योगेश किसलय-
छी! ऐसे संपादकीय ज्ञान पर
संपादक जी, अगर ज्ञान नहीं है तो भोकाल मत कीजिए। ये जो खबरों में आलंकारिक शीर्षक लगाने का पागलपन सवार है न, उस पर नियंत्रण कीजिए। क्या आपको लगता है कि मां गंगा का आहार बच्चों की जान है? बच्चे नदी में डूबे तो नदियों का पेट भरता है क्या? आपको थोड़ी भी शर्म नहीं है? उन बच्चों की मां को कैसा लग रहा होगा, जिन्हें आप गंगा का भोग कह रहे हैं। वैसे भी गंगा को मां गंगा माना जाता है। उन्हें अपने बच्चों का भोग चाहिए क्या?
हैरत तो यह भी है कि पटना से लेकर रांची, भोपाल, जयपुर तक किसी महाज्ञानी संपादक को यह समझ में नहीं आया कि क्या छपने जा रहा है।

आप एक पार्टी के पक्ष में प्रोपेगेंडा कर रहे हैं, करिए न। हम तो यह जानते हुए आपका अखबार खरीद रहे हैं, लेकिन असंवेदनशीलता की यह हद बर्दाश्त नहीं है। मैं चालीस साल से इसी पेशे का नमक खा रहा हूं, इसलिए तकलीफ होती है। आप कबीलांठ बनने के चक्कर में नंगे हो जा रहे हैं।
वैसे भी लीड खबरों की हेडिंग सीधी-सपाट होनी चाहिए। उसमें साहित्यिक विद्वता नहीं दिखानी चाहिए। भीतर के बहुत से पृष्ठ हैं, जिनमें अपनी साहित्यिक कलाकारी दिखाइए न। अच्छा चलिए, आपका अखबार है, आप जैसे चलाएं, लेकिन ये जो शीर्षक लगाए हैं, वे निहायत ही बेहूदा है। आपने गंगा भक्तों, हिंदू आस्था का मजाक ही नहीं उड़ाया, उन बच्चों की मृत्यु का भी मजाक उड़ाया और दुःख की इस घड़ी में उनके मां-बाप से ठिठोली की है।
नवरात्र मां की आराधना का पर्व है। वह उन बच्चों की मां हो या गंगा मां या दुर्गा मां, आपने अपनी घटिया सोच को उजागर किया है।
ईश्वर आपको सद्बुद्धि दे और मृत बच्चों की मां तथा मां गंगा आपको क्षमा करें।
आनंद कुमार-
राजा सागर के 60 हजार पुत्रों को जीवनदान देने वाली पतित पावनी मां गंगा को एक अखबार ने 13 मासूम बच्चों का भोग लगाने वाली बता दिया.. ये घृणित विचार ही कैसे मन में आया?
छी..छी.. न खबर की गंभीरता की समझ न करोड़ों हिंदुओं की आस्था की चिंता!
आज सुबह से इस शीर्षक पर पत्रकारों की प्रतिक्रियाओं को देख रहा हूं.. वाजिब गुस्सा है, लेकिन जब नेशनल एडिटर और मालिक द्वारा की जाने वाली सम्पादकीय समीक्षाओं में सबसे अलग न दिखने पर सार्वजनिक रूप से जलील होने का प्रेशर हो.. तो ऐसी ही उटपटांग पंक्तियां शीर्षक बनती हैं…
शीर्षक में तुकबंदी का फैशन अलग ही नशा है.. कुछ लोगों को हर शीर्षक में तुकबंदी करनी है.. मुझे याद है, मैं तब रांची में हिंदुस्तान अखबार का पहला पन्ना देखा करता था.. विधानसभा का सत्र चल रहा था.. अर्जुन मुंडा की सरकार थी.. निर्दलीय मधु कोड़ा खान मंत्री थे और अपने क्षेत्र में बनने वाली हाट गम्हरिया-बरायबुरू सड़क के ठेके पर उनको आपत्ति थी…
हमारे संपादक स्मृति शेष हरिनारायण सिंह जी थे, मगर पटना से कुछ दिन के लिए एक डीआरई भेजे गए थे.. पटना में रहते भी वे खूब तुकबंदियाँ करते थे और रांची में उनकी कोशिश रहती थी की मुख्य खबरों के शीर्षक में तुकबंदी रहे..
तो हुआ ये कि विधानसभा में सरकार ने घटिया सड़क बनाने वाले ठेकेदार को क्लीन चिट दे दी… ठेकेदार जमशेदपुर वाले शंभू सिंह थे, जो अर्जुन मुंडा के करीबी माने जाते थे.. मधु कोड़ा गुस्से से आग-बबूला हो गए और सदन में मुख्यमंत्री के साथ उनकी तीखी बहस हुई.. इसी घटना के बाद एनडीए को समर्थन दे रहे मधु कोड़ा लापता हो गए थे और बाद में यूपीए खेमे में प्रकट होकर निर्दलीय मुख्यमंत्री बनकर हर मामले में इतिहास रचा..
खैर यह खबर सीधी- सपाट गंभीर हेडिंग के साथ लीड लगी.. जब मैं पेज दिखाने के लिए डीआरई साहब के पास गया, तो उन्होंने कहा कि मजा नहीं आ रहा है.. इसमें कुछ तुकबंदी नहीं बैठ रही है.. कई तरह के विकल्प उन्होंने सुझाए.. पर तुकबंदी बैठ नहीं रही थी..
डाक एडिशन लेट हो रहा था.. झुंझलाकर मैंने एक शीर्षक सुझाया.. शीर्षक कुछ ऐसा था : “ठेकेदार बेदाग-कोड़ा हुए आग”… डीआरई साहब ने कहा – वाह.. यही तो चाहिए था और वह शीर्षक पास हो गया.. छपा भी..
ऐसे ही बिहार के इन सम्पादक जी को लगा होगा कि खबर तो हर जगह लीड ही जाएगी.. हम ऐसा क्या करें कि हर जगह हमारी चर्चा हो.. तो अब हर जगह चर्चा हो रही है..

