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यशवंत सिंह की अगुवाई में भड़ास लड़ रहा मजीठिया की लड़ाई

मीडिया में सिर्फ एक फीसद मस्त-मस्त संप्रदाय सारस्वत है और बाकी लोग अस्पृश्य बंधुआ मजदूर …; बहरहाल मोदियापे में मशगूल मीडिया कर्मियों से हमारा सवाल है कि लंबे तेरह साल के इंतजार के बाद माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो मजीठिया अपनी देखरेख में लागू करने का फैसला किया है, उसमें समानता और न्याय कितना है, क्या वेतनमान मिला, ठेके पर जो हैं, उनको क्या मिला, ग्रेडिंग और कैटेगरी में कितनी ईमानदारी बरती गयी और दो-दो प्रमोशनों के बाद उनकी हैसियत क्या है, पहले इस पर गौर करें तो आम जनता पर क्या कहर बरप रहा है, उसका तनिक अंदाज आपको हो जाये। ‘भड़ास4मीडिया’ जैसे मंचों से उनकी बात सिलसिलवार सामने आ रही है और हमें इसके लिए यशवंत सिंह का आभार मानना चाहिए। लेकिन सिर्फ पत्रकार उत्पीड़ित नहीं हैं, जिनके लिए वे आवाज बुलंद कर रहे हैं। हम मीडिया उनके हवाले छोड़ आम जनता के मसले उठा रहे हैं।

मीडिया में सिर्फ एक फीसद मस्त-मस्त संप्रदाय सारस्वत है और बाकी लोग अस्पृश्य बंधुआ मजदूर …; बहरहाल मोदियापे में मशगूल मीडिया कर्मियों से हमारा सवाल है कि लंबे तेरह साल के इंतजार के बाद माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो मजीठिया अपनी देखरेख में लागू करने का फैसला किया है, उसमें समानता और न्याय कितना है, क्या वेतनमान मिला, ठेके पर जो हैं, उनको क्या मिला, ग्रेडिंग और कैटेगरी में कितनी ईमानदारी बरती गयी और दो-दो प्रमोशनों के बाद उनकी हैसियत क्या है, पहले इस पर गौर करें तो आम जनता पर क्या कहर बरप रहा है, उसका तनिक अंदाज आपको हो जाये। ‘भड़ास4मीडिया’ जैसे मंचों से उनकी बात सिलसिलवार सामने आ रही है और हमें इसके लिए यशवंत सिंह का आभार मानना चाहिए। लेकिन सिर्फ पत्रकार उत्पीड़ित नहीं हैं, जिनके लिए वे आवाज बुलंद कर रहे हैं। हम मीडिया उनके हवाले छोड़ आम जनता के मसले उठा रहे हैं।

बहरहाल, यशवंत सिंह की अगुवाई में भड़ास4मीडिया पर मजीठिया सिफारिशों से न्याय दिलाने के लिए सिलसिलेवार आंदोलन चल रहा है और मीडियाकर्मियों का जबर्दस्त समर्थन है लेकिन सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में कितना मजीठिया लागू हो पाया अब तक और सितारा अखबारों में पत्रकारिता का जोश का अंजाम क्या है, इसे मीडिया कर्मी की जांच लें और समझ लें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश हाथी के दांत कैसे-कैसे हैं।

कम-से-कम एक आदेश तो लागू हो गयो रे कि मोदियापा का देश हुई गयो हमार देश। मोदी का चेहरा चमके भी,  दमके भी और गायब हुआ रे देश यह फिसड्डी।

किस्सा कुछ यूं है कि बंगाल में सबसे बड़े मीडिया ग्रुप में बंगाल के सारे साहित्यकार कलाकार संस्कृतिकर्मी बंधुआ हैं, के उन्हें उनकी औकात बनाने में, ग्रुम करने में और फिर बाजार का आइकन बनाकर बेचना ही इस ग्रुप का कारोबार है। वह केसरिया हुआ है।

हिंदी वालों को इस ग्रुप का एक उत्पाद बता रहे हैं, सो वो हैं तसलीमा नसरीन। बाजार ने जिनका जीवन नर्क बनाया हुआ है और इस ग्रुप की ओर से हांका लगाकर मछलियों के गले में हुक फंसाने का काम किया करते थे भारतीय साहित्य और संस्कृति को महानगरीय साफ्ट कोक में तब्दील करके जनपदों को हाशिये पर डालकर मुक्त बाजार की जमीन पकाने वाले महामहिम सारे। उनका नाम भी सार्वजनीन हैं।

इस ग्रुप में बाजार में बेचने से पहले सबको छापते रहने का रिवाज है और झूठ को कला के उत्कर्ष में बदलने की दक्षता की ट्रेनिंग यहीं दी जाती है।

इस गुरुकुल से प्रशिक्षित तमामो हिंदी अंग्रेजी राजनेता भी अब बिलियनर राजनेता खेल खिलाड़ी पिलाड़ी हुआ करे हैं।

यह तरीका भारतीय भाषाओं में मराठी से लेकर ओड़िया और असमिया में भी है जो मूल मीडिया मोड अंग्रेजी का है और सांस्कृतिक वर्चस्व का यह चामत्कारिक कलाकौशल है। जहां बाकी जनता तमाशबीन है और अहा, कि आनंद स्थाईभाव।

हिंदी में चूंकि रंगभेद जातिभेद और नस्ली भेदभाव स्थाई भाव है तो यहां चुन चुनकर मसीहा निर्माण होता है बहुतै सावधानी से कहीं वर्चस्व का आलम टूटे नहीं…..

लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार पलाश विश्वास के लेख का अंश ‘हस्तक्षेप’ से साभा

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