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टेलीग्राफ ने खबर छापी है- “प्रधानमंत्री के ‘आपदा में अवसर’ का उल्टा असर हुआ”

संजय कुमार सिंह-

प्रचारकों का हेडलाइन मैनेजमेंट… प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यूक्रेन में फंसे भारतीयों को निकालने में हुई देरी और उससे हुई फजीहत को कम करने के लिए निकालने के लिए की जा रही कार्रवाई का प्रचार करना शुरू कर दिया है। और एएनआई इसके वीडियो शूट करके प्रसारित भी कर रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में सोमवार को हुई एक बैठक में चार केंद्रीय मत्रियों को यूक्रेन भेजने का निर्णय हुआ। इसपर द टेलीग्राफ ने खबर छापी है, “प्रधानमंत्री के ‘आपदा में अवसर’ का उल्टा असर हुआ”।

अनिता जोशुआ की खबर में बताया गया है कि भाजपा सांसद वरुण गांधी ने कहा है कि सरकार को हर संकट में मौका नहीं तलाशना चाहिए। ऐसी खबरें आजकल छपती नहीं हैं तथा इसे कहीं और प्रमुखता मिली है कि नहीं मैं नहीं जानता। लेकिन द टेलीग्राफ ने ही आज दूसरी खबर छापी है, मंत्रियों की तैनाती सुर्खियों के लिए है। दोनों ही खबरें पहले पन्ने पर एक साथ छपी हैं।

अखबार ने अपनी इस खबर में लिखा है, दुनिया के सबसे बड़े नागरिक बचाव अभियान के समय विदेश मंत्रालय के खाड़ी डिविजन में संयुक्त सचिव और पूर्व राजनयिक केपी फैबियन ने कहा है कि मंत्रियों को भेजने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा है कि इस समय दूतावासों को मजबूत करने की आवश्यकता है और वहां ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता है जो आवश्यक भाषाई कौशलों से युक्त हों। मंत्रियों को भेजकर आप समस्या का हल नहीं कर रहे हैं। हां, वे अपने समकक्षों को फोन कर सकते हैं पर यह काम राजदूत भी कर सकते हैं। उन्होंने साफ-साफ कहा और अखबार ने लिखा है कि ऐसा शीर्षक को ध्यान में रखकर किया गया है। 1990 में कुवैत संकट के समय भी ऐसा नहीं किया गया था।

उस समय विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन से मिलने इराक गए थे। इस बार में रिटायर राजनयिक ने कहा, वे प्रधानमंत्री की चिट्ठी लेकर गए थे जिसमें सद्दाम हुसैन से सहयोग की मांग की गई थी। उस समय 1,70,000 नागरिकों को कुवैत से सुरक्षित निकाल कर भारत लाया गया था। आज यह दिलचस्प है कि सरकारी कार्रवाई प्रचार है, इसे समझने और बताए जाने के बावजूद आज के अखबारों में यह पहले पन्ने पर है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह टॉप पर तीन कॉलम में है, टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड के साथ दो कॉलम में है, द हिन्दू में फोल्ड से ऊपर सिंगल कॉलम में है और इंडियन एक्सप्रेस में तो लीड का भाग ही है। और यह लीड के शीर्षक का हिस्सा है। इतने अनुकूल माहौल में किसी भी सरकार को काम क्यों करना चाहिए यह सवाल सवाल नहीं पूछने वाले मीडिया से जरूरत पूछा जाना चाहिए।

(मुद्दा यह है कि अखबारों की इस भूमिका को रिकार्ड किया जाना चाहिए। कुछ नहीं तो भविष्य के पत्रकारों को बताने-समझाने के लिए भी। मैंने इसपर एक किताब लिख भी ली थी पर कोई प्रकाशक नहीं मिला और बात आई-गई हो गई। मुझे लगता है कि इसे गंभीरत से देखने और दर्ज करने की जरूरत है ताकि जब सवाल पूछने की स्थितियां बन सके तो उदाहरण सामने रहें या आसानी से उपलब्ध हों।)

जितेंद्र नारायण- बहुत ज़रूरी है अख़बारों की भूमिका को रिकॉर्ड किया जाना…इससे लोग भविष्य में दिग्भ्रमित होने से बच जाएँगे… मैं अभी एक किताब The Art of Thinking Clearly पढ़ रहा हूँ जिसमें ये सलाह दी गई है कि किसी घटना को लोग या अख़बार किस तरह देखते हैं इसके लिए आप बीस-पच्चीस साल पहले की अख़बार पढ़े और उसे वर्तमान से तुलना करें…इससे आप Hindsight Bias से बच जाएँगे…

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