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सुख-दुख

नियमों के परे जाकर पत्रकारिता करेंगे तो आज न कल शिकार बनेंगे ही!

दीपांकर-

यूट्यूब के जर्नलिस्टों की हालत ये है कि एक खास तरफ़ का पक्ष दिखा कर थोड़े से व्यूज क्या आ गये भाई लोग उस पक्ष की तमाम स्थितियों और उस पक्ष से जुड़े धर्म, परम्पराओं, रीति-रिवाजों इतिहास आदि का खुद को रातों रात विशेषज्ञ घोषित कर देते हैं.

ये कैसे हुआ वो कैसे हुआ आदि-आदि विषयों पर दनादन वीडियो करने लगते हैं. अरे भाई सैकड़ों वर्षों की ऐतिहासिक घटनाओं के हजारों विभिन्न परिपेक्ष्य होते हैं. दस मिनट के वीडियो में क्या-क्या निपटाना है? इतिहास कोई मैगी नूडल तो है नहीं!

रविशंकर उपाध्याय-

कुछ माह पहले की बात है। पटना में एक यूट्यूबर पत्रकार पीएमसीएच के इमरजेंसी वार्ड में वीडियो बनाने चला गया था। उसे मना किया गया कि भैया इमरजेंसी वार्ड में कैमरा ले जाना मना लेकिन वह नहीं माना। वीडियो बनाने लगा। उसके बाद उसकी गार्ड ने खूब पिटाई कर दी। मार मार कर पैर तोड़ दिया। यूट्यूबर कैमरे के सामने आकर खूब रोया। पत्रकार को मारने- पीटने को लेकर कई सारी बातें की। सभी सैद्धांतिक बातें थी। एक दो लोगों को छोड़कर कोई भी उसके साथ खड़ा नहीं हुआ।

दूसरी कहानी 2011-12 के आसपास की है। रांची में रिम्स में जूनियर डॉक्टरों ने कुछ पत्रकारों की सही रिपोर्टिंग पर बेरहमी से पिटाई कर दी थी। सब पत्रकार एक हो गए। प्रशासन भी साथ आ गया। पुलिस से गुप्त डील हुई कि जूनियर डॉक्टरों का मन बहुत बढ़ गया है इनको उसी की भाषा में जवाब दिया जाए। उसके बाद रिम्स के जूनियर डॉक्टरों को पत्रकारों ने उसी की भाषा में जवाब दिया। पुलिस वालों की मदद से यह काम पूरी तन्मयता से की गई। फिर कभी मनमानी की कोई बड़ी घटना नहीं सुनी।

2008 की एक तीसरी घटना याद आ रही है। एक सत्ताधारी दबंग विधायक ने पटना में एक चैनल के पत्रकार की पिटाई कर दी थी। इसके बाद पटना के सभी पत्रकारों ने मार्च निकाला। समूचे विपक्ष के साथ नेता प्रतिपक्ष भी सड़क पर उतर गई और सत्ता को बैकफुट पर आना पड़ा।

कहने का आशय यही है कि पत्रकारों को पत्रकारिता के सिद्धांत पता होते नहीं हैं और वह सो कॉल्ड क्रांतिकारी बनने की चाह में उल-जलूल हरकतें करता है। इसके बाद उसकी पिटाई भी होती है तो लोग बाग क्या साथी पत्रकार भी उसके साथ खड़े नहीं होते। हां ये पत्रकार कुछ मठाधीश टाइप के लोगों के कूटनीतिक हथियार होते हैं जो उनके चढ जा बेटा सूली पर.. की उक्ति को सार्थक करने निकल पड़ते हैं।

आजकल पक्षकारिता और यूट्यूब/फेसबुक के मोनेटाइज होने के कारण ये खुद को और तोप समझने लगे हैं। लेकिन बावजूद इसके संदेश साफ है, आप नियमों के परे जाकर पत्रकारिता करेंगे तो आप बड़े हों या छोटे, आज न कल शिकार तो बनेंगे ही। यह तो तय ही है।

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