यशवंत सीख रहे वीडियो एडिटिंग, देखें उनकी पहली वीडियो स्टोरी

Yashwant Singh : प्रिंट मीडिया का आदमी रहा हूं. कंपोजिंग, एडिटिंग, रिपोर्टिंग, पेज मेकिंग आदि में एक दशक तक जीता-मरता रहा. फिर वेब मीडिया में आया तो यहां आनलाइन लिखने-पढ़ने, खबर-फोटो अपलोड करने के अलावा एचटीएमएल, कोडिंग से लेकर टेंपलेट्स, माड्यूल्स, प्लगइन, सर्वर आदि तक सीखने-जानने की कोशिश करते एक दशक बिता दिया. अब विजुवल मीडिया को सीखने की बारी है. वैसे भी स्मार्टफोन और फ्री डाटा के कारण विजुवल मीडिया में जबरदस्त क्रांति का दौर है. सो इसमें कदम रखते हुए अब वीडियो एडिटिंग सीख रहा हूं.

इसी क्रम में आज एक ऐसी वीडियो स्टोरी तैयार की जिसमें आपको कई सारे बुनियादी तकनीकी ज्ञान नजर आ जाएंगे… वीडियो काटना, वीडियोज मर्ज करना, बैकग्राउंड म्यूजिक, यूट्यूब चैनल का लोगो, फोटो स्लाइड्स, वायसओवर, वायस पिच एडिटिंग आदि देख पाएंगे, इसी एक वीडियो में… ये लर्निंग किसी इंस्टीट्यूट में नहीं बल्कि एक मेरे ही जैसे सीखने को आतुर मित्र के पिछले दो महीने में दिन-रात एक कर आनलाइन सर्च और खुद की समझ के जरिए हासिल ज्ञान के मुझ तक हस्तांतरण के माध्यम से हुई. वीडियो लिंक कमेंट बाक्स में है. देख कर बताइएगा, तकनीकी रूप से कैसा बन पाया है ये वीडियो… और हां, आप भी सीखते-सिखाते रहिए… कभी प्रकृति नेचर से सीखिए तो कभी तकनीकी को जानिए-बूझिए. जय जय… शुक्रिया… वीडियो ये रहा…

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें:  

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प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में यशवंत हारे, देखें नतीजे

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Yashwant Singh : टोटल 1750 वोट पड़े हैं जिनमें 500 वोटों की गिनती हो चुकी है। इस आधार पर कहें तो सत्ताधारी पैनल क्लीन स्वीप की तरफ है। मैनेजिंग कमेटी के लिए जो 16 लोग चुने जाने हैं उनमें 500 वोटों के आधार पर मेरी पोजीशन 23 नम्बर पर है। चमत्कार की कोई गुंजाइश आप पाल सकते हैं। मैंने तो हार कुबूल कर लिया है। प्रेस क्लब के इस चुनाव में शामिल होकर इस क्लब को गहरे से जानने का मौका मिला जो मेरे लिए एक बड़ा निजी अनुभव है। नामांकन करने से लेकर बक्सा सील होने, बैलट वाली मतगणना देखना सुखद रहा। अब साल भर तैयारी। अगले साल फिर लड़ने की बारी। सपोर्ट के लिए आप सभी को बहुत बहुत प्यार। इतना समर्थन देखकर दिल जुड़ा गया। ये अलग बात है कि जो क्लब के टोटल वोटर है, उनमें बड़ी संख्या में मुझसे और मैं उनसे अपरिचित हूं। साल भर में इन सबसे जुड़ने की कोशिश किया जाएगा और अगली साल ज्यादा प्रोफेशनल तरीके से लड़ा जाएगा।

कल मतगणना शुरू होने के ठीक बाद उपरोक्त स्टेटस यशवंत ने फेसबुक पर डाला था.

Abhishek Srivastava : प्रधानजी को नापसंद लुटियन की दिल्ली से खास खबर- प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के पत्रकारों ने एक स्वर में आरएसएस समर्थित चुनावी पैनल को किया खारिज, यथास्थिति कायम। गौतम-विनय-मनोरंजन का पैनल भारी मतों के अंतर से विजयी। सभी दोस्तों और बड़ों का दिल से शुक्रिया जिन्होंने मुझे और मेरे पैनल को वोट दिया।

मैनेजिंग कमेटी सदस्य के लिए विजयी हुए सत्ताधारी पैनल वाले अभिषेक श्रीवास्तव ने उपरोक्त स्टेटस चुनाव नतीजे आने के बाद पोस्ट किया.

Ashwini Kumar Srivastava : दिल्ली प्रेस क्लब के चुनाव में Abhishek Srivastava और उसके पैनल ने विजयश्री हासिल कर ली है। हालांकि अभिषेक का जैसा विराट व्यक्तित्व, अद्भुत समझ, समाज से गहरा सरोकार, जबरदस्त संघर्षशीलता और अपार लोकप्रियता रही है, उस हिसाब से यह चुनाव या यह जीत उसके लिए कोई मायने नहीं रखती। मगर मैं जानता हूँ कि प्रेस क्लब और बाकी पत्रकारों के लिए जरूर यह जीत खासी अहम है। जीत की इस खुशी में मुझे एक दुख भी है…और वह है Yashwant Singh के हारने का। यशवंत जी पर भी मैं अपनी किसी अगली पोस्ट में लिखूंगा लेकिन फिलहाल अभी अभिषेक की ही बात करते हैं।

मुझे ठीक से तो याद नहीं लेकिन शायद मैं 2001-02 के उस दौर में अभिषेक से पहली बार मिला था, जब वह आईआईएमसी में मेरे ठीक बाद वाले बैच में पढ़ रहा था। तब उसके बाकी बैचमेट सामान्य आईआईएमसीएन की ही तरह बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों में नौकरी पाने के लिए इस कदर आतुर रहते थे कि किसी भी सीनियर आईआईएमसीएन को पाकर न सिर्फ निहाल हो जाते थे बल्कि तरह तरह के सवाल पूछकर जान भी खा जाते थे।

जबकि अभिषेक इन सबसे अलग था। वह तब भी जेनएयू और अन्य सार्वजनिक मंचों या राजनीतिक/सांस्कृतिक संगठनों में जोरदार तरीके से एक्टिव था। मैं नवभारत टाइम्स में नौकरी कर रहा था और मैं भी संयोग से जेनएयू में जन संस्कृति मंच से जुड़ा हुआ था और मित्रों के साथ राजनीतिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया करता था।

आईआईएमसी करने के बाद के बरसों में अभिषेक ने शायद ही देश का कोई ऐसा मीडिया संस्थान हो, जहां पर सिलेक्शन प्रोसेस में टॉप में अपनी जगह न बनाई हो और शायद ही कोई ऐसा संस्थान हो, जहां उसने नौकरी का एक साल भी पूरा किया हो। मीडिया की नौकरी उसके लिए और वह नौकरी के लिए बने ही नहीं हैं। टाइम्स ग्रुप में भी वह मेरे साथ कुछ समय रहा। लेकिन उसके अभूतपूर्व क्रांतिकारी स्वभाव ने टाइम्स ग्रुप में संपादकीय विभाग से लेकर मैनेजमेंट तक में जबरदस्त खलबली मचा दी थी। बतौर सीनियर भले ही अभिषेक मुझे हमेशा से सम्मान देता रहा हो लेकिन वहां रहने के दौरान उसने मुझे भी कभी नहीं बख्सा और लगातार मेरी भी गलतियां सार्वजनिक तौर पर अखबार रंग कर बाकी सभी जूनियर-सीनियर्स की तरह खिल्ली उड़ाने के अपने रोजमर्रा के कार्यक्रम में शामिल कर लिया था।

हालांकि उसी दौर में देर रात हम लोग महफिलों में भी साथ ही शरीक भी होते थे। क्योंकि मैंने कभी उसकी इस बात का बुरा ही नहीं माना। वह इसलिए क्योंकि मैं या जो भी शख्स अगर अभिषेक को जानता-पहचानता होगा, तो उसे यह अच्छी तरह से पता होगा ही कि अभिषेक अपने आदर्श, मूल्य और विचारधारा के तराजू पर सबको बराबर तौलता है।

अभिषेक की सबसे खास बात, जिसने मुझे हमेशा ही उसका फैन बनाया है, वह यह है कि अपने 10-12 साल के मीडिया कैरियर में मुझे अभिषेक के अलावा ऐसा एक भी पत्रकार नहीं मिला, जिसे हर मीडिया संस्थान या बड़े पत्रकार ने सर माथे पर बिठाया हो लेकिन उसके बावजूद उसने नौकरी या मीडिया से जुड़े किसी भी अन्य फायदे के लिए कभी अपनी विचारधारा, क्रांतिकारी स्वभाव और व्यक्तित्व में एक रत्ती का भी बदलाव न किया हो। मगर अभिषेक ऐसा ही है। मीडिया में सबसे अनूठा और एकमात्र….सिंगल पीस।

एक से बढ़कर एक नौकरियां उसे लगातार बुलाती भी रहीं, बुलाकर पछताती भी रहीं पर अभिषेक बाबू नहीं बदले। अंग्रेजों के जमाने के जेलर की तरह इतनी बदलियों के बाद भी अगर अभिषेक नहीं बदले तो इस चुनाव की जीत से भी अभिषेक के बदलने की कोई गुंजाइश मुझे नहीं दिखती। जाहिर है, इसका फायदा अब पत्रकारों और प्रेस क्लब को ही होगा….क्योंकि वहां चुनाव जीत कर भी अभिषेक के न बदलने का सीधा मतलब यही है कि अब वहां के हालात और राजनीति जरूर कुछ न कुछ तो बदलने ही लगेगी।

बहरहाल, यही उम्मीद है कि सार्वजनिक/राजनीतिक जीवन में पहला औपचारिक कदम रखकर अभिषेक ने जब सही दिशा पकड़ ही ली है तो कम से कम अब भविष्य में हमें वह इसी क्षेत्र में और बड़ी भूमिकाएं निभाते हुए भी नजर आएंगे। ढेर सारी बधाइयां और शुभकामनाएं…

पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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पीसीआई चुनाव : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार!

Naved Shikoh : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार! क्योंकि ये ऐसा पत्रकार ने जो ब्रांड अखबारों की नौकरी छोड़कर शोषित पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहा है। इस क्रान्तिकारी पत्रकार ने अपने कॅरियर को दांव पर लगाकर, वेतन गंवाया.. तकलीफें उठायीं. मुफलिसी का सामना किया.. जेल गये.. सरकारों से दुश्मनी उठायी… ताकतवर मीडिया समूहों के मालिकों /उनके मैनेजमेंट से टकराये हैं ये। छोटे-बड़े अखबारों, न्यूज चैनलों में पत्रकारों का शोषण /महीनों वेतन ना मिलना/बिना कारण निकाल बाहर कर देना.. इत्यादि के खिलाफ कितने पत्रकार संगठन सामने आते हैं? कितने प्रेस क्लब हैं जहां पत्रकारों की इन वाजिब समस्याओं के समाधान के लिए कोई कदम उठाया जाता है!

यशवंत सिंह जी ने बिना संसाधनों और बिना किसी सपोर्ट के खुद के बूते पर भड़ास फोर मीडिया जैसा देश का पहला और एकमात्र प्लेटफार्म शुरु किया। जहां से पत्रकारों के हक़ की आवाज बुलंद होती है। जहां पत्रकारों का शोषण करने और उनका हक मारने वालों का कच्चा चिट्ठा खोला जाता है। यशवंत के भड़ास ने ना जाने कितने मीडिया समूहों की तानाशाही पर लगाम लगाई। शोषण की दास्तानों को देश-दुनिया तक फैलाकर दबाव बनाया। नतीजतन सैकड़ों मीडिया कर्मियों को यशवंत के भड़ास ने न्याय दिलवाया। मीडिया कर्मियों का वाजिब हक दिलवाया। देश में सैकड़ों बड़े-बड़े पत्रकार संगठन है। इनमें से ज्यादातर को आपने सत्ता और मीडिया समूहों के मालिकों की दलाली करते तो देखा होगा, लेकिन जरा बताइये, कितने संगठन पत्रकारों के शोषण के खिलाफ लड़ते हैं? दिल्ली सहित देशभर के छोटे-बड़े प्रेस क्लबों में क्या हो रहा है आपको बताने की जरुरत नहीं।

मैं 24 बरस से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरन्तर संघर्ष कर रहा हूँ। आधा दर्जन से अधिक छोटे-बड़े मीडिया ग्रुप्स में काम किया है। मैंने देखा है किस तरह सरकारों और अखबार- चैनलों के मालिकों के काले कारनामों की कालक एक ईमानदार पत्रकार को किस तरह अपने चेहरे पर पोतनी पड़ती है। नैतिकता-निष्पक्षता-निर्भीकता और पत्रकारिता के सिद्धांतों-संस्कारों की बात करने वाले ईमानदार पत्रकार के चूतड़ पर चार लातें मार के भगा दिया जाता है। आज के माहौल ने मिशन वाली पत्रकारिता को तेल लेने भेज दिया है। ये तेल शायद मिशन की पत्रकारिता करने की चाहत रखने वाले भूखे पत्रकारों की मज़ार पर चराग के काम आ जाये।

कार्पोरेट और हुकूमतों की मोहताज बन चुकी पत्रकारिता को तवायफ का कोठा बना देने की साजिशों चल रही हैं। पत्रकार का कलम गुलाम हो गया है। अपने विवेक से एक शब्द नहीं लिख सकता। वैश्या जैसा मजबूर हो गया पत्रकार। पैसे देने वाला सबकुछ तय करेगा। पत्रकारिता को कोठे पर बिठाने वालों ने कोठे के दलालों की तरह सत्ता की दलाली करने वालों के चेहरे पर पत्रकार का मुखौटा लगा दिया है। इस माहौल के खिलाफ लड़ रहे हैं यशवंत सिंह और उनका भड़ास। साथ ही यशवंत का व्यक्तित्व और कार्यशैली इस बात का संदेश भी देता है कि कार्पोरेट घराने या हुकूमतें के इशारे पर यदि आपसे पत्रकारिता का बलात्कार करवाया जा रहा है तो ऐसा मत करें। अपना और अपने पेशे का ज़मीर मत बेचो। इसके खिलाफ आवाज उठाओ। नौकरी छोड़ दो। बहुत ही कम खर्च वाले वेब मीडिया के सहारे सच्ची पत्रकारिता के पेशे को बरकरार रख सकते हैं।

कितना लिखूं , बहुत सारे अहसान हैं। जब हमअपने मालिकों/मैनेजमेंट की प्रताड़ना का शिकार होते हैं। अपने हक की तनख्वाह के लिए सटपटा रहे होते हैं। बिना कारण के निकाल दिये जाते हैं। तो हम लेबर कोर्ट नहीं जाते। पत्रकारों की यूनियन के पास भी फरियाद के लिए नहीं जाते। मालुम है लेबर कोर्ट जाने से कुछ हासिल नहीं होता। पत्रकार संगठनों के पत्रकार नेताओं से दुखड़ा रोने से कोई नतीजा नहीं निकलता। प्रेस क्लबों में दारू – बिरयानी और राजनीति के सिवा कुछ नहीं होता। पीड़ित का एक ही आसरा होता है- यशवंत का भड़ास। इस प्लेटफार्म से मालिक भी डरता है- मैनेजमेंट भी और सरकारें भी। पत्रकारिता के जीवन की छठी से लेकर तेहरवीं का सहारा बने भड़ास में नौकरी जाने की भड़ास ही नहीं निकलती, नौकरी ढूंढने की संभावना भी पत्रकारों के लिए मददगार साबित होती हैं।

वेबमीडिया की शैशव अवस्था में ही पत्रकारों का मददगार भड़ास पोर्टल शुरु करके नायाब कॉन्सेप्ट लाने वाला क्या दिल्ली प्रेस क्लब की सूरत नहीं बदल सकता है। आगामी 25 नवंबर को प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव के लिए लखनऊ के एक पत्रकार की गुज़ारिश पर ग़ौर फरमाएं :- दिल्ली प्रेस क्लब के चुनाव में मैंनेजिंग कमेटी के सदस्य के लिए क्रान्तिकारी पत्रकार यशवंत सिंह को अपना बहुमूल्य वोट ज़रूर दीजिएगा। यशवंत सिंह का बैलेट नंबर 33 है।

नवेद शिकोह
पत्रकार ‘लखनऊ
वरिष्ठ सदस्य
उ. प्र. मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति
8090180256 9918223245
Navedshikoh@rediffmail.com

प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव से संबंधित अन्य खबरें…

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आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं

दिवाली में दिए ज़रूर जलाएं, लेकिन खुद के दिलो-दिमाग को भी रोशन करते जाएं. सहज बनें, सरल बनें, क्षमाशील रहें और नया कुछ न कुछ सीखते-पढ़ते रहें, हर चीज के प्रति संवेदनशील बनें, बने-बनाए खांचों से उबरने / परे देखने की कोशिश करें, हर रोज थोड़ा मौन थोड़ा एकांत और थोड़ा ध्यान जरूर जिएं.

आइए, सच्ची दिवाली मनाएं, मन के अंधेरे घटाएं.

आप सभी को दिवाली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

मैं हर तरफ और हर किसी के लिए शांति-सुख-समृद्धि की कामना करता हूँ।

आभार

यशवन्त

फाउंडर, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम

संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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दी वायर और सिद्धार्थ वरदराजन की पत्रकारीय राजनीति पर शक करिए और नज़र रखिए, वजह बता रहे हैं यशवंत सिंह

Yashwant Singh : भाजपा ने सबको सेट कर रखा है। अब कांग्रेस वाले कुछेक पोर्टलों से काम चला रहे हैं तो इतनी बेचैनी क्यों। मुकदमा ठोंक के भाजपा ने रणनीतिक गलती की है। मुद्दे को देशव्यापी और जन-जन तक पहुंचा दिया। एक वेबसाइट को करोङों की ब्रांडिंग दे दी। तहलका वालों ने कांग्रेस परस्ती में बहुत-सी भाजपा विरोधी ‘महान’ पत्रकारिता की। मौका मिलते ही भाजपा शासित गोआ में तरुण तेजपाल ठांस दिए गए। उनके साथ हवालात में क्या क्या हुआ था, उन दिनों गोआ में तैनात रहे बड़े पुलिस अधिकारी ऑफ दी रिकार्ड बता सकते हैं।

तहलका अब लगभग नष्ट हो चुका है। केंद्र में सरकार भी बदल गयी तो सारे बनिया मानसिकता वाले मीडिया मालिक भाजपाई हो गए। ऐसे में मीडिया फील्ड में एक एन्टी बीजेपी मोर्चा, जो कांग्रेस परस्त भी हो, तैयार करना बड़ा मुश्किल टास्क था। पर धीरे धीरे सिद्धार्थ वरदराजन एंड कंपनी के माध्यम से कर दिया गया। एन गुजरात चुनाव के पहले जय शाह की स्टोरी का आना, कपिल सिब्बल का इसको लपक कर प्रेस कांफ्रेंस करना, हड़बड़ाई भाजपा का बैकफुट पर आकर अपने एक केंद्रीय मंत्री के जरिए प्रेस कांफ्रेंस करवा के सफाई दिलवाना, सौ करोड़ का मुकदमा जय शाह द्वारा ठोंका जाना… मैदान में राहुल गांधी का आ जाना और सीधा हमला मोदी पर कर देना… यह सब कुछ बहुत कुछ इशारा करता है।

बड़ा मुश्किल होता है निष्पक्ष पत्रकारिता करना। बहुत आसान होता है पार्टी परस्ती में ब्रांड को ‘हीरो’ बना देना। भड़ास4मीडिया डॉट कॉम चलाते मुझे दस साल हो गए, आज तक मुझे कोई निष्पक्ष फंडर नहीं मिला। जो आए, उनके अपने निहित स्वार्थ थे, सो मना कर दिया। न भाजपाई बना न कांग्रेसी न वामी। एक डेमोक्रेटिक और जनपक्षधर पत्रकार की तरह काम किया। जेल, मुकदमे, हमले सब झेले। पर आर्थिक मोर्चे पर सड़कछाप ही रहे। जैसे एक बड़े नेता का बेटा फटाफट तरक्की कर काफी ‘विकास’ कर जाता है, वैसे ही कई बड़े नामधारी पत्रकारों से सजा एक छोटा-मोटा पोर्टल एक बड़ी पार्टी के संरक्षण में न सिर्फ दौड़ने लगता है बल्कि ‘सही वक्त’ पर ‘सही पत्रकारिता’ कर खून का कर्ज चुका देता है।

इसे मेरी निजी भड़ास कह कर खारिज कर सकते हैं लेकिन मीडिया को दशक भर से बेहद करीब से देखने के बाद मैं सचमुच सन्यासी भाव से भर गया हूं। यानि वैसा ज्ञान प्राप्त कर लिया हूं जिसके बाद शायद कुछ जानना बाकी नही रह जाता। आज के दौर में मीडिया में नायक पैदा नहीं होते, गढ़े जाते हैं। कारपोरेट और पॉलिटिशियन्स ही मीडिया के नायक गढ़ते हैं। दी वायर और सिद्धार्थ वरदराजन की पत्रकारीय राजनीति पर शक करिएगा, नज़र रखिएगा। ये जन सरोकार से नहीं फल फूल रहे, ये बड़े ‘हाथों’ के संरक्षण में आबाद हो रहे।

चार्टर्ड फ्लाइट से वकील कपिल सिब्बल / प्रशांत भूषण और संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ये वाला ‘क्रांतिकारी’ मुकदमा लड़ने अहमदाबाद जाएंगे, बाइट देंगे, फोटो खिचाएँगे, केस गुजरात से बाहर दिल्ली में लाने पर जिरह कराएंगे। इस सबके बीच इनकी उनकी ऑनलाइन जनता हुँआ हुँआ करके सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग वाली तगड़ी खेमेबंदी करा देगी। इस दौरान हर दल के आईटी सेल वाले सच को अपनी-अपनी वाली वैचारिक कड़ाही में तल-रंग, दनादन अपलोड ट्रांसफर सेंड शेयर ब्रॉडकास्ट पब्लिश करने-कराने में भिड़े-लड़े रहेंगे, ताकि पब्लिक परसेप्शन उनके हिसाब से बने।

आज के दौर में चीजें बहुत काम्प्लेक्स हैं, मल्टी लेयर लिए हुए हैं। अगर आपको पार्टियों से अघोषित या घोषित रोजगार मिला हुआ है तो आप अपने एजेंडे को अपने तरीके का सच बताकर परोसेंगे, वैसा ही कंटेंट शेयर-पब्लिश करेंगे। जो सच को जान समझ लेता है वो बोलने बकबकाने हुहियाने में थोड़ा संकोची हो जाता है। ऐसे समय जब दी वायर हीरो है, कांग्रेसी आक्रामक हैं, भक्त डिफेंसिव हैं, भाजपाई रणनीतिक चूक कर गए हैं, शेष जनता जात धर्म के नाम पर जल कट मर रही है और इन्हीं आधार पर पोजिशन लिए ‘युद्ध’ मे इस या उस ओर बंटी-डटी है, मुझे फिलहाल समझ नहीं आ रहा कि अपने स्टैंड / अपनी पोजीशन में क्या कहूँ, क्या लिखूं। इस कांव कांव में जाने क्यूं मुझे सब बेगाना-वीराना लग रहा है।

भड़ास4मीडिया डाट काम के फाउंडर और एडिटर यशवंत सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Shamshad Elahee Shams ज़बरदस्त. सभी नाप दिऐ आपने..कलम हो तो ऐसी हो.

Pranav Shekher Shahi Hats off… दादा… वाकई जानदार लेखनीः।

अभिषेक मिश्रा बस यही आपको सबसे अलग बनाती हैl

Muzaffar Zia Naqvi भैय्या दिल निकाल कर रख दिया आपने। उम्मीद रखिए दिन बदलेंगे।

Ashok Anurag जय जय जय जय हो सत्य वचन, गर्दा लिखे हैं

Ashok Aggarwal आपने तो बहुत जानदार बात लिख दी है आप कह रहे हैं क्या लिखूं ।

Vijay Srivastava ये विश्लेषण पत्रकारिता की नयी पौध को सलीके से सींच सकता है. मैं इसे अपने वाल पर शेयर कर रहा हूं.

Vijayshankar Chaturvedi मैं निष्पक्ष हूँ। भारतीय वामधारा का समर्थक होने के बावजूद आप जान लीजिए, कार्यकर्ता बनने को पत्रकारिता नहीं समझता। और, संन्यास आप ग़लत लिखते आए हैं। कृपया सुधार लीजिए।

Yashwant Singh प्रभो, तुम ज्ञानी, हम मूरख। जानि रहै ई बात 🙂

Sushil Dubey नहीं बाबा पहली बार लगा की आप थक रहे हो सिस्टम से… वीर तुम बढ़े चलो

Yashwant Singh बाबा, थकना बहुत ही प्यारी सी मानवीय और प्राकृतिक (अ)क्रिया/ अवस्था है। हमका कंपूटर जाने रहौ का? 🙂

Ajai Dubey have u same view about Robert Vadra case.

Yashwant Singh हम सबके घरों में दामाद / बेटे होते हैं जिन्हें बढ़ाने का दायित्व ससुरों / बापों का होता है। ये काम पार्टी वाले बाप / सास भी करती / करते हैं। संपूर्णता में चीजों को देखेंगे तब समझेंगे। किसी उस वाड्रा दामाद या इस शाह बेटा पर अटके रहेंगे तो कांव कांव वाली जमात में ही रह जाएंगे। 🙂

Ajai Dubey sahi baat, agree Yashwant ji.

Badal Kumar Yashwant sir your analysis is best on contemporary media.

Sandeep K. Agrawal Bahut achchhi aur sachchi bat kahi aapne… Nishpakash ko trishanku banakar uski durgat karne ka koi mouka nahi chhoda ja raha hai..

Shorit Saxena आलेख सटीक तो है ही, बहुत कुछ सिखाता है। बड़ी बात आइना दिखाता है कि आदरणीय विनोद दुआ जी की बातोंसे भावुक ना हुआ जाये। यहाँ सब प्री प्लांड ही है। गजब, जय जय।

योगेंद्र शर्मा दर्द छुपा है। इस दर्द में आप अकेले है। आपने पत्रकारिता का मूल धर्म कितना निभाया। वायर कितना दोषी है, हम नहीं जानते लेकिन कुछ सच्चाई इसके माध्य्म से आ तो रही है।

Bhagwan Prasad Ghildiyal यशवंत सिंह सही लिख रहे है। चाटुकार, दलाल, भ्रष्ट रातों रात फर्श से अर्श पर होते हैं और दो ..तीन दशक से यह चलन हर क्षेत्र में बढ़ा है । कर्तव्य, मर्यादा और चरित्र तो केवल कहने, सुनने भर को रह गया है।

Avinash Pandey दी वायर की रिपोर्टिंग ने राजनैतिक भूचाल ला दिया है। सबसे अच्छा यह हुआ कि जय शाह ने 100 करोड़ रुपयों का मानहानि का मुकदमा कर दिया है। यह भारत की जनता के लिए सुखद है। इसके पहले भी एक और राजनैतिक मानहानि का मुकदमा जनता देख रही है। श्री केजरीवाल द्वारा दिल्ली क्रिकेट एशेसियेशन में श्री अरुण जेटली पर भ्रष्टाचार करने सम्बन्धी सार्वजनिक आरोप सोशल मीडिया पर लगाये गये थे।यह मुकदमा बहुत रोचक स्थिति में पहुंच गया है। आजतक श्री केजरीवाल भ्रष्टाचार सम्बन्धी एक भी साक्ष्य अदालत में जमा नहीं कर पायें हैं। श्री केजरीवाल के बडे वकील श्री राम जेठमलानी भी भ्रष्टाचार सिद्ध करने के स्थान पर कुछ और ही बहस कर रहे हैं। इसके पहले भी तहलका के तरुण तेजपाल द्वारा गोवा में किये गये यौन शोषण प्रकरण पर श्री कपिल सिब्बल तरुण की ओर से बयान-बाजी कर चुके हैं। गुजरात चुनाव के पूर्व दी वायर वेव पोर्टल की ओर से शानदार खलबली पैदा की गयी।इसी के साथ वेव पोर्टल के प्रमोटर और उनका भविष्य तय हो जायेगा।

Aflatoon Afloo वायर का पृष्ठपोषक कांग्रेस नही है। कुछ उद्योगपति हैं। स्तरीय पत्रकारिता अनुकरणीय है। सीखने की उम्र सीमा नहीं होती। भड़ास अन्याय के खिलाफ हो, बाकी सुलगाने से क्या होगा!

Harsh Vardhan Tripathi स्तरीय नहीं एजेंडा पत्रकारिता कहिए।

Surendra Grover सरोकारी एजेंडा भी कुछ होता है त्रिपाठी भाई.. यदि कोई मीडिया हाउस सरोकारी पत्रकारिता करता है तो उसे हर उस सक्षम से फंडिंग हो जाती है जो सही तथ्यों को गम्भीरता से लेता है.. विरोधी राजनैतिक दल भी इसमें शामिल होते हैं और अपने अपने हिसाब से उन तथ्यों का इस्तेमाल भी करते हैं..

Aflatoon Afloo रजत शर्मा और हर्षवर्धन में कुछ समान

Harsh Vardhan Tripathi बहुत कुछ समान हो सकता है Aflatoon Afloo । लेकिन, कब तक यह चलाइएगा कि पत्रकार, लेखक होने के लिए तय खाँचे में फ़िट होना जरूरी

Aflatoon Afloo बिना खांचे वाले आप होना चाहते हैं?

Harsh Vardhan Tripathi बिना खाँचे का तो कोई नहीं होता Aflatoon Afloo । लेकिन, मुझे यह लगता है कि हर खाँचे से पत्रकार निकल सकते हैं। वामपन्थी होना पत्रकार, लेखक, सरोकारी होने की असली योग्यता भला कैसे हो सकती है।

Surendra Grover सरोकारी होने पर लोग खुद वामपंथी का तमगा क्यों थमाने लगते हैं.?

Harsh Vardhan Tripathi भाई Surendra Grover जी, वामपन्थियों ने लम्बे समय तक कांग्रेस पोषित व्यवस्था में यह साबित किया कि सिर्फ वामपन्थी ही सरोकारी हो सकता है। यह कितना बड़ा भ्रमजाल है, वामपन्थियों की ताज़ा गति से आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन, यही वजह रहती होगी।

Surendra Grover निर्लिप्तता भी बड़ी चीज है, खुद Yashwant Singh गवाह है.. हमारे अज़ीज़ नचिकेता भाई मेरी इस बात पर मुझे दलाल का तमगा थमा बैठे थे और उसके परिणामस्वरूप जो हुआ उससे हमारे अभिन्न रिश्ते ही तोड़ बैठे सम्मानीय.. ब्लॉक किया सो अलग..

Akhilesh Pratap Singh संघी सरोकार वाले भाई साहब पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ने पर चेक गणराज्य में भी दाम ज्यादा होने की दलील दे चुके हैं…..इनकी बातों को दिल पर न लें…

Harsh Vardhan Tripathi दिल ठीक रहे, कहाँ की ईंट उठाए घूम रहे हो Akhilesh Pratap Singh भाई

Devpriya Awasthi आप कमोबेश सच लिख रहे हैं. लेकिन फंडिग के फंडे के बारे में आपके नजरिए से सहमत नहीं हूं. द वायर ने कुछ तथ्य ही तो उजागर किए हैं . भक्त बेवकूफी भरी प्रतिक्रिया नहीं करते तो द वायर द्वारा उजागर किए गए तथ्यों पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता. और जहां तक फंडिंग का मामला है, उसकी जड़ें कहां कहां तलाशोगे? हरेक फंडिंग में कुछ न कुछ स्वार्थ छिपे ही होंगे. आप तो यह देखो कि शांत तालाब में एक छोटे से पत्थर ने कितनी बड़ी हलचल पैदा कर दी है.

Pankaj Chaturvedi आप सटीक बात कर रहे हैं. इसमें भाजपा के कुछ लोग शामिल हैं जिन्होंने इसे हवा दी, आनंदी बेन गुट

Surendra Grover भाई Yashwant Singh जी, Afloo दुरुस्त ही फरमा रहे हैं.. वैसे निर्लिप्त भाव से की गई पत्रकारिता ही असल होती है.. बाकी तो जो है,, वो है ही बल्कि सिरमौर बने बैठे हैं.. सबकुछ बिकता है.. धंधा जो बन गया..

Sandeep Verma जब आप मान ही रहे है कि भाजपा ने रणनीतिक गलती कर दी है तो बाकी पोस्ट की बाते फालतू हो जाती है . और जो हो रहा है वह सोशल मीडिया का दबाव है . भाजपा अगर गलतियाँ कर रही है तो उसकी वजह वह सोशल मिडिया से प्रभावित हो रही है

Manoj Dublish I don’t think that this issue will conclude any result because fast moving media channels will bring a solution of compromise very soon .

Sandip Naik सब सही पर जिस भड़ास पर किसी का साया पड़ा अपुन पढ़ना ही बंद नहीं करेगा एक एंटी भड़ास खोल देगा। यार भाई जनता से जुड़े हो काहे इन अंबानियों की बाट जोह रहे हो

Dev Nath जबर्दश्त। अनुभव इसे कहते हैं, लेखन इसे कहते हैं, समालोचना इसे कहते है, पत्रकारिता इसे कहते हैं, विश्लेषण इसे कहते हैं।शब्द शब्द जबरदस्त

Sanjay Bengani कोई आपके सम्मान से खिलवाड़ करे लेकिन चूँकि वे पत्रकार है चाहे बीके हुए ही क्यों न हो आपको अदालत जाने का अधिकार नहीं है.

Roy Tapan Bharati यशवंत जी, एक दशक हो गया आप और आप की पत्रकारिरता देखते ,आपकी चिंता जायज है। पर आपका उदासीन हो जाना खलता है। हम जैसे शुभचिंतक अपने बच्चों के बल पर भड़ास को कुछ आर्थिक सहयोग करना चाहें तो कैसे करें?

Kamta Prasad झाल बजाना शुरू कर दीजए, जहाँ से नर्क में आए थे। बदलाव की शुरुआत उसी से और वहीँ से होगी। आपने अपने वैचारिक आग्रहों को छोड़कर मानवतावाद का दामन पकड़ा, कहीं से भी ठीक नहीं था।

Manoj Kumar Mishra अमित शाह के पूरे भारत मे भाजपा के विस्तार के आक्रमक नीति से ऐसे फ़र्ज़ी सर्जी हमले होने ही थे तब जब कि सभी विपक्षियों पार्टियों विशेषकर लेफ्ट और कांग्रेस के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगे। 2019 आते आते ऐसे ही आरोप और गढ़े जाएंगे ।करोड़ों रुपये की कीमत वाले प्रशांत किशोर के फेल होने के बाद कांग्रेस डोनॉल्ड ट्रम्प की चुनावी रणनीति तैयार करने वाली एजेंसी को करोड़ों डॉलर के अनुबंध के साथ हायर कर रही है । जो उच्च तकनीक से लैस है और जिसके पास हज़ारों आईटी एक्सपर्ट और हैकर्स की सेवा उपलब्ध है जो भारतीय मतदाताओं के गूगल सर्च, ईमेल, सोशल मीडिया और उनके संपर्कों का इतिहास भूगोल खंगाल डालेगी और उनकी रुचियों और उसी के अनुसार वो कांग्रेस की चुनावी रणनीति तय करेगी, राहुल बाबा के भाषणों के जुमले गढ़े जाएंगे ।अगर भारतीयों की प्राइवेसी और देश और देश की साइबर सुरक्षा इतनी गौण है तो कम से कम ये तो विचारणीय है कांग्रेस के पास इतना भारीभरकम फण्ड कहां से आ रहा है ?

Brijesh Singh कांग्रेस के पास व उसके नेताओं के पास अभी भी इतना पैसा है कि वह भाजपा तो क्या भारत की सभी पार्टियों को खरीद सकती हैं । अभी सत्ता ही तो नहीं है उनके पास। अभी तक कमाये धन को व्यवस्थित कर रहे हैं ।

Rehan Ashraf Warsi भाई हम जैसे नादान को लगता है कि अपने जो दुख झेलें हैं वह मीडिया के अंदर के सच , संघर्ष और गंदगी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल कर लिए हैं। वरना आज आप भी मज़े कर रहे होते। हाँ आपकी इज़्ज़त बहुत है मगर ज़्यादातर दिल मे ही करते हैं । बल

Jai Prakash Sharma निष्पक्ष, निडर और सच्चाई की बात करने वाले अधिकतम भाई Lisening ही करते नजर आते हैं, दलाली कहना थोड़ा ज्यादा हो जाता है

Vinay Oswal कुछ ऐसे ही कारणों से मैं भी बहुत मानसिक उलझन में हूँ। आप साझा करके हल्का हो लिए मैं नही हो पा रहा हूँ

Arvind Pathik यशवंत जी एक दशक हो गया आप और आप की पत्रकारिरता देखते… आप के निष्कर्ष उचित हैं… पर आपका उदासीन हो जाना खलता है.

Trivedi Vishal Confuse kyo hain ap? Hey arjun.. shastra uthao aur waar karo.

Kuldeep Singh Gyani अपने-अपने झंडे तले “सबकी” मौज बहार, मारी गई “पत्रकारिता” अब तू अपनी राह सवार… भाई साहब लिखा तो बहुत अच्छा है लेकिन बात बात पर सन्यास लेने की बात उचित नहीं…हम तालाब के किनारे बैठ कर भी क्या कर लेंगे उछलेगा तो कीचड़ ही तो क्यों न तालाब में ही खड़े रहा जाए जहां “मगर” भी हैं और “कमल” भी… हे ज्येष्ठ अडिग रहें और अपने हाथों को निरंतर मजबूत करने के लिए “फौज” तैयार करें…

Nirupma Pandey बात तो सही है अब आम जनता में न्यूज के प्रति उदासीन भाव आ गया है परदे के पीछे का सच आम जनता भी जानने लगी है

Harshit Harsh Shukla जी Yashwant singh भाई, पत्रकारिता के वेतन से घर नहीं चलता तो ईमान कहाँ से चलेगा… शायद यही वजह है की पत्रकार पार्टी के हो लेते हैं..

Manoj Upadhyay भाई साहब.. सच तो यही है कि आप जैसे लोग और आपकी जैसी पत्रकारिता ही सही और सार्वकालिक है. यह भी सच है कि यदि आप की पत्रकारिता और पत्रकार भावना संपन्न है तो आर्थिक मोर्चे पर तो सड़क छाप होना ही है. क्योंकि आपकी पत्रकारिता और आपकी पत्रकार भावना आज के तथाकथित लोकतांत्रिक दौर में पनपने वाले कारपोरेट नेताओं के लिए आप किसी काम के नहीं..

Yogesh Garg भड़ास का पिछले 5 साल से नियमित पाठक हूँ । पिछले कुछ समय से लगता है खबरों की आंच कम हो गई है । निष्पक्ष रहने के चक्कर में सत्ता पक्ष के लोकतंत्र विरोधी कुकर्मो का सख्त विरोध नही कर पा रहे आप । ऐसे बहुत से मुद्दे थे जिन पर लगा था कि भैया यशवंत की कलम चलेगी । पर वो मौन रह गए ।

Harsh Vardhan Tripathi असली बात बस यही है हमको १० साल में एक भी निष्पक्ष फ़ंडर न मिला। बाक़ी सब मिथ्या है।

Aflatoon Afloo और वायर को मिले।

Harsh Vardhan Tripathi भाई Aflatoon Afloo सही बात तो यही है ना कि वायर मोदी/संघ/बीजेपी के ख़िलाफ़ एजेंडे पर लगी वेबसाइट है। ऐसे ही कई होंगी, जो मोदी/संघ/बीजेपी के साथ लगी होंगी। जो जैसा है, उसको वही बताइए। मोदी के निरन्तर ख़िलाफ़ है, तो पत्रकार है। मोदी के साथ मुद्दों पर भी है, तो संघी है, इससे बाहर को आना ही पड़ेगा। और तो पब्लिक है, ये सब जानती है।

Aflatoon Afloo बिल्कुल, पब्लिक सब जानती है

Akhilesh Pratap Singh संघ के साथ पत्रकार नहीं, नारद होते हैं

Satyendra PS बात तो ठीक ही कह रहे हैं।

Vishnu Rajgadia अच्छा विश्लेषण है

Jayram Shukla वाजिब भडास।

सौरभ मिश्रा सूर्यांश कोई बचा क्या ? शायद कोई भी नहीं ! अच्छा समालोचनात्मक विश्लेषण

Garima Singh बेहतरीन ….कमाल ….खरा सच

Arvind Mishra बघेलखण्ड में कहा जाता है फुलई पनही से मारना वही किया है। आपने किसी को नहीं छोड़ा। दौड़ा दौड़ा कर

Sushil Rana सोलह आने सच – आज के दौर में मीडिया में नायक पैदा नहीं होते, गढ़े जाते हैं।

आदित्य वशिष्ठ निजी भड़ास भी भड़ास के माध्यम से निकलने लगे तो भड़ास भी भड़ास न रहेगा भाई

SK Mukherjee आज के दौर में चीजें बहुत काम्प्लेक्स हैं, मल्टी लेयर लिए हुए हैं।

Jitesh Singh मीडिया सच नहीं दिखाता, सच छानना पड़ता है। बड़ा मुश्किल हो गया है मीडिया का सच जानना।

Someshwar Singh Good write-up and very correct-analysis.

Madhav Tripathi आपकी बात तो सही है लेकिन जिसके अमित शाहक़ के लड़के को फ़साने की फालतू कोशिश की गई है कुछ वास्तविक मुद्दा होना चाहिए था।

Sanjay Mertiya मुकदमे की जरुरत नहीं थी, वायर की स्टोरी में दम नहीं था, चौबीस घण्टे भी मुश्किल से चलती।

अतुल कुमार श्रीवास्तव अगर वो मुकदमा न करता तो जांच नहीं होती। और सिर्फ इल्जाम लगते। सच और झूठ सामने तो आये।

Kohinoor Chandravancee Right sir I beleif in your thoughts

Baladutt Dhyani तुम्हारी तो दुकान बंद चल रही है इसीलिए परेशान दिखते हो… दलाली की और कमीशन का काम बंद पड़ा है…

Yashwant Singh आपने सच में मेरे दिल के दर्द को समझ लिया ध्यानी भाई.. इसीलिए आप ध्यानी हैं.. वैसे, अपन की दुकान चली कब थी.. जीने खाने भर की कभी कमी नहीं हुई… कोई काम रुका नहीं.. आदमी को और क्या चाहिए… खैर, पूर्वाग्रह से ग्रस्त लोग ये सब न समझेंगे.. वे तो वही बोलेंगे जो बोलना है… सो, बोलते रहियो 🙂

पंकज कुमार झा सुंदर. शब्दशः सहमत.

Rai Sanjay सहमत हूँ आप से

Vimal Verma बहुत बढ़िया।

राजीव राय बहुत सही

Anurag Dwary Sehmat

A P Bharati Ashant yashwant jindabad ! salam !

Arvind Kumar Singh बिल्कुल ठीक बात है

Aradhya Mishra Behatreen

Ashutosh Dwivedi यही सच है

Arun Srivastava सही कहा।

Lal Singh वीर तुम बढ़े चलो।

Nurul Islam सानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद

Shadab Rizvi बात 100 फीसदी सही

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इन खबरों के कारण भड़ास संपादक यशवंत पर हमला किया भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी ने!

साढ़े छह साल पुरानी ये वो खबरें है जिसको छापे जाने की पुरानी खुन्नस में शराब के नशे में डूबे आपराधिक मानसिकता वाले भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी ने किया था भड़ास संपादक यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब आफ इंडिया में हमला… इसमें सबसे आखिरी खबर में दूसरे हमलावर अनुराग त्रिपाठी द्वारा स्ट्रिंगरों को भेजे गए पत्र का स्क्रीनशाट है जिसके आखिर में उसका खुद का हस्ताक्षर है… ये दोनों महुआ में साथ-साथ थे और इनकी कारस्तानियों की खबरें भड़ास में छपा करती थीं… बाद में दोनों को निकाल दिया गया था…

इन दोनों से भड़ास एडिटर यशवंत की कभी कोई मुलाकात नहीं हुई थी, सिवाय कभी किसी कार्यक्रम या किसी जगह देखा-देखी के अलावा. इनके मन में इस बात की खुन्नस थी कि वैसे तो ये खुद को तीसमारखां पत्रकार समझते थे लेकिन इनका असली चेहरा सबके सामने लाया गया तो इन्हें चक्कर आने लगे. इनकी सारी दलाली-लायजनिंग की पोलपट्टी भड़ास पर लगातार खुलती रही जिसके चलते इनका पत्रकार का आवरण धारण कर दलाली करने का असली करतब दुनिया के सामने उदघाटित हो गया. इससे इनके लिए मुंह दिखाना मुश्किल हो गया होगा…

सोचिए, मीडिया के लोग वैसे तो पूरे देश समाज सत्ता की पोल खोलने के लिए जाने जाते हैं लेकिन जब इनकी पोल खुलती है तो ये कैसे पागल होकर हिंसक हो उठते हैं… जिसका पेशा कलम के जरिए दूसरों की पोल खोलना और आलोचना करना हो, वह खुद की सही-सही आलोचना छापे जाने से तिलमिलाकर कलम छोड़ बाहुबल पर उतर जाता हो, उसे क्या कहेंगे? पत्रकार के वेश में अपराधी या पत्रकार के वेश में पशु या पत्रकार के वेश में लंपट?

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत का कहना है कि ऐसे हमलों, पुलिस-थानों, मुकदमों और जेल से वे लोग डरने वाले नहीं… मीडिया के अंदरखाने का असल सच सामने लाते रहेंगे, चाहें इसके लिए जो भी कुर्बानी देनी पड़े… भुप्पी और अनुराग से संबंधित कुछ प्रमुख खबरों का लिंक, जो भड़ास पर साढ़े छह साल पहले छपीं, नीचे दिया जा रहा है… इन  खबरों पर एक-एक कर क्लिक करें और पढ़ें…


आजतक के ब्यूरो चीफ का हुआ स्टिंग?
http://old.bhadas4media.com/tv/8998-2011-02-03-04-47-10.html

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आजतक प्रबंधन ने अपने ब्यूरो चीफ को बर्खास्त किया?
http://old.bhadas4media.com/buzz/9130-2011-02-08-16-14-47.html

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ब्लैकमेलिंग के आरोपों में आजतक न्यूज चैनल से निकाले गए भुप्पी
http://old.bhadas4media.com/tv/9172-2011-02-10-19-01-06.html

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महुआ न्यूज चैनल के हिस्से हो गए भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी!
http://old.bhadas4media.com/edhar-udhar/10121-2011-03-27-13-50-04.html

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आजतक से हटाए गए भुप्पी अब तिवारी जी की सेवा में जुटे
http://old.bhadas4media.com/tv/10769-2011-04-26-07-15-30.html

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महुआ न्यूज़ से भी विदाई हुई भूपेंद्र नारायण भुप्पी की
http://old1.bhadas4media.com/edhar-udhar/6062-bhuppi-out-from-mahua.html

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पैसे की जगह स्ट्रिंगरों को धमकी भरा पत्र भेज रहे हैं महुआ वाले
http://old1.bhadas4media.com/print/4507-2012-05-19-18-21-08.html


पूरे प्रकरण का अपनी तरफ से पटाक्षेप करते हुए यशवंत ने फेसबुक पर जो लिखा है, वह इस प्रकार है-

”मेरे पर हमला करने वाले भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी को लेकर ये मेरी लास्ट पोस्ट है. इसमें उन खबरों का जिक्र और लिंक है जिसके कारण इन दोनों के मन में हिंसक भड़ास भरी पड़ी थी और उसका प्राकट्य प्रेस क्लब आफ इंडिया में इनने किया. मैंने अपनी तरफ से रिएक्ट नहीं किया या यूं कहें कि धोखे से इनके द्वारा किए गए वार से उपजे अप्रत्याशित हालात से मैं भौचक था क्योंकि मुझे कभी अंदेशा न था कि कलम धारण करने वाला कोई शख्स बाहुबल के माध्यम से रिएक्ट करेगा. मैं शायद अवाक था, अचंभित था, किंकर्त्व्यविमूढ़ था. इस स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था. अंदर प्रेस क्लब में तारीफ और बाहर गेट पर हमला, इस उलटबांसी, इस धोखेबाजी से सन्न हो गया था शायद. आज के दिन मैं मानता हूं कि जो हुआ अच्छा हुआ.  हर चीज में कई सबक होते हैं. मैंने इस घटनाक्रम से भी बहुत कुछ लर्न किया. मेरे मन में इनके प्रति कोई द्वेष या दुश्मनी नहीं है. मैं जिस तरह का काम एक दशक से कर रहा हूं, वह ऐसी स्थितियां ला खड़ा कर देता है जिसमें हम लोगों को जेल से लेकर पुलिस, थाना, कचहरी तक देखना पड़ता है. एक हमला होना बाकी था, ये भी हो गया. अब शायद आगे मर्डर वाला ही एक काम बाकी रह गया है, जिसे कौन कराता है, यह देखने के लिए शायद मैं न रहूं 🙂

मैंने अपने इन दोनों हमलावरों को माफ कर दिया है क्योंकि मैं खुद की उर्जा इनसे लड़ने में नहीं लगाना चाहता. दूसरा, अगर इनकी तरह मैं भी बाहुबल पर उतर गया तो फिर इनमें और मेरे में फर्क क्या रहा?  मैं इन्हें अपना दुश्मन नहीं मानता. मेरा काम मीडिया जगत के अंदर के स्याह-सफेद को बाहर लाना है, वो एक दशक से हम लोग कर रहे हैं और करते रहेंगे. ऐसे हमले और जेल-मुकदमें हम लोगों का हौसला तोड़ने के लिए आते-जाते रहते हैं, पर हम लोग पहले से ज्यादा मजबूत हो जाते हैं. लोग मुझसे भले ही दुश्मनी मानते-पालते हों पर मेरा कोई निजी दुश्मन नहीं है. मैं एक सिस्टम को ज्यादा पारदर्शी, ज्यादा लोकतांत्रिक और ज्यादा सरोकारी बनाने के लिए लड़ रहा हूं और लड़ता रहूंगा. मैं पहले भी सहज था, आज भी हूं और कल भी रहूंगा. हां, इन घटनाओं से ये जरूर पता चल जाता है कि मुश्किल वक्त में कौन साथ देता है और कौन नहीं. पर इसका भी कोई मतलब नहीं क्योंकि चार पुराने परिचित साथ छोड़ देते हैं तो इसी दरम्यान दस नए लोग जुड़ जाते हैं और परिचित बन जाते हैं. बदलाव हर ओर है, हर पल है, इसे महसूस करने वाला कर लेता है.  मैं नेचर / सुपर पावर / अदृश्य नियंता पर भरोसा करता हूं, बहुत शिद्दत के साथ, इसलिए मुझे कतई एहसास है कि हर कोई अपनी सजाएं, अपनी मौज हासिल करता रहता है. इसलिए मैं अपने हमलावर साथियों को यही कहूंगा कि उनने जो किया उसका फल उन्हें ये नेचर देगा जिसके दरम्यान उनका अस्तित्व है. जैजै”


पूरे मामले को समझने के लिए इन खबरों / टिप्पणियों / आलेखों को भी पढ़ें…

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भड़ास4मीडिया पर पहला मुकदमा मृणाल पांडेय के सौजन्य से एचटी मीडिया ने किया था

बेकार बैठीं मृणाल पांडेय को मिल गया चर्चा में रहने का नुस्खा!

Yashwant Singh : मृणाल पांडेय ने जो लिखा कहा, उस पर बहुत लोग लिख कह रहे हैं. कोई पक्ष में कोई विपक्ष में. आजकल का जो राजनीतिक विमर्श है, उसमें अतिवादी टाइप लोग ही पूरा तवज्जो पा रहे हैं, महफिल लूट रहे हैं. सो इस बार मृणाल पांडेय ही सही. मेरा निजी अनुभव मृणाल को लेकर ठीक नहीं. तब भड़ास4मीडिया की शुरुआत हुई थी. पहला पोर्टल या मंच या ठिकाना था जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बड़े-बड़े मठाधीश संपादकों को चैलेंज कर रहा था, उनकी हरकतों को उजागर कर रहा था, उनकी करनी को रिपोर्ट कर रहा था.

मृणाल पांडेय ने हिंदुस्तान अखबार से मैनेजमेंट के निर्देश पर थोक के भाव पुराने मीडियाकर्मियों को एक झटके में बाहर का रास्ता दिखा दिया. करीब तीन दर्जन लोग निकाले गए थे. शैलबाला से लेकर राजीव रंजन नाग तक. इस बारे में विस्तार से खबर भड़ास पर छपी. मृणाल पांडेय ने अपने सेनापति प्रमोद जोशी के जरिए भड़ास पर मुकदमा ठोंकवा दिया, लाखों रुपये की मानहानि का, जिसके लिए कई लाख रुपये दिल्ली हाईकोर्ट में एचटी मीडिया लिमिटेड की तरफ से कोर्ट फीस के रूप में जमा किया गया.

मुकदमा अब भी चल रहा है. प्रमोद जोशी एक बार भी हाजिर नहीं हुए. भड़ास पर यह पहला मुकदमा था. हम लोगों ने इसका स्वागत किया कि यह क्या बात है कि आप अपने यहां से बिना नोटिस तीन दर्जन लोगों को निकाल दो और हम खबर छाप दें तो मुकदमा ठोंक दो, सिर्फ इस अहंकार में कि हम तो इतने बड़े ग्रुप के इतने बड़े संपादक हैं, तुम्हारी औकात क्या? भड़ास4मीडिया न डरा न झुका, बल्कि कई निकाले गए लोगों की मदद करते हुए उन्हें लीगल सहायता भी उपलब्ध कराई. मृणाल पांडेय मुकदमें में खुद पार्टी नहीं बनीं. उन्होंने प्रमोद जोशी को आगे किया. एचटी मीडिया यानि शोभना भरतिया की कंपनी को आगे किया. आज भी एचटी मीडिया बनाम भड़ास4मीडिया का मुकदमा चल रहा है. हमारे बड़े भाई और वकील साब Umesh Sharma जी इस मुकदमें को देख रहे हैं, बिना कोई फीस लिए.

कहते हैं न कि कई बार चींटीं भी हाथी को धूल चटा देती है. इस मुकदमें में कुछ ऐसा ही होने वाला है. अब तो वहां न मृणाल पांडेय रहीं न प्रमोद जोशी रहे. एचटी मीडिया के ढेर सारे वकील भारी भरकम फीस कंपनी से वसूल रहे हैं और भड़ास4मीडिया से लड़ने हेतु कोर्ट से तारीख पर तारीख लेते जा रहे हैं. अपन लोग भी इंज्वाय करते हुए मुकदमा लड़ रहे हैं, कि इतनी भी जल्दी क्या है, मुकदमा चल रहा है तो क्या… मुकदमा खत्म भी हो जाए तो क्या…

लेकिन उस वाकये ने मृणाल पांडेय को मेरी नजरों से गिरा दिया. वह एक दंभी, स्वार्थी, चापलूस पसंद, अलोकतांत्रिक और आत्मकेंद्रित महिला मुझे लगी. उसे अब किसी भी प्रकार से चर्चा में रहना है… क्योंकि उसके पास अब न कोई पद है न कोई काम… ऐसे में सहारा बचा है सोशल मीडिया जिसके जरिए उसे चर्चा में रहने का एक जोरदार मौका मिला है. आजकल ब्रांडिंग इसी को कहते हैं. आप लगे रहिए मृणाल के विरोध या पक्ष में, लेकिन सच बात तो ये है कि मृणाल फिर से मशहूर हो गई… मृणाल फिर से मुख्यधारा में आ गई… ये है नए दौर की ब्रांडिंग की ताकत… कोई मारी गई महिला पत्रकार को कुतिया कह कर चर्चा में आ जाता है तो कोई पीएम को गधा बताकर ताली बटोर लेता है. साथ ही साथ उतना ही तगड़ा विरोध भी झेलता है. इस तरह चरम विरोध और समर्थन के बीच वह अपना कद काठी काफी बड़ा कर लेता है.

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए इस पोस्ट पर क्लिक करें :

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यशवंत हजारों पीड़ितों को स्वर दे रहे हैं, भगवान उन्हें दीर्घायु दें

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह पर हमले की खबर पढ़कर मन बहुत व्यथित हुआ। साथ ही इससे बहुत खिन्नता भी उपजी, आज के पत्रकारिता जगत के स्वरूप को लेकर। यशवंत सिंह पर हमला करने वाले निश्चित रूप से मानसिक रूप से दिवालिया हैं। यह बात भी तय है कि वे तर्क और सोचविहीन हैं।

निश्चित तौर पर वे पत्रकारिता जगत के लिए बदनुमा दाग हैं। उन्हें यह नहीं पता है कि यशवंत सिंह कितना बड़ा योगदान पत्रकारिता जगत के मूल्यों को समाज में बचाए रखने के लिए कर रहे हैं। यशवंत वो काम कर रहे हैं जिसे मीडिया जगत में बड़े नाम के रूप में स्थापित समूह भी नहीं कर सकते हैं। वे हजारों पीड़ितों को स्वर दे रहे हैं। भगवान उन्हें दीर्घायु दें।

उमेश शुक्ल
सीनियर जर्नलिस्ट
झांसी
umeshsukul@gmail.com

ये हैं दोनों हमलावर…

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पत्रकार कहे जाने वालों का यशवंत जैसे एक निर्भीक पत्रकार पर हमला बेहद शोचनीय है : अविकल थपलियाल

Avikal Thapliyal : कोहरा घना है… बेबाक और निडर पत्रकारों पर हमले का अंदेशा जिंदगी भर बना रहता है। भाई यशवंत को भी एक दिन ऐसे घृणित हमले का शिकार होना ही था। बीते वर्षों में हुई मुलाकात के दौरान मैंने यशवंत का ध्यान इस ओर खींचा भी था। लेकिन मुझे ऐसा लगता था कि कई बार फकीराना अंदाज में सभी को गरियाने वाले यशवंत किसी अपराधी या फिर विशेष विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले हिंसक लोगों के कोप का भाजन बनेंगे। लेकिन पत्रकार कहलाये जाने वाले ही अपने बिरादर भाई यशवंत की नाक पर दिल्ली प्रेस क्लब में हमला कर देंगे, यह नहीं सोचा था।

यशवंत ने अपने पोर्टल के जरिये हिंदुस्तान के मीडिया जगत की खबरों के अलावा कई रचनात्मक प्रयोग किये, जिसकी प्रशंसा सभी करते हैं। साथ ही बतौर पत्रकार अपने को भी गरियाने में यशवंत कोई कोर कसर नही छोड़ते। जेल जाने पर ‘जानेमन जेल’ किताब लिख मारी। वह किताब भी एक जेल याफ्ता पत्रकार की स्वीकारोक्ति स्वागत योग्य थी। बहरहाल, यशवंत पर हुए हमले की निंदा की जानी चाहिए और हमले के आरोपी को सजा मिलनी चाहिए। पत्रकार कहे जाने वालों का एक निर्भीक पत्रकार पर हमला बेहद शोचनीय है। यशवंत की धाकड़ लेखनी सच उगलती रहे, और ये घना कोहरा छंटे…. आमीन!

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार अविकल थपलियाल की एफबी वॉल से.

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विकास सिंह डागर : कई दिनों पहले भड़ास वाले यशवंत जी पर दो मानसिक दिवालिया तथाकथित पत्रकारों ने दिल्ली प्रेस क्लब में हमला कर दिया था।  हमला तो अकेले यशवंत जी पर हुआ लेकिन उसकी चोट शायद उन तमाम पत्रकारों को लगी जो मेहनत और ईमानदारी से अपने पेट का गुजारा कर रहे हैं। लेकिन इस घटना पर दुःख जताने वाले कम हैं, दिवाली मनाने वाले ज्यादा। कारण है यशवंत सिंह की कलम, जो आये दिन मीडिया में बैठे दलालों पर वार करती रहती है। किसी बड़े चैनल का सम्पादक हो, कोई जिले का उगाहीबाज स्टिंगर हो या रात दिन मेहनत करने वाले पत्रकारों की तनख्वाह मारने वाले मालिक। यशवंत लगातार ऐसे लोगों की पोल भड़ास डॉट कॉम के जरिये खोलते रहे हैंं और यही कारण है कुछेक पत्रकारों को छोड़कर बाकी सभी इस शर्मनाक कांड पर चुप्पी साधे हुए हैं।

मौजूदा समय मे पत्रकारिता में कुछेक ही लोग हैं जो अपने ही पेशे में फैल रही कुरूतियों के खिलाफ लिखते बोलते हैं। अगर ऐसे में सबसे बड़े भड़ासी और भड़ासियों की आवाज़ यशवंत जी पर हमला होता है तो कहीं ना कहीं हम जैसे लोग जो अपने घर की कुरूतियो से लड़ रहे हैं, उन्हें झटका लगना लाजमी है। ऐसे समय में यशवंत सिंह का साथ देना और आरोपियों का बहिष्कार कर उन्हें सजा दिलवाना हमारा कर्तव्य है। साथ ही मैं उन लोगों को सलाह दूँगा जो इस कायराना काँड पर खुशी जता रहे हैं कि यशवंत सिंह की दुश्मनी आप लोगों से नहीं थी, उन्होंने आपकी कुरूतियों को उजागर किया, जिसकी खुन्नस तुम लोग दिमाग मे लिए बैठे हो।

लेखक विकास सिंह डागर एक टीवी चैनल के रिपोर्टर हैं.

ये हैं दोनों हमलावर…

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हमलावर लोग कायर होते हैं, इसलिए हारना अंततः उन्हें ही होता है…

Anoop Gupta : पत्रकार यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के बाहर हमला किया गया और पुलिस की चुप्पी तो समझ आती है, प्रेस क्लब की चुप्पी के मायने क्या हैं। अगर यशवंत का विरोध करना ही है तो लिख कर कीजिये, बोल कर कीजिए, हमला करके क्या साबित किया जा रहा है। मेरा दोस्त है यशवंत, कई बार मेरे मत एक नहीं होते, ये जरूरी भी नहीं है लेकिन हम आज भी दोस्त हैं। चुनी हुई चुप्पियों और चुने हुए विरोध से बाहर निकलने की जरूरत है।

यशवंत अपने सीमित संसाधनों में भड़ास4 मीडिया चलाते रहे हैं और मीडिया की दुनिया के कई गलत कारनामे निर्भीकता के साथ सामने लाते रहे हैं। एक ऐसे समय में जबकि पूरा मीडिया कॉर्पोरेट घरानों के कब्ज़े में है, इस तरह के सूचना माध्यम काफी अहमियत रखते हैं। काबिलेतारीफ बात यह रही कि यशवंत ने हिम्मत के साथ इस हमले को बेनकाब किया और अभी भी अपनी उसी प्रतिबद्धता के साथ मीडिया मैदान में डटे हुए हैं।

ये हैं दोनों हमलावर…

हम सब आपके साथ हैं। हमलावर लोग कायर होते हैं, इसलिए हारना अंततः उन्हें ही होता है… देश के सभी बागी पत्रकारों से मेरी अपील है की यशवंत सिंह पर हुए हमले के विरोध में दिल्ली के प्रेस क्लब पर सब लोग एक साथ आये और हमलावरों के खिलाफ मोर्चा खोले जिससे कभी कोई और यशवंत सिंह पर हमला करने की जुर्रत ना कर सके. में अनूप गुप्ता संपादक दृष्टान्त लखनऊ हर तरह से यशवंत सिंह के साथ थे, है और रहेंगे.

लेखक अनूप गुप्ता लखनऊ से प्रकाशित चर्चित मैग्जीन दृष्टांत के प्रधान संपादक हैं.

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हे ईश्वर, हमलावर भुप्पी और अनुराग को क्षमा करना, वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं..

Shrikant Asthana : प्रेस क्लब आफ इंडिया परिसर में यशवंत पर हमला हुए कई दिन बीत चुके हैं। अपराधियों की पहचान भी सबके सामने है। फिर भी न पुलिस कार्रवाई का कुछ पता है, न ही इनके संस्थानों की ओर से। क्या हम बड़ी दुर्घटनाओं पर ही चेतेंगे? कौन लोग इन अपराधियों को बचा रहे हैं? वैसे भी, कथित मेनस्ट्रीम मीडिया के बहुत सारे कर्ता-धर्ता तो चाहते ही हैं कि वे यशवंत की चटनी बना कर चाट जाएं। इस श्रेणी से ऊपर के मित्रों-शुभचिंतकों से जरूर आग्रह किया जा सकता है कि वे उचित कार्रवाई के लिए दबाव बनाएं। अपनी फक्कड़ी में यशवंत किसी को अनावश्यक भाव देता नहीं। लगभग ‘कबीर’ हो जाना उसे यह भी नहीं समझने देता कि यह 15वीं-16वीं शती का भारत नहीं है। First hand account of attack on Yashwant Singh : https://www.youtube.com/watch?v=MgGks6Tv2W4 I’m very thankful to friends who have shown deep concern about the incident and are likely to help create due pressure.

Surendra Grover : पत्रकारों के साथ आये दिन होने वाली #मारपीट और उनकी हत्याओं से कई दिनों से सदमे की स्थिति में हूँ.. पिछले दिनों तो गज़ब हुआ जब पत्रकारिता का लबादा ओढ़े दो लोगों ने छोटे छोटे पत्रकारों की तकलीफ सबके सामने रखने वाले पत्रकार Yashwant Singh पर हमला कर दिया.. यानी कि अब पत्रकारिता लायजनिंग से होते हुए गुण्डागर्दी तक पहुंच गई है.. हे ईश्वर, उन्हें क्षमा करना, वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं…

ये हैं दोनों हमलावर…

Sanjay Yadav : कलम के धनी Yashwant Singh भाई साहब पर हमला हुए कई दिन हो गए. यशवंत भाई को पिछले दो साल से पढ रहा हूँ और देख ऱहा हूँ. उनका संघर्ष अपनी पत्रकार बिरादरी के लिए है. मैं कोई पत्रकार नहीं हूँ. दिल्ली में अकेला रहकर नौकरी करता हूँ और yashwant भाई साहब से कभी मिला नहीं. पर मुझे पता नही क्यों ये लगता है कि कभी जरूरत पड़ी तो ये बंदा आधी रात को भी मेरे साथ खडा होगा. जबसे भाई साहब पर हमला हुआ, मैं बहुत परेशान था. अच्छा लगा कि लोग इनके साथ खडे हैं. पर कुछ लोग लिखते हैं कि yashwant की विचारधारा अलग है. ज़हां तक मैँ यशवंत भाई को समझा हूँ, इनकी एक ही विचारधारा है, और वो है इंसानियत. यशवंत भाई यारों के यार हैं. जब ये किसी के साथ खडे होते हैं तो ना तो उसकी विचारधारा देखते हैं और ना ही उसका कद-पद.

चन्द्रहाश कुमार शर्मा : यशवंत सिंह किसी राजनीतिक पार्टी का चोला पहने होते, तो न आवाज़ बुलंद होती? साथियों, आज मैं बात कर रहा हूं एक ऐसे निडर, निर्भीक व धारदार कलम के धनी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से निकले देश के नामी पत्रकार जो देश के हरएक नागरिक, यहाँ तक की मीडियाकर्मियों पर भी जब-जब जुल्म होते हैं, वह बड़ी प्रमुखता से अपने लोकप्रिय न्यूज़ पोर्टल भड़ास फ़ॉर मीडिया में प्रकाशित करते हैं। हुआ कुछ यूं कि… एक सप्ताह पहले वह प्रेस क्लब ऑफ इंडिया पहुंचे। वहां दो संकीर्ण विचारधारा के पत्रकार भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी उनकी तारीफ में पुल बांधें। जब यशवंत बाहर निकलने लगे, तब उसी भुप्पी और त्रिपाठी ने उन पर हमला बोल दिया। यशवंत सिंह काफी चोटिल हुए। जब सोशल मीडिया पर उन्होंने अपना दर्द बयां किया, तो सभी हिल गए। इस घटना के इतने दिन बीत जाने के बाद भी न सरकार सख्त है, न पत्रकार। यशवंत सर में एक खूबी रही है कि वह किसी राजनीतिक पार्टी को सपोर्ट नहीं करते और न ही उनके एहसान तले दबते हैं। यदि वह ऐसा किये होते तो लगातार टीवी पर खबरें चलती और यह मामला तूल पकड़ लिया होता। (चंद्रहाश कुमार शर्मा, यूपी व बिहार प्रभारी- भोजपुरिया बयार न्यूज़ पोर्टल)

वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत अस्थाना, सुरेंद्र ग्रोवर, संजय यादव और चंद्रहाश कुमार शर्मा की एफबी वॉल से.

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‘यशवंत बड़ा वाला लंकेश है, इसे जान से मारना चाहिए था!’

Naved Shikoh : दिल्ली प्रेस क्लब में यशवंत भाई पर होता हमला तो मैंने नहीं देखा लेकिन लखनऊ के प्रेस क्लब में कुछ भाई लोगों को इस घटना पर जश्न मनाते जरूर देखा। पुराने दक्षिण पंथी और नये भक्तों के साथ फ्री की दारु की बोतलें भी इकट्ठा हो गयीं थी। आरोह-अवरोह शुरू हुआ तो गौरी लंकेश की हत्या से बात शुरु हुई और यशवंत पर हमले से बात खत्म हुई। कॉकटेल जरूर हो गयी थी लेकिन वामपंथियों को गरियाने के रिदम का होश बरकरार था।

एक ने कहा- ‘बड़े-बड़ों की फटी पड़ी है लेकिन इस यशवंत के सुर-लय में कोई फर्क नहीं आया’। एक मीडिया समूह के मालिक का चमचा और मैनेजमेंट का आदमी लगा रहा था, बोला- ‘हम लोगों ने तो आफिस के हर सिस्टम से भड़ास ब्लॉक करवा दिया है’। एक बेवड़ा कहने लगा कि हिम्मत तो देखो यशवंत की, बेलगाम इतना है कि नीता अंबानी तक के बारे मे भी लिखने से नहीं डरता। एक मोटा आसामी बोला- ‘बड़ा वाला लंकेश है यशवंत, इसे तो जान से मारना चाहिए था।’

ये हैं दोनों हमलावर…

इनकी बातें सुनकर लगा कि सच लिखने वाले निर्भीक पत्रकारों की आवाज बंद करने के लिए न सिर्फ अंबानी-अडानी के चैनल इस्तेमाल हो रहे हैं बल्कि टुच्चे और दलाल किस्म के पत्रकारों को भी निडर पत्रकारों को डराने धमकाने के लिए मारने-पीटने की सुपारी दी जा रही है। सरकार के भोपू चैनल हों या भुप्पी जैसे टुच्चे और दलाल पत्रकार, इन्हें कहीं न कहीं से सच लिखने वाले यशवंत सिंह जैसे पत्रकारों को डरा कर खामोश करने की सुपारी दी जा रही है।

उधर, लखनऊ के कई पत्रकार संगठनो ने बैठक की। उत्तर प्रदेश जिला मान्यता प्राप्त पत्रकार एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस बैठक में आधा दर्जन पत्रकार संगठनों के सैकड़ों पत्रकारों ने शिरकत की। पत्रकारों ने यशवंत सिंह के हमलावरों को जल्द से जल्द गिरफ्तार किये जाने की मांग की।

नवेद शिकोह लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9918223245 या Navedshikoh84@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पत्रकारिता में ‘सुपारी किलर’ और ‘शार्प शूटर’ घुस आए हैं, इनकी रोकथाम न हुई तो सबके चश्मे टूटेंगे!

Rajiv Nayan Bahuguna : दिल्ली प्रेस क्लब ऑफ इंडिया परिसर में एक उद्दाम पत्रकार यशवंत सिंह को दो “पत्रकारों” द्वारा पीटा जाना कर्नाटक में पत्रकार मेध से कम चिंताजनक और भयावह नहीं है। दरअसल जब से पत्रकारिता में लिखने, पढ़ने और गुनने की अनिवार्यता समाप्त हुई है, तबसे तरह तरह के सुपारी किलर और शार्प शूटर इस पेशे में घुस आए हैं। वह न सिर्फ अपने कम्प्यूटर, मोबाइल और कैमरे से अपने शिकार को निशाना बनाते हैं, बल्कि हाथ, लात, चाकू और तमंचे का भी बेहिचक इस्तेमाल करते हैं।

इस पेशे में इनकी उपस्थिति वास्तविक श्रम जीवी पत्रकारों के लिए राजनैतिक और आर्थिक धन पशुओं से अधिक भयावह है। इनकी रोकथाम न हुई, तो बारी बारी सबके हाथ, पाँव चश्मे तथा नाक तोड़ेंगे, जैसे यशवंत की तोड़ी है। इनका मुक़ाबला लिख कर, बोल कर तथा जूतिया कर करना अपरिहार्य है।

उत्तराखंड के वरिष्ठ और चर्चित पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से.

भड़ास संपादक यशवंत पर हमले को लेकर धीरेंद्र गिरी, पंकज कुमार झा और शैलेंद्र शुक्ला की प्रतिक्रियाएं कुछ यूं हैं…

Dhirendra Giri : बेबाक शख्सियत है Yashwant Singh जी…. फ़र्ज़ी लोग इस वज़न को सह नही पाते… खैर उन्होंने कई दफा टुच्चो को सहा है। आगे भी वह हमेशा की तरह मज़बूत ही दिखाई देंगे । इस आक्रमण की घोर निंदा पढ़ने लिखने और चिंतन करने वाली पूरी बिरादरी को करनी चाहिए।

पंकज कुमार झा : मीडिया के एजेंडा आक्रमण के हमलोग भी ऐसे शिकार हो जाते हैं कि कोई घोषित अपराधी की हत्या पर पिल पड़ते हैं जबकि अपने निजी सम्पर्क के लोगों, मित्रों तक के साथ हुए किसी आक्रमण तक पर ध्यान नही जाता. गौरी लंकेश की हत्या पर होते वाम दुकानदारी के बीच ही मित्र Yashwant Singh पर प्रेस क्लब में आक्रमण की ख़बर आयी. कोई भुप्पी और किसी त्रिपाठी ने दारू के नशे में इस करतूत को अंजाम दिया. दोनों शायद किसी ख़बर के भड़ास पर छापे जाने से नाराज़ थे. आइए इस हरकत की भर्त्सना करें और अगर कर पायें तो दोषियों को दंडित कराने की कोशिश हो. सभ्य समाज में ऐसा कोई कृत्य बिल्कुल भी सहन करने लायक नही होनी चाहिए.

ये हैं दोनों हमलावर…

Shailendra Shukla : यशवंत भाई पर हमला यानी लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के चौथे स्तम्भ पर हमला..  भारत वर्ष में ऐसा माना जाता है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। अगर ये सही है तो यशवंत भाई और भड़ास चौथे स्तम्भ के स्तम्भ है। भाई के ऊपर कुछ तथाकथित पत्रकारों ने हमला किया और वह भी भरोसे में लेकर। यशवंत भाई… यानी अगर मीडिया आपके साथ गलत कर रहा है तो उसके खिलाफ खड़ा होने वाला एकमात्र इंसान… कुछ छुटभैये किश्म के तथाकथित फर्जी पत्रकारों ने उनके साथ जो गुस्ताखी की है उसकी सजा उन्हें कानून पता नहीं कब देगा लेकिन अगर मुझे भविष्य में ऐसा अवसर मिलता है जिसमें उन सज्जनों से मुलाकात होती है तो उनकी खातिरदारी मैं जरूर करूँगा… उसके बदले इस देश का कानून जो भी सजा मेरे लिए तय करेगा मैं उसे सत्य नारायण भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण कर लूंगा। अब बात यशवंत भाई और उन तथाकथित पापी किश्म के पत्रकारों की… अगर उन्हें लग रहा है कि उन्होंने यशवंत भाई को धोखा दिया तो वे गलत हैं… उन्हें लग रहा है कि उन्होंने यशवंत भाई पर हमला किया तो भी वो गलत हैं … किसी दीवार पर मैंने लिखा हुआ एक वाक्य पढ़ा था ….

“अगर आप किसी को धोखा देने में कामयाब हो जाते हो तो ये आपकी जीत नहीं है… बल्कि ये सोचो सामने वाले को आप पर कितना भरोसा था जिसे आपने तोड़ दिया”

खैर यशवंत भाई से बात की मैन भावुक होकर बदले की भावना प्रकट की और मैं आज नहीं तो कल उस चूहे तक जरूर पहुँच जाऊंगा… लेकिन भैया हो सकता है आप राम हो पर मैं नहीं…. मैंने लक्ष्मण जी की एक बात बिलकुल गाँठ बांध रखी है….

“जो ज्यादा मीठा होता है.. वह अपना नाश कराता है।
देखो तो मीठे गन्ने को.. कोल्हू में पेरा जाता है।।”

मैं यशवंत भाई पर हुए हमले की निंदा नहीं करूंगा… भर्तसना नहीं करूँगा… लेकिन अगर मौका मिला तो “जैसे को तैसा” वाला मुहावरा हमलावरों के साथ जरूर चरित्रार्थ करूँगा। अगर मेरे फेसबुक वॉल या किसी अन्य माध्यम से ये मैसेज उन दुर्जनों तक पहुचता है तो वो खुलकर मेरे सामने आ सकते है। वह इस बात का विशेष ध्यान रखें कि अगर वो धूर्त हैं… ठग हैं… मीठी मीठी बातों में मुझे फंसा लेंगे जैसे यशवंत भाई के साथ उन्होंने किया तो ऐसे मत सोचें… क्योंकि मैं वाकई में महाधूर्त… हूँ खासकर उन दुर्जनों से तो ज्यादा… पता नहीं मेरे इस पत्र को भड़ास अपने पास जगह देगा कि नहीं लेकिन अगर देता है तो अच्छा लगेगा… मेरा मैसेज दुर्जनों तक जल्दी पहुचेंगे.…. क्योंकि सफाई कर्मचारी से लेकर मुख्य संपादक तक सब भड़ास पढ़ते हैं… अगर हमलावर जरा सा भी मीडिया से जुड़े होंगे तो भड़ास जरूर पढ़ते होंगे…

पूरे मामले को समझने के लिए ये भी पढ़ें…

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शैतानी ताकतों के हमले में चश्मा टूटा… ये लो नया बनवा लिया… तुम तोड़ोगे, हम जोड़ेंगे.. : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : चश्मा नया बनवा लिया। दो लम्पट और आपराधिक मानसिकता वाले कथित पत्रकारों भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी द्वारा धोखे से किए गए हमले में चश्मा शहीद हो गया था, पर मैं ज़िंदा बच गया। सो, नया चश्मा लेना लाजिमी था। वो फिर तोड़ेंगे, हम फिर जोड़ेंगे। वे शैतानी ताकतों के कारकून हैं, हम दुवाओं के दूत। ये ज़ंग भड़ास के जरिए साढ़े नौ साल से चल रही है। वे रूप बदल बदल कर आए, नए नए छल धोखे दिखलाए, पर हौसले तोड़ न पाए।

न जाने क्या मंजूर है नियति को, न जाने क्या योजना है नेचर की। मैं सिर्फ निमित्त मात्र हूं। जेल, मुकदमे, हमले, धमकी, पुलिस, कोर्ट कचहरी, आर्थिक तंगी… पर इरादे हैं कि दिन ब दिन चट्टानी होते गए। हमने सबको क्षमा किया। मेरा निजी बैर किसी से नहीं। पर सच की मशाल तो जलती रहेगी, सरोकार की पत्रकारिता तो होकर रहेगी, कुकर्मों का भाँडा तो फूटेगा। आप सभी साथियों का प्यार और समर्थन मेरे साथ है। वैसे नया वाला चश्मा कैसा है, बताएं तो जरा आप लोग 🙂

भड़ास संपादक यशवंत के उपरोक्त स्टेटस पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Arsh Vats Are Yashwant Singh sir g u r bravo aapke bhi 1 crore anuyayi h aang laga denge aang
Yashwant Singh आग नहीं, प्रेम लगाएंगे हर ओर 🙂

Jyoti Singh सर नया चश्मा मुबारक हो। और एक सलाह आगे से कोई चश्मे पे अटैक करे तो आप उसके दांत तोड़ देना।
Yashwant Singh तोड़ने का काम प्रकृति के हवाले। अपन तो कलम से लड़ेंगे और कलम से तोड़ेंगे 🙂

Vinay Maurya Sinner हम तोहरे साथ हई भईया। ई अउर बात हव की छोट भाईयन के भूल गईला …संजय शर्मा भईया के तरे
Yashwant Singh दिल मे हउआ भाय। कहा त करेजवा फाड़ के देखायीं 🙂

प्रवीण श्रीवास्तव उ दूनो भुप्पी और भुप्पा की तस्वीर हो तो देखाईये… देखल जाए शकल दुनहुँन क
Yashwant Singh आप लोग ही खोजिए। मैं इन इग्नोर किए जाने लायक लोगों पर टाइम नहीं खर्च करता। ये काम भड़ास समर्थकों पर छोड़ता हूं।

Vikash Rishi बढ़िया चेहरे पर गंभीरता दिख रही है कुछ ठोस करना होगा।
Yashwant Singh अरे नहीं। कुछ चीजें प्रकृति पर भी छोड़ देनी चाहिए। हम लोग कलम वाले हैं। उनके जैसे आपराधिक मानसिकता वाले नहीं। क्षमा किए जाने योग्य हैं वो ताकि खुद आत्म मंथन कर सकें वो। 🙂

Brijendra Singh दाढ़ी तो तभी बनेगी जब…
Yashwant Singh अरे नहीं। कुछ चीजें प्रकृति पर भी छोड़ देनी चाहिए। हम लोग कलम वाले हैं। उनके जैसे आपराधिक मानसिकता वाले नहीं। क्षमा किए जाने योग्य हैं वो ताकि खुद आत्म मंथन कर सकें वो। 🙂

Soban Singh चश्मा अच्छा है. आपकी फिक्र रही दो दिन. थोड़ा दाढ़ी साड़ी भी बन जाती तो भुप्पी और त्रिपाठी का कुछ और भला हो जाता।

Rajeev Tewari इस चश्मे में ज्यादा प्रबुद्ध दिखे हैं। सरोकार की पत्रकारिता तो होकर रहेगी। बहुत बधाई, shubhkamnayen

Vivek Dutt Mathuria भाई ज़म रहे हो और जमे रहो! आपके साथ पूरा कारवां है!

Rehan Ashraf Warsi विचारों का मतभेद यहाँ तक आ पहुँचा, दुःखद है। ये सब कहाँ ले जाएगा, और कब रुकेगा।

Nirupma Pandey वो फिर तोड़ेगें, हम फिर जोड़ेगें

Yuvneet Rai Chaudary Desh badh raha hai …..apke patrkar mitra Kuch jyda aage badh gye

Bhoopendra Singh आपने ऐतिहासिक काम किया है। पीढ़ियां ज़रूर याद करेंगी

Aditya Singh Bhardwaj चश्मा आप गांधीवादी रखिये 🙂

Ansh Sumit Sharma जबरदस्त चश्मा है भैया जी।

Nivedita Patnaik Never mind… change your glasses but never the visions…. thru which you made people to see what is what.

Gandhi Mishra ‘Gagan’ चश्मा क्या खरीदे पिछले चार दिनों की खोयी आंख मिल गयी.. अब उसकी खाट खड़ी करने से इन्हें कौन रोक सकता। इतनी बड़ी हमदर्दों व समर्थकों की टीम जो ठहरी… उठाओ ठाकुर साहब कलम और रगड़कर मटियामेट कर दो उन्हें जो अंधा बनाकर देश को कई महत्वपूर्ण सूचनाओं से दूर रखना चाह रहे थे जिससे उनकी भविष्य की मंशा पुनः होश नहीं संभाल पाए।

Mohanraj Purohit नया वाला भी अच्छा हैं, लेक़िन पुराने वाले शहीद वाले को भी संभाल कर रखें, भुप्पी और अनुराग को याद रखने के लिए।

Anand Kumar तेरे वजह से चश्मा बदला, अफसोश नजरिया ना बदल सका, ऐ भुप्पी और अनुराग तू तो ताकत दे गया…

Arvind Tripathi दुष्टों के चिन्हांकन की दृष्टि साफ़ बनी रहनी चाहिए, बाक़ी सब ठीक है।

Deepak Srivastava गांधी जी का रूप तो आपके लेख में दिखा… किंतु भगत सिंह, आज़ाद जी , बोस , बिस्मिल जी की प्रतिक्रिया भी देखनी है

Maruf Khan Journalist Bhadas ne media ke ander ke haal btaye. jo sach me hota hai.

अनिल अबूझ सरोकारों के साथ-साथ खुद का भी खयाल भी रखिए सर! पत्रकारों की हालत देख रहे हैं? आपका जीना जरूरी है..बल्कि हर उस शख्स का जीना जरूरी है जो सच कहता है..सच लिखता है| हौसले को नमन करता हूँ|

Tahir Khan इस चश्मे से उन लोगों के कुकृत्य भी दिखेंगे जो अभी मीडिया का चोला ओढ़े किसी बिल में छिपे बैठे हैं…शानदार ..जय हिंद।

Rajnish Tara Bahute hi gazab hai bhaiya…. lage rahiye mission sachchai ke liye…

Majid Qureshi निडर और बिना डिगे पत्रकारिता के होंसले को सलाम। वैसे भी ये किस्म कम ही रह गई है। वरना तो ऐसा होने पर क़लम तोड़ देते है लोग।

Keshav Kumar अगर आप सही हो तो आपको कुछ साबित करने की जरूरत नहीं होती है। केवल आपको अपनी सच्चाई पर टिके रहना होता है, गवाही वक्त खुद देता है।

Sudhir Jagdale बिना लक्ष्य के जीने वाले इंसानों की जिंदगी कहाँ अमीर होती है, जब मिल जाती है सफलता तो नाम ही सबसे बड़ी जागीर होती है।

सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ chashma bahut achchha hai . aap bhi bahut achchhe ho . sankalp bada hai to dikkat to rhengee

Shailesh Tiwari पुराना टूटता है तभी नया बनता है । उन दोनों को भगवान सद्बुद्धि दे यही प्रार्थना है। वैसे यह चस्मा चेहरे पर जम तो रहा है गुरु… इस हेतु उन दोनों शैतानी ताकतों के कारकुनों का आभार की एक नए चश्मे को लेने का बहाना बनने में उनका योगदान था..

Nitin Thakur चश्मा कातिल है Yashwant जी.

Amit Ahluwalia और चूंकि काले फ्रेम का है तो चश्मे कातिल से भी बचाएगा

Manvinder Bhimber ऐतिहासिक काम करते हो

Rajpal Parwa चश्मा सुंदर है। आप सेहतमंद रहें ईश्वर से ये दुआ है।

Sarvesh Singh आपके बेमिसाल व्यक्तित्व को प्रणाम

Rahul Amrit Raj शानदार, जानदार, जबरदस्त, भड़ास जिंदाबाद

Hitesh Tiwari चीता हो आप। और चश्मा मस्त है।

Sanjay Swadesh डरे, सहमे, बुजदिल ही ऐसी हिंसात्मक हरकत पत्रकारों के साथ करते हैं

Mafatlal Agrawal हर जोर जुल्म की टक्कर मे संघर्ष हमारा नारा है।

Madan Tiwary पहले यह बताये उन हरामियों की ठुकाई कीजियेगा या नहीं।

Ziaur Rahman आप हजारों-लाखों मीडिया कर्मियों की आवाज हो, उन सभी का प्यार, सहयोग और दुआ आपके साथ है।

Mukesh Singh बच्चे अक्सर कुछ ना कुछ तोड़ते ही रहते हैं। वैसे नया चश्मा व्यक्तित्व को और घना बना रहा है।

Narendra M Chaturvedi थोड़ा टेड़ा है…वैसे ऊपर से नीचे तक टेड़े की नगरी रहकर सब टेड़ा ही दिखता है…?

Satya Prakash Chashma mein DRISHTI ki dhaar tez ho gayee hai

Golesh Swami Very nice, god bless you. Keep it up.

अजित सिंह तोमर चश्मा और आप दोनों ही दमदार हैं सर

Ashok Anurag ये आपका बड़प्पन है यशवंत भाई, फिर भी जो हुआ वो माफ़ी योग्य नहीं था

Purushottam Asnora गुण्डे कहीं भी हो सकते हैं, पत्रकारिता में भी

Sunil Negi himate marda mardade khuda

Sushovit Sinha नए चश्मे से दुनिया बेहतर दिखेगी सर!

Rakesh Punj चश्मा सुंदर है। आप सेहतमंद रहें ईश्वर से ये दुआ है।

Santosh Singh उन लोगो को खोजा कैसे जाए

मुकुन्द हरि शुक्ल तनिक अपनी कुंडली की ग्रहदशा की विवेचना भी कर लीजिएगा।

Sadique Zaman हम सब साथ हैं दादा, लड़ेंगे

Virendra Rai लल्लनटाप बाटई

Madhvendra Kumar चश्मा आपका टूटा दिल उन दोनों का,शानदार है ये वाला चश्मा।

Narendera Kumar गजबे लुक है

Dinker Srivastava चेहरे पे एक सबक चढ़ा हुआ दिख रहा और क्या…

Ashok Aggarwal चश्में के साथ साथ हौसला भी बढिया है ।

Sudhendu Patel आपही की तरह पारदर्शी गुरू .

Dilip Clerk इंकलाब जिन्दाबाद …धन्य है आप

Rahul Chouksey चश्मा बहाना है। नज़र और नज़रिया वही रहेगा।

Syed Shakeel आप और आपका चश्मा दोनों बिंदास है दादा

Hemant Shukla … पर सच की मसाल तो जलती रहेगी … बहुत सुंदर विचार ।

Kuldeep Singh Gyani दुवाओं के दूत के साथ साथ आप युवाओं के दूत भी हैं…

Sambhrant Mishra ये चश्मा तो और जोरदार है।

Nitesh Tripathi नया चस्मा स्मार्ट बना रहा है और

Pawan Kumar Upreti शानदार चश्मा। ताकतवर व्यक्तित्व

Manoj Anuragi अच्छा है सावधान रहो

Arshad Ali Khan आप जैसे क्रांतिकारी पत्रकार के लिए यह आम बात है….

Govind Badone आपके होंसले को सलाम

Farhan Quraishi कलम में बहुत ताकत है

Nurul Islam गजब सर, ख़्याल रखिए अपना

Mahendra Singh दूसरे गांधी बनने के रास्ते पर है आप

Veernarayan Mudagl पत्रकार जगत में जलवा कायम है सर आपका

Pramod Singh सलाम है यशवंत भाई! आपके बड़प्पन को.

Vindhya Singh भइया ! तनी उन्हन लोगन के फोटू शेयर कइल जा, के हवे जानलअ जरूरी बा… बड़का भूपति बनता लोग
Yashwant Singh आप लोग ही खोजिए। मैं इन इग्नोर किए जाने लायक लोगों पर टाइम नहीं खर्च करता। ये काम भड़ास के साथियों पर छोड़ता हूं।

Sharvan Panchal अच्छा लग रहा ह ,,,,,,,आप ऐसे धूर्त लोगो के लिए पत्रकार जैसा शब्द क्यू इस्तेमाल करते ह सर
Yashwant Singh ‘कथित पत्रकार’ लिखा हूं भाई

Vipin Shrivastava ये चश्मा पहले से ज्यादा साफ दिख रहा है , यकीनन वो जितने चश्में तोड़ेंगे , नए चश्में और बेहतर क्वालिटी के क्लियर होते जाएंगे

Man Mohan Singh Achche ensan pe sab achcha lagta hai !

Avinash Singh आपके निर्भीकता और आपके व्यक्तित्व को सलाम, आपकी लेखनी , निडरता, और व्यक्तिव से बहुत कुछ सीखने को मिलता है ,

Syed Quasim चश्मा 40 + होने यानी लौंडियाहुज जो हमारे रुदौली में बचपन को कहते हैं खत्म होने की निशानी है.. इसी लिए तो मुस्कुरा कर मार देते हैं बड़े से बड़े दुश्मन को

Pawan Dubey हे क़लम के पुजारी आपकी बेबाक़ और निर्भीक अभिव्यक्ति को प्रणाम। क्षमा बड़े साहस का आभूषण है। आप को कमज़ोर लोग कमज़ोर नही कर पाएँगे।

Om Prakash Pathak आप स्वस्थ्य हो गए उसके लिए भगवान का शुक्रिया। ऐसे कमजोर लोग हमेशा टकराएंगे यह भी सही है। ऐसे चश्मा अच्छा लगा।

Shishubh Bhargava जय हो, क्रिज़ोल है या थोड़ा सामान्य कुछ भी हो आखिर आँखों पर चस्मा लगाए थोड़ी न बैठे लड़ते रहिये यशवंत जी सत्य आपके साथ है

कुंदन वत्स अब मारक बदला लीजिये

Humaira Zafar Allah aapko salamat rakhe.Aameen

Chandan Sharma चश्मा का तो ठीक है लेकिन एक नया संकल्प दिख रहा है। बनाये रखिये। 🙂

Rajendra Mishra सच साहस सरोकार! जय हो

यशवंत पर हमला करने वालों की ये है तस्वीर… याद रखें, ध्यान रखें…

पूरे मामले को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें….

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दो बददिमाग और विक्षिप्त कथित पत्रकारों द्वारा यशवंत पर हमले के बाद हमारी बिरादरी को सांप क्यों सूंघ गया?

Padampati Sharma : क्या किसी पत्रकार के समर्थन में मोमबत्ती दिखाने या विरोध ज्ञापित करने के लिए उसका वामपंथी या प्रगतिशील होना जरूरी है? यदि ऐसा नहीं है तो सिर्फ पत्रकार हित के लिए दिन रात एक करने वाले यशवंत सिंह पर दो बददिमाग मानसिक रूप से विक्षिप्त कथित पत्रकारों द्वारा किये गए हमले पर हमारी बिरादरी को क्यों सांप सूंघ गया? यशवंत के बहाने पत्रकारों की आवाज दबाने का कुत्सित प्रयास करने वाले की मैं घोर निंदा करता हूं.

सच तो यह है कि उन अपराधियों के अंत्राशय पर इतने प्रहार किए जाते कि वे महीनों न सो पाते और न बैठ पाते. मगर हम जिस बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं वहां कलम ही तलवार है और मेरी ओर से सजा यही कि अगर वे दोनो शख्स मेरी फ्रेंड लिस्ट में हुए तो न सिर्फ उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दूंगा वरन ब्लाक भी करूंगा. यशवंत! डटे रहना भाई. आ गया है सोशल मीडिया का दौर. मुख्य धारा के मीडिया का यही हाल जारी रहा तो उसकी दुकान बंद होने में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा. तब यशवंत जैसे जाबांज पत्रकारों का ही वर्चस्व होगा. जुझारू पत्रकार Yashwant Singh पर हमले की निंदा करता हूँ। शायद कुछ लोग शर्म से सर झुका सकें।

(कई अखबारों और न्यूज चैनलों में खेल संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार पदमपति शर्मा की एफबी वॉल से.)

फेसबुक पर आईं कुछ अन्य प्रमुख प्रतिक्रियाएं यूं हैं…

Surendra Pratap Singh : जिस दिन यशवंत पर हमले वाली घटना घटित हुई थी उसी दिन किसी ने इस पर पोस्ट लगाई थी लेकिन किसी पत्रकार ने कोई नोटिस नहीं लिया… और, तभी लंकेश वाली वारदात हुई और लंका में लगी आग मचा हाहाकार… सभी पत्रकार बंधु अपनी अपनी बाल्टी का पानी लेकर उधर ही दौड़ लगाने लगे… फिर क्या, यशवंत जी समाचारों से गायब। धन्य हो।

Sarvesh Singh : पिछले दिनों भड़ास 4मीडिया के संपादक Yashwant Singh सर पर हमला हुआ।हमला किसी और ने नहीं बल्कि पत्रकारिता को कलंकित करने वाले दो दिमागी दिवालियों ने किया। उस हमले से जुड़ा एक वीडियो यशवंत सर ने फेसबुक पर साझा किया। इसमें उन्होंने साफ तौर पर उन दोनों को माफ़ करने की बात कही। पीत पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों और सरकार की गोद में झूलने वाले मीडिया समूह की काली करतूतों को देश के सामने निष्पक्षता और निडरता से रखने वाले यशवंत सर के प्रति मेरे मन में अनन्त सम्मान बढ़ गया है। उन्होंने उन पर हमला करने वालों को माफ किया। और कुछ ऐसी बातों का जिक्र किया जो मेरे मानस पटल पर सदैव सदैव के लिए अंकित हो गया।

ये हैं दोनों हमलावर…

यशवंत ने भूपेंद्र सिंह भूप्पी और अनुराग त्रिपाठी को माफ करते हुए कहा कि “मेरे पास कलम की ताकत है सच्चे पत्रकार के लिए कलम ही सब कुछ है।कलम ही तोप होती है, कलम ही बंदूक होती है, बशर्ते उसे कलम का इस्तेमाल करने आता हो”।”प्रकृति न्याय करती है। हम कौन होते हैं न्याय करने वाले”। आपके इस वाले वीडियो को देखकर आपकी बातों को सुनकर मैं बहुत भावुक हुआ। बड़ी आसानी से आपने उन दोनों सनकी और तथाकथित पत्रकारों को माफ कर दिया। शायद यह आप जैसा बड़े और महान व्यक्तित्व वाला ही कर सकता है। एक बात तो तय है कि उन दोनों पागलों का न्याय प्रकृति ही करेगी।आप के सच्चे व निडर व्यक्तित्व का मैं हमेशा से कायल रहा हूं। पर आप की सहजता, सहनशीलता, विशाल हृदयता वाले आपके इस महान व्यक्तित्व को मैं हजार बार सलाम करता हूं। और, हां सर! चश्मा तो निर्जीव वस्तु है वह टूटेगा भी और जुड़ेगा भी। पर आप के अदम्य साहस, बेबाक सच्चाई, साफगोई को भूपेंद्र सिंह भूप्पी और अनुराग त्रिपाठी जैसे हजारों आसूरी प्रवृत्ति के लोग कभी दबा नहीं पाएंगे।

Dhananjay Singh : ”थोड़ा मारने दो इसे,बहुत खबरें छापता है” कहते हुए दिल्ली के प्रेस क्लब में भड़ास वाले Yashwant भाई को दो पत्रकारों ने ही पीट दिया…. जाहिर है इस घटना के गवाह भी कई एक रहे ही होंगे… निर्भीक पत्रकारिता पर खुद पत्रकारों की तरफ से हुए इस हमले की मैं निंदा करता हूँ….खम्भों की यह लड़ाई निंदनीय है… आप भी छापिये न भाई… असहमति है तो किसी को पीट देंगे? ऐसे ही कमजोर पलों में निहायत ही कमजोर लोग पिस्टल भी निकाल लेते हैं और परिणाम अत्यंत भयानक होता है… आशा है देश की राजधानी के प्रेस क्लब में हुई इस घटना के विरोध में तमाम एक्टिविस्ट्स से लगायत प्रधानमंत्री भी संज्ञान लेंगे.. ऐसी हरकत निंदनीय है, अभी निंदा करिए, सिर्फ देखिए और इंतजार करिए की रणनीति पर न चलिए…

पूरे मामले को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ सकते हैं….

 

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यशवंत किसी विचारधारा-गिरोहबाजी के आधार पर किसी को रियायत नहीं देते, इसलिए गिरोहबाजों ने चुप्पी साध रखी है!

Vivek Satya Mitram : प्रेस क्लब में हाल ही में जमा हुए पत्रकारों! इस मामले पर कहां जुटान है? इसका भी खुलासा हो जाए। वैसे भी ये हमला तो प्रेस क्लब के बाहर ही हुआ। एक वरिष्ठ पत्रकार पर कुछ ‘गुंडा छाप’ पत्रकारों द्वारा। फिर भी ना तो प्रेस क्लब के पदाधिकारियों को फर्क पड़ा ना ही साथी पत्रकारों को। Yashwant Singh को करीब से जानने वाले जानते होंगे कि वो पिछले एक दशक से गौरी जैसी ही निर्भीक पत्रकारिता कर रहे हैं। महज़ इसलिए कि वो इस हमले में ज़िंदा बच गए, पत्रकारों को उनके लिए न्याय नहीं चाहिए?

वाह रे क्रांतिकारी पत्रकारगण! अबे खुलके कहो ना कि तुम गौरी के लिए नहीं, किसी पत्रकार के लिए नहीं, किसी दमन के ख़िलाफ़ नहीं, राजनीति करने के लिए जमा हुए थे। और, यशवंत जैसा पत्रकार जो किसी को भी विचारधारा और गिरोहबाजी के आधार पर कोई रियायत नहीं देता उस पर हमला तुम्हारे लिए कोई महत्व नहीं रखता। सुनो, तुम्हारे सेलेक्टिव, दिखावे की क्रांति लोग समझते हैं, इसलिए सोशल मीडिया पर अपनी एक ख़ास किस्म की ब्रांडिंग करते हुए ये भी याद रखा करो कि लोग कभी तो हिसाब मांग सकते हैं तुम्हारे ढ़ोंग का। बाई द वे, मैं जानता हूं तुम पत्रकार नहीं हो!

(आजतक समेत कई न्यूज चैनलों में कार्यरत रहे और अब एक सफल उद्यमी के तौर पर स्थापित विवेक सत्य मित्रम की एफबी वॉल से.)

Praveen Jha : पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देश कौन सा है? मैं टुकड़ों में ‘विश्व मीडीया विमर्श’ नामक किताब पढ़ता रहा हूँ, जिसमें पूरे विश्व के अलग-अलग देशों की मीडिया पर लिखा है। स्कैंडिनैविया के सभी देश सालों से ‘प्रेस फ्रीडम’ में टॉप 5 पर हैं। यहाँ कोई पत्रकार कभी मारा-पीटा अब तक नहीं गया। कई रिपोर्ट के अनुसार ईरीट्रिया और चीन में पत्रकारों की हालत खस्ता है। तुर्की और रूस पर भी इल्जाम लगते रहे हैं। पर वो अलोकतांत्रिक देश है।

एक लोकतंत्र में पत्रकार अमूमन सुरक्षित होता है। पर पिछले साल की CPJ की रिपोर्ट पढ़ रहा था, उसमें पत्रकारों के लिए विश्व के दस सबसे खतरनाक (डेडलिएस्ट) देशों में भारत का भी नाम है। यह पढ़ कर अजीब लगा। यह अकेला लोकतांत्रिक देश है जहाँ पत्रकारों पर हमला हो रहा है, और मृत्यु भी होती है। एक और अजीब बात है कि यह मामले अन्य हत्याओं की अपेक्षा ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। छिट-पुट मार-पीट तो दब ही जाते हैं। कई बार आपस में सुलझ जाते हैं, या ‘पार्ट ऑफ जॉब’ मान लिया जाता है।

यह कैसा ‘पार्ट ऑफ जॉब’ है? डॉक्टर पिट रहे हैं, पत्रकार पिट रहे हैं, और नेता वगैरा तो खैर पिटते ही रहे हैं। पार्ट ऑफ जॉब? मैं जब-जब इन रिपोर्ट को गलत मानता हूँ, किसी पत्रकार पर हिंसा की खबर आ जाती है। वजह जो भी हो, हिंसा को आप कैसे सही मान सकते हैं? कलम का जवाब कलम से ही दिया जा सकता है। हम रूस या चीन नहीं हैं, और कभी होंगें भी नहीं। मित्र Yashwant Singh जी पर हुए हमले के पोस्ट कुछ दिनों से देख रहा हूँ। हत्याओं पर तो काफी कुछ लिखा ही जा चुका। यह बात गले से उतर ही नहीं रही कि हमारा देश कभी पत्रकारों के लिए खतरनाक देशों में गिना जाएगा। बल्कि भारत प्रेस स्वतंत्रता के शिखर पर पहुँचे, यही कामना है।

(नार्वे में मेडिकल फील्ड में कार्यरत और सोशल मीडिया पर अपने लेखन के कारण चर्चित प्रवीण झा की एफबी वॉल से.)

प्रवीण श्रीवास्तव : कहीं किसी से सुना था कि … यशवंत सिंह जब वाराणसी संस्करण से प्रकाशित एक बड़े अखबार में थे.. उनका बाघा बॉर्डर जाना हुआ… लौटे तो “निगाहों- निगाहों में होती हैं बातें” नामक शीर्षक की ख़बर लिख डाली… कि दोनों देशों के सैनिक कैसे करते हैं बातें … उस यात्रा वृतांत में क्या था ये तो हमें नही पता… लेकिन जिसने ये बात छेड़ी थी उसके बातों से लग रहा था कि उस वृतांत के शब्दों ने कई पत्रकारों को हिला दिया था। लोग सोचने पर मजबूर हो गए कि हम भी बाघा बॉर्डर घूम आये लेकिन ऐसा भी लिखा जा सकता है दिमाग में क्यों नही आया। फिर क्या था लोग जलते गए… कारवां शिखर की तरफ बढ़ता गया… गाजीपुर का वह युवा यशवंत सिंह भड़ासी बन गया…
फिर क्या था.. संघर्षों और जीवन के उतार चढ़ाव ने भड़ासी बाबा की कलम मजबूत कर दी।

ये तो होना ही था… एक रोल मॉडल तैयार हो गया पत्रकारिता के छात्रों के लिए .. हम भी उन्हीं छात्रों में से थे… 2010 की बात है… हम पत्रकार बनने की लालसा लिए भोपाल पहुंचे… माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में दाखिला लिया.. वहां पहुंचने के बाद भड़ासी बाबा यशवंत सिंह के बारे में पता चला… हमें पूर्वांचल के होने के नाते इतना पता था कि पत्रकार होना अपने आप में भौकाली होता है…. उसपर भौकालियों की भौकाल पर नकेल कसने वाला इंसान कितना भौकाली होगा… वहीं से यशवंत सिंह से मिलने की लालसा जगी… खुशी तो तब और बढ़ गयी जब पता चला यशवंत जी हमारे पड़ोसी जिले गाजीपुर के हैं…. तमन्ना पूरी हुई कुछ सालों बाद गाज़ीपुर में पत्रकारों के एक कार्यक्रम में यशवंत जी मुख्य अतिथि थे… उनके साथ पिछले दिनों हुए वाकये के बाद भी उनकी उदार सोच ने युवा पत्रकारों में फिर से ऊर्जा भरी…

इस एक छोटी सी कथा को उन्होंने चरितार्थ किया.. कथा यूं है… “एक ब्राह्मण हर रोज मंदिर की 50 सीढियां चढ़कर पूजन को जाते थे… जैसे ही वह 25वीं सीढ़ी पर पहुंचते एक बिच्छु उन्हें डंक मार देता और वह उसे उठाकर किनारे रख देते और मंदिर में चले जाते, हर रोज ऐसा ही होता, लोगों ने एक दिन उनसे कहा बाबा आपको वो बिच्छु हर रोज काटता है और आप उसे मारने के बाजाय किनारे क्यों रख देते हैं.. इसपर ब्राह्मण ने जवाब दिया ” वो अपना धर्म निभा रहा है और मैं अपना” बिच्छु का धर्म है काटना सो वो मुझे काटता है…

(पूर्वी उत्तर प्रदेश के युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार प्रवीण श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.)

भड़ास संपादक यशवंत पर प्रेस क्लब आफ इंडिया में हमला करने वाले ये दो हमलावर हैं.. इन्हें जान लीजिए, पहचान लीजिए…

पूरे मामले को समझने के लिए ये भी पढ़ें….

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हमलावर नंबर एक भुप्पी भी मिल गया फेसबुक पर, देखें-जानें इसकी हकीकत

Yashwant Singh : फेसबुक पर मिल गया हमलावर नम्बर एक भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी। हमलावर नंबर दो अनुराग त्रिपाठी की तरह इसने भी मुझे फेसबुक और ट्विटर पर ब्लॉक कर रखा है ताकि खोजने पर ये न मिले। हमले के अगले ही दिन दोनों ने मुझे सोशल मीडिया पर ब्लाक कर दिया। क्यों? शायद उस डर से कि उन लोगों को खोजा न जा सके और उनकी करनी जगजाहिर न की जा सके। मुझे वाकई सोशल मीडिया पर खोजते हुए भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी नहीं मिले। फिर मैंने दोस्तों को टास्क दिया। इसके बाद पहले अनुराग त्रिपाठी की कुंडली मिली। अब भुप्पी का भी पता चल गया है।

इस भुप्पी के बारे में फिलहाल थोड़ा-सा बता दूं। यह आजतक न्यूज चैनल से ब्लेकमेलिंग के आरोपों में निकाला गया था। चार पांच साल पहले की घटना है। तब उसकी खबर भड़ास पर विस्तार से छपी थी। उसके बाद भुप्पी ने महुआ न्यूज चैनल में दलाली परवान चढ़ाने के लिए कदम रखा। इसकी और अनुराग की हरकतों के कारण इन दोनों को न सिर्फ महुआ न्यूज से जाना पड़ा बल्कि महुआ न्यूज को बंद हो जाना पड़ा। बताया जा रहा है कि ये भुप्पी फिलहाल किसी करेस्पांडेंट टीवी नामक एक वेबसाइट को चलाता है और इसी नाम से कोई पत्रिका प्रकाशित करता है, चंडीगढ़ से। फिलहाल इस डरपोक तक संदेश भेजकर इसको गेट वेल सून कहने का अभियान शुरू किया जाए।

इसका फेसबुक पता ये है https://www.facebook.com/bhupendranarayan.singh.54

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें..

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भड़ास वाले यशवंत पर हमला दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन चौंकाता नहीं : देवेंद्र सुरजन

Devendra Surjan : बेबाक निडर और साहसी पत्रकार Yashwant Singh पर हमला होना दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन चौंकाता बिलकुल नहीं. इस असंवेदनशील युग में जिसकी भी आप निडरता से आलोचना करोगे, वह आपका दुश्मन हो जाएगा. यशवंत भाई इसी इंस्टेंट दुश्मनी के शिकार हुए हैं लेकिन उन्हें अपनी भड़ास निकालना नहीं छोड़ना चाहिए. गौरी और उस जैसे दस और पत्रकारों ने इसी निडरता की कीमत अपने जीवन की आहुति देकर चुकाई है. अगला नम्बर किसी का भी हो सकता है. यशवंत सिंह जी जो करें, अपने जीवन को सुरक्षित रखते हुए करें क्योंकि उन जैसों की ही आज देश और समाज को जरूरत है.

देशबंधु अखबार समूह के निदेशक देवेंद्र सुरजन की एफबी वॉल से.

ये हैं दोनों हमलावर…

प्रेस क्लब आफ इंडिया में यशवंत पर हमला करने की निंदा का दौर जारी है… कुछ चुनिंदा प्रतिक्रियाएं पढ़िेए….

Nadim S. Akhter : पत्रकार और bhadas4media के संस्थापक Yashwant Singh पर हुए हमले की मैं घोर भर्त्सना करता हूँ। उनके ऊपर दिल्ली में प्रेस क्लब के बाहर हमला हुआ था। यशवंत भाई से यही कहूंगा कि जो लोग इसके लिए ज़िम्मेदार हैं, उन्हें कानून के दायरे में ज़रूर लाएं। हां, अगर वे कानूनी रूप से अपना जुर्म कुबूल करके सार्वजनिक माफी मांगें, तो उन्हें क्षमा किया जा सकता है। साथ ही अपनी निजी सुरक्षा का भी ख्याल रखें । बाकी भड़ास पर शब्द छापते रहें। कागद कारे, कागद कारे।

Vinay Dwivedi : पत्रकार Yashwant Singh पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के बाहर हमला किया गया और पुलिस की चुप्पी तो समझ आती है, प्रेस क्लब की चुप्पी के मायने क्या हैं। अगर यशवंत का विरोध करना ही है तो कीजिये, हमला करके क्या साबित किया जा रहा है। मेरा दोस्त है यशवंत, कई बार मेरे मत एक नहीं होते, ये जरुरी भी नहीं है लेकिन हम आज भी दोस्त हैं। चुनी हुई चुप्पियों और चुने हुए विरोध से बाहर निकलने की जरुरत है।

Sunil Kumar Suman : Bhadas4media के संचालक और युवा साहसी पत्रकार Yashwant Singh पर किया गया हमला निंदनीय है। यशवंत अपने सीमित संसाधनों में भड़ास4 मीडिया चलाते रहे हैं और मीडिया की दुनिया के कई गलत कारनामे निर्भीकता के साथ सामने लाते रहे हैं। एक ऐसे समय में जबकि पूरा मीडिया कॉर्पोरेट घरानों के कब्ज़े में है, इस तरह के सूचना माध्यम काफी अहमियत रखते हैं। काबिलेतारीफ बात यह रही कि यशवंत ने हिम्मत के साथ इस हमले को बेनकाब किया और अभी भी अपनी उसी प्रतिबद्धता के साथ मीडिया मैदान में डटे हुए हैं। हम सब आपके साथ हैं। हमलावर लोग कायर होते हैं, इसलिए हारना अंततः उन्हें ही होता है…

वेद प्रकाश पाठक गोरखपुर : मीडिया में बैठे गुंडों के खिलाफ यूं ही लड़ते रहिये Yashwant Singh भाई. बड़ा कठिन और साहसिक काम है मीडिया का लिबास ओढ़ कर बैठे गुंडों से निपटना। वह भी तब जबकि आप खुद कलमकार हों। मीडिया से जुड़ी खबरों के एकमात्र सर्वाधिक लोकप्रिय न्यूज वेबसाइट bhadas4media.com के संपादक आदरणीय यशवंत सिंह भाई यह काम अर्से से बखूबी कर रहे हैं। भ्रष्ट मीडिया घरानों ने आपको जेल में भी डलवाया लेकिन आप टूटे नहीं। आप मजबूती से लड़ते रहे। जेल में भी कलम चलती रही। हाल ही में अपनी लेखनी के कारण दो गुंडा और कथित पत्रकारों ने उनको फिर निशाना बनाया। प्रेस क्लब आफ इंडिया के बाहर उन पर हमला किया गया। यशवंत भाई पर हमले से उन पत्रकारों में खासा गुस्सा है जो कलम पर विश्वास रखते हैं। वे पत्रकार दुखी हैं, जिन्हें गुंडई की बजाय कलम पर आस्था है। यशवंत जी भी सक्षम हैं और उनके साथ इतना समर्थन है कि दोनों गुंडों का जवाब उन्हीं की भाषा में दिया जा सकता है। लेकिन वह ऐसा नहीं करेंगे। क्योंकि यशवंत सिंह उस शख्सियत का नाम है जो कलम से जवाब देते हैं। आपकी लेखनी में वह धार है जो गुंडई का माकूल उत्तर देने में सक्षम है। और वह समय-समय पर इस बात का आभास भी कराते रहते हैं। हम सभी आपकी लड़ाई में साथ हैं और अपने इस साथी से बस इतनी दरख्वास्त है कि यह लड़ाई हर हाल में जारी रहनी चाहिये।

Nirala Bidesia : दो दिनों पहले ही खबर को पढ़ा कि Yashwant भाई पर हमला हुआ है. पढ़कर अजीब लगा.घटना के बारे में जानकर तो और भी अजीब. क्या फालतू और बकवास टाइप की हरकतें पत्रकार करने लगे हैं. यशवंत भाई से मेरी आमने—सामने की कभी मुलाकात नहीं. ऐसा भी नहीं कि हर कुछ दिनों पर बात हो. पिछले करीब दस सालों से हम एक दूसरे को जानते हैं लेकिन कुल जमा दस बार भी चैट से बात नहीं हुई होगी. फोन से तो एक दूसरे की आवाज अब तक सुने नहीं हैं. लेकिन यह एक पक्ष है. असली वाला पक्ष यह है कि हम एक दशक से उन्हें जानते हैं, क्लोजली फॉलो करते हैं. इन दस सालों में यह हमेशा लगा है कि बहुत करीबी हैं यशवंत भाई.भड़ास की जब शुरुआत उन्होंने की तो पहले कुछ दिन लगा कि यह क्या बकवासबाजी है. लेकिन ऐसा कुछ ही दिनों तक लगा. फिर देखा कि कई संस्थान दे दनादन भड़ास को फॉलो करने लगे. उसी ट्रेंड पर वेबसाइट बनाने लगे. अब आज जबकि नये वेंचर का आइडिया मांगा जा रहा है और लोग दे रहे हैं तो उस लिहाज से भड़ास को एक फ्रेश और इनोवेटिव आइडिया माना जाना चाहिए. एक ऐसा आइडिया, जिसने देश भर के पत्रकारों को परोक्ष तौर पर एक दूसरे से जोड़ दिया. मीडिया के अंदर की खबर बाहर आने लगी तो न जाने कितने नंगे होने लगे, संस्थानों की परत दर परत पोल खुलने लगी. यह करिश्मा, चालबाजी कम थी, एक नये किस्म की बदलाव की आहट ज्यादा. भड़ास के बाद न जाने कितने लोगों ने कितने तरह के आरोप लगाये यशवंत पर. तरह—तरह के आरोप. मैं नहीं जानता कि उन आरोपों में कितना दम था. हो सकता है कि बहुत कुछ सच हो, संभव है कि बहुत कुछ मनगढ़ंत. ब्लैकमेलर, दारूबाज और भी न जाने क्या—क्या कहते थे. लेकिन इतने तरीके से व्यक्तिगत हमले, सार्वजनिक जीवन में चरित्र हनन के बावजूद ऐसा कभी नहीं सुना कि यशवंत ने किसी के साथ गुंडई की, हमला किया, करवाया. कायरों की तरह, बुजदिलों की तरह मतभेद—मनभेद वाले दुश्मनों से निपटा. दो दिनों पहले जब यशवंत भाई पर हमले की बात सुना तो लगा कि कितने कमजोर लोग हैं. सत्ता—सल्तनत टूट रही है तो यशवंत के मुकाबले कुछ नया कीजिए. परास्त कीजिए. अप्रासंगिक बनाइये भड़ास को. तर्कों और तथ्यों के साथ यशवंत को खड़ा कीजिए ताकि सार्वजनिक जीवन से वे तौबा कर लें. भड़ास और यशवंत के बारे एफबी पर लिखिए, कोई रोक थोड़े हैं. आपका लिखना सही होगा, भड़ास गलत होगा, यशवंत गलत होंगे तो वे तर्क देेंगे, कुतर्क करेंगे, जवाब देंगे या निरूत्तर हो जायेंगे. लेकिन इस तरह से हमला करना, मारना, मारने की कोशिश करना तो यही साबित करता है कि अभी भड़ास का भूत पीछा छोड़ नहीं रहा. उसका असर अब भी रगों में दौड़कर दिमाग को चैन से नहीं रहने दे रहा.यशवंत भाई पर हुए हमले का सिर्फ विरोध नहीं है बल्कि यह भी मानना हे कि हिंसा का सहारा लेनवाला कोई भी व्यक्ति चाहे कुछ और हो, वह पत्रकार तो नहीं होगा, नहीं हो सकता

Manoj Bhawuk : मैं Yashwant भाई को बहुत नजदीक से जानता हूँ। मुँहफट है, दिलेर हैं। बुजदिलों की तरह कभी नहीं लड़ते। चुप्पी के साथ मदद भी करते हैं और कमजोर के पक्ष में खड़े हो जाते हैं, बिना किसी रिश्ते-नाते के भी। हमला करने वाले लोग बहुत हीं घटिया और बुजदिल हैं।

Ravi Kumar Singh : वरिष्ठ पत्रकार लंकेश की हत्या के दुसरे दिन ही बड़ी संख्या में प्रेस क्लब में पत्रकारों का जमावड़ा लगा था, अंग्रेजी और हिंदी दोनोंं भाषाओं में बतियाते हुए समझदार लोग एक स्वर में निंदा कर रहे थे,किसी के हाथों में तख्तियां थी तो किसी के आंखों में गुस्सा, कातिल का पता नहीं फिर भी लोग दोषी को सख्त सजा दिलवाने की मांग कर रहे थे, लेकिन उसी राजधानी में भड़ास के संपादक Yashwant Singh जी पर हमला हुआ वो भी पत्रकारों के द्वारा जिनमें उन्हें चोट भी लगी, उन्होंने बकायदा इसकी जानकारी फेसबुक पर शेयर किया, फोटो में चेहरे पर लगा चोट साफ दिख रहा था हमलावर के नाम भी सामने थे,और ये राजधानी का ही मामला था, लेकिन यहां पर “वी वांट जस्टिस” करने वाले लोग नदारद हो गये, जैसे कुछ हुआ ही न हो, ये दावे के साथ कह सकता हूं कि पत्रकार लंकेश से कहीं ज्यादा भड़ास संपादक यशवंत सिंह जी ने पत्रकारों के लिए आवाज उठायी, बड़े बड़े मीडिया घरानों से टकराने की क्षमता इन्हीं में दिखी, बिना कोई लोभ लालच के ये भड़ास को कई सालों से चलाते आ रहे हैं जिसमें पत्रकारों के लिए हर बार आवाज उठायी जाती है, लेकिन आज वही बिरादरी अपने इस संपादक पर हुए हमले पर खामोश है, इससे बुरा हमारे लिए और क्या हो सकता है, खैर पहले राजनेता लाशों पर राजनीति करते थे लेकिन अब पत्रकार भी इस दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं, जहां उन्हें स्वार्थ दिखता है वहीं वह मुंह खोलते हैं, यकिन से कह सकते हैं पत्रकारिता का सबसे बुरा दौर चल रहा है…..

अजित सिंह तोमर : वरिष्ठ पत्रकार Yashwant Singh पर हाल ही में प्रेस क्लब,दिल्ली के बाहर दो ‘कथित’ पत्रकारों हमला किया और उनके साथ अभद्रता की। यशवंत जी की चोटिल तस्वीरें हमनें फेसबुक पर देखी। मैं उसी दिन से यह सोच रहा हूँ कि मीडिया की अंदरूनी दुनिया के शोषण और पत्रकारों की समस्याओं पर लिखने बोलने और अभियान चलाकर शोषित पत्रकारों के साथ खड़े होने वाले भाई यशवंत सिंह यदि ऐसी हिंसा के शिकार हो गए है तो इससे पता चलता है पत्रकारों की अंदरूनी दुनिया वास्तव ने कितनी अकेली और विचित्र किस्म की कुत्सओं से भरी है। मैं यशवंत जी को एक दशक से अधिक समय से जानता हूँ जितना स्पेस उन्होंने भड़ास फ़ॉर मीडिया पर विपक्ष को दिया है इतना कोई नही देता है वो गजब के लोकतांत्रिक सोच के व्यक्ति है। इस घटना के बाद उनकी प्रतिक्रिया में उदात्तमना होना ही मुखर होकर सामने आया उनका एक वीडियो मैनें देखा जिसमे वो क्षमा और नेचर की जस्टिस की बात कर रहे। मैं सोच रहा था ये आदमी किस मिट्टी का बना है यदि उनकी जगह मैं होता तो निसन्देह इतना उदार होकर कतई पेश नही आता। मीडिया के अंदर यदि पत्रकार (?) ऐसी गुंडई करेंगे तो हम उस मीडिया से संविधान सम्मत होने की अपेक्षा कैसे रख सकेंगे? निसन्देह भूप्पी और अनुराग त्रिपाठी पत्रकार तो नही है। बतौर जर्नलिज़्म टीचर मुझे यह बात भी खराब लगी कि एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ जो अभद्रता हुई उस पर जैसा विरोध मीडिया के अंदर होना चाहिए था वैसे नही हुआ। खैर! हमनें यशवंत जी का जेल प्रकरण भी देखा था तब भी कमोबेश ऐसे ही लोग चुप्पी लगा गए थे। मैं यह पोस्ट यशंवत जी के लिए नैतिक समर्थन या न्याय के लिए नही लिख रहा हूँ उनका अपना एक स्वतन्त्र अस्तित्व है और उनके चाहने वाले भी कम नही है मगर पत्रकारों के सुख-दुःख में मीडिया घरानों से लड़ने वाले पत्रकार के साथ हुई ऐसी हिंसा और अभद्रता देखकर मेरा मन खिन्न जरुर है। उम्मीद करता हूँ उन दोनों पत्रकारों के संस्थान इस निंदनीय कृत्य के लिए जरुर सख्त कार्यवाही उन पर करेंगे।

Apoorva Pratap Singh : अभी 3 दिन पहले पत्रकार Yashwant Singh पर हमला हुआ, कारण उनके पोर्टल पर उन दोनों व्यक्तियों (पत्रकार नहीं कहूंगी) के पिछले काले कारनामों की पोल खोली गई थी । अचंभा यह है कि रेगुलर मीडिया और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों की चुप्पी। दिवगंत गौरी जी और उनसे पहले वाले पत्रकारों जिनकी हत्याएं हुईं उन पर अगर सही समय ध्यान दिया गया होता, हाइलाइट किया होता तो हो सकता है कि यह सब नहीं होता। हम सब लोग सांप गुजरने के बाद लाठी पीटने वालों में से हैं । दुर्घटनाओं के बाद शोक सभाएं करने से बेहतर है कि मुद्दों को सही समय उठाया जाए। एक और कड़वी बात यह कि अपने मुद्दों, दिक्कतों को हाइलाइट या खुद की शोक सभा भी अगर ऑर्गनाइज करनी हो तो पहले एक गुट बनाइये या जॉइन करिये, तभी सम्भव है कि मसले को trp मिले, वरना लोग पीड़ित के ही सौ गुनाह गिनाने को तैयार हैं।

प्रेमी चन्द्रहाश कुमार शर्मा : पिछले दिनों पूर्वांचल के रहने वाले और दिल्ली में रहकर पूरे देश की मीडिया की खबर लेने वाले तेज-तर्रार पत्रकार भड़ास फॉर मीडिया के संपादक यशवंत कुमार सिंह पर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के गेट पर जानलेवा हमला हुआ, जिसकी मैं कड़ी निंदा करता हूं। क्या कहूँ, मुझे दुख इस बात की है, कि धारदार कलम के धनी यशवंत सिंह अपनी कलम को ही अपना तोप व हथियार समझतें हैं, यह मेरे जैसे नवोदित पत्रकार का भी यही तोप व हथियार है। भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी जैसे पत्रकार यशवंत सर पर हमला कर इस पेशे को कलंकित कर बैठे हैं। कई नामचीन प्रिंट मीडिया दैनिक जागरण, अमर उजाला जैसे अखबारों में अपनी लेखनी का लोहा मनवाने वाले पूर्वांचल के गाजीपुर जिले से ताल्लुक रखने वाले यशवंत सिंह एक लोकप्रिय हिंदी न्यूज़ पोर्टल भड़ास फ़ॉर मीडिया के संस्थापक व प्रधान सम्पादक हैं। उनकी लेखनी का मैं भी कायल हूँ। घटना के एक सप्ताह बाद भी इस प्रकरण पर शासन-प्रशासन का तनिक भी ध्यान नहीं है। खैर, जो हुआ उसका परिणाम तो भुप्पी और त्रिपाठी को भुगतना ही है, पर… जो हुआ गलत हुआ। यह घटना लोकतंत्र पर ”लोकतंत्र” का हमला है।

Prakash Asthana : सच तो यह है कि यशवंत ने कई मीडिया घरानों से पंगा लिया हुआ है..वहां जो पत्रकार काम कर रहे हैं, वे भले ही दिल से यशवंत के साथ हों, लेकिन संपादक या मालिक के खिलाफ जाकर वे उसकी खबर तक नहीं बना सकते..उन्हें भी नौकरी करनी है…अब पहले वाली पत्रकारिता तो रही नहीं, अलबत्ता मीडिया संगठन जरूर कुछ कर सकते हैं

Azeem Mirza : सत्य कड़वा होता है लेकिन हकीकत यही है कि न जाने कौन सी लालच, प्रभाव या दबाव में मीडिया का बड़ा वर्ग काम कर रहा है, संस्थान में बड़े ओहदों पर बैठे मीडिया मैनेजर अपने अधिनस्तो का शोषण कर रहे हैं, ऐसे लोगों में यशवन्त जी के समर्थन में बोलने की हिम्मत ही नहीं है, मैं यशवन्त जी के साथ हूँ।

Virendra Dubey : सर जी बात तो सही है। सभी को सांप सूघ गया है। इस मुद्दे पर कोई बात ही नहीं करना चाहते है। रवीश भाई भी इस मुद्दे पर चुप है। वे क्या यशवंत भाई को पत्रकार नहीं मानते है या फिर अभी तक उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं हो पायी। पत्रकारों की असली लड़ाई तो यशवंत जी ही लड़ रहे हैं।

Nirmal Kumar : जिस तरह की पत्रकारिता यशवंत सिंह जी करते हैं, मुझे पहले से अंदेशा था कि ऐसा होगा। आज की तारीख में ईमानदार को कोई देखना नहीं चाहता। ईमानदारी एक ऐसी रौशनी की तरह हो गयी है जो चहुँ ओर व्याप्त बेईमानी और भ्रष्टाचार के अँधेरे को चीरती है इसलिए इन धतकर्मों में लिप्त लोग रौशनी के स्त्रोत को ही बंद करने में लगे हैं काली कोठरी के रोशनदान को बंद करने में लगे हैं। धिक्कार है डरपोक सियासतदानों पर।

सौजन्य : फेसबुक

पूरे मामले को समझने के लिए इसे भी पढ़ें…

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यशवंत सिंह पर कैसे हुआ हमला, सुनिए उनकी जुबानी (देखें वीडियो)

प्रेस क्लब आफ इंडिया के गेट पर भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह पर दो लफंगानुमा पत्रकारों ने हमाला किया. इनमें से एक का नाम भूपेंद्र सिंह भुप्पी है और दूसरा अनुराग त्रिपाठी है. प्रेस क्लब के भीतर ये दोनों यशवंत को देखने के बाद अपनी टेबल से उठकर यशवंत की टेबल पर आ गए और बैठकर यशवंत की तारीफें किए जा रहे थे, गले मिल रहे थे. बाहर निकलने पर धोखे से हमला कर दिया.

यशवंत ने हमले के दो दिन बाद पूरी कहानी इस वीडियो के जरिए विस्तार से बताई. साथ ही ऐसे हमलों को लेकर अपनी सोच का इजहार भी किया. नीचे दिए वीडियो पर क्लिक करें:

यशवंत ने उपरोक्त वीडियो के लिंक को फेसबुक पर साझा करते हुए जो लिखा है, वह इस प्रकार है :

उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं :

Alok Singh : बहुत दुःखद है इस तरह का विरोध करना। मारपीट और हाथापाई कायराना हरकत है जो कि निंदनीय है। शुक्र है कि आपको ज्यादा चोटें नहीं आई। आपका चश्मा टूट गया। कोई बात नहीं। मिलिये मैं आपको उस से बढ़िया वाला चश्मा दिलवाने का प्रयत्न करूँगा। जल्द स्वस्थ होकर पुनः अपने जीवन का आनंद लें।

Rishabh Yadav : bhaiya lage raho…prerna de raha hai aapka yeh video। भैया आप जब समय मिले तो यह भी बताये की किन कारणों से जेल यात्राएं हुई और ओर नौजवान लोगों के लिए क्या सावधानियां रखना चाहिए। थोड़ा कोर्ट कचहरी का अनुभव भी साझा करें तो बढ़िया रहेगा। लिखें पूरे सिलसिलेवार ढंग से, अगर आप उचित समझें तो।

Hemant Jaiman Dabang : यशवन्त सर आपको कुछ नही होगा। हजारो लोगो की दुआएं आपके साथ है।

Qamer Baig : भड़ास है तो निकलेगी ही किसी के कायराना हरकत के लिए तो भड़ास भर भर के निकले कलम की तेज धार से भड़ास निकालते रहिये सतर्क रहिये होशियार रहिये खुश रहिये और ज़िंदादिली से सभी से मिलते रहिये।

अंशुमान मिश्रा : सर ये कोई आम हमला नहीं बल्कि नाक पर हमला है। अब सवाल नाक का है तो कुछ न कुछ करना ही चाहिए।

Dhananjay Singh : ”थोड़ा मारने दो इसे,बहुत खबरें छापता है” कहते हुए दिल्ली के प्रेस क्लब में भड़ास वाले Yashwant भाई को दो पत्रकारों ने ही पीट दिया……… जाहिर है इस घटना के गवाह भी कई एक रहे ही होंगे… निर्भीक पत्रकारिता पर खुद पत्रकारों की तरफ से हुए इस हमले की मैं निंदा करता हूँ ….खम्भों की यह लड़ाई निंदनीय है… आप भी छापिये न भाई,असहमति है तो किसी को पीट देंगे? ऐसे ही कमजोर पलों में निहायत ही कमजोर लोग पिस्टल भी निकाल लेते हैं और परिणाम अत्यंत भयानक होता है… आशा है देश की राजधानी के प्रेस क्लब में हुई इस घटना के विरोध में तमाम एक्टिविस्ट्स से लगायत प्रधानमंत्री भी ट्विट करेंगे. ऐसी हरकत निंदनीय है, अभी निंदा करिए.

Shahid Naqvi : जब खबर छापने के विरोध में पत्रकार ही पत्रकार पर हमलावर हो तो सच के नज़दीक पहुंचना मुश्किल है। पत्रकार पर किसी भी तरह के हमले की मैं घोर निन्दा करता हूं।

Vaibhav Agrawal : यशवंत जो पत्रकारिता की पोल खोल राजनीती करते है वो निश्चित ही प्रसंशक कम दुश्मन अधिक बनाती है! .. इस ढंग से मार पीट कर इन लोगो ने पत्रकारिता को और अधिक कलंकित किया है! दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, इसमें राजनीतिक लाभ का कोई एंगल न होने की वजह से अधिकतम बिरादरी चुप है! 🙁

Abdul Noor Shibli : shandar. dono se ab bhi nafrat nahin. wah.

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भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब गेट पर भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी ने किया हमला

(कोबरा पोस्ट में प्रकाशित यशवंत पर हमले की खबर का स्क्रीनशाट)

भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह पर चार सितंबर की रात करीब साढ़े दस बजे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के गेट पर जानलेवा हमला हो गया. यशवंत को बुरी तरह से मारा-पीटा गया और गालियां दी गई. भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने अपनी फेसबुक वाल पर घटना की जानकारी देते हुए लिखा, ”अटैक हो गया गुरु। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के गेट पर। बहुत मारा पीटा मुझे। पार्ट ऑफ जॉब ही है। भूपेंद्र सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी की कारस्तानी है। जाने किस खबर की बात करके पीटा उसने।” इस हमले में यशवंत का चश्मा टूट गया और नाक, कान, गर्दन, होंठ पर चोट आई है.

यशवंत ने बताया कि भूपेंद्र सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी प्रेस क्लब के अंदर तो काफी अच्छे मिले. तारीफ की. लेकिन वे पूरी योजना से थे. बाहर गेट पर इंतजार कर रहे थे. जब यशवंत बाहर निकले तो भूपेंद्र सिंह भुप्पी ने हाथ मिलाने के बहाने पास बुलाया और हमला कर दिया. इस दौरान अनुराग त्रिपाठी मोबाइल से वीडियो बनाने लगा. वहां मौके पर वरिष्ठ पत्रकार रुबी अरुण भी मौजूद थीं जो हमलावर को बार बार रोक रही थीं लेकिन भुप्पी और अनुराग दोनों लगातार कह रहे थे कि ‘इसे मार खाने दो, बहुत खबरें छापता है’. इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से यशवंत हक्के बक्के थे और लगातार भुप्पी से कह रहे थे कि आखिर गुस्सा किस बात पर है, प्रेस क्लब के अंदर तो तुम ठीक थे, बाहर अचानक क्या हो गया?

भुप्पी हमले के दौरान कुछ बरस पुरानी छपी भड़ास की खबरों का जिक्र कर रहा था. ज्ञात हो कि भूपेंद्र सिंह भुप्पी रहने वाला गाजीपुर का है लेकिन चंडीगढ़ में केपीएस गिल की खानदान की एक लड़की से शादी करने के बाद अब नोएडा और चंडीगढ़ सेटल हो गया है. आजतक के लिए पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के ब्यूरो चीफ के बतौर एक जमाने में काम करता था पर किन्हीं कारस्तानियों के कारण उसे निकाल दिया गया. फिर उसने महुआ न्यूज चैनल ज्वाइन किया जहां वह फिर अपनी कारस्तानियों के कारण असफल साबित हुआ और अब मीडिया से ही बाहर हो चुका है. उन दिनों इसी से संबंधित खबरें भड़ास पर छपा करती थीं.

अनुराग त्रिपाठी भी महुआ में भुप्पी के साथ था और आजकल खुद को तहलका / न्यूज लांड्री के साथ कार्यरत बताता है. यशवंत ने प्रेस क्लब आफ इंडिया के प्रबंधन को हमले के बाबत लिखित शिकायत दे दी है. साथ ही एक लिखित कंप्लेन पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में दी है. यशवंत ने पहले एफआईआर न करने का निर्णय लिया था लेकिन अपने देश भर के हजारों साथियों समर्थकों के अनुरोध पर थाने में लिखित कंप्लेन देने का फैसला कर लिया.

यशवंत का कहना है कि दो पत्रकारों का किसी खबर को लेकर एक पत्रकार पर हमला करना पत्रकारिता के आजकल के निम्नतम स्तर को दर्शाता है. जब हम पत्रकार खुद ही मानसिक लेवल पर सामंती / आपराधिक सोच रखते हैं तो कैसे इस लोकतांत्रिक देश में मीडिया की निष्पक्षता की बात सोच सकते हैं. कलम का जवाब कलम ही हो सकता है, हथियार या हमला नहीं. यशवंत ने भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी को बेहद कमजोर आदमी करार देते हुए कहा कि ये माफी के योग्य हैं, इन्हें खुद नहीं पता कि ये क्या कर बैठे हैं. ये लोग सामने कुछ कहते-बोलते हैं और पीठ पीछे छुरा घोंपने को तैयार रहते हैं. ऐसे दोहरे व्यक्तित्व और आपराधिक मानसिकता के लोग अगर मीडिया में हैं तो यह मीडिया की दयनीयता / दरिद्रता को ही दिखाता है. एक आदमी जो अकेले और निहत्था है, उस पर अचानक से घेर कर हमला कर देना कहां की बहादुरी है. उम्मीद करते हैं कि भुप्पी और अनुराग में अगर थोड़ी भी पत्रकारीय सोच-समझ होगी अकल आएगी और अपने किए पर पश्चाताप करेंगे. 

यशवंत ने अपने पर हमले को लेकर फेसबुक पर दो पोस्ट्स डाली हैं, जो इस प्रकार हैं-

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अपराधी को हिरासत से भगाने वाली गाजीपुर पुलिस ने निर्दोष बुजुर्ग का मोबाइल फोन छीन लिया!

Yashwant Singh : ग़ज़ब है यूपी का हाल। अपराधी भाग गया हिरासत से तो खिसियानी पुलिस अब बुजुर्ग और निर्दोष को कर रही परेशान। मेरे बुजुर्ग चाचा रामजी सिंह का फोन ग़ाज़ीपुर की नन्दगंज थाने की पुलिस ने छीना। बिना कोई लिखा पढ़ी किए ले गए। अब बोल रहे फोन हिरासत में लिया है। शर्मनाम है यह सब। जो पुलिस वाले नशे में होकर अपराधी को भगाने के जिम्मेदार हैं, उनको तो अरेस्ट किया नहीं होगा, एक बुजुर्ग को ज़रूर घर से उठा ले गए और फोन छीन लिया। चाचाजी फिलहाल लौट आए हैं, लेकिन फोन पुलिस ने रख लिया। यही है मोदी-योगी राज का स्मार्ट और डिजिटल इंडिया। राह चलते आदमी का फोन पुलिस छीन ले जाए और पूछने पर कहे कि फोन हिरासत में लिया है। माने बिना लिखा पढ़ी किसी का भी फोन छीनकर हिरासत में लेने का अधिकार है पुलिस को? यूपी की पुलिस कभी न सुधरेगी।

चाचा का मोबाइल पुलिस वालों ने लौटा दिया. गाजीपुर के एसपी का फोन आया था. पर सवाल ये है कि क्या पुलिस होने का मतलब यही होता है कि आप किसी भी सीनियर सिटीजन को उठा लो और फिर उनको यहां-वहां घुमाने के बाद छोड़ते हुए फोन छीन लो. जब फोन के बारे में पूछा जाए तो कह दीजिए कि फोन हिरासत में है. बिना लिखत पढ़त आपका फोन कैसे ले सकते हैं पुलिसवाले? डिजिटल इंडिया के इन दिनों में जब फोन आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज है, आपकी वर्चुवल / आनलाइन पर्सनाल्टी की तरह है मोबाइल फोन, इसमें सारे मेल, सारे पेमेंट डिटेल्स, सारे कार्ड्स, सारे सोशल मीडिया साइट्स, सारे कांटैक्ट्स, सारे आफिसियल और परसनल डिटेल्स होते हैं तो आप पुलिस वाले इन्हें यूं ही छीन कर कैसे ले जा सकते हो और और पूछने पर तपाक से कैसे कह दोगे कि फोन आपका हिरासत में लिया गया है? मने कुछ भी कर दोगे और कुछ भी कह दोगे? कोई नियम-कानून आपके लिए नहीं है? अपराधी आप पुलिस वाले खुद ही हिरासत से भगा दीजिए और इसका बदला किन्हीं दूसरे निर्दोषों से लीजिए?

गाजीपुर के पुलिस कप्तान सोमेन वर्मा को मुझे यह समझा पाने में काफी मुश्किल हुई कि आपका थानेदार किसी का फोन यूं ही कैसे छीन कर ले जा सकता है? आपको किसी आदमी पर शक है, उसकी बातचीत या उसके मैसेजेज पर शक है तो आप उसके फोन नंबर सर्विलांस पर लगवा लो, सीडीआर निकलवा लो, सारे मैसेज पता करवा लो, सारे फोन सुन लिया करो… चलो ये सब ठीक, देश हित का मामला है, अपराध खोलने का मामला है, अपराधी पकड़ने का मामला है, कर लो ये सब, चुपचाप. लेकिन आप किसी का फोन कैसे छीन लेंगे? और, पूछने पर कहेंगे, पूरी दबंगई-थेथरई से, कि हम फोन चेक कर रहे हैं? ऐसे कैसे फोन छीनकर चेक कर सकते हैं आप लोग? आपने अगर फोन छीनकर आपके लोगों ने इसी फोन से अपराधियों को फोन कर दिया, इसी फोन से अपराधियों को मैसेज कर दिया और फिर बाद में यह कह कर फोन वाले को फंसा दिया कि इस फोन से तो अपराधियों को काल किया गया है, मैसेज किया गया है तो फिर हो गया काम… इस तरह से आप लोग किसी भी निर्दोष को फंसा सकते हैं.

देश में अभी निजता की बहस चल ही रही है. किसी के फोन में देखना तक अनैतिक होता है. किसी के फोन को बिना पूछे उठाना गलत माना जाता है. आप पुलिस वाले तो किसी दूसरे का पूरा का पूरा फोन ही छीन लेते हो? ये इस लोकतंत्र में किस किस्म का निजता का अधिकार है? या फिर ये निजता का अधिकार सिर्फ बड़े शहरों के बड़े लोगों के लिए है?

ट्विटर पर यूपी पुलिस, डीजीपी, सीएम योगी आदि को टैग करते हुए जब मैंने ट्वीट किया और कई साथियों ने इस ट्वीट पर यूपी पुलिस व गाजीपुर पुलिस से जवाब मांगा तो गाजीपुर पुलिस सक्रिय हो गई. रात में ही चाचा का फोन नंदगंज थाने से शहर कोतवाली मंगवा लिया गया और मुझे इत्तला किया गया कि फोन आ चुका है, किसी को भेज कर मंगवा लें. मेरे अनुरोध करने पर शहर में रहने वाले साथी Sujeet Singh Prince और Rupendra Rinku भाई रात करीब एक बजे गाजीपुर कोतवाली जाकर चाचा का फोन ले आए.

सवाल ये भी है कि क्या हम आप अगर ट्विटर और एफबी पर सक्रिय हैं, तभी जिंदा रहेंगे, वरना पुलिस आपके साथ कोई भी सलूक कर जाएगी? ऐसा देश मत बनाइए भाइयों जहां किसी निर्दोष और किसी आम नागरिक का जीना मुहाल हो जाए. क्या फरक है सपा की अखिलेश सरकार और भाजपा की योगी सरकार में? वही पुलिस उत्पीड़न, वही अराजकता, वही जंगलराज. जिसका जो जी कर रहा है, वह उसे धड़ल्ले से कर रहा है, बिना सही गलत सोचे.

हमारे गांव का एक अपराधी गाजीपुर शहर में पुलिस हिरासत से फरार हो गया. बताया जाता है कि पुलिस वाले जमकर पीने खाने में मगन थे और उसी बीच वह भाग निकला. जो पुलिस वाले उसे पेशी पर लाए थे, उन्हें करीब दो घंटे बाद पता चला कि पंछी तो उड़ चला. मुझे नहीं मालूम गाजीपुर के पुलिस कप्तान ने इन लापरवाह, काहिल और भ्रष्ट पुलिस वालों को गिरफ्तार कराया या नहीं, जो अपराधी को भगाने के दोषी हैं. इन पुलिस वालों ने कितने पैसे लेकर अपराधी को भगाया, इसे जांच का विषय बनाया या नहीं, मुझे नहीं मालूम. पर पुलिस विभाग शातिर अपराधी के भाग जाने के बाद उसे खोजने-पकड़ने के चक्कर में अब उन निर्दोषों को परेशान करने लगा जिनका इस शख्स से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं.

खिसियानी बिल्ली खंभो नोचे के क्रम में पुलिस वाले भागे हुए अपराधी को पकड़ने के नाम पर मेरे गांव पहुंचे और मेरे बुजुर्ग चाचा रामजी सिंह को उठा ले गए. वे उन्हें गाजीपुर शहर उनके बड़े वाले पुत्र यानि मेरे कजन के घर पर ले गए. उनका बड़ा पुत्र गांव छोड़कर गाजीपुर शहर में गांव की किचकिच / राजनीति से बचने के लिए सपरिवार किराये पर रहने लगा. वहां जब उनका बड़ा बेटा नहीं मिला तो पुलिस वाले चाचा को छोड़ तो दिए पर जाते-जाते उनका फोन ले गए. उस फोन को ले जाकर उन्होंने उसमें सेव सभी नामों पर मिस काल मारने लगे. जिसका भी पलट कर फोन आए, उससे फोन पर ही पूछताछ करने लगते.

अरे भाई गाजीपुर पुलिस! आजकल की पुलिसिंग बहुत एडवांस है. कहां बाबा आदम के जमाने के इन तौर-तरीकों / टोटकों में अटके पड़े हो और अपनी कीमती उर्जा यूं ही खर्च कर रहे हो. आजकल अव्वल तो शातिर अपराधी फोन पर बात नहीं करते. दूसरे, पुलिस के लोग अब तकनीकी रूप से काफी ट्रेंड किए जाने लगे हैं ताकि वे सारे आयाम को समझ कर अपराधी को बिना भनक लगे दबोच सकें. साइबर अपराध बढ़े हैं और इसी कारण इसको हैंडल करने के लिए ट्रेंड पुलिस वालों की भी संख्या बढ़ाई जा रही है. पर यूपी में लगता है कि पुलिस अब भी बाहुबल और बकैती को ही अपराध खोलने का सबसे बड़ा माध्यम मानती है.

भाई एडवोकेट Prateek Chaudhary की एक पोस्ट पढ़ रहा था जिसमें उन्होंने लिखा है कि अलीगढ़ में एक थाने में एक लड़की को 12 दिन तक लगातार गैर-कानूनी रूप से रखा गया. उस पर शायद अपनी भाभी की हत्या का आरोप था. जब हो-हल्ला हुआ तो उसे 12 दिन के बाद जेल भेजा गया. बताइए भला. एक लड़की को आप 12 दिन तक हवालात में रखते हो! ये कहां का नियम कानून है. आप रिमांड पर लो. पूछताछ करो. पर ये क्या कि न कोर्ट में पेश करेंगे न जेल भेजेंगे, बस हवालात में रखे रहेंगे! वो भी एक लड़की को! क्या इन्हीं हालात में (गाजीपुर में मेरे चाचाजी वाले मामले और अलीगढ़ में लड़की वाले मामले में) पुलिस वाले उगाही और बलात्कार जैसी घटनाएं नहीं करते?

योगी सरकार को यूपी में पुलिसिंग दुरुस्त करने के लिए बहुत सख्त कदम उठाने की जरूरत है अन्यथा सरकार बदलने के बावजूद जनता के कष्ट कम न हो सकेंगे. अखिलेश यादव के राज में जो जंगलराज था, वही हालात आज भी जमीन पर है. खासकर छोटे और पिछड़े जिलों में तो पुलिस विभाग का बुरा हाल है. वहां पुलिस का मतलब ही होता है गरीबों को प्रताड़ित और शोषित करने वाले. निर्दोष जनता से बदतमीजी करने के आरोपी / दोषी पुलिस वालों को बिना देर किए सस्पेंड-बर्खास्त करने में कतई हिचकने-झिझकने की जरूरत नहीं. शायद तभी ये सुधर सकें.

मेरे चाचा के फोन छीने जाने वाले मामले में डॉ Avinash Singh Gautam और Avanindr Singh Aman समेत ढेरों साथियों ने ट्विटर पर तुरंत सक्रियता दिखाई, इसके लिए इन सभी का दिल से आभार.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : 9999330099 या yashwant@bhadas4media.com

गाजीपुर पुलिस का हाल जानने के लिए इसे भी पढ़ें…

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44 के हुए यशवंत को वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय ने यूं दी बधाई

Dayanand Pandey : आज हमारे जानेमन यारों के यार यशवंत सिंह का शुभ जन्म-दिन है। व्यवस्था से किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत सिंह से सीखे। अपनों से भी किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत से सीखे। यहां तक कि अपने-आप से भी किसी को टकराना सीखना हो तो भी वह यशवंत से सीखे। अपने आप को गाली सुनाने और सुनने की क्षमता भी किसी को पानी हो तो यशवंत से पाए। पारदर्शिता की इंतिहा भी हैं यशवंत सिंह।

मैं उनको उनकी फकीरी, फ़क्कड़ई और बहादुरी के लिए जानता हूं। मीडिया के थके-हारे, पराजित लोगों को जिस तरह सुस्ताने के लिए, रोने के लिए, साहस और भरोसा देने के लिए अपना अनमोल कंधा वह सर्वदा उपस्थित कर देते हैं वह अन्यत्र दुर्लभ है। मीडिया के असंख्य स्पीचलेस लोगों के लिए जिस तरह वह भड़ास 4 मीडिया के मंच के मार्फत वायस आफ स्पीचलेस बन जाते हैं, वह बहुत ही सैल्यूटिंग है।

आज वह 44 साल के हो गए हैं। अभी कुछ समय पहले वह जेल गए थे, मीडिया घरानों के खिलाफ लड़ते हुए। कई सारे मीडिया हाऊस मिल कर उन के खिलाफ पिल पड़े थे। कि वह जेल से बाहर ही न आ पाएं। पर वह आए और एक दिलचस्प किताब ‘जानेमन जेल’ भी लिखी। लेकिन जब वह जेल में थे तभी मैंने उनकी बहादुरी और संघर्ष को रेखांकित करते हुए एक लेख लिखा था। लेख का लिंक नीचे देते हुए, उनके इस जुझारू जज़्बे को सैल्यूट करते हुए उन्हें जन्म-दिन की बधाई दे रहा हूं।

बीती आधी रात भी मेसेंजर पर उन्हें बधाई दी थी। फ़ौरन उनका वीडियो काल आया। वह लहालोट थे, जश्न में थे, बहू के साथ नृत्यरत! बजते हुए गीत और नृत्य के बीच वह बार बताते रहे, आप की बहू है, बहू! और बहू नृत्य में उनके साथ होते हुए भी गंवई और पारिवारिक लाज, ओढ़े हुए थीं। मर्यादा और यशवंत के मान का निर्वाह करते हुए। ईश्वर से प्रार्थना है कि ऐसे ही सपरिवार स्वस्थ, मस्त और प्रसन्न रहें यशवंत सिंह। लव यू जानेमन यशवंत सिंह, लव यू!

यह समय यशवंत के खिलाफ़ आग में घी डालने का नहीं, यशवंत के साथ खड़े होने का है
http://sarokarnama.blogspot.in/2012/07/blog-post.html 

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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भड़ास4मीडिया के भविष्य को लेकर यशवंत ने क्या लिया फैसला, जानें इस एफबी पोस्ट से

Yashwant Singh : ऐ भाई लोगों, कल हम पूरे 44 के हो जाएंगे. इलाहाबाद में हायर एजुकेशन की पढ़ाई के दौरान ओशो-मार्क्स के साथ-साथ अपन पामोलाजी-न्यूमरोलॉजी की किताब पर भी हाथ आजमाए थे. उस जमाने में हासिल ज्ञान से पता चलता है कि मेरा जन्मांक 8 और मूलांक 9 है. जन्मांक छब्बीस का छह और दो जोड़कर आठ बना इसलिए आठ हुआ. मूलांक तारीख, महीना और साल जोड़कर पता किया जाता है जो मेरा 9 होता है. इस बार जो 26 अगस्त सन 2017 है, इसका योग 8 बैठ रहा. 44 साल का होने के कारण चार प्लस चार यानि आठ हो रहा. मतलब जन्मांक और मूलांक दोनों आठ हो रहा है. ग़ज़ब संयोग या दुर्योग, जो कहिए, बैठ रहा है इस बार. वैसे, अपन तो कई साल पहले लिख चुके हैं कि बोनस लाइफ जी रहा हूं, इसलिए हर दिन जिंदाबाद. 🙂

अपने एक पत्रकार साथी मृदुल त्यागी, दैनिक जागरण मेरठ के जमाने में ज्योतिषीय ज्ञान-गणना के आधार पर राहु-केतु टाइप के दो खूंखार जीवों / ग्रहों-नक्षत्रों का मुझ पर भयंकर प्रकोप बताया-समझाया करते थे. तब मुझे मन ही मन लगता रहा कि जरूर ये मूलांक 9 वाला अंक राहु है और जन्मांक 8 वाला केतु. अंक ज्योतिष के हिसाब से 8 वाला अंक थोड़ा क्रिएटिव पर्सनाल्टी डेवलप करता है और 9 वाला दुस्साहसी / खाड़कू / दबंग टाइप का. जब दोनों साथ हों तो आदमी ‘एक तरफ उसका घर एक तरफ मयकदा’ मार्का द्वंद्व समेटे हुआ जीवन के हर क्षण को हाहाकारी टाइप से जीता है. अपन का भी कुछ कुछ ऐसा रहा है. 🙂

ऐसा लग रहा है कि राहु-केतु मेरा पिंड छोड़ रहे हैं. ज्योतिष के विद्वान लोग बताएं कि क्या मेरे इस बर्थडे पर राहु और केतु की अनंत प्यास बुझ जाएगी और वो मेरा पिंड छोड़कर मेरे किसी ‘चाहने’ वाले के कपार पर सवार हो उसे सदा के लिए बेचैन आत्मा बनाकर छोड़ेंगे 🙂

मौज लेते रहना चाहिए.

इस जन्मदिन पर मैं क्या सोच-गुन रहा हूं?

बस दो चीजें.

एक तो सोचने-दिमाग लड़ाने का काम लगभग बंद कर रहा हूं. ‘जाहे विधि राखे प्रभु, ताहे विधि रहिए’ वाला मेरा हाल हो गया है. इस रास्ते पर चलते हुए लग रहा है कि चलते रहो, जब जीवन का अंतत: कोई मकसद ही नहीं होता तो फिर काहें को टेंशन लेने का, हर साल का चार्ट काहें को तैयार करने का. तत्काल में यानि तुरंत में जीते रहो, न अतीत को लेकर परेशान होओ और न भविष्य को लेकर चिंतित. तत्क्षण को उदात्त तरीके से जीते रहो. जीवन यापन के लिए जो करो, इतने कलात्मक ढंग से, इतने मन से और इतने डूब कर करो कि वही तपस्या और ध्यान बन जाए.

बीते दो दशकों के दौरान समझ, संघर्ष, समय, चेतना और नियति आदि के मेलजोल के चलते अब एक जाग्रत भाव-सा निर्मित हुआ है. यह भाव महसूस किया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता, क्योंकि जो इससे वंचित है, वह सारा का सारा शब्दजाल मानेगा. एक नया जीवन चर्या डेवलप होने लगा है. पुराने संस्कारों की ज़िद खत्म होती जा रही है. नई लाइफस्टाइल ने खुद ब खुद जगह बनाना शुरू किया है. एक ट्रांजीशन फेज चल रहा था पिछले चार पांच साल से, वह पूरा होने की ओर है. सहजता और शांति, ये ऐसी चीजें हैं जो बीते एक साल के दौरान शिद्दद से खुद के भीतर महसूस किया, कर रहा हूं. इन्हें खदेड़ने के वास्ते बाहरी तौर पर बेहद अशांत और असहज माहौल क्रिएट करता रहा, जान बूझ कर, पर जीतता रहा अंदर वाला ही. अपने आप.

किसी भी चीज की परवाह न करना, तत्क्षण में जीना, किसी भी तर्क-वितर्क या घटनाक्रम की निर्रथकता महसूस करना, ‘ये हो जाएगा तो क्या हो जाएगा और वो नहीं हो रहा तो क्या बिगड़ रहा’ टाइप फीलिंग का घर करते जाना… ये सब मिलाकर एक अ-सामाजिक सा व्यक्तित्व निर्मित होता रहा. एक शब्द आता है हाइबरनेशन. शायद मेरे मामले में उसी की बारी है. अतिशय उर्जा खर्च कर अब तक का भड़ भड़ टाइप जिया हुआ करियरवादी / क्रांतिकारी / अराजकतावादी (जिसे जो मानना हो माने, अपन तो जीवन को समग्रता में देखते हैं) जीवन फिलहाल इनके इतर या इन्हीं चीजों के दूसरे कांट्रास्ट / छोर की तरफ शिफ्ट हो गया है. सबका भला हो, सबको प्रेम मिले, सब सहज हों, सब भयमुक्त हों. ऐसा फील आने लगा है. ऐसा करने-कराने का मन करने लगा है. पहले भी थी, लेकिन तब दूसरे रास्ते तलाशे जाते थे. दूसरे हथियार अख्तियार किए जाते थे. अब तो अलग बात है. अब तो सहज बात है.

इस आंतरिक मन:स्थिति के इस लेवल की ज्यादा व्याख्या यहां संभव नहीं है. शब्द शायद सटीक न मिलें और इसके अभाव में व्याख्या कहीं सतही न हो जाए. वैसे भी, आंतरिक यात्राएं अधिकांशत: निजी हुआ करती हैं. बाहरी यात्राएं अक्सर सामूहिकता और परंपरा का स्वभाव लिए होती हैं. अध्यात्म आंतरिक यात्रा से जुड़ा मामला है. इसमें बाहरी मदद ज्यादा नहीं मिल सकती. इसमें सामूहिकता का कोई ज्यादा मतलब नहीं है. अप्प दीपो भव: वाली स्थिति होती है यहां. विज्ञान और व्यवस्था आदि चीजें परंपरा दर परंपरा निर्मित होती रहती है. इसमें हर पीढ़ी कुछ न कुछ जोड़ती रहती है. और, हर आदमी के जाग्रत होने के खुद के रास्ते तरीके होते हैं. फिलहाल इस विषय को यहीं छोड़ते हैं. यह इतना बड़ा टापिक है, इतने डायमेंशन हैं कि इसे लिखा नहीं जा सकता. दूसरे, अगर सब लिख दिया तो उसे सब महसूस नहीं कर सकते.

अब दूसरी बात. भड़ास को 26 अगस्त को बंद करने को लेकर जो मेरा ऐलान था, उसके बाद से लगातार मंथन, चर्चा और विमर्श अलग-अलग लोगों से होता रहा. तय फिलहाल ये हुआ कि भड़ास को बंद न किया जाए. और, इसमें बहुत ज्यादा उर्जा भी न खर्च की जाए. इसके संचालन के लिए आय के स्रोत क्रिएट करने को लेकर कई किस्म की चर्चाएं हुईं. मेरा निजी मन भड़ास से इतर कुछ नये आंतरिक प्रयोगों को लेकर है, सो भड़ास मेरी प्रियारिटी में न रहेगा. हां, बड़ा प्रकरण / मामला आएगा तो छोड़ेंगे नहीं, छोटे-मोटे मामलों का लोड लेंगे नहीं.

आखिरी बात. जो कुछ विजिबल है, उतना ही गहरा, उतना ही मजबूत इनविजिबल चीजें हैं. उर्जानांतरण इधर से उधर होता रहता है. इसे आप विजिबल मोड में फील कर सकते हैं, उस पाले, यानि इनविजिबल हिस्से को महसूस कर सकते हैं. इसके लिए दिन के उजाले से बचिए, रातों की दिनचर्या शुरू करिए. रात में बगल के पेड़ से आ रही चिट चिट वाली गिलहरी की आवाज के जरिए गिलहरी की रातचर्या को महसूस करिए. अगल-बगल दिखने वाले कुछ चुनिंदा अंधेरों से बतियाइए, उनसे दोस्ती करिए. ये सब एक डोर हैं जिनके जरिए आगे बढ़ा जा सकता है.

फिलहाल जैजै वरना कमरेडवा सब कहेंगे कि गड़बड़ा गया है 🙂

पर ये भी सच है कि ‘सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग.’ इसलिए मस्त होकर अपनी लाइफ खुद चुनिए, जीइए.

फिर से जैजै मित्रों.

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से.

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आज रिलीज ‘राग-देश’ और ‘इंदु सरकार’ क्यों हैं मस्ट वॉच फिल्में, बता रहे हैं यशवंत

Yashwant Singh : ऐसा बहुत कम होता है कि एक ही दिन दो अलग-अलग सच्ची घटनाओं पर आधारित, दो अलग-अलग ऐताहासिक कालखंडों पर केंद्रित फिल्में रिलीज हो जाएं. आज ऐसा हुआ है. ‘राग देश’ और ‘इंदु सरकार’ नामक दो फिल्में आज शुक्रवार के दिन रिलीज हुई हैं. दोनों सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं और दोनों ही घटनाएं इतिहास के चर्चित अध्याय हैं.

‘राग देश’ सुभाष चंद्र बोष और उनकी सेना आईएनए के जवानों पर केंद्रित है. मेरे जैसे लोग जो गांधी जी के साथ-साथ भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चंद्र बोस आदि के प्रति समान श्रद्धा और प्रेम रखते हैं, इस फिल्म को जरूर देखेंगे क्योंकि सुभाष चंद्र बोस और उनकी सेना के बारे में इतिहासकार कई एंगल से देखते लिखते बताते हैं. सुभाष चंद्र बोस की सेना आईएनए के जांबाज जवानों के द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ट्रायल को फिल्म का मुख्य सब्जेक्ट बनाया गया है. सुभाष चंद्र बोस और उनकी सेना पर पूरी तरह केंद्रित इस नई फिल्म से बहुत उम्मीदें हैं.

फिल्म रागदेश के निर्माता गुरदीप सिंह सप्पल

इस फिल्म की खास बात यह भी है कि इसे अपने बड़े भाई और राज्यसभा टीवी के सीईओ व एडिटर इन चीफ Gurdeep Singh Sappal जी ने प्रोड्यूस किया है. जाने माने फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया ने इसे डायरेक्ट किया है. यह फिल्म चुनिंदा फिल्म क्रिटिक्स को दिखाई जा चुकी है और उन सभी ने इसे मस्ट वाच कैटगरी की फिल्म करार दिया है. यानि रिव्यू के लेवल पर फिल्म को ढेर सारे स्टार मिल रहे हैं. फिल्म का ये स्लोगन काफी फेमस हो रहा- ”जो देश से करते हैं प्यार, वो राग-देश से कैसे करें इनकार!” तो बंधु, चलिए चला जाए देखने. अपने सभी मित्रों से अपील है कि वे ‘राग देश’ देखें और इसको लेकर रिव्यू प्रकाशित करें. मैं आज शाम का शो बुक कर चुका हूं.

इंदु सरकार फिल्म पहले ही विवादों के कारण चर्चा में आ चुकी है. इंदिरा गांधी, संजय गांधी और आपातकाल पर केंद्रित इस फिल्म के जरिए हम जैसे आपातकाल के समय या बाद पैदा हुए लोग जान सकेंगे कि उस दौर की क्या भयावहता थी, उस दौर के घटनाक्रम कैसे कैसे घटित हुए. इस फिल्म को मधुर भंडारकर ने बनाया है जो पेज थ्री, फैशन, कारपोरेट जैसी फिल्में बना चुके हैं. इंदु सरकार को को कल देखूंगा. फिर दोनों ही फिल्मों का रिव्यू परसों लिखूंगा, वादा है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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”आप ठहरे भड़ासी पत्रकार, कोई आम आदमी होता तो फर्जी मुकदमे लादे जाते और जेल काट कर ही बाहर आता”

पिछले दिनों भड़ास के संपादक यशवंत सिंह के साथ यूपी के गाजीपुर जिले की पुलिस ने बेहद शर्मनाक व्यवहार किया. यशवंत अपने मित्र प्रिंस सिंह के साथ रेलवे स्टेशन पान खाने गए और कुछ लोगों की संदिग्ध हरकत को देखकर एसपी को सूचना दी तो एसपी के आदेश पर आए कोतवाल ने यशवंत व उनके मित्र को ही पकड़ कर कोतवाली में डाल दिया. इस पूरे मामले पर यशवंत ने विस्तार से फेसबुक पर लिखकर सबको अवगत कराया. यशवंत की एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा इस प्रकार हैं… मूल पोस्ट नीचे कमेंट्स खत्म होने के ठीक बाद है… 

Mamta Kalia इस घटना से पुलिस का जनता के प्रति रवैया पता चलता है। मैंने एक बार अपने घर मे हुई चोरी की रपट लिखवाई थी। पुलिस ने मुझे अलग अलग तारीखों में कोर्ट बुला कर इतना परेशान किया कि मैंने लिख कर दे दिया मुझे कोई शिकायत नहीं। केस बन्द किया जाय।

सोनाली मिश्र हम लोग बाइक चोरी होने की रिपोर्ट लिखवाने पहुंचे तो वो हमें ही यह उपदेश देने लगे, चेन न पहना करें, टॉप्स न पहनें आदि आदि।

Ramji Mishra इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि पुलिस से शिकायत करने से पहले खुद को आदरणीय यशवंत जी की तरह मजबूत बना लेना चाहिए, अन्यथा अंजाम उसके हांथ होगा……

Shyam Singh Rawat अपने साथ भी मुरादाबाद में कुछ ऐसा ही हुआ था 1991 में। एक पुलिस इंस्पेक्टर की सार्वजनिक हित में ऐसी ही क्लास लगाई थी। फर्क इतना कि हम अकेले थे। बड़ी मुश्किल से इंस्पेक्टर साहब की जान छूटी थी।

Braj Bhushan Dubey अजीब दास्तान है। अजीबो गरीब घटना। आमजन के साथ तो ऐसे ही होता है जिसे चाहा उठा लिया और बेइज्जत कर दिया। शहर कोतवाल जो है। जोरदार लेखनी कि पढ़ने वाला एक बार शुरू करें तो अंत करके ही रुकेगा।

Pawan Singh यशवंत गुरू एक किस्सा और मिलता है तुम्हारे किस्से से….पुख्ता तौर पर वर्ष का उल्लेख न कर सकूँगा …वाकया होगा तकरीबन सन् 1988-89 का…दैनिक नवजीवन में मैं स्ट्रिंगर हुआ करता था…एक दिन पता लगा कि प्रसिद्ध कवि व पत्रकार राजेश विद्रोही और उस दौरान नवभारत टाइम्स में कार्यरत धीरेंद्र विद्यार्थी काठमांडू में धर लिए गए हैं …घटना यूँ थी कि नेपाल में कम्युनिस्ट दबदबे वाली सरकार थी..भाई लोगों ने दवा लगाई और काठमांडू के कवि सम्मेलन मंच पर ही कम्युनिस्टों के खिलाफ ही आधा दर्जन कविताओं का फाॅयर झोंक दिया….बवाल मचा…भाई लोग धर लिए गए ….अगले दिन हम लोगों ने नेपालगंज जाकर वहां के नेपाली पत्रकारों को साधा तो अगले दिन शाम ढलने के बाद छूटे….आज राजेश भाई तो दुनियां में नहीं हैं लेकिन उनकी कुछ कविताओं की दो-दो पंक्तियां आज भी याद हैं …..

अखबार नवीस भी अजब आदमी है, खुद खबर है दूसरों की लिखता है..

..आज सारा धनी पड़ोस उस निर्धन के साथ है।
लगता है उसकी बेटी जवान है…

..भूखे को चांद भी रोटी नजर आता है….

Vijay Prakash जय हो सर पूरा झकझोर दिए। आखिर तक हार नहीं माने…

Anurag Singh थाने को भी बाद में पता चला कि हम तो असली थानेदार को ले आये, फिर कोतवाल साहब बोले होंगे हईला….मैनें ये क्या कर दिया

Vinod Bhaskar बोला ये क्या कर बैठे घोटाला हाय ये क्या कर बैठे घोटाला, ये तो है थानेदार का साला.

पत्रकार यदु सुरेश यादव सर जी आप तो ठहरे भड़ासी पत्रकार, कोई आम आदमी होता तो लूट के दो चार केस दर्ज हो जाते और कुछ दिन जेल की रोटी तोड़ने के बाद ही बाहर आता, जय हो भड़ासानंद बाबा

Kuldeep Singh Gyani योगी का बदला कोतवाल से…अभी “अर्ध कुम्भ” लगने में समय है महराज, लेकिन बढ़िया तबियत दुरुस्त किये विभाग की…सारे भक्तजन एक साथ…बोलिये, स्वामी भड़ासानन्द महराज की जै

Azmi Rizvi दादा यही होता है आम आदमी के साथ, कोई आम आदमी होता तो जेल में होता आज, और दस बीस साल लग जाते उसे बेगुनाह साबित होने में। जै हो बाबा की

Rahul Vishwakarma सही सबक सिखाया… लेकिन कोतवाल की तरह आपको भी रायता थोड़ा और फैलाना चाहिए था. जरा जल्दी मान गए…

Surendra Trivedi यार मित्र, वाकई में बड़े ही रोमांटिक हो।

Anil Gupta पैदल चलने वाला हर आदमी सामान्य नही होता … बहुत खूब सर ..

Ravi S Srivastava लगता है जानेमन जेल पढे नही है कोतवाल साहब

Gaurav Joshi ग़ज़ब दादागिरी दिखायी भाई आपने ।

Riyaz Hashmi मेरठ कांड याद दिला दिया भाई। उस कहानी का एक चरित्र सौरभ भी याद आ गया जो अब इस दुनिया में नहीं है। Take Care.

Amod Kumar Singh कभी हमारी कोतवाली पधारिये, तुलसी रजनीगन्धा के साथ कन्नौज का इत्र विदाई में अलग से दिया जायेगा।

Yashwant Singh आंय । धमका रहे हैं भाया या वाकई प्रेम भरा न्योता है?

Amod Kumar Singh पुलिस में आने से पहले पुलिस की इतनी लाठियां खायी हैं, कि किसी सभ्य व्यक्ति को धमकाने या लठियाने की कल्पना ही नहीं की जा सकती।आपका स्वागत है।

Yashwant Singh काश आप जैसे सोच समझ के लोग पुलिस विभाग में ज्यादा होते। थैंक्यू आमोद भाई। न्योता कुबूल। जल्द मुलाकात होगीं।

Journalist Yogesh Bharadwaj यशवंत भाई आप मिलिएगा आमोद जी से अच्छे व्यक्तित्व के धनी है और अच्छी सोच समझ के साथ न्याय प्रिय भी

Mishra Aradhendu आप तो बच गए पर आम जनता का क्या , जिसको ये पुलिस वाले बोलने ही नहीं देते….??

Shivam Bhardwaj ज़बरदस्त… लगा जैसे सब कुछ सजीव देख रहा हूँ 🙂

Ashutosh Dwivedi यशवंत जी क्या छापी जा सकती है ये कथा।

Yashwant Singh बिल्कुल ब्रदर।

Nishant Arya रजनीगंधा से मोह नहींऐ जाएगा। उल्टे कोतवाले से घुस लिए।।। बाह

Ajay Kumar Kosi Bihar बच गए भाई.बिहार रहता तो पोलठी भी खाते.सब पत्रकारी निकाल देता.तब फिर से आपको जाने मन जेल का भाग 2 लिखना पड़ता.

Ghanshyam Dubey तो आगे से समझ लेना — SP और CO समझदार थे! अगर न होते तो कहानी में फिर कई ट्विस्ट होते। पुलिस तो फर्जी मुकदमे कायम करने में माहिर होती है! जवान हो, भड़ासी हो तो कहानियाँ तो होती रहेंगी…

चन्द्रहाश कुमार शर्मा …तो आप भी एक नया अफसाना बना दिये?

Sachin Mishra मनमोहक और काफी रुचिकर कहानी थी गुरु। सच में वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो।

Kailash Paswan इसलिए पुलिस को आमलोग उप नाम से पुकारते है

Devendra Verma आपने पुलिस का जो सच सुनाया है, वह बिलकुल सच है ….जैसे मैने पढना शुरू किया वैसे वैसे कहानी का रोमांच बढता गया आनन्द आ गया…..

Md Islam बेचारा कोतवाल गलत नंबर डायल कर गया

Amit Srivastava इस पूरी घटना में मुखपात्र कोतवाल का कही नाम नहीं लिखा अगर उसका नाम भी लिख देते तो मामला समझ ने लोगो को आसानी होती।

Pandit Prakash Narayan Pandey बेशर्मी व बेहयाई की हद्द कर दी उस दारोगा ने… वे सब बहुरूपिया तो होते ही हैं… बहरहाल लताड़ना तो कत्तई नहीं छोड़ना है….
Hemant Jaiman Dabang एक वाक्य में ख़त्म करूँगा—अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे… यहां ऊंट कोतवाल (पुलिस) को कहा गया है। और पहाड़ यशवंत सिंह को। राम जी राम

Ashutosh Chaturvedi ऊर्जा का संचार कर दिया सर आपने।

DrMandhata Singh गनीमत है एनकाउंटर नहीं किया। आजकल अपनी प्रगति के लिए अनजान लोगों को बलि का बकरा बनाते हैं पुलिस वाले और बाद में होती है लीपा-पोती। अनुरोध है कि ऐसे खेल न खेलें। हम लोगों के लिए आप बहुमूल्य हैं। यह आपको याद रखना चाहिए। सबक का खेल सावधानी से खेलें।

Sunayan Chaturvedi भड़ासी माहौल के जनक यशवंत सिंह की भड़ासी अदा को प्रणाम।

Purnendu Singh आज तो तुम खुश बहुत होगे ठाकुर कोतवाल सीओ, sp से माफी मंगवा लिए। याद रखना अब तुम्हारे जैसे लोग अनशन की धमकी मत दे कर माफी मंगवा सकते हैं तो यह नेता बलात्कारी और अपराधी हत्यारों को भी छोड़ा लेते हैं फिर दोष मत देना पुलिस को क्यों कोतवाल निकम्मा था जो तुमको ऐसे ही आने दिया… कभी किसी के चक्कर में पड़ोगे तो बताया जाएगा पुलिस क्या होती है…

Yashwant Singh आपकी बात कांट्राडिक्टरी हैं। बेवजह पकड़े जाने पर निर्दोष का प्रतिरोध और रेपिस्ट मर्डरर अपराधी को पुलिस से छुड़वाए जाने की नेता की गुंडई जैसी दो विरोधाभाषी चीजों को एक तराजू में रख कर कैसे तौल सकते हैं। वैसे, धमकाने के लिए धन्यवाद।

Sandeep Chandel भाई साहाब पुलिस कोई मुहनोचवा तो है नहीं कि किसी को उठा ले जाय मामले की सही जाच कर के उठाना चहीये ताकी लोगो का विश्वास बना रहे ये सही है की हम पुलिस की दिल से इज्ज़त करते हैं और करते रहेंगे , लेकीन विश्वास तब डगमगाता हैं जब ग्यात्री प्रजापती जैसे लोगों को पकडने में एक महीने लग जाता है और आम जनता को सरेआम बदनाम किया जाता है, हमे लगता है आप हमारी बातों से सहमत होंगे ,

Syed Shahid Ali पुलिस की कार्यप्रणाली की सच्चाई सहन न कर पाने बाले भाई साहब एक पत्रकार को धमकाने के बजाय जनता में पुलिस की छवि सुधारने पर विचार कीजिए । धन्यवाद

Uvaish Choudhari पुरनेन्दू जी के रिश्तेदार तो नही थे कोतवाल साहिब?

S.K. Misra गलती करने वालों को भी विभाग के यदि लोग ऐसे ही समर्थन देंगे तो उनमें सुधार कैसे होगा, इस पुलिस बाले की कमेंट को देख कर दुःख हो रहा है ।

Manoj Tripathi आप जहाँ काण्ड वहां!!

Ram Murti Rai Jabardast.. Heropanthi

C S Singh Chandu जरा सोचिए भाई साहब अगर आपके जगह कोई आमजनता होती तो अब तो उसका उसके पूरे परिवार के साथ बड़ी ही दर्दनाक कहानी हो जाती और वर्षों पढ़ी जाती… सोचकर ही रुह काँप जा रही है… पता नहीं और क्या क्या बीतती उस आम आदमी के साथ…

Rahul Gupta Badaun भैया जी, यह कोतवाल अब सपने में भी सौ सौ बार सोचेगा, इस भड़ासी बाबा से आइंदा पाला न पड़े। वरना अभी तो बच गया आगे भगवन मालिक होंगे। अब यह जहाँ भी आपको देखेगा खुद चल कर मिलने आएगा।

Ajay Mishra खेत खाए गदहा मारा जाए जुलाहा उत्तर प्रदेश पुलिस की यही दिनचर्या है यह सुधर जाएं तो पूरा प्रदेश सुधर जाए

ChandraShekhar Hada सर, ऐसा लग रहा है जैसे आप रजनीगंधा-तुलसी की विज्ञापन फिल्म कर रहे हैं।

Nirupma Pandey ये आप ही कर सकते थे ।

Maneesh Malik Thanks for police valo ko sabak sekhane k laya Maja aa gya. Jay hind.

Syed Mazhar Husain क्या बात है भाई… ऐसी तैसी हो गयी कप्तान से लेकर कोतवाल तक… एक सेल्फी तो बनती थी कोतवाल के साथ…

Narendra M Chaturvedi जेल तो….जानेमन जेल…नाम से प्रख्यात हुई…और अब कोतवाली….यशवंत भईया वैसे आज आपके मुताबिक जेल दिवस भी है…?

S.K. Misra इस पोस्ट में डीजीपी को टैग करना चाहिये था… उन्हें भी पता चलता उनके रणबांकुरे कैसे जनता की सेवा में तत्पर हैं।

Surya Prakash कुल मिला के रजनीगन्धा तुलसी की व्यवस्था हो गई गुरु …

Rajendra Joshi घटना तो जो भी रही हो कहानी में ऐसे-ऐसे मोड़ आपने डाल दिए कि लगा न जाने अगले मोड़ पर क्या नया होगा।

Sarvesh Singh बेचारे पुलिस वालों ने इस दिन की कल्पना तक ना की होगी।

Anshuman Shukla अब सोचिये, लल्लन टाप कानून व्यवस्था है कि नहीं है उत्तर प्रदेश में।

Ashok Kumar Singh आपका रिश्वत रजनीगन्धा तुलसी ,फिर भी सस्ता ही पड़ा कोतवाल को

Vinay Shrikar बतौर समझौते की शर्त तुलसी और रजनीगंधा के साथ ही संजीवनी सुरा की डिमांड कर देना था।

Rajesh Mishra बहुत गलत किये थे कोतवाल महोदय

A.k. Roy कोतवाल के लिऐ, सेर को सवासेर मिला….

Sant Sameer क्रान्तिवीरों की जै हो।

Shrinarayan Tiwari गजब की कहानी है यशवंत जी

Anuj Sharma गुरु एक नई जानकारी मिल गई। आप ”रजनीगंधा तुलसी” मंत्र से वश में होते हो।

Umesh Srivastava Socialist संत किसी के बस में नहीं होता और सब के बस में होता है

Anuj Sharma गुरु तो क्रांतिवीर हैं।।। पत्रकारों की रीढ़ हैं।।

Anuj Sharma अब भक्त ये मंत्र याद कर लेंगे।।।

Kaushal Sharma उत्तर प्रदेश पुलिस संघटित अपराधियों का सरकारी गिरोह है।

Abhay Prakash Yashwant G Mai to aapko ni janta par itna jarur kahunga ki pulice wale itna sidhe sadhe kab se ho gai

Anand Agnihotri फोन करके कोतवाल साहब का हालचाल तो पूछ लेते। बेचारा बड़ा मायूस बैठा होगा। अब कई दिन कहीं से रंगदारी नहीं मिलेगी उसे।

प्रयाग पाण्डे आपकी जै हो। माना आपकी जगह कोई दूसरा निरपराध इंसान होता ? बना दिया गया होता न अपराधी। खैर…… .

Dinesh Dard यही जुझारूपन तो चाहिए ज़ुल्म के ख़िलाफ़। मगर हर शख़्स में इतनी ताब कहाँ होती है। बहरहाल, ज़िंदाबाद।

Vinod Bhardwaj स्वामी भड़ासानन्द जी महाराज, अब उस इंस्पेक्टर को दिल से धन्यवाद कर दो जिसने अपनी करतूत से ये रोमांचकारी भडासी मसाला लिखने – पढ़ने का मौका दे दिया ।

Madan Tiwary यह हुई मेरे मन मुताबिक़ बात। अब आंदोलन शुरू करो गुरु।

Amar Chaubey ध्यान रखा करिये आप योगी सरकार में है

Madhusudan JI अपने ही घर के दरवाजे पर अपना ही कुत्ता न पहचान पाया और गुर्रा कर अपनी औकात भी जल्दी से पहचान लिया.. बधाई हो.. धूल चटा ही दिया उसे

Manish Jaiswal सर, इन कोतवाल महापुरुष का नाम तो बता दीजिए ताकि हम लोग भी उन्हें दुआ दे सकें…

Fareed Shamsi जलवा है जलवा, मैं तो सोच रहा था, कि अब एक और नई किताब पढ़ने के लिये मिलेगी ‘जानेमन हवालात’

Amit Tiwari आज फिर से अपराध जीत गया। एक तुलसी और रजनीगंधा की रिश्वत से बड़ी गलती को माफ़ कर दिया गया । क्या गारंटी है कि इस रिश्वत से पुलिस यह ग़लती किसी भले आदमी के साथ दोबारा नही करेगी।

Dheeraj Rai Sri Amit ji / Dobara Aysa karen na karen .. Ab Yah Police Parivar ke mukhiya (SP-Gazipur) ka daitva huva. Sri Yashvant Ji ne SP KoAaina dikha Apne Daitva ka Nirvahan kar diya. Ab Ek Journalist Es se jada kuchh nhi De Sakta Police ko. Ins. Ko Nilambit athva Anya koi bhi gambhir karywahi ka Vaydhanik Adhikar to Aaina Dekhte SP ke Pas hay !! Ab SP Avm Sarkar Samjhe.
Dhanyawad Sri Yashvan Ji.

Ashwani Sharma अरे भाई कोई आम आदमी होता तो अब तक जेल में सड़ रहा होता

Dheeraj Rai Haaaaaaaa…. To kisi Patrakar se Pala para tha Police ka. hona hi tha.

Lokesh Raj Singh Aapki patrakarita ka power bhi paan masale tak mein simat aaya jai ho patrakar maharaj. Koi shaq nahi ki angreji daru par imaan bik jata hoga.

Manoj Singh Chauhan आप के साथ कहानी हुई, उस कोतवाल के साथ तो कांड हो गया…

Yatish Pant आम आदमी पर क्या गुजरती होगी क्योंकि ऐसा तो रोज होता है।

Chandra Shekhar Kargeti कोतवाल को माफ़ भी किया तो एक रजनीगन्धा और डबल जीरो में …आपकी जगह कोई दुसरे वाले पत्रकार रहे होते तो ?

Mannu Kumar Mani Yashwant भाई, कोई आम आदमी होता। तो उसकी लग गई होती।

Arvind Saxena आपने तुलसी रजनीगंधा की मांग कर अपराध को बढावा दिया

Care Naman सच में कहानी कहानी हो गई इस नई जवानी

Syed Tariq Hasan पैदल चलने वाला हर व्यक्ति सामान्य नहीं होता ! शानदार।

Devendra Kumar Nauhwar आप असाधारण हैं, आपकी समाज को जरूरत है!

Ankit Kumar Singh यशवंत भैया कोतवाल सच में पैर छूने लगा ??

Vishal Ojha ले रहे मजा मजबूर बन के जानेमन

Ashish Mishra E sare fasad ki jadd mujhe tusli aur rajnigandha lg rha h.

Gopal Ji Rai Janeman 2 likhane SE bach gaye

Sandeep Kher वाह बहुत अच्छा सबक़ दिया आपने सर पर उस ग़रीब आदमी का क्या जो ऐसे ही उठा लिए जाते है जिनका कोई सोर्स नहीं होता है अगर आप भी आम आदमी होते तो शायद अंदर होते हमारी पूलिस संवेदनहीन हो गए है जो सिर्फ़ आदेश बजाना जानती है फिर चाहे निर्दोष इंसान को ही ना उठना पड़े पूलिस को ध्यान देना चाहिए की कोई बेगुनाह आदमी क़ानून के चुंगल में ना आए

Sanjay Kumar Patrakaar पता नहीं भारत में ऐसी घटनाएं रोज कितनी होती होगी. परंतु बहुत सा मामला उजागर ही नहीं होती है . यशवंत जी आपने उजागर कर पुलिस की कार्यशैली को जनता के सामने लाने का प्रयास किया है .

Sunil Kumar Singh जय हो… पर आप जरा अंदाजा लगाए कि यह पुलिस महकमा कैसे पेश आता होगा आमजन से?

Vivek Gupta बहुत खूब भैय्या. लेकीन ये प्रशासन कब सुधरेगा.

Gandhi Mishra ‘Gagan’ काम तो कोतवाल कोई बुरा नहीं किया था भाई क्योंकि आप दोनों मित्र भी तो पहुंचने के बाद उसे जिसकी संदिग्धता की जानकारी आपने कप्तान को दी थी कोतवाल को भी देना था औऱ रजनीगंधा तुलसी पर नहीं बिकना था ।

Dharmendra Pratap Singh बाबा कहीं रहें और बवाल न हो, असंभव… जय हो !

Rinku Singh हर पैदल चलने वाला आम आदमी नहीं होता….

Amit Kumar Bajpai पूरी कहानी का सार……. रजनीगंधा की पुड़िया और पानी की बोतल में संसार बंधा है….. तर्क- वितर्क- कुतर्क धरे रह जाते हैं, गलती करने वाले पछताते हैं और गुरु गजब कर जाते हैं.. Haha

Neeraj Sharma बड़े काण्डी हो यशवंत भाई

Trilochan Prasad हाहा, डार्लिंग जेल वाले को पकड़ लिया

Anil Kumar Singh उसे मालूम नहीं था जिसे बकरा समझ रहा है वह तो शेरों का शेर है।


मूल पोस्ट ये है…

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रेलवे स्टेशन पर पान खाने गए यशवंत पहुंचा दिए गए कोतवाली!

Yashwant Singh : रात मेरे साथ कहानी हो गयी। ग़ाज़ीपुर रेलवे स्टेशन पर पान खाने गया लेकिन पहुंचा दिया गया कोतवाली। हुआ ये कि स्टेशन पर मंदिर के इर्द गिर्द कुछ संदिग्ध / आपराधिक किस्म के लोगों की हरकत दिखी तो एसपी को फोन कर डिटेल दिया। उनने कोतवाल को कहा होगा। थोड़ी ही देर में मय लाव लश्कर आए कोतवाल ने मंदिर के पास वाले संदिग्ध लोगों की तरफ तो देखा नहीं, हम दोनों (मेरे मित्र प्रिंस भाई) को तत्काल ज़रूर संदिग्ध मानकर गाड़ी में जबरन बिठा कोतवाली ले गए। मुझे तो जैसे आनंद आ गया। लाइफ में कुछ रोमांच की वापसी हुई। कोतवाल को बताते रहे कि भाया हम लोगों ने तो संदिग्ध हरकत की सूचना दी और आप मैसेंजर को ही ‘शूट’ कर रहे हो।

कोतवाली में नीम के पेड़ के नीचे चबूतरे पर मेरा आसन लगा और गायन शुरू हो गया- ना सोना साथ जाएगा, ना चांदी जाएगी…। पुलिस वालों ने मेडिकल कराया जिसमें कुछ न निकला। अंततः एक स्थानीय मित्र आए तो उनके फोन से फिर एसपी को फोन कर इस नए डेवलपमेन्ट की जानकारी दी। एसपी भौचक थे सुनकर। उन्होंने फौरन कोतवाल को हड़काया। सीओ को कोतवाली भेजा। आधे घंटे में खुद भी प्रकट हो गए।

तब तक दृश्य बदल चुका था।

शहर कोतवाल सुरेंद्र नाथ पांडेय हम लोगों के चरण छूकर माफी मांग रहा था। उनका अधीनस्थ दरोगा जनार्दन मिश्रा जो बदतमीजी पर आमादा था, कोतवाली लाए जाते वक्त, गायब हो चुका था। हम लोगों ने नीम के पेड़ के नीचे पुलिस जुल्म के खिलाफ ऐतिहासिक अनशन शुरू कर देने की घोषणा की। माफी दर माफी मांगते रुवांसे कोतवाल को हम अनशनकारियों ने आदेश दिया कि फौरन तुलसी रजनीगंधा की व्यवस्था कराओ, तब अनशन खत्म करने पर विचार किया जाएगा। कोतवाल ने अल्फा बीटा गामा चीता कुक्कुर सियार जाने किसको किसको आदेश देकर फौरन से पेशतर उच्च कोटि का पान ताम्बूल लेकर हाजिर होने का हुक्म सुनाया।

सीओ को हम लोग कम भाव दिए क्योंकि निपटना कोतवाल से था।

कप्तान आए तो मेरा पुलिस, जनता, पत्रकरिता और सरोकार पर भाषण शुरू हुआ जो अनवरत आधे घंटे तक चला। मैं रुका तो मेर साथ अनशनकारी मित्र प्रिंस का उग्र भाषण शुरू हुआ। कप्तान सोमेन वर्मा माफी मांगने लगे और कोतवाल को जमकर लताड़ने लगे। अगले घण्टे भर तक सुलहनामे की कोशिश चलती रही। मेरी एक ही शर्त थी कि अगर मेरे दोस्त प्रिंस ने माफ कर दिया तो समझो मैंने भी माफ कर दिया वरना ये कोतवाली का धरना सीएम आवास तक पहुंचेगा। एसपी ने प्रिंस भाई के सामने हाथ जोड़ा और पुलिस विभाग की तरफ से मांफी मांग कर उन्हें गले लगाया। साथ ही साथ वहां हाथ बांधे खड़े कोतवाल की जमकर क्लास लगाई- ‘तुम नहीं सुधर सकते… चीजों को ठीक नहीं कर सकते हो तो कम से कम रायता तो न फैलाया करो…’।

मैंने कहा- ‘इसके पास वसूली उगाही से फुरसत हो तब न सकारात्मक काम करे… ऐसे ही लोग विभाग के लिए धब्बा होते हैं जो राह चलते किसी शख्स से बदतमीजी से बात करते हुए उसे थाने-कोतवाली तक उठा लाते हैं, जैसा आज हुआ’।

कोतवाल बेचारे की तो घिग्घी बंधी थी। एसपी और सीओ माफी पर माफी मांग अनशन से उठने का अनुरोध करते जा रहे थे। हम लोग जेल भेजे जाने की मांग पर यह कहते हुए अड़े थे कि अरेस्टिंग और मेडिकल जैसे शुरुआती दो फेज के कार्यक्रम हो चुके हैं, तीसरे फेज यानि जेल भेजे जाने की तरफ प्रोसीड किया जाए।

इसी बीच बाइक से आए एक पुलिस मैन ने कोतवाल के हाथों में चुपके से कुछ थमाया तो कोतवाल ने हाथ जोड़ते हुए मुझे तुलसी रजनीगंधा का पैकेट दिखाया। मैं मुस्कराया, चॉकलेट को मुंह से कट मारने के बाद सारे दुख भूल जाने वाले विज्ञापन के पात्र की तरह। उधर प्रिंस भाई का भी भाषण पूरा हो चुका था और पूरा पुलिस महकमा सन्नाटे में था। अनुनय विनय की चौतरफा आवाजें तेज हो चुकी थीं। अंततः आईपीएस सोमेन वर्मा के बार बार निजी तौर पर मांफी मांगने और आइंदा से ऐसी गलती न होने की बात कही गयी तो मैंने उनसे बोतल का पानी पहले प्रिंस भाई फिर मुझे पिला कर अनशन खत्म कराने का सुझाव दिया जिसे उन्होंने फौरन लपक लिया।

आंदोलन खत्म करने का एलान करते हुए नीम के पेड़ के चबूतरे से उठ कर मैं सीधे कोतवाल की तरफ मुड़ा और उसके हाथ से तुलसी रजनीगंधा झपटते हुए कहा- ”तुम यहां आंख के सामने से निकल लो गुरु, वर्दी न पहने होते तो दो कंटाप देता, लेकिन ये तुलसी रजनीगंधा मंगा कर तुमने थोड़ा अच्छा काम किया है इसलिए जाओ माफ कर रहा हूं। बस ध्यान रखना आगे से कि पैदल चलने वाला हर व्यक्ति सामान्य ही नहीं होता इसलिए किसी आम आदमी से बदतमीजी करने से पहले सौ बार जरूर सोचना।”

कोतवाल सिर झुकाए रहा।

कप्तान ने हम लोगों का जब्त मोबाइल और लाइसेंसी रिवाल्वर वापस कराया। एक दोस्त रिंकू भाई की कार पर सवार होने से पहले कोतवाली के गेट पर बंदूक लिए खड़े संतरी से जोरदार तरीके से हाथ मिलाते हुए उन्हें इस कोतवाली का सबसे बढ़िया आदमी होने का खिताब दिया और उन्हें ‘जय हिंद’ कह कर सैल्यूट ठोंकते हुए घर वापस लौट आया।

अभी सो कर उठा तो सबसे पहले रात का पूरा वृत्तांत यहां लिखा ताकि भड़ास निकल जाए। आज रोज से ज्यादा एनर्जेटिक फील कर रहा हूं क्योंकि वो मेरा प्रिय गाना है न – ‘वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो’। दिक्कत ये है कि मैं पूरी जिंदगी में एक नहीं बल्कि हर रोज एक कहानी चाहता हूं और जिन-जिन दिनों रातों में कोई कहानी हो जाया करती है उन उन दिनों रातों में ज्यादा ऊर्जा से भरा जीवंत महसूस करता हूँ।

कह सकते हैं मेरे साथ हर वक्त कहानी हो जाया करती है, कभी इस बाहरी दुनिया में घटित तो कभी आंतरिक ब्रम्हांड में प्रस्फुटित।

फिर मिलते हैं एक कहानी के बाद।

जै जै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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बचपन के मित्र बिग्गन महाराज के गुजरने पर यशवंत ने यूं दी श्रद्धांजलि : ‘दोस्त, अगले जनम अमीर घर ही आना!’

Yashwant Singh : गांव आया हुआ हूं. कल शाम होते-होते बिग्गन महाराज के गुजर जाने की खबर आई. जिस मंदिर में पुजारी थे, वहीं उनकी लाश मिली. उनके दो छोटे भाई भागे. मंदिर में अकेले चिरनिद्रा में लेटे बड़े भाई को लाद लाए. तख्त पर लिटाकर चद्दर ओढ़ाने के बाद अगल-बगल अगरबत्ती धूप दशांग जला दिया गया. देर रात तक बिग्गन महाराज के शव के पास मैं भी बैठा रहा. वहां उनके दोनों सगे भाइयों के अलावा तीन-चार गांव वाले ही दिखे.

बिग्गन महाराज गांव के सबसे गरीब ब्राह्मण परिवार के सबसे बड़े बेटे थे. अभाव और अराजकता के दुर्योग से वह भरी जवानी में बाबा बनने को मजबूर हुए. अगल-बगल के गांवों के मंदिरों पर रहने लगे. कुछ बड़े बाबाओं के शिष्य भी बने. बताया गया कि वह कल मरने से पहले एक यजमान के यहां जाकर उन्हें दीक्षा दी. गुरुमुख बनाया. बदले में उन्हें नया स्टील का कमंडल और एक बछिया मिली. जिस दिन उन्हें इतना कुछ मिला, उसी दोपहर उनके पेट में अन्न जल न था. उपर से तगड़ी धूप. बिग्गन महाराज मंदिर लौटे और गिर कर मर गए. शव के साथ बैठे लोग किसिम किसिम की चर्चाएं कर रहे थे. कौन जानता था अपने यजमान को मोक्ष-मुक्ति का मार्ग बता मंदिर लौट रहे गुरु पर इस मायावी संसार को अलविदा कहने के वास्ते मारण मंत्र का जाप शुरू हो चुका था.

बतकही जारी थी. पुरवा हवा की सरसराहट से बिग्गन महाराज के शव पर पड़ा चद्दर सर से पांव तक इस कदर फड़फड़ा रहा था जैसे पंडीजी बस अब कुछ बोलने के लिए उठने ही वाले थे. ताड़ी से तारी साथ बैठे एक सज्जन उदात्त भाव और तेज स्वर से कहने लगे- बिग्गन महराज गांजा के बाद हीरोइन पीने लगे थे. आजकल तो पैसे के लिए गांव आकर अपनी मां से लड़कर सौ पचास ले जाने लगे थे. जितने मुंह उतनी बातें. कईयों ने मौत को अनिवार्य सच बताया. कुछ ने बिग्गन महाराज की कम उमर होने का हवाला दिया. मुझे अजीब इच्छा हुई. तख्त पर लिटाए गए बिग्गन महाराज के चेहरे को देखने की. रात दो बजे के करीब उनके छोटे भाई ने महराज के चेहरे से चद्दर हटाया. लंबी बाबाओं वाली दाढ़ी और सांवला चेहरा. बिलकुल शांत. लग ही नहीं रहा था कि यह मरे आदमी का चेहरा है. जैसे वो सोए हों. ध्यान में हों. चिलम के असर के बाद मौन साध गए हों.

चार भाइयों में सबसे बड़े बिग्गन महाराज के गुजर जाने से उनके परिवार पर कोई असर न पड़ेगा. एक तो उनका खुद का कोई निजी परिवार न था. उनने शादी न की थी. कह सकते हैं शायद हुई ही न हो. इसलिए वे बाल ब्रह्मचारी कहलाए गए. दूसरे उनके जाने से सगे भाइयों को कभी कभार सौ पचास मां से मांग ले जाने के अप्रत्याशित कर्म से मुक्ति मिली.

हां, बुजुर्ग महतारी जरूर देर तक छाती पीट पीट कर रोती रहीं. शायद मां के कलेजे में उस बेटे के खास तड़प होती है जो थोड़ा मजबूर हो, जो थोड़ा शोषित हो, जो थोड़ा अव्यवस्थित हो, जो थोड़ा मिसफिट हो, जो गैर-दुनियादार हो, जो संघर्षरत हो.

शाम के समय मरने की खबर जब घर पहुंची तो नाती-नातिन के साथ बैठी बुजुर्ग महतारी छाती पीट पीट कर रोने लगी. अगल-बगल घरों की महिलाएं एक एक कर पहुंच कर उन्हें पकड़ कर दिलासा देने लगीं- ”होनी को कौन टाल सकता है मइया, चुप रहिए, भगवान को शायद यही मंजूर था.” पड़ाइन मइया कुछ गा-गा कर लगातार रोती बिलखती हिलती फफकती हांफती रहीं. शायद इस तरह बेटे को अंतिम बार पूरे दिल और पूरी शिद्दत से याद किया उनने.

मुझे बिग्गन महाराज के साथ बचपन के दिन याद आए. उनके साथ बगीचों में आम तोड़ना, उनके साथ पूड़ी खाने दूसरे गांवों में जाना, ढेर सारी शरारतों और बदमाशियों में उनको अपने विश्वासपात्र सिपाही की तरह साथ रखना. बिग्गन महाराज लायल थे. निष्ठा उनने कभी न तोड़ी. दोस्ती की तो खूब निभाया. बाबा बने तो उसी दुनिया के आदमी हो गए, बाकी सबसे नाता तोड़ लिया. बस केवल अपनी मां से नाता रखा. देखने या मांगने चले आते थे, आंख चुराए, मुंह नीचे झुकाए.

बिग्गन महाराज जीते जी मरने की कामना करने लगे थे. मौत के दर्शन और लाभ का शायद वह कोई रहस्यमय धार्मिक अध्याय बांच चुके थे. तभी तो वह दुनियादारों की तरह मौत से डरते न थे और मौत से बचने के लिए कोई उपक्रम न करते. जैसे वह मौत को चुनौती देते रहते. खुद को नशे में डुबोने के लिए वह अतिशय गांजा-चिलम पीने लगे.

बताते हैं कि जिस गांव के मंदिर पर वह पुजारी थे, उस गांव के कुछ नशेड़ियों की संगत में सुल्फा-हीरोइन को अपना बैठे. गांजे के असर की हद-अनहद वह जी चुके थे. उन्हें इसके परे, इससे भी दूर, अंतरिक्ष के पार, जाना था. सफेद धुओं के रथ पर सवार होकर जाना था. हीरोईन-सुल्फा ने इसमें उनकी मदद की होगी शायद.

इस नई शुरुआत ने इतना आनंदित किया कि वह इसे अपना गुरु बना बैठे. हीरोइन-सुल्फा की लत के शिकार बिग्गन महाराज को पहले कभी-कभार फिर अक्सर पैसे का अभाव खलने लगा. ऐसे में उन्हें अपनी मां याद आतीं जिनके अलावा किसी पर उनका कोई अधिकार न था. वह अपने घर आ जाते, चुपके से. मां से लड़ते-झगड़ते और आखिर में कुछ पैसे पा जाते. घर वाले थोड़े परेशान रहने लगे. उनके लिए बिग्गन महराज की यह आदत नई और अप्रत्याशित थी. छोटे तीन भाइयों के बच्चे-पत्नी हैं. वे छोटे-मोटे काम धंधा कर जीवन गृहस्थी चलाने में लगे रहते. पैसे का अभाव सबके लिए एक बराबर सा था. ऐसे में मां जाने कहां से सौ-पचास उपजा लेतीं और बिग्गन महाराज को डांटते डपटते, आगे से आइंदा न मांगने की लताड़ लगाते हाथ पर चुपके से धर देतीं.

बिग्गन महाराज की मिट्टी को जब आज सुबह अंतिम यात्रा पर ले जाया गया तो मैं गहरी नींद में था. देर रात तक सोए बिग्गन महाराज संग जगा मैं जीवन मौत के महात्म्य को समझता गुनता रहा. घर आकर बिस्तर पर गिरा तो सुबह दस बजे आंख खुली. तब तक बिग्गन महाराज गांव से कूच कर चुके थे. उनके शरीर को गंगा के हवाले किया जा चुका था. उन्हें साधुओं सरीखा सम्मानित सुसज्जित कर जल समाधि दी गई.

इस देश में अभाव और गरीबी के चलते जाने कितने बिग्गन महाराज भरी जवानी बाबा बनने को मजबूर हो जाते हैं. फिर इस मजबूरी को ओढ़ने के लिए नशे के धुएं में उड़ने लगते हैं. बिग्गन महाराज हमारे गांव के लिए कोई उतने जरूरी शख्स नहीं थे. वैसे भी गांव में गरीब और गरीबी के हमदर्द-दोस्त होते कहां हैं. बिग्गन महाराज किसी से कुछ न बोलते और गांव से परे रहते. बेहद गरीब परिवार के सबसे बड़े बेटे बिग्गन महाराज को पता था कि उनके लिए कोई निजी इच्छा रखना, किसी कामना को पालना नामुमकिन है इसलिए उनने इसे विरुपित करने वाले चोले को ओढ़ लिया. एक आकांक्षाहीन जीवन को साधु के चोले से ही दिखावट कर पाना संभव था.

बिग्गन महाराज का जाना मेरे लिए बचपन के एक निजी दोस्त का असमय काल के गाल में समाना है. उनने जिस राह को चुना और आगे जिस राह पर जाने को इच्छुक थे, बाबागिरी से मृत्यु यात्रा तक, इसका सफर उनने रिकार्ड कम समय में, बेहद सटीक-सधे तरीके से की. शायद देश के करोड़ों युवा बिग्गन महाराजों के लिए इस व्यवस्था ने मोक्ष और मुक्ति के लिए यही आखिरी रास्ता बुन-बचा रखा है जिससे परे जाने-जीने के लिए कोई विकल्प नहीं है.

राम-राम बिग्गन महाराज.

नई दुनिया के लिए शुभकामनाएं. इस लुटेरी-स्वार्थी दुनिया से जल्द निकल लेने पर बधाई.

दोस्त, अगले जनम किसी अमीर घर ही आना!

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स को पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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‘टाइम मशीन’ पर सवार यशवंत ने ये जो देखा-महसूसा!

Yashwant Singh : कल शाम कामधाम निपटा कर टहलने निकला तो मन में आने वाले खयाल में क्वालिटेटिव चेंज / ग्रोथ देख पा रहा था. लगा जैसे अपन तो इस दुनिया के आदमी ही नहीं. जैसे किसी ‘टाइम मशीन’ पर सवार हो गया था. अगल-बगल दिख रही चुपचाप खड़ी कारों, मकानों, पेड़ों, सूनी सड़कों, गलियों से रूबरू होते गुजरते सोचने लगा कि मान लो यह सब जलमग्न हो जाए, किसी महा प्रलय के चलते तो मछलियां इन्हीं कारों में अपना घर बसाएंगी और ये बहुत गहरे दबे पेड़ नई सभ्यताओं के लिए कोयला तेल आदि का भंडार बनेंगे… मतलब, कुछ भी बेकार नहीं जाना है.. सब रीसाइकिल होना है…

इस धरती का तेजी से नए की ओर उन्मुख होना, वो नया भले ही हमारे आपके लिए विकास वाला या विनाश वाला हो, बताता है कि हमारे चाहने न चाहने के बावजूद चीजें अपनी स्पीड में चलती हैं और इससे जो कुछ नया रचता बनता बिगड़ता नष्ट होता है वह दरअसल बहुत आगे के जीवन, सभ्यताओं, समय के लिए पूंजी / थाती / आधार / नींव का काम करता है.. जो हमारे लिए विकास है, संभव है वह धरती की सेहत के लिए विनाश हो लेकिन यही विनाश संभव है आगामी सभ्यताओं के लिए अकूत उर्जा और जीवन का केंद्र बन जाए…

पहाड़ पिघल रहे हैं… समुद्र लपलपा कर फैलना चाह रहे हैं, जंगल कट कर ठूंठ मैदान में पसरते जा रहे हैं और मैदान धीरे-धीर नमी विहीन होकर रेगिस्तान में तब्दील होता जा रहा है… यह बदलाव अपनी नियति को प्राप्त होगा..

ये तो सब जान रहे हैं कि धरती का उर्जा भंडार, जल स्रोत समेत कई किस्म के वो स्रोत जो जीवन के लिए जरूरी हैं, तेजी से क्षरण की ओर उन्मुख हैं.. अचानक घड़ी की सुइयां बहुत तेज गति से टिक टिक करने लगी हैं… कैलेंडर में जो बारह महीने खत्म होकर एक साल गुजरने का एहसास कराते हैं, वैसा अब सब स्थूल / गणितीय भर नहीं है. अब जो साल बीतता है, वह अपने आप में दशक भर समेटे होता है. दशक भर में पहले जो उर्जा हम नष्ट करते थे, जो उर्जा हम उपभोग करते थे, अब वह साल भर में करने लगे हैं… अचानक जैसे कोई शरीर फुल स्पीड में दौड़ने लगे और हांफते हुए धड़ाधड़ उर्जा बर्न करने लगे…

जिस यूरोपीय माडल की अर्थनीति और राजनीति हम ओढ़ने जीने को अभिशप्त हैं उसमें सोचने समझने नीति बनाने का काम बस चंद मुट्ठी भर लोगों के हाथ है और बकिया जनता बस दौड़ने-हांफने, अपने पेट के वास्ते जीने और और निहित स्वार्थ के इर्द गिर्द सोचने-समझने के लिए बाध्य है. यह एक किस्म की गुलामी ही है लेकिन मजेदार यह कि इस गुलामी के शिकार खुद को गुलाम मानने को तैयार नहीं होते.

ये जो दिन-रात गुजर रहे हैं, बड़े कीमती हैं. एक दिन-रात कोई चौबीस घंटे की चीज भर नहीं.. थोड़ा स्लो मोशन में महसूस करिए तो इसमें पूरा महीने छह महीने निहित हैं… कुछ वैसे ही जैसे स्पेस में पहुंचे आदमी के दिन रात महीने अलग होते हैं और हम धरती वालों के अलग… लेकिन हम धरती वालों ने अपनी स्पीड जो तय कर दी है, खुद को टाप गीयर में जो डाल दिया है, इसका नतीजा है कि समय तेजी से गुजर रहा है लेकिन असल में वह तेजी अपने पीछे कई कई सालों की शांति-उर्जा को फूंक रहा है.

जैजै

@स्वामी भड़ासानंद

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

उपरोक्त स्टटेस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Praveen Jha  आपने जो बात लिखी है, उसके लिए साधुवाद। यह जनचेतना से ही संभव है। नॉर्वे ने ठान लिया है कि २०२५ से कारें बंद कर देंगी। ओस्लो में २०१९ से ही। २ साल ही बचे हैं, पर जनता में कोई विद्रोह नहीं। कई लोगों ने कार डंप भी कर दिए। बस से जाते हैं। मेरा छोटा शहर है, वहाँ कंपनियों ने गाड़ी की पार्किंग खत्म करनी शुरू कर दी। बस साइकल पार्किंग रहेगी। कोपेनहेगन में साइकल के ‘सुपर हाइ-वे’ बन रहे हैं। फ्लाईओवर जिस पर बस साइकल जाएँगीं। गाड़ी पर टैक्स हर साल बढ़ रहा है। पर यह तभी संभव हुआ जब हर व्यक्ति साइकल चालक है, पहाड़ पर साइकल दौड़ा देते हैं। महिला-पुरूष सब। यह सरकार के बस का नहीं, यह जनचेतना से ही संभव है।

Ashok Anurag यशवंत जी, 60, 70, 80 के दशक तक तरक़्क़ी की रफ़्तार तो थी लेकिन एक सामान्य गति में 90 के दशक में जो तेज़ी आई है, वो तरक़्क़ी और विनाश साथ लाई है, आपके विचारों से सहमत हूँ

Arvind Kumar Singh जिस यूरोपीय माडल की अर्थनीति और राजनीति हम ओढ़ने जीने को अभिशप्त हैं। वाह!

Harish Pant बन्धु ! अब सिर्फ पृथ्वी को बचाने की सोच को विस्तृत आयाम देने की बात कही जाए?

Ghanshyam Dubey आज सही और यथार्थ के फुलफार्म मे विचारों की गाड़ी दौड़ी है । खैर – विचार हैं तो विचार ही ! निर्विचार मन की स्थिति चाहिए आगे कुछ और देखने के लिए …!

Rajesh Somani First time realised that yaswant Singh sir name have different different meaning

Kashi Prasad Yadav Jaswant bhai..sach likh diya hai aapne..jara shaant man se sochne bhar se hi cheezein saaf saaf nazar aane lagtu hain…badhai..

Yogesh Bhatt स्वामी जी.. दिशा व दशा भी बदलिए उन सबकी जिनके लिए लिखते हैं …

राजीव चन्देल Very perfect analysis about life and nature.

Yashwant Singh Bhandari कल लगता है अकेलेपन और गहरी सोच लिए निकले थे रोड में,

Aryan Kothiyal प्रकृति स्वयं सब ठीक करेगी।

Braj Bhushan Dubey यथार्थ से आच्छादित पक्ष।

Puneet Sahai सच को निकट दृष्टि से देख ही लिया आपने

लोकेश सलारपुरी खबरनवीस अगर फिलॉस्फर भी हो तो ये ही हाल होता है

Naresh Sadhak क्या क्या न सहे हम विकास के नाम पर , जाने कहाँ आ गये हम ,चलते चलते ! घडी भर तू कर ले आराम जाना है कहाँ , यहाँ कौन है तेरा मुसाफिर जाना है कहाँ!

Shwetank Ratnamber JAI BHOKAL …. JAI BADHAS …. AAJ SE YAHI JAIKARA…. BHADAS BHADAS YAR TUMHARA….. NIKALIYE NISHULK BHADAS PAIYE ACHHI SEHAT BINDAS

Ashok Thapliyal Shaandaar future study aapki… Shayad cheekh bhi shoony, Maun bhi shoony hota Jaa Raha hai…… Sampoorn Jagat mein sabsay taakatwar….. prakriti aur shabd…Lekin, abki baar pralay Kay Baad Manu & shradhha sambhav hai Aisa kuch kahain sabhyataoon Kay malbay Kay beech say nikalkar…… +++kuchh to bachana thaa, Laava ugal Kay kya Kiya hamnay…!!!!!

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भ्रष्ट और चापलूस अफसरों ने सीएम योगी के हाथों आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे के करियर का कत्ल करा दिया!

सुभाष चंद्र दुबे तो लगता है जैसे अपनी किस्मत में लिखाकर आए हैं कि वे सस्पेंड ज्यादा रहेंगे, पोस्टेड कम. सुल्तानपुर के एक साधारण किसान परिवार के तेजस्वीय युवक सुभाष चंद्र दुबे जब आईपीएस अफसर बने तो उनने समाज और जनता के हित में काम करने की कसम ली. समझदार किस्म के आईपीएस तो कसमें वादे प्यार वफा को हवा में उड़ाकर बस सत्ता संरक्षण का पाठ पढ़ लेते हैं और दनादन तरक्की प्रमोशन पोस्टिंग पाते रहते हैं. पर सुभाष दुबे ने कसम दिल से खाई थी और इसे निभाने के लिए अड़े रहे तो नतीजा उनके सामने है. वह अखिलेश राज में बेईमान अफसरों और भ्रष्ट सत्ताधारी नेताओं की साजिशों के शिकार होते रहे, बिना गल्ती सस्पेंड होते रहे.

चुनाव के वक्त चुनाव आयोग ने सुभाष चंद्र दुबे को गाजीपुर का एसएसपी बनाकर भेजा और वहां से वह सहारनपुर सीएम योगी के कार्यकाल के शुरुआती दिनों में तब भेजे गए जब जातीय हिंसा चरम पर थी. भाजपा के लोगों ने सहारनपुर के तत्कालीन एसएसपी लव कुमार के घर पर धावा बोल दिया था. लव कुमार की पत्नी बच्चों को जान बचाने के लिए छिपना पड़ा था. ऐसी किरकिरी से ध्यान हटाने और लव कुमार को खुश करने के लिए राज्य सरकार ने उनको नोएडा जैसे प्राइम जिले की पोस्टिंग दे डाली और सहारनपुर का जिम्मा तेजतर्रार अधिकारी सुभाष चंद्र दुबे को सौंप दिया.

उधर, नोएडा के डीएम एनपी सिंह को सहारनपुर का जिलाधिकारी बना दिया गया. एनपी सिंह की पूरे सूबे में एक अलग छवि है. वह अपनी ईमानदारी, कठिन मेहनत, जन सरोकार के लिए जाने जाते हैं. माना गया कि एनपी और सुभाष दुबे की जोड़ी सहारनपुर में सब कुछ सामान्य कर देगी. ऐसा हुआ भी. लेकिन सीएम योगी और इन दो अफसरों के बीच संवादहीनता ने बीच के दलाल अफसरों को मौका दे दिया. इन दलाल अफसरों ने सीएम योगी के कान में अपने हिसाब से फीडबैक दे दिया.

एनपी और सुभाष दुबे ने अठारह अठारह घंटे तक साथ रहकर सहारनपुर में शांति लाने की कोशिश की लेकिन इन दोनों को यह आरोप लगाकर सस्पेंड कर दिया गया कि इनमें तालमेल नहीं था और इन लोगों ने मायावती को सहारनपुर में घुसने की अनुमति दे दी थी. खासकर मायावती वाले प्वाइंट को योगी ने गंभीरता से ले लिया. जबकि हकीकत यह है कि एसपीजी कवर प्राप्त मायावती दिल्ली से जब गाजियाबाद में घुसीं और मेरठ समेत कई जिलों को पार करती हुईं सहारनपुर पहुंचीं तो इसके लिए कोई एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

एसपीजी के लोग अपने वीवीआईपी के रूट पर कई दिन पहले से काम करने लगते हैं. मतलब यह कि यह सारा कुछ बड़े अफसरों के इशारे और सहमति से हुआ था लेकिन दोष मढ़ दिया गया सहारनपुर के तत्कालीन एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे और डीएम एनपी सिंह पर. कहा जाता है कि सहारनपुर की सीमा पर अगर मायावती को उस समय रोक दिया जाता तो सहारनपुर में उग्र हुए दलित समुदाय के लोग अपनी नेता को रोके जाने से नाराज होकर लंबा और बड़ा बवाल कर सकते थे जिसे फिर रोक पाना मुश्किल होता.

अपने छोटे से कार्यकाल में एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे ने सहारनपुर में ग्राउंड लेवल पर जो जो काम किए (कुछ दस्तावेज संलग्न हैं यहां), उसी का नतीजा है कि जो नए लोग वहां डीएम एसएसपी बनाकर भेजे गए, उन्हें बहुत खास कुछ नहीं करना पड़ा और नियंत्रित हालात का श्रेय खुद लेने का मौका मिल गया. वो कहते हैं न जो नींव के पत्थर होते हैं, उनका जिक्र कम होता है, उस मजबूत नींव पर खड़े महल को सब देखते सराहते हैं.

ये हैं सहारनपुर बवाल के असल कारण.. पर दोषियों पर कार्रवाई की जगह ईमानदार और मेहनती अफसरों को ही सस्पेंड कर दिया गया…

ये वह दस्तावेज है जिससे जाहिर होता है कि सहारनपुर के तत्कालीन डीएम एनपी सिंह और एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे ने ग्राउंड लेवल पर खूब सारा होमवर्क काम करने और डाक्यूमेंटेशन के बाद पब्लिक-प्रशासन-पुलिस के बीच तालमेल का एक फुलप्रूफ और जनपक्षधर तानाबाना बुना. आज इसी का नतीजा है कि सहारनपुर में सब कुछ पुलिस प्रशासन के नियंत्रण में है लेकिन इसका श्रेय एनपी-सुभाष को मिलने की जगह इन्हें निलंबन झेलना पड़ा और वाहवाही उनको मिल रही जिनका काम सिर्फ लगाना बुझाना और गाल बजाना है और अपने सियासी आकाओं का चरण चापन करना है.

आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे के खिलाफ जिस कदर जहर सीएम योगी के दिमाग में बोया गया है, उसका नतीजा यह है कि इन दोनों अफसरों को आजतक अपना पक्ष रखने के वास्ते सीएम से मिलने तक का समय नहीं दिया गया. जो बिचौलिए अफसर हैं, इस स्थिति का फायदा उठाकर अपने खास चंपू अफसरों को प्राइम तैनाती दिलाने में सफल हो जा रहे हैं और जो ईमानदार हैं, वह खुद को सपा राज जैसा ही प्रताड़ित पीड़ित महसूस कर रहे हैं. चाल चेहरा चरित्र को लेकर खुद को अलग होने का दावा करने वाली भाजपा के नेताओं को यह देखना चाहिए कि भले सौ बेईमान माफ कर दिए जाएं, लेकिन किसी एक ईमानदार के खिलाफ गलत कार्रवाई न हो जाए.

चर्चा तो यहां तक होने लगी है कि पूरा सिस्टम अब इस कदर चापलूसों और चोरों से भरा हुआ हो गया है कि अब ईमानदार, तेवरदार और जन सरोकार वाला होना अपराध हो गया है. ऐसे लोगों को न तो काम करने दिया जाता है और न ही कोई ठीकठाक पोस्टिंग देर तक दी जाती है. इनके पीछे सारे बेईमान एकजुट होकर हाथ धोकर पड़ जाते हैं. सबको उम्मीद थी कि यूपी में भाजपा शासन आ जाने से लंबे समय से चल रहे सपा और बसपा के जंगलराज से मुक्ति मिल जाएगी लेकिन हुआ ठीक उलटा. लग रहा है जैसे जंगलराज कांटीन्यू कर रहा है. वही भ्रष्ट और दागी अफसर मजबूत बड़े पदों पर जमे हैं जिन्होंने पिछले शासनकालों में जमकर मलाई खाई और अपनों को खिलाया. जिन्हें जेलों में होना चाहिए, वह योगी सरकार के गुड बुक में हैं और जिन्हें बड़ा पद कद मिलना चाहिए वे सस्पेंड बड़े हैं या कहीं कोने में फेंक दिए गए हैं.

सीएम योगी को अफसरों द्वारा दिए जाने वाले फीडबैक को परखने जांचने के लिए भी एक सिस्टम खड़ा करना चाहिए अन्यथा बेईमान और चापलूस अफसरों की झूठी बातों में आकर उनके हाथों बहुत सारा अनर्थ होता रहेगा, जैसे एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे के मामले में हुआ है. इन दो अफसरों का निलंबन लगातार जारी रहने और इनकी बात तक न सुने जाने से ईमानदार किस्म के अफसरों में बेचैनी है. यूपी में कानून व्यवस्था से लेकर ढेर सारे क्षेत्रों में हालात न सुधरने का बड़ा कारण यही है कि अब भी प्रदेश का दो तिहाई हिस्सा भ्रष्ट अफसरों के शिकंजे में है जो भाजपा नेताओं को पर्दे के पीछे से ओबलाइज कर अपनी मनमानी कर रहे हैं.

उम्मीद करना चाहिए कि सीएम योगी के जो खास लोग हैं, वह आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे और आईएएस एनपी सिंह मामले में योगी को सच्चाई बताएंगे और इनका निलंबन खत्म कराने की दिशा में काम करेंगे. अभी अगर कोई भ्रष्ट अफसर सस्पेंड हुआ होता तो वह तगड़ी लाबिंग करके हफ्ते-दो हफ्ते में ही बहाल हो गया होता. लेकिन एनपी और सुभाष लाबिंग जैसे खेल तमाशों से दूर रहने वाले लोग हैं और अपने लिए राजनीतिक आका नहीं बनाए इसलिए अलग-थलग पड़कर भोगने के लिए मजबूर हैं. उनके पक्ष में कोई भी अफसर सीएम के सामने एक शब्द बोलने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि टाप लेवल पर बैठे अफसरों को अपनी नौकरी बचाने और कुर्सी हथियाए रहने की कला खूब आती है.

आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन भी लगभग रीढ़ विहीन मुद्रा में ही रहते हैं. इनके पदाधिकारी भी कानों में तेल डाले चुप्पी साधे पड़े हुए हैं. यहां तक कि डीजीपी सुलखान सिंह से लेकर मुख्य सचिव राहुल भटनागर तक में अपने ईमानदार अफसरों को प्रोटेक्ट करने, उनका पक्ष रख उन्हें बिना वजह दंडित किए जाने से बचाने का दम नहीं दिख रहा अन्यथा आज एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे यूं निलंबित होकर बनवास नहीं काट रहे होते. ये उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि यहां बदलाव के पक्ष में वोट तो पड़ते हैं लेकिन भारी भरकम नोटों के तले जनभावना कुचली जाती है, सत्ता सिस्टम का करप्टर चरित्र पहले जैसा ही बना रहता है. जो ईमानदारी से ग्राउंड लेवल पर जनसरोकार के साथ काम करता है, उसकी नियति एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे बन जाना होता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे के व्यक्तित्व को लेकर यशवंत द्वारा लिखी गई इस पुरानी पोस्ट को भी पढ़ें…

ये भी पढ़ें, योगी राज में अफसरशाही का हाल….

एक नज़र इधर भी….

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पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखने की मोदी की दोगली नीति पर भाजपाई चुप क्यों हैं?

Yashwant Singh : ये तो सरासर मोदी की दोगली नीती है. देश को एक कर ढांचे में लाने की वकालत करने वाले मोदी आखिर पेट्रोल डीजल को जीएसटी से क्यों बाहर रखे हुए हैं. ये तर्क बेमानी है कि राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल से भारी टैक्स से काफी पैसा पाती हैं, जिसे वह खोना नहीं चाहतीं.

भाजपा की केंद्र सरकार और भाजपा की राज्य सरकारें अगर अपना अपना हिस्सा खत्म करते हुए पेट्रोल डीजल को जीएसटी के दायरे में ले आएं तो जनता को भारी राहत मिलती. पर ऐसा नहीं करेंगे ये लोग क्योंकि थोक में फायदा तो ये बड़े लोगों को देते हैं. माल्य से लेकर अडानी तक. अंबानी से लेकर टाटा-बिड़ला तक. पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने से इनका दाम आधा हो जाता. यही कारण है कि केंद्र सरकार इसे तो जीएसटी से बाहर रखे हुए है ताकि इससे भारी मात्रा में जनता से पैसा वसूला जाता रहे और बाकी सामान को जीएसटी में लाकर महंगाई बढ़ाने की कवायद कर रहे हैं.

नारा दे रहे हैं एक देश और एक कर का. लेकिन ये नारा बेकार साबित हो जाता है पेट्रो प्रोडक्ट्स को जीएसटी से बार रखने के फैसले से. आजकल ह्वाट्सअप पर ये वाला मैसेज खूब भेजा जा रहा है, आप भी पढिए-

Why petrol and diesel prices are not brought under GST. Now for petrol and diesel the central exise duty is 23% and state VAT is 34%. Total tax is 57%. If these essential products are brought under GST , the maximum tax will be only 28%, which means the prices of petrol and diesel can come down by almost 50%. The public at large will be benefited.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं–

Harshendra Singh Verdhan : Dada, It’s somehow difficult in Fertiliser sector too..18% for processed complex on raw materials & 12% on Imported. So; nothing for homemade indigenous Fertilisers. An easy way to Chinese poor quality fertilisers.

Care Naman : यदि जीएसटी सब पर तो पेट्रोल और दारु दोनों पर भी लागू करें… ये तो वही हुआ कड़ुआ कड़ुआ थू थू… मीठा मीठा गप गप…

Vijayshankar Chaturvedi : Larger public interest will not be bothering to them until 2019.

Divakar Singh : State governments opposed centre’s move to bring petroleum under gst. As you mentioned, state govts earn huge money from it, so they don’t want to bring it under gst. Centre wants to bring everything under gst. So we should ask respective state govts.

Yashwant Singh : जो बुरा है, वो दूसरों का है। जो अच्छा है, वो सब मेरा है। 🙂

Divakar Singh : बुरा भी अपना हो सकता है, पर इस केस में नही है। बेचारे जेटली जी बहस करते रह गए पर कोई राज्य तैयार नही हुआ पेट्रो उत्पादों के लिए gst लागू करने के लिए। ऐसे में केंद्र सरकार को दोषी बताना तथ्यात्मक नही है। देखें इस लिंक को : Petroleum products to be under GST if states agree: Minister

Yashwant Singh सेंटर को अपना हिस्सा छोड़ देना चाहिए था ताकि मोदी जी की नीयत तो साफ सही दिखती. साथ ही जिन स्टेट्स में बीजेपी है, वहां भी हटवा सकती थी. इसके बाद बीजेपी के लोग गैर बीजेपी राज्यों की सरकारों को एक्सपोज कर सकते थे. पर ऐसा नहीं, क्योंकि पेट्रोल डीजल बहुत ज्यादा सस्ता हो जाने से गरीबों को फायदा होता, महंगाई कम होती. बड़े उद्यमी घरानों को लाभ पहुंचाने वाले मोदी भला बल्क में यानि थोक में गरीबों को राहत कैसे दे सकते थे.

Rajeev Verma : पेट्रोल डीजल यदि gst के दायरे में कर देते तो input credit देने में सरकार का धुंआ निकल जाता. चीजें आश्चर्य जनक रूप से सस्ती हो जातीं.

Rajeev Pandey : Modi dhongi pakhandi hai uske maalik Ambani ki kamayi kam ho jayega jo Modiya kabhi nahi chahta.

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