डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 को लेकर न्यूज़रूमों की बेचैनी अब औपचारिक चिट्ठी की शक्ल में सरकार की मेज़ पर है। निजी न्यूज़ चैनलों और डिजिटल प्रकाशकों के संगठन न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (NBDA) ने केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव से मांग की है कि क़ानून में पत्रकारिता के काम के लिए साफ़ और लिखित वैधानिक छूट दी जाए।
NBDA की दलील सीधी है- सरकार कहती रही है कि उसका इरादा पत्रकारिता की आज़ादी पर रोक लगाने का नहीं है, तो यह भरोसा क़ानून में दर्ज हो, और वह भी DPDP एक्ट की मुख्य ज़िम्मेदारियां लागू होने से पहले। संगठन ने सरकार से उसका रुख़ लिखित में स्पष्ट करने को कहा है, साथ ही यह भी पूछा है कि संशोधन होने तक मौजूदा क़ानून के तहत कौन-सी अंतरिम सुरक्षा दी जा सकती है।
चिट्ठी में जो डर गिनाए गए हैं, वे हर खोजी रिपोर्टर के रोज़ के काम से जुड़े हैं। NBDA के मुताबिक़ सहमति की शर्त से जिस व्यक्ति की पड़ताल हो रही है, उसे पहले ही भनक लग सकती है; वह सहमति देने से मना कर सकता है, गोपनीय स्रोत उजागर हो सकते हैं और सबूत मिटाए जा सकते हैं। सहमति वापस लेने और डेटा मिटाने के अनुरोधों का इस्तेमाल सही ख़बरें और उनके रिकॉर्ड हटवाने में हो सकता है। जानकारी मांगने की शक्तियों से गोपनीय सूत्रों या अप्रकाशित जांच तक पहुंच बनाई जा सकती है।
संगठन का कहना है कि क़ानून में मौजूद छूटें और “वैध उपयोग” के प्रावधान जनहित की पत्रकारिता के लिए आम आधार नहीं देते, और ढांचे का इस्तेमाल पत्रकारों व न्यूज़रूमों पर दबाव बनाने में हो सकता है। जुर्मानों को उसने बेहद कठोर और बोझिल बताया है। NBDA ने यह भी याद दिलाया कि यह क़ानून जस्टिस बी.एन. श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट और यूरोप के GDPR के अनुच्छेद 85 जैसे ढांचों से अलग है, जहां पत्रकारिता को छूट दी गई है।
NBDA ने मंत्री और मंत्रालय के अफ़सरों से मुलाक़ात का समय मांगा है और कहा है कि पत्रकारिता-छूट का दायरा और भाषा तय करने वाली किसी भी बातचीत में उसे शामिल किया जाए। रिपोर्ट में संगठन के किसी पदाधिकारी का नाम या बयान नहीं है, और मंत्रालय का जवाब भी अभी सामने नहीं आया है।
बड़े चैनल मालिकों का यह संगठन जब ख़ुद लिखकर कह रहा है कि क़ानून स्रोतों और जांच को ख़तरे में डालता है, तो ज़िलों के उन पत्रकारों की सोचिए जिनके पास न वकील हैं, न संगठन।

