साधना न्यूज वर्सेज भड़ास : तीस हजारी कोर्ट पहुंचे यशवंत का कचहरीनामा पढ़ें

Yashwant Singh आज कचहरी का दाना पानी उड़ाया। चांपना न्यूज़ नाम से भड़ास पर जो व्यंग्य छपा था, साधना न्यूज़ वालों ने उसको लेकर मुकदमा किया हुआ है। आज उनके गवाह का क्रॉस था जिसे बखूबी अंज़ाम दिया सीनियर वकील हिमाल अख्तर भाई ने। भड़ास का ये केस हिमाल भाई बिल्कुल मुफ्त में लड़ रहे …

सरवाइकल के भयंकर दर्द की चपेट में यशवंत, देखें लोग क्या-क्या दे रहे सलाह!

Yashwant Singh : सरवाइकल का दर्द क्या होता है, कोई मुझसे पूछे। दाहिने हिस्से के सिर से लेकर गर्दन पीठ कंधा हाथ तक में दर्द की लहरें उठ रहीं हैं। लैपटॉप, मोबाइल पर झुक कर देर तक काम और ढेर सारे तकिए लगाकर सोने की बुरी आदत ने फाइनली सीवियर सर्वाइकल पेन को निमंत्रित कर …

यशवंत सीख रहे वीडियो एडिटिंग, देखें उनकी पहली वीडियो स्टोरी

Yashwant Singh : प्रिंट मीडिया का आदमी रहा हूं. कंपोजिंग, एडिटिंग, रिपोर्टिंग, पेज मेकिंग आदि में एक दशक तक जीता-मरता रहा. फिर वेब मीडिया में आया तो यहां आनलाइन लिखने-पढ़ने, खबर-फोटो अपलोड करने के अलावा एचटीएमएल, कोडिंग से लेकर टेंपलेट्स, माड्यूल्स, प्लगइन, सर्वर आदि तक सीखने-जानने की कोशिश करते एक दशक बिता दिया. अब विजुवल मीडिया को सीखने की बारी है. वैसे भी स्मार्टफोन और फ्री डाटा के कारण विजुवल मीडिया में जबरदस्त क्रांति का दौर है. सो इसमें कदम रखते हुए अब वीडियो एडिटिंग सीख रहा हूं.

प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में यशवंत हारे, देखें नतीजे

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Yashwant Singh : टोटल 1750 वोट पड़े हैं जिनमें 500 वोटों की गिनती हो चुकी है। इस आधार पर कहें तो सत्ताधारी पैनल क्लीन स्वीप की तरफ है। मैनेजिंग कमेटी के लिए जो 16 लोग चुने जाने हैं उनमें 500 वोटों के आधार पर मेरी पोजीशन 23 नम्बर पर है। चमत्कार की कोई गुंजाइश आप पाल सकते हैं। मैंने तो हार कुबूल कर लिया है। प्रेस क्लब के इस चुनाव में शामिल होकर इस क्लब को गहरे से जानने का मौका मिला जो मेरे लिए एक बड़ा निजी अनुभव है। नामांकन करने से लेकर बक्सा सील होने, बैलट वाली मतगणना देखना सुखद रहा। अब साल भर तैयारी। अगले साल फिर लड़ने की बारी। सपोर्ट के लिए आप सभी को बहुत बहुत प्यार। इतना समर्थन देखकर दिल जुड़ा गया। ये अलग बात है कि जो क्लब के टोटल वोटर है, उनमें बड़ी संख्या में मुझसे और मैं उनसे अपरिचित हूं। साल भर में इन सबसे जुड़ने की कोशिश किया जाएगा और अगली साल ज्यादा प्रोफेशनल तरीके से लड़ा जाएगा।

कल मतगणना शुरू होने के ठीक बाद उपरोक्त स्टेटस यशवंत ने फेसबुक पर डाला था.

पीसीआई चुनाव : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार!

Naved Shikoh : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार! क्योंकि ये ऐसा पत्रकार ने जो ब्रांड अखबारों की नौकरी छोड़कर शोषित पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहा है। इस क्रान्तिकारी पत्रकार ने अपने कॅरियर को दांव पर लगाकर, वेतन गंवाया.. तकलीफें उठायीं. मुफलिसी का सामना किया.. जेल गये.. सरकारों से दुश्मनी उठायी… ताकतवर मीडिया समूहों के मालिकों /उनके मैनेजमेंट से टकराये हैं ये। छोटे-बड़े अखबारों, न्यूज चैनलों में पत्रकारों का शोषण /महीनों वेतन ना मिलना/बिना कारण निकाल बाहर कर देना.. इत्यादि के खिलाफ कितने पत्रकार संगठन सामने आते हैं? कितने प्रेस क्लब हैं जहां पत्रकारों की इन वाजिब समस्याओं के समाधान के लिए कोई कदम उठाया जाता है!

आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं

दिवाली में दिए ज़रूर जलाएं, लेकिन खुद के दिलो-दिमाग को भी रोशन करते जाएं. सहज बनें, सरल बनें, क्षमाशील रहें और नया कुछ न कुछ सीखते-पढ़ते रहें, हर चीज के प्रति संवेदनशील बनें, बने-बनाए खांचों से उबरने / परे देखने की कोशिश करें, हर रोज थोड़ा मौन थोड़ा एकांत और थोड़ा ध्यान जरूर जिएं.

दी वायर और सिद्धार्थ वरदराजन की पत्रकारीय राजनीति पर शक करिए और नज़र रखिए, वजह बता रहे हैं यशवंत सिंह

Yashwant Singh : भाजपा ने सबको सेट कर रखा है। अब कांग्रेस वाले कुछेक पोर्टलों से काम चला रहे हैं तो इतनी बेचैनी क्यों। मुकदमा ठोंक के भाजपा ने रणनीतिक गलती की है। मुद्दे को देशव्यापी और जन-जन तक पहुंचा दिया। एक वेबसाइट को करोङों की ब्रांडिंग दे दी। तहलका वालों ने कांग्रेस परस्ती में बहुत-सी भाजपा विरोधी ‘महान’ पत्रकारिता की। मौका मिलते ही भाजपा शासित गोआ में तरुण तेजपाल ठांस दिए गए। उनके साथ हवालात में क्या क्या हुआ था, उन दिनों गोआ में तैनात रहे बड़े पुलिस अधिकारी ऑफ दी रिकार्ड बता सकते हैं।

इन खबरों के कारण भड़ास संपादक यशवंत पर हमला किया भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी ने!

साढ़े छह साल पुरानी ये वो खबरें है जिसको छापे जाने की पुरानी खुन्नस में शराब के नशे में डूबे आपराधिक मानसिकता वाले भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी ने किया था भड़ास संपादक यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब आफ इंडिया में हमला… इसमें सबसे आखिरी खबर में दूसरे हमलावर अनुराग त्रिपाठी द्वारा स्ट्रिंगरों को भेजे गए पत्र का स्क्रीनशाट है जिसके आखिर में उसका खुद का हस्ताक्षर है… ये दोनों महुआ में साथ-साथ थे और इनकी कारस्तानियों की खबरें भड़ास में छपा करती थीं… बाद में दोनों को निकाल दिया गया था…

भड़ास4मीडिया पर पहला मुकदमा मृणाल पांडेय के सौजन्य से एचटी मीडिया ने किया था

बेकार बैठीं मृणाल पांडेय को मिल गया चर्चा में रहने का नुस्खा!

Yashwant Singh : मृणाल पांडेय ने जो लिखा कहा, उस पर बहुत लोग लिख कह रहे हैं. कोई पक्ष में कोई विपक्ष में. आजकल का जो राजनीतिक विमर्श है, उसमें अतिवादी टाइप लोग ही पूरा तवज्जो पा रहे हैं, महफिल लूट रहे हैं. सो इस बार मृणाल पांडेय ही सही. मेरा निजी अनुभव मृणाल को लेकर ठीक नहीं. तब भड़ास4मीडिया की शुरुआत हुई थी. पहला पोर्टल या मंच या ठिकाना था जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बड़े-बड़े मठाधीश संपादकों को चैलेंज कर रहा था, उनकी हरकतों को उजागर कर रहा था, उनकी करनी को रिपोर्ट कर रहा था.

यशवंत हजारों पीड़ितों को स्वर दे रहे हैं, भगवान उन्हें दीर्घायु दें

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह पर हमले की खबर पढ़कर मन बहुत व्यथित हुआ। साथ ही इससे बहुत खिन्नता भी उपजी, आज के पत्रकारिता जगत के स्वरूप को लेकर। यशवंत सिंह पर हमला करने वाले निश्चित रूप से मानसिक रूप से दिवालिया हैं। यह बात भी तय है कि वे तर्क और सोचविहीन हैं।

पत्रकार कहे जाने वालों का यशवंत जैसे एक निर्भीक पत्रकार पर हमला बेहद शोचनीय है : अविकल थपलियाल

Avikal Thapliyal : कोहरा घना है… बेबाक और निडर पत्रकारों पर हमले का अंदेशा जिंदगी भर बना रहता है। भाई यशवंत को भी एक दिन ऐसे घृणित हमले का शिकार होना ही था। बीते वर्षों में हुई मुलाकात के दौरान मैंने यशवंत का ध्यान इस ओर खींचा भी था। लेकिन मुझे ऐसा लगता था कि कई बार फकीराना अंदाज में सभी को गरियाने वाले यशवंत किसी अपराधी या फिर विशेष विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले हिंसक लोगों के कोप का भाजन बनेंगे। लेकिन पत्रकार कहलाये जाने वाले ही अपने बिरादर भाई यशवंत की नाक पर दिल्ली प्रेस क्लब में हमला कर देंगे, यह नहीं सोचा था।

हमलावर लोग कायर होते हैं, इसलिए हारना अंततः उन्हें ही होता है…

Anoop Gupta : पत्रकार यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के बाहर हमला किया गया और पुलिस की चुप्पी तो समझ आती है, प्रेस क्लब की चुप्पी के मायने क्या हैं। अगर यशवंत का विरोध करना ही है तो लिख कर कीजिये, बोल कर कीजिए, हमला करके क्या साबित किया जा रहा है। मेरा दोस्त है यशवंत, कई बार मेरे मत एक नहीं होते, ये जरूरी भी नहीं है लेकिन हम आज भी दोस्त हैं। चुनी हुई चुप्पियों और चुने हुए विरोध से बाहर निकलने की जरूरत है।

हे ईश्वर, हमलावर भुप्पी और अनुराग को क्षमा करना, वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं..

Shrikant Asthana : प्रेस क्लब आफ इंडिया परिसर में यशवंत पर हमला हुए कई दिन बीत चुके हैं। अपराधियों की पहचान भी सबके सामने है। फिर भी न पुलिस कार्रवाई का कुछ पता है, न ही इनके संस्थानों की ओर से। क्या हम बड़ी दुर्घटनाओं पर ही चेतेंगे? कौन लोग इन अपराधियों को बचा रहे हैं? वैसे भी, कथित मेनस्ट्रीम मीडिया के बहुत सारे कर्ता-धर्ता तो चाहते ही हैं कि वे यशवंत की चटनी बना कर चाट जाएं। इस श्रेणी से ऊपर के मित्रों-शुभचिंतकों से जरूर आग्रह किया जा सकता है कि वे उचित कार्रवाई के लिए दबाव बनाएं। अपनी फक्कड़ी में यशवंत किसी को अनावश्यक भाव देता नहीं। लगभग ‘कबीर’ हो जाना उसे यह भी नहीं समझने देता कि यह 15वीं-16वीं शती का भारत नहीं है। First hand account of attack on Yashwant Singh : https://www.youtube.com/watch?v=MgGks6Tv2W4 I’m very thankful to friends who have shown deep concern about the incident and are likely to help create due pressure.

‘यशवंत बड़ा वाला लंकेश है, इसे जान से मारना चाहिए था!’

Naved Shikoh : दिल्ली प्रेस क्लब में यशवंत भाई पर होता हमला तो मैंने नहीं देखा लेकिन लखनऊ के प्रेस क्लब में कुछ भाई लोगों को इस घटना पर जश्न मनाते जरूर देखा। पुराने दक्षिण पंथी और नये भक्तों के साथ फ्री की दारु की बोतलें भी इकट्ठा हो गयीं थी। आरोह-अवरोह शुरू हुआ तो गौरी लंकेश की हत्या से बात शुरु हुई और यशवंत पर हमले से बात खत्म हुई। कॉकटेल जरूर हो गयी थी लेकिन वामपंथियों को गरियाने के रिदम का होश बरकरार था।

पत्रकारिता में ‘सुपारी किलर’ और ‘शार्प शूटर’ घुस आए हैं, इनकी रोकथाम न हुई तो सबके चश्मे टूटेंगे!

Rajiv Nayan Bahuguna : दिल्ली प्रेस क्लब ऑफ इंडिया परिसर में एक उद्दाम पत्रकार यशवंत सिंह को दो “पत्रकारों” द्वारा पीटा जाना कर्नाटक में पत्रकार मेध से कम चिंताजनक और भयावह नहीं है। दरअसल जब से पत्रकारिता में लिखने, पढ़ने और गुनने की अनिवार्यता समाप्त हुई है, तबसे तरह तरह के सुपारी किलर और शार्प शूटर इस पेशे में घुस आए हैं। वह न सिर्फ अपने कम्प्यूटर, मोबाइल और कैमरे से अपने शिकार को निशाना बनाते हैं, बल्कि हाथ, लात, चाकू और तमंचे का भी बेहिचक इस्तेमाल करते हैं।

शैतानी ताकतों के हमले में चश्मा टूटा… ये लो नया बनवा लिया… तुम तोड़ोगे, हम जोड़ेंगे.. : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : चश्मा नया बनवा लिया। दो लम्पट और आपराधिक मानसिकता वाले कथित पत्रकारों भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी द्वारा धोखे से किए गए हमले में चश्मा शहीद हो गया था, पर मैं ज़िंदा बच गया। सो, नया चश्मा लेना लाजिमी था। वो फिर तोड़ेंगे, हम फिर जोड़ेंगे। वे शैतानी ताकतों के कारकून हैं, हम दुवाओं के दूत। ये ज़ंग भड़ास के जरिए साढ़े नौ साल से चल रही है। वे रूप बदल बदल कर आए, नए नए छल धोखे दिखलाए, पर हौसले तोड़ न पाए।

दो बददिमाग और विक्षिप्त कथित पत्रकारों द्वारा यशवंत पर हमले के बाद हमारी बिरादरी को सांप क्यों सूंघ गया?

Padampati Sharma : क्या किसी पत्रकार के समर्थन में मोमबत्ती दिखाने या विरोध ज्ञापित करने के लिए उसका वामपंथी या प्रगतिशील होना जरूरी है? यदि ऐसा नहीं है तो सिर्फ पत्रकार हित के लिए दिन रात एक करने वाले यशवंत सिंह पर दो बददिमाग मानसिक रूप से विक्षिप्त कथित पत्रकारों द्वारा किये गए हमले पर हमारी बिरादरी को क्यों सांप सूंघ गया? यशवंत के बहाने पत्रकारों की आवाज दबाने का कुत्सित प्रयास करने वाले की मैं घोर निंदा करता हूं.

यशवंत किसी विचारधारा-गिरोहबाजी के आधार पर किसी को रियायत नहीं देते, इसलिए गिरोहबाजों ने चुप्पी साध रखी है!

Vivek Satya Mitram : प्रेस क्लब में हाल ही में जमा हुए पत्रकारों! इस मामले पर कहां जुटान है? इसका भी खुलासा हो जाए। वैसे भी ये हमला तो प्रेस क्लब के बाहर ही हुआ। एक वरिष्ठ पत्रकार पर कुछ ‘गुंडा छाप’ पत्रकारों द्वारा। फिर भी ना तो प्रेस क्लब के पदाधिकारियों को फर्क पड़ा ना ही साथी पत्रकारों को। Yashwant Singh को करीब से जानने वाले जानते होंगे कि वो पिछले एक दशक से गौरी जैसी ही निर्भीक पत्रकारिता कर रहे हैं। महज़ इसलिए कि वो इस हमले में ज़िंदा बच गए, पत्रकारों को उनके लिए न्याय नहीं चाहिए?

हमलावर नंबर एक भुप्पी भी मिल गया फेसबुक पर, देखें-जानें इसकी हकीकत

Yashwant Singh : फेसबुक पर मिल गया हमलावर नम्बर एक भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी। हमलावर नंबर दो अनुराग त्रिपाठी की तरह इसने भी मुझे फेसबुक और ट्विटर पर ब्लॉक कर रखा है ताकि खोजने पर ये न मिले। हमले के अगले ही दिन दोनों ने मुझे सोशल मीडिया पर ब्लाक कर दिया। क्यों? शायद उस डर से कि उन लोगों को खोजा न जा सके और उनकी करनी जगजाहिर न की जा सके। मुझे वाकई सोशल मीडिया पर खोजते हुए भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी नहीं मिले। फिर मैंने दोस्तों को टास्क दिया। इसके बाद पहले अनुराग त्रिपाठी की कुंडली मिली। अब भुप्पी का भी पता चल गया है।

भड़ास वाले यशवंत पर हमला दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन चौंकाता नहीं : देवेंद्र सुरजन

Devendra Surjan : बेबाक निडर और साहसी पत्रकार Yashwant Singh पर हमला होना दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन चौंकाता बिलकुल नहीं. इस असंवेदनशील युग में जिसकी भी आप निडरता से आलोचना करोगे, वह आपका दुश्मन हो जाएगा. यशवंत भाई इसी इंस्टेंट दुश्मनी के शिकार हुए हैं लेकिन उन्हें अपनी भड़ास निकालना नहीं छोड़ना चाहिए. गौरी और उस जैसे दस और पत्रकारों ने इसी निडरता की कीमत अपने जीवन की आहुति देकर चुकाई है. अगला नम्बर किसी का भी हो सकता है. यशवंत सिंह जी जो करें, अपने जीवन को सुरक्षित रखते हुए करें क्योंकि उन जैसों की ही आज देश और समाज को जरूरत है.

देशबंधु अखबार समूह के निदेशक देवेंद्र सुरजन की एफबी वॉल से.

यशवंत सिंह पर कैसे हुआ हमला, सुनिए उनकी जुबानी (देखें वीडियो)

प्रेस क्लब आफ इंडिया के गेट पर भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह पर दो लफंगानुमा पत्रकारों ने हमाला किया. इनमें से एक का नाम भूपेंद्र सिंह भुप्पी है और दूसरा अनुराग त्रिपाठी है. प्रेस क्लब के भीतर ये दोनों यशवंत को देखने के बाद अपनी टेबल से उठकर यशवंत की टेबल पर आ गए और बैठकर यशवंत की तारीफें किए जा रहे थे, गले मिल रहे थे. बाहर निकलने पर धोखे से हमला कर दिया.

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब गेट पर भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी ने किया हमला

(कोबरा पोस्ट में प्रकाशित यशवंत पर हमले की खबर का स्क्रीनशाट)

भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह पर चार सितंबर की रात करीब साढ़े दस बजे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के गेट पर जानलेवा हमला हो गया. यशवंत को बुरी तरह से मारा-पीटा गया और गालियां दी गई. भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने अपनी फेसबुक वाल पर घटना की जानकारी देते हुए लिखा, ”अटैक हो गया गुरु। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के गेट पर। बहुत मारा पीटा मुझे। पार्ट ऑफ जॉब ही है। भूपेंद्र सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी की कारस्तानी है। जाने किस खबर की बात करके पीटा उसने।” इस हमले में यशवंत का चश्मा टूट गया और नाक, कान, गर्दन, होंठ पर चोट आई है.

अपराधी को हिरासत से भगाने वाली गाजीपुर पुलिस ने निर्दोष बुजुर्ग का मोबाइल फोन छीन लिया!

Yashwant Singh : ग़ज़ब है यूपी का हाल। अपराधी भाग गया हिरासत से तो खिसियानी पुलिस अब बुजुर्ग और निर्दोष को कर रही परेशान। मेरे बुजुर्ग चाचा रामजी सिंह का फोन ग़ाज़ीपुर की नन्दगंज थाने की पुलिस ने छीना। बिना कोई लिखा पढ़ी किए ले गए। अब बोल रहे फोन हिरासत में लिया है। शर्मनाम है यह सब। जो पुलिस वाले नशे में होकर अपराधी को भगाने के जिम्मेदार हैं, उनको तो अरेस्ट किया नहीं होगा, एक बुजुर्ग को ज़रूर घर से उठा ले गए और फोन छीन लिया। चाचाजी फिलहाल लौट आए हैं, लेकिन फोन पुलिस ने रख लिया। यही है मोदी-योगी राज का स्मार्ट और डिजिटल इंडिया। राह चलते आदमी का फोन पुलिस छीन ले जाए और पूछने पर कहे कि फोन हिरासत में लिया है। माने बिना लिखा पढ़ी किसी का भी फोन छीनकर हिरासत में लेने का अधिकार है पुलिस को? यूपी की पुलिस कभी न सुधरेगी।

44 के हुए यशवंत को वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय ने यूं दी बधाई

Dayanand Pandey : आज हमारे जानेमन यारों के यार यशवंत सिंह का शुभ जन्म-दिन है। व्यवस्था से किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत सिंह से सीखे। अपनों से भी किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत से सीखे। यहां तक कि अपने-आप से भी किसी को टकराना सीखना हो तो भी वह यशवंत से सीखे। अपने आप को गाली सुनाने और सुनने की क्षमता भी किसी को पानी हो तो यशवंत से पाए। पारदर्शिता की इंतिहा भी हैं यशवंत सिंह।

भड़ास4मीडिया के भविष्य को लेकर यशवंत ने क्या लिया फैसला, जानें इस एफबी पोस्ट से

Yashwant Singh : ऐ भाई लोगों, कल हम पूरे 44 के हो जाएंगे. इलाहाबाद में हायर एजुकेशन की पढ़ाई के दौरान ओशो-मार्क्स के साथ-साथ अपन पामोलाजी-न्यूमरोलॉजी की किताब पर भी हाथ आजमाए थे. उस जमाने में हासिल ज्ञान से पता चलता है कि मेरा जन्मांक 8 और मूलांक 9 है. जन्मांक छब्बीस का छह और दो जोड़कर आठ बना इसलिए आठ हुआ. मूलांक तारीख, महीना और साल जोड़कर पता किया जाता है जो मेरा 9 होता है. इस बार जो 26 अगस्त सन 2017 है, इसका योग 8 बैठ रहा. 44 साल का होने के कारण चार प्लस चार यानि आठ हो रहा. मतलब जन्मांक और मूलांक दोनों आठ हो रहा है. ग़ज़ब संयोग या दुर्योग, जो कहिए, बैठ रहा है इस बार. वैसे, अपन तो कई साल पहले लिख चुके हैं कि बोनस लाइफ जी रहा हूं, इसलिए हर दिन जिंदाबाद. 🙂

आज रिलीज ‘राग-देश’ और ‘इंदु सरकार’ क्यों हैं मस्ट वॉच फिल्में, बता रहे हैं यशवंत

Yashwant Singh : ऐसा बहुत कम होता है कि एक ही दिन दो अलग-अलग सच्ची घटनाओं पर आधारित, दो अलग-अलग ऐताहासिक कालखंडों पर केंद्रित फिल्में रिलीज हो जाएं. आज ऐसा हुआ है. ‘राग देश’ और ‘इंदु सरकार’ नामक दो फिल्में आज शुक्रवार के दिन रिलीज हुई हैं. दोनों सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं और दोनों ही घटनाएं इतिहास के चर्चित अध्याय हैं.

”आप ठहरे भड़ासी पत्रकार, कोई आम आदमी होता तो फर्जी मुकदमे लादे जाते और जेल काट कर ही बाहर आता”

पिछले दिनों भड़ास के संपादक यशवंत सिंह के साथ यूपी के गाजीपुर जिले की पुलिस ने बेहद शर्मनाक व्यवहार किया. यशवंत अपने मित्र प्रिंस सिंह के साथ रेलवे स्टेशन पान खाने गए और कुछ लोगों की संदिग्ध हरकत को देखकर एसपी को सूचना दी तो एसपी के आदेश पर आए कोतवाल ने यशवंत व उनके मित्र को ही पकड़ कर कोतवाली में डाल दिया. इस पूरे मामले पर यशवंत ने विस्तार से फेसबुक पर लिखकर सबको अवगत कराया. यशवंत की एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा इस प्रकार हैं… मूल पोस्ट नीचे कमेंट्स खत्म होने के ठीक बाद है… 

Mamta Kalia इस घटना से पुलिस का जनता के प्रति रवैया पता चलता है। मैंने एक बार अपने घर मे हुई चोरी की रपट लिखवाई थी। पुलिस ने मुझे अलग अलग तारीखों में कोर्ट बुला कर इतना परेशान किया कि मैंने लिख कर दे दिया मुझे कोई शिकायत नहीं। केस बन्द किया जाय।

रेलवे स्टेशन पर पान खाने गए यशवंत पहुंचा दिए गए कोतवाली!

Yashwant Singh : रात मेरे साथ कहानी हो गयी। ग़ाज़ीपुर रेलवे स्टेशन पर पान खाने गया लेकिन पहुंचा दिया गया कोतवाली। हुआ ये कि स्टेशन पर मंदिर के इर्द गिर्द कुछ संदिग्ध / आपराधिक किस्म के लोगों की हरकत दिखी तो एसपी को फोन कर डिटेल दिया। उनने कोतवाल को कहा होगा। थोड़ी ही देर में मय लाव लश्कर आए कोतवाल ने मंदिर के पास वाले संदिग्ध लोगों की तरफ तो देखा नहीं, हम दोनों (मेरे मित्र प्रिंस भाई) को तत्काल ज़रूर संदिग्ध मानकर गाड़ी में जबरन बिठा कोतवाली ले गए। मुझे तो जैसे आनंद आ गया। लाइफ में कुछ रोमांच की वापसी हुई। कोतवाल को बताते रहे कि भाया हम लोगों ने तो संदिग्ध हरकत की सूचना दी और आप मैसेंजर को ही ‘शूट’ कर रहे हो।

बचपन के मित्र बिग्गन महाराज के गुजरने पर यशवंत ने यूं दी श्रद्धांजलि : ‘दोस्त, अगले जनम अमीर घर ही आना!’

Yashwant Singh : गांव आया हुआ हूं. कल शाम होते-होते बिग्गन महाराज के गुजर जाने की खबर आई. जिस मंदिर में पुजारी थे, वहीं उनकी लाश मिली. उनके दो छोटे भाई भागे. मंदिर में अकेले चिरनिद्रा में लेटे बड़े भाई को लाद लाए. तख्त पर लिटाकर चद्दर ओढ़ाने के बाद अगल-बगल अगरबत्ती धूप दशांग जला दिया गया. देर रात तक बिग्गन महाराज के शव के पास मैं भी बैठा रहा. वहां उनके दोनों सगे भाइयों के अलावा तीन-चार गांव वाले ही दिखे.

‘टाइम मशीन’ पर सवार यशवंत ने ये जो देखा-महसूसा!

Yashwant Singh : कल शाम कामधाम निपटा कर टहलने निकला तो मन में आने वाले खयाल में क्वालिटेटिव चेंज / ग्रोथ देख पा रहा था. लगा जैसे अपन तो इस दुनिया के आदमी ही नहीं. जैसे किसी ‘टाइम मशीन’ पर सवार हो गया था. अगल-बगल दिख रही चुपचाप खड़ी कारों, मकानों, पेड़ों, सूनी सड़कों, गलियों से रूबरू होते गुजरते सोचने लगा कि मान लो यह सब जलमग्न हो जाए, किसी महा प्रलय के चलते तो मछलियां इन्हीं कारों में अपना घर बसाएंगी और ये बहुत गहरे दबे पेड़ नई सभ्यताओं के लिए कोयला तेल आदि का भंडार बनेंगे… मतलब, कुछ भी बेकार नहीं जाना है.. सब रीसाइकिल होना है…