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सुख-दुख

भारत की राजनीति से गायब हो चुके वामपंथ के लिए नेहा बोरा थोड़े अच्छे दिन लेकर आई हैं!

Woman with glasses and black shirt walking in a protest crowd, foreground focus with a colorful protest sign in the background. Moment captured outdoors among other protesters and trees.

यशवंत सिंह-

मोदी जी को बधाई। एक शानदार वामपंथी नेता को देशव्यापी प्रतिष्ठा दिलाने के लिए। नेहा बोरा और आइसा, दोनों को अच्छी ब्रांडिंग मिली। बहुत दिन बाद किसी युवा वामपंथी नेता के पीछे लोग पागल हैं।

जब तक वामपंथी पार्टियां कांग्रेस की पिछलग्गू रहीं, ख़ुद वामपंथ और कांग्रेस का सफाया होता गया। दक्षिणपंथी ताकतें मजबूत होती गईं। अंततः कांग्रेस और वामपंथ का खात्मा हुआ। दक्षिणपंथ के अच्छे दिन आ गए। लेकिन कहते हैं न, एक ऊँचाई के बाद निचाई शुरू हो जाती है। पतन के एक लेवल के बाद उत्थान शुरू हो जाता है।

दक्षिणपंथ के चरम दिनों में वामपंथ का रिवाइवल हो रहा है।

वामपंथ हमेशा सड़कों खेतों खलिहानों में संघर्ष कर निखरता है जिसे करना वामपंथी कबका छोड़ चुके हैं। लेकिन नेहा बोरा ने सब रिवाइव कर दिया। देखना, कहीं नेहा बोरा सबसे बड़ा और सबसे मुख्य विपक्षी चेहरा न बन जाए। ऐसा होगा तो इसमें पूरा योगदान वर्तमान केंद्र सरकार का होगा। दमन संघर्ष उत्पीड़न के खदानों से ही हीरे निखर कर सामने आते हैं।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी हासिल नेहा बोरा हैं। हाँ वो बोलते समय गर्दन ज़्यादा हिलाती हैं। वे सिर्फ़ बोलती नहीं बल्कि दिल से बोलती हैं जिसकी तस्दीक उनकी देह भाषा भी करती है।

हाँ नेहा बोरा के रूप में देश को एक नया भगत सिंह मिला है। भगत सिंह आज के युग में होते तो कैसे होते। नेहा बोरा जैसे होते। दक्षिणपंथ के चरम दिनों में वामपंथ का एक सितारा चमका है। देखना है इसका प्रकाश कितनी दूर कितने देर तक फैलता है।

भारत की राजनीति से गायब हो चुके वामपंथ के लिए नेहा बोरा थोड़े अच्छे दिन लेकर आई हैं।

वामपंथ की सबसे बड़ी दिक्कत इनके अति विद्वान नेताओं का अहंकार और अतिशय महत्वाकांक्षा है। इस कारण सब अपनी अपनी छोटी छोटी दुकानें खोलकर बैठे हैं। नेहा बोरा के सामने एक वृहद वामपंथी मोर्चा बनाने की चुनौती है जिसकी छतरी तले सभी बुड्ढे वाम नेताओं को लाना चाहिए।

हालांकि मुझे बुड्ढे नेताओं पर तनिक भरोसा नहीं हैं इसलिए नेहा बोरा चाहें तो इन्हें लात मारकर अपनी युवा टीम को ही बहुत बड़ा बना दें जिसमें विलीन और समाहित होना बाक़ी सभी वामपंथियों की मजबूरी हो जाए।

नेहा बोरा को लाल सलाम!
हम होंगे कामयाब एक दिन!

मैं भी कभी लाल कार्ड होल्डर था। सोच रहा हूँ नेहा बोरा की पार्टी की फिर से सदस्यता ले लूँ, बशर्ते बुढ़वे कामरेडवा सब टंगड़ी न मार दें!

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