चंदन बंगारी-
पत्रकारिता सवाल पूछने की ताकत है, किसी को डराने का लाइसेंस नहीं…
देहरादून। खुद को न्यूज प्लेटफॉर्म का संचालक बताने वाले अनुज अग्रवाल की गिरफ्तारी से पत्रकारिता के नाम पर होने वाली कथित वसूली को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। पटेलनगर कोतवाली पुलिस ने अनुज अग्रवाल को कथित ब्लैकमेलिंग के मामले में गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, आरोपी के पास से तीन मोबाइल फोन और एक डायरी बरामद हुई है। कुछ गोपनीय वीडियो मिलने की बात भी सामने आई है, जिनकी जांच की जा रही है। पुलिस के अनुसार आरोपी हिस्ट्रीशीटर है।
इस घटनाक्रम के बहाने एक व्यापक समस्या पर चर्चा जरूरी है। सोशल मीडिया के दौर में न्यूज प्लेटफॉर्म शुरू करना और खुद को पत्रकार बताना पहले से बहुत आसान हुआ है। लेकिन पत्रकारिता केवल मोबाइल, माइक, सोशल मीडिया पेज तक सीमित नहीं है। इसके लिए तथ्यों की समझ, निष्पक्षता, जवाबदेही और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता भी जरूरी है।
चिंता तब बढ़ती है, जब खबर प्रकाशित करने या न करने के नाम पर कथित दबाव बनाने, निजी विवादों को प्रचारित करने की धमकी देने अथवा किसी को बदनाम करने की आशंका दिखाकर अनुचित लाभ लेने जैसी शिकायतें सामने आती हैं।
कहीं जमीन का विवाद, कहीं मकान का मामला, कहीं राजनीतिक विरोध तो कहीं व्यक्तिगत हित। यदि पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल ऐसे मामलों में अनुचित दबाव बनाने के लिए किया जाता है, तो यह न केवल संबंधित व्यक्ति के अधिकारों के लिए चिंता का विषय है, बल्कि पूरे पत्रकारिता जगत की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करता है।
सवाल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। सवाल उस प्रवृत्ति का है, जिसमें पत्रकारिता को जनसेवा के बजाय निजी लाभ का माध्यम बनाने की कोशिश होती है। हालांकि, यह भी उतना ही जरूरी है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ लगे आरोपों को जांच और अदालत के निर्णय से पहले अंतिम सच न माना जाए। आलोचना तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए और कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होना चाहिए।
निष्पक्ष पत्रकारिता में सवाल पूछे जाते हैं, लेकिन सवालों की आड़ में अनुचित दबाव बनाने की जगह नहीं होती। भ्रष्टाचार उजागर करना पत्रकारिता है, जबकि किसी को डराकर अनुचित लाभ लेने का आरोप एक अलग और गंभीर विषय है, जिसकी जांच कानून के अनुसार होनी चाहिए।
विडंबना यह है कि कथित अनैतिक गतिविधियों के कारण ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों की साख पर भी सवाल उठने लगते हैं। जबकि बड़ी संख्या में पत्रकार सीमित संसाधनों और तमाम चुनौतियों के बावजूद जनता की आवाज उठाने का काम करते हैं। कैमरा पकड़ना आसान हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता अर्जित करना आसान नहीं है।
जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता के नाम पर अनुचित दबाव या कथित वसूली की शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो, दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए और वास्तविक पत्रकारिता की गरिमा बनाए रखने के लिए संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। आखिरकार, पत्रकारिता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसकी पहचान जनहित, निष्पक्षता और सच के प्रति प्रतिबद्धता से होनी चाहिए।



