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दिल्ली

दिल्ली प्रोटेस्ट कवर कर रहे पत्रकारों पर पुलिसिया कहर; प्रज्ञा मिश्रा, श्याम मीरा सिंह समेत कई डिटेन किए गये!

Policewomen in khaki uniforms restrain a woman in an orange sari as a reporter holds a microphone nearby in a street scene.
Man on a raised platform shouting, raising a yellow-microphone in his right hand as a dense crowd reaches up toward him at night.

नई दिल्ली। दिल्ली में जारी विरोध प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों और स्वतंत्र पत्रकारों पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा और श्याम मीरा सिंह समेत कई लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर है। प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने और मौके पर कथित मारपीट के एक वीडियो के सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या दिल्ली में पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने का मौका मिल रहा है?

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक छोटे वीडियो में एक अधेड़ व्यक्ति को प्रदर्शनकारियों और स्वतंत्र पत्रकारों के साथ कथित तौर पर मारपीट करते देखा जा सकता है। वीडियो को लेकर दावा किया जा रहा है कि व्यक्ति ने मुस्लिम टोपी पहन रखी थी और श्याम मीरा सिंह ने उसकी पहचान को लेकर सवाल उठाए थे। इसके बाद उन्हें दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया।

हालांकि, वीडियो की पूरी पृष्ठभूमि, संबंधित व्यक्ति की पहचान और घटनाक्रम के क्रम की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि श्याम मीरा सिंह को हिरासत में लेने के पीछे पुलिस ने क्या कारण बताया है।

प्रदर्शन के बीच पत्रकारों की भूमिका पर सवाल

किसी भी विरोध प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों का काम घटनास्थल पर मौजूद रहकर तथ्यों को सामने लाना, हिंसा या अव्यवस्था की स्थिति को दर्ज करना और अलग-अलग पक्षों का बयान जनता तक पहुंचाना होता है। यदि रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों के साथ मारपीट होती है या उन्हें उनके काम के कारण हिरासत में लिया जाता है, तो यह प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल बन जाता है।

Man in a red plaid shirt is restrained by soldiers in camouflage as reporters with microphones crowd around during a tense street scene.

इस मामले में भी यह जानना जरूरी है कि कथित मारपीट करने वाले व्यक्ति के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई और मौके पर मौजूद पत्रकारों की शिकायत पर पुलिस ने क्या कदम उठाए। यदि पत्रकार किसी व्यक्ति की भूमिका या गतिविधि पर सवाल उठा रहे थे, तो पुलिस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें हिरासत में लेने की जरूरत क्यों पड़ी।

क्या प्रदर्शन को बदनाम करने की कोशिश हुई?

वायरल वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या कोई व्यक्ति प्रदर्शन के दौरान विवाद पैदा कर रहा था और क्या उसकी गतिविधियों से प्रदर्शन की छवि प्रभावित हो सकती थी। कुछ लोग यह आशंका भी जता रहे हैं कि कहीं बाहरी लोगों के जरिए प्रदर्शन को बदनाम करने की कोशिश तो नहीं हुई।

लेकिन उपलब्ध वीडियो के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि संबंधित व्यक्ति को किसी संगठन या पुलिस ने प्रदर्शन को बदनाम करने के लिए भेजा था। इस दावे की पुष्टि के लिए व्यक्ति की पहचान, उसकी भूमिका, पूरी घटना के वीडियो और पुलिस की जांच से जुड़े तथ्यों का सामने आना जरूरी है।

सबसे अहम सवाल यह है कि यदि मौके पर मारपीट हुई, तो पुलिस ने मारपीट करने वाले व्यक्ति के खिलाफ क्या कार्रवाई की और घटना को रिकॉर्ड करने वाले पत्रकारों को हिरासत में लेने का आधार क्या था? दिल्ली पुलिस को इन सवालों का जवाब देना चाहिए।

अमित शाह की जिम्मेदारी पर भी सवाल

दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आती है। ऐसे में राजधानी में विरोध प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ पत्रकारों की सुरक्षा और उनके काम में अनावश्यक बाधा न आने देना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से इस घटनाक्रम पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई है या नहीं, इसकी पुष्टि आवश्यक है। हालांकि, गृह मंत्री की व्यक्तिगत भूमिका पर निष्कर्ष निकालने से पहले पुलिस की कार्रवाई, प्रशासनिक निर्देशों और संबंधित अधिकारियों के जवाब को देखना जरूरी होगा।

दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरें और मारपीट के वायरल वीडियो ने प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चिंता बढ़ाई है। अब दिल्ली पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए कि हिरासत में लिए गए पत्रकारों के खिलाफ क्या आधार था, कथित मारपीट की जांच कैसे की जा रही है और प्रदर्शनस्थल पर पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

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