दिल्ली में प्रदर्शन की कवरेज के दौरान पुलिस हिरासत में लिए गए स्वतंत्र फोटोग्राफर विवेक सागर अब अपना कैमरा ठीक कराने या नया कैमरा खरीदने के लिए आर्थिक मदद जुटा रहे हैं। उनका आरोप है कि हिरासत के दौरान उनका कैमरा क्षतिग्रस्त हो गया और फोन भी उनसे ले लिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि घटना के दौरान उनके फोन से तस्वीरें डिलीट कर दी गईं। सागर का कहना है कि फोन वापस पाने के लिए वह कई बार पुलिस थाने जा चुके हैं, लेकिन अब तक उन्हें फोन नहीं मिला है।

फोटोग्राफी के जरिए आजीविका चलाने वाले विवेक सागर सार्वजनिक कार्यक्रमों और सड़क पर होने वाली घटनाओं को अपने कैमरे में दर्ज करते हैं। उपकरण खराब होने और फोन वापस नहीं मिलने से उनका काम प्रभावित हुआ है। अब वह कैमरे की मरम्मत कराने या नया उपकरण खरीदने के लिए लोगों से आर्थिक मदद की अपील कर रहे हैं।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब दिल्ली में प्रदर्शनों की कवरेज करने वाले पत्रकारों और फोटोग्राफरों के साथ पुलिस के व्यवहार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों के साथ कथित मारपीट और उत्पीड़न का मामला सुनवाई के लिए आया था। सुनवाई के दौरान पत्रकारों की पहचान और उन्हें मिलने वाली सुरक्षा पर भी चर्चा हुई।
सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत हर किसी के पत्रकार होने का दावा करने की स्थिति में मुश्किल पैदा होती है। वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने डिजिटल दौर में पत्रकारों की पहचान से जुड़ी चुनौती का जिक्र करते हुए कहा कि आज के तकनीकी युग में मोबाइल रखने वाला कोई भी व्यक्ति पत्रकार हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए दिशा-निर्देशों पर विचार करने के संकेत दिए। इसमें मान्यता प्राप्त पत्रकारों के साथ स्वतंत्र रूप से काम करने वाले और डिजिटल माध्यमों पर रिपोर्टिंग करने वाले लोगों के लिए सुरक्षा उपायों का सवाल भी शामिल है। हालांकि, इस संबंध में अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
यह सुनवाई मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध में हुए प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं के बाद हुई। पत्रकारों ने पुलिस पर दुर्व्यवहार और उनके फोन जब्त करने के आरोप लगाए थे।
कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) के मुताबिक, 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में कम से कम 39 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया था। संगठन ने समाचार रिपोर्टों, साक्षात्कारों और सत्यापित सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर यह जानकारी जुटाई। बाद में संगठन ने दिल्ली और दूसरे शहरों में इन प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लिए गए पत्रकारों की संख्या कम से कम 43 बताई। ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया और तीन महिला पत्रकारों की ओर से पुलिसकर्मियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए जाने का उल्लेख किया।
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस का कहना था कि प्रदर्शन में कुछ लोगों ने खुद को पत्रकार बताया और पुलिस के कामकाज में बाधा डाली। वहीं, पत्रकारों और मीडिया संगठनों ने ऐसे लोगों को हिरासत में लिए जाने पर सवाल उठाए, जिन्होंने अपनी पहचान प्रेस के सदस्य के रूप में बताई थी।
विवेक सागर का मामला स्वतंत्र पत्रकारों और फोटोग्राफरों के सामने आने वाली आर्थिक चुनौतियों को भी उजागर करता है। किसी मीडिया संस्थान से जुड़े पत्रकारों को अक्सर कैमरा, फोन और अन्य जरूरी उपकरण संस्थान की ओर से उपलब्ध कराए जाते हैं। जरूरत पड़ने पर उन्हें संपादकीय और कानूनी सहायता भी मिल सकती है। लेकिन स्वतंत्र रूप से काम करने वाले फोटोग्राफरों को अपने उपकरणों, यात्रा और मरम्मत का खर्च खुद उठाना पड़ता है।
उनकी कमाई असाइनमेंट मिलने या तस्वीरें बेचने पर निर्भर हो सकती है। ऐसे में कैमरा खराब होने या फोन और उसमें मौजूद सामग्री तक पहुंच नहीं मिलने से न सिर्फ काम रुकता है, बल्कि कमाई पर भी असर पड़ता है।
विवेक सागर फिलहाल अपने उपकरण वापस पाने और कैमरे की मरम्मत या उसे बदलने के लिए आर्थिक मदद जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका मामला इस बड़े सवाल से भी जुड़ता है कि किसी मीडिया संस्थान से जुड़े बिना सार्वजनिक घटनाओं की रिपोर्टिंग और फोटोग्राफी करने वाले लोगों को किस तरह की सुरक्षा मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर चर्चा शुरू हो चुकी है, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारों और फोटोग्राफरों के लिए सुरक्षा के स्पष्ट दायरे को लेकर स्थिति अभी तय नहीं हुई है।


