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नॉर्वे के अखबार ने लिखा- ‘मोदी का दुःस्वप्न जारी है’, कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दिपके पर पूरे पेज की टिप्पणी!

Newspaper front page with a close-up photo of Narendra Modi and a bold headline reading 'Modis mareritt fortsetter' beneath the image, Nyheter logo top right.

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके की गिरफ्तारी की गूंज अब यूरोप तक पहुंच गई है। नॉर्वे की राजधानी ओस्लो से निकलने वाले राष्ट्रीय अखबार डागसाविसेन (Dagsavisen) ने दिपके पर पूरे पेज की टिप्पणी छापी है। शीर्षक है- “Modis mareritt fortsetter” यानी “मोदी का दुःस्वप्न जारी है”। उपशीर्षक में लिखा है कि इस गर्मी में मोदी कॉकरोचों के आगे झुके थे, अब वे दांत दिखा रहे हैं। पेज पर दिपके की बड़ी तस्वीर है, जो एपी के फोटोग्राफर अजय राही की खींची हुई है।

यह टिप्पणी अखबार की कमेंटेटर हेले लिंग स्वेंडसेन ने लिखी है। उन्होंने बताया कि मंगलवार सुबह उन्होंने दिपके से बात की। दिपके ने उनसे कहा, “वे विमान में ऐसे घुसे जैसे मैं कोई आतंकवादी हूं।”

स्वेंडसेन ने अपनी टिप्पणी की शुरुआत नॉर्वे के ही संदर्भ से की है। उनके मुताबिक मई में नॉर्वे के राजा ने शाही महल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘ग्रैंड क्रॉस’ सम्मान दिया था। पांच महीने बाद भारत के नए विपक्ष कहे जा रहे आंदोलन के नेता प्रदर्शन में जाते हुए गिरफ्तार कर लिए गए। लेख के अनुसार ‘कॉकरोच’ आंदोलन उसी हफ्ते इंस्टाग्राम पर एक व्यंग्य अकाउंट के रूप में शुरू हुआ था, जब मोदी नॉर्वे में थे, और कुछ ही महीनों में यह भारत का सबसे चर्चित युवा आंदोलन बन गया।

दिपके एक पॉलिटिकल कम्युनिकेशन स्ट्रैटजिस्ट और एक्टिविस्ट हैं, जिन्होंने 16 मई 2026 को इस पार्टी की स्थापना की थी। पार्टी का नाम भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) की पैरोडी है।

दिल्ली पुलिस ने शनिवार 10 अक्टूबर को दिपके और पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास व आशुतोष रांका को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग वाले प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिया। मुंबई से आई फ्लाइट के दिल्ली में उतरते ही पुलिसकर्मी विमान में दाखिल हुए। पुलिस का कहना है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी, इसलिए यह कार्रवाई की गई। अगले दिन रविवार को एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कोर्ट ने तीनों नेताओं को इस शर्त पर रिहा किया कि एक साल तक शांति भंग नहीं करेंगे। इसी दौरान दिपके की दादी के निधन की खबर भी आई।

नॉर्वेजियन अखबार लिखता है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में 13 करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम हटाए गए हैं। आयोग का कहना है कि यह सूचियों को अपडेट करने के लिए है, जबकि आंदोलन का आरोप है कि नाम उन इलाकों में ज्यादा कटे जहां विपक्ष मजबूत है। लेख में न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से यह भी कहा गया है कि दो वरिष्ठ अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर पुनरीक्षण को राजनीति से प्रेरित बताया। दिपके ने ज्ञानेश कुमार के बारे में कहा, “वोटों की हेराफेरी के पीछे वही हैं।”

स्वेंडसेन के मुताबिक गर्मियों में युवाओं ने एक महीने से ज्यादा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ प्रदर्शन किया और आखिर उन्हें पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया। तब मोदी को झुकना पड़ा, लेकिन इस बार वे टस से मस नहीं हो रहे। लेख में दावा है कि प्रदर्शन से पहले वाले शुक्रवार को दिल्ली आने वाली ट्रेनें रद्द की गईं, प्रदर्शन वाले इलाकों में इंटरनेट बंद किया गया और जंतर-मंतर का प्रदर्शन स्थल का दर्जा खत्म कर दिया गया।

इंटरव्यू में दिपके ने मोदी को “फासीवादी तानाशाह” कहा और इसके पीछे गर्मियों में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज को वजह बताया। उनका कहना था, “पुलिस ने लड़कियों को पीटा, उनकी गर्दन पकड़ी। मैंने अपनी आंखों से पुलिसवालों को किशोरों को मारते देखा।”

लेख के अनुसार दिल्ली पुलिस का कहना है कि यह आंदोलन हिंसक है। दिपके इससे साफ इनकार करते हैं। उनका कहना है कि वे 20 जुलाई को हिंसा भड़कने से पहले एक महीने से ज्यादा शांति से प्रदर्शन कर चुके थे, और उनका आरोप है कि सरकार ने अराजकता फैलाने के लिए लोग भेजे थे। दिपके ने कहा कि वे डटे रहेंगे, चाहे महीनों या सालों जेल में रहना पड़े। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी CJP पर तीखा हमला बोला है।

टिप्पणी के आखिर में स्वेंडसेन ने अपने देश को भी कठघरे में खड़ा किया है। उनका कहना है कि नॉर्वे में ट्रंप के हर कदम की आलोचना होती है, लेकिन मोदी को ग्रैंड क्रॉस खुशी-खुशी दे दिया जाता है क्योंकि भारत अहम है। उनके शब्दों में, नॉर्वे ने उस शख्स को सम्मानित करना चुना जिसने यह लोकतांत्रिक संकट पैदा किया। जब उन्होंने दिपके से पूछा कि आंदोलन कब तक चलेगा, तो जवाब था- जब तक चुनाव आयुक्त नहीं जाते और मतदाताओं को उनका वोट का हक वापस नहीं मिलता। लेख इस सवाल पर खत्म होता है- भारत आखिर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, है ना?

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