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वेब-सिनेमा

रिपब्लिक भारत के इस रिपोर्टर ने अपने साथी के साथ मिलकर सीजेपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हंगामा काटा!

Male news reporter in a pinstripe suit speaking into a mic with a red R logo.

दीपक गोस्वामी-

ये है वो रिपब्लिक भारत का रिपोर्टर जिसने आज सीजेपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हंगामा किया। इसके साथ इसका एक और साथी था।

बीच प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही दोनों अपनी-अपनी कुर्सियों पर चढ़ गए और किसी पॉलिटिकल एक्टिविस्ट की तरह माइक पर जोर-जोर से चीखने लगे।

दूसरे पत्रकारों ने मना भी किया। फिर इन्हें प्रेस कॉन्फ्रेंस से बाहर कर दिया गया।

भाजपा पोषित गोदी मीडिया के ऐसे ही पेड वर्कर लगातार सीजेपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हंगामा करने भेजे जाते हैं। कभी Pyara Hindustan नामक सोशल मीडिया हैंडल से, कभी Headlines India नामक सोशल मीडिया हैंडल से और अब रिपब्लिक भारत से इन गुंडों को भेजा गया है।

जिन दो हैंडल्स के ऊपर नाम गिनाए हैं। इनका काम ही प्रति रील के हिसाब से पेमेंट उठाना है। इनके पेज खंगालिये, ये गली के उन गुंडों की तरह हैं जो 1000-500 रुपये के लिए किसी भी अपराध को अंजाम दे दें।

अब जब सीजेपी के प्रोटेस्ट में गोदी मीडिया के रिपोर्टर्स की हूटिंग होती है तो स्वतंत्र मीडिया के लोग कहने लगते हैं, ‘रिपोर्टर्स तो मजबूर होता है। असली ज़हर एंकर फैलाता है।’

लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। मैं हमेशा कहता हूं कि फील्ड पर मौजूद रिपोर्टर भी ज़हर फैलाने में उतना ही भागीदार होता है, जितना कि स्टूडियो में बैठा एंकर। इसलिए इन पर दया मत कीजिए।

इस नफ़रती चिंटू को देखकर आज मेरी बात से कई लोग सहमत होंगे क्योंकि गोदी मीडिया के रिपोर्टर्स का असली चेहरा उनके सामने आ गया है।

इसलिए सीजेपी के प्रोटेस्टर्स हूटिंग करके जो ट्रीटमेंट इन्हें देते हैं, वो एकदम सही है। गोदी मीडिया के तो हर रिपोर्टर को खदेड़ा जाना चाहिए।

हाथ में माइक लेकर ख़ुद को पत्रकार समझ रहे इस नफ़रती चिंटू को पत्रकारिता का ‘प’ भी नहीं पता। प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकार का काम आयोजकों की बात ख़त्म होने के बाद सवाल करना होता है। दुनिया में आज तक ऐसा पत्रकार नहीं देखा जो बीच प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुर्सी पर चढ़कर सरकार के समर्थन में नारे लगाने लगे।

इस मूर्ख को कोई किसी पत्रकारिता के कॉलेज में दाखिला दिलाओ या इसे इंटरव्यू के लिए आईसआईस, तालिबानी और हाफिज सईद के पास भेजो।

देश और दुनिया में ढेरों ऐसे पत्रकार हुए जो कुख्यात अपराधियों, आतंकवादियों और नक्सलवादियों के बीच गए और उनका इंटरव्यू लेकर आए। बिल्कुल शांत स्वभाव से। इस गधे के बीज को उनका इंटरव्यू लेने भेज दिया जाता तो वहां भी पत्रकारिता के सिद्धांत को ताक पर रखने की ऐसी हरकत कर देता। फिर इसका जो हाल होता आप कल्पना कर लीजिए। इसे ज़िंदा एक ही सूरत में छोड़ा जाता कि ये उनके अड्डे की बसंती बनकर उनका एंटरटेनमेंट करता रहे, ‘जब तक है जां, जाने जहां, मैं नाचूंगी… ’

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