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आपातकाल नभाटा में कुछ पत्रकारों के लिए स्वर्णकाल साबित हुआ!

प्रदीप कुमार-

नवभारत टाइम्स हिंदी पत्रकारिता का इतिहास भी है

नवभारत टाइम्स और दिनमान टाइम्स को मिलाकर मैंने सर्वाधिक काल तक नौकरी बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लि में की-तीन अलग-अलग दौर में ही सही। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘ अज्ञेय ‘,राजेन्द्र माथुर और मधुसूदन आनंद,इन तीन संपादकों पर लिखने की खास वजहें हैं। इन तीनों के साथ काम करने के नाते बहुत कुछ आंखों देखा है और शेष विश्वासजनक ओरल हिस्टरी पर आधारित है। 1946 में स्थापना से लेकर 1977 तक लगभग एक जैसा दौर रहा।सबसे बड़ी मीडिया कंपनी के हिंदी दैनिक की प्रतिष्ठा इस दृष्टि से थी कि उस समय दिल्ली में इसके जैसा भी कोई अखबार नहीं था। एक अखबार को हिकारत से ‘लाटरी टाइम्स ‘ कहा जाता था। एक अखबार हिंदू महासभा का अघोषित मुखपत्र था। नभाटा के स्तर का अनुमान यों लगाइए कि हुनरमंद कारीगरों की नामौजूदगी में यह निकलता था। यहां कोई भी नौकरी पा सकता था और कुछ भी छपाया जा सकता था। रामकृष्ण डालमिया की बैंक और बीमा कंपनियां बंद हुईं तो उनके अनेक बेरोजगार कर्मी पत्रकार बन गए।डालमिया के चर्चित आयल बाथ के समय ‘ रामचरित मानस ‘ सुनाने वाले व्यक्ति पर सेठ जी ने प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा तो वह अगले दिन संपादकीय विभाग में बैठे मिले। मैंने पहली बार 1978 में नया शब्द सुना-वाया बठिंडा। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एमए, मुख्य उप संपादक जयदत्त पंत कुछ कड़वाहट के साथ बोलते थे। उन्हीं के शब्दों में, दसवां-बारहवां पास लोग इधर-उधर से आ गए,वेज बोर्ड के तहत ग्रेजुएशन ज़रूरी होने पर बठिंडा के प्राइवेट कालेजों से स्नातक की डिग्री हासिल कर ली,जैसे गांवों में लड़कियां शादी से पहले विद्या विनोदिनी जैसी डिग्री ले लेती थीं। रिपोर्टिंग और स्पोर्ट डेस्क को ‘ कामधेनु ‘ कहा जाता था। तीसरे नंबर पर थी कामर्स डेस्क।प्रादेशिक डेस्क पर भी अवसर थे,लेकिन उन्हें खोजना पड़ता था।

आपातकाल नभाटा में कुछ पत्रकारों के लिए स्वर्णकाल साबित हुआ। लखनऊ में साइकिल से चलने वाले एक पत्रकार के पास कार आ गई। दिल्ली में फ्लैट हो गया। फ्लाइट से नीचे वह बात ही नहीं करते थे। संभव होता तो भीड़भाड़ वाले बहादुर शाह जफर मार्ग पर हेलिकाप्टर उतरवा लेते। ‘ परासंवैधानिक सत्ता ‘ संजय गांधी के दरबारी की छवि को उन्होंने खूब भुनाया।चर्चा थी कि संजय गांधी के चप्पल उठाने पर गर्व करने वाले एक मंत्री इस पत्रकार के भारी दबाव में रहते थे। ज़्यादातर खबरें संजय गांधी और उनके चमचों से संबंधित होती थीं। इस सब एडिटर से काम लेने की हिम्मत किसकी पड़ती।एक वरिष्ठ पत्रकार आए दिन इंदिरा गांधी या संजय गांधी के साथ ब्रेक फास्ट,लंच या डिनर का दंभ भरा करते थे। एक संपादक के बारे में प्रसिद्ध था कि उन्हें डिक्टेशन देने का शौक था । दो-चार वाक्य लिखवाने के बाद उन्हें याद आता कि प्रधानमंत्री के यहां लंच पर जाना है। हड़बड़ाहट का नाटक करते हुए टाइपिस्ट से कहते, आगे आप इंदिरा जी के आज प्रकाशित भाषण से जोड़ लीजिए। लोकसभा चुनाव का परिणाम आने के दो दिन पहले तक यह मंडली प्रचंड बहुमत से इंदिरा जी की वापसी का दावा कर रही थी। दूसरी ओर उच्च प्रबंधन तक निश्चित सत्ता परिवर्तन की खबरें पहुंच रही थीं। अखबार की हालत बाद से बदतर हो चुकी थी। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद नए संपादक का आना तय हो गया।

गिरावट की दीर्घ अवधि के बाद मैनेजमेंट को वजनी,गरिमामय और चर्चित व्यक्ति की आवश्यकता थी। सत्ता के गलियारे में पहुंच भी एक स्वाभाविक कारण रहा होगा। इस कसौटी पर सिर्फ अज्ञेय जी खरे उतरते थे। इन
गुणों से युक्त होने के साथ ही अज्ञेय जी के साथ ‘दिनमान ‘ की समृद्ध संपदा भी थी। अज्ञेय की परिकल्पनाओं का ‘ दिनमान ‘ हिंदी में उल्कापात माना जा सकता है। अज्ञेय के जाने के बाद रघुवीर सहाय के नेतृत्व में दिनमान की गौरवशाली परंपरा का अनुरक्षण होता रहा। सहाय जी के बाद ऐसे-ऐसे लोग दिनमान के संपादक बने,जिनकी महारत अन्य कामों में थी। मैनेजमेंट ने इसी ग्रुप की हिंदी-अंग्रेजी की स्तरीय पत्रिकाओं के दौर में भी ‘ दिनमान ‘ सरीखी पत्रिका पहले कभी नहीं निकाली थी। बाद में तो पत्रिका की संस्कृति ही समाप्त हो गई। आला दर्जे की काबिलियत के साथ ही अज्ञेय जी के मुकुट में एक हीरा यह भी था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से संबंधों के लिए कुख्यात, कांग्रेस फार कल्चरल फ़्रीडम के दिनों से वह और जय प्रकाश नारायण (जेपी) सहयोगी थे। पटना के कदमकुआं वाले घर में वस्तुतः गुमनामी में रह रहे जेपी ने भारी-भरकम बहुमत से चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री बनीं, इंदिरा गांधी को पदच्युत करने के लिए हुए ‘ संपूर्ण क्रांति आंदोलन ‘ का नेतृत्व किया था। जेपी, मोरारजी देसाई की नुमाइंदगी में बनी जनता पार्टी की सरकार के अघोषित गुरु और मार्गदर्शक थे।यह बात दीगर थी कि चुनाव घोषित होते ही उन्हें महत्वहीन किया जाने लगा था;इस हद तक कि उनकी सलाह पर प्रधानमंत्री का चयन करने के लिए रायशुमारी एक घंटे बाद ही रोक दी गई थी,क्योंकि बहुमत जगजीवन राम के साथ दिख रहा था। अज्ञेय जी ‘ संपूर्ण क्रांति ‘ के मुखपत्र, अंग्रेजी साप्ताहिक ‘ एवरीमैंस’ के संपादक थे। इसी पत्र के, बीच के दो पन्नों पर मार्क्सवादी अतीत वाले जेपी ने मुनादी करने के अंदाज़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एतिहासिक सनद दी थी,’ अगर आरएसएस फासिस्ट है, तो मैं भी फासिस्ट हूं ‘। कांग्रेस और ‘ संपूर्ण क्रांति आंदोलन ‘ के अन्य विरोधियों ने सीआईए का मुद्दा उठाया तो जेपी ने ‘एवरीमैंस’के बीच के दो पेजों पर लंबा जवाब दिया,जिसका शीर्षक था’ जिस दिन जेपी देशद्रोही हो जाएगा इस देश में कोई देशभक्त नहीं बचेगा।‘ बदले राजनीतिक परिदृश्य में नवभारत टाइम्स के लिए अज्ञेय जी से ज्यादा माकूल संपादक मिलना बहुत मुश्किल था।

जीवन के सातवें दशक में चल रहे अज्ञेय जी अपने दिमाग में परिवर्तनशील योजनाएं लेकर आए थे। स्टाफ की विरासत को साथ लेकर चलना बाध्यता थी। ब्यूरो के माशाअल्लाह क्या कहने ! इसलिए गौरीशंकर जोशी को विशेष संवाददाता बनाकर लाए। साप्ताहिक पत्रिका को नया कलेवर देने के लिए गुलशेर ख़ान शानी को नियुक्त किया। उपसंपादक पद पर मेरी भी बहाली हुई थी। मधुसूदन आनंद और विष्णु नागर मुंबई से आ चुके थे। नागर जी, शानी जी के साथ थे। आनंद जी डेस्क पर थे। डेस्क के वरिष्ठता क्रम को छूना हज़ार वॉल्ट का करंट दौड़ा रहे नंगे तार के स्पर्श से कम नहीं था। बठिंडा मार्का डेस्क पर कल्पनाशीलता आशातीत थी। अज्ञेय जी चुनिंदा राज्यों में कामकाजी संवाददाता रखना चाहते थे। यूनियन दिल्ली में पहले से कार्यरत लोगों को मौका देने के लिए अड़ी रही। अनमने मैनेजमेंट को मौका मिला और प्रोजेक्ट कूड़े की टोकरी में चला गया। प्रोफेशनल मानकों से दूर और अपने- अपने हितों के हिसाब से काम करने के अभ्यस्त संवाददाताओं के सतत विरोध के बीच जोशी जी का उत्साह ठंडा पड़ने लगा। पहले पेज का स्वरूप तय करने में संपादक या समाचार संपादक की कोई भूमिका नहीं होती थी। चाहे जितना बड़ा घटनाक्रम हो, मुख्य उपसंपादक के स्तर पर फैसला हो जाता था। पंत जी और सोनी जी जब नाइट इंचार्ज होते थे,तभी मैं मन लगाकर काम करता था;वे सम्मानपूर्वक, खबरों के चयन में मुझे शामिल करते थे। सोनी जी कहते थे,पुत्तर अपने लिए काम कर,नहीं तो तू भी वाया बठिंडा हो जाएगा। सोनी जी की ड्यूटी के दौरान हुई एक घटना याद आती है।

हिदुस्तान समाचार ने खबर दी कि नेपाल में लोकतंत्र की बहाली के लिए प्रदर्शन कर रहे नेपाली कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर हुई फायरिंग में 13 लोग मारे गए। सोनी जी इसे लीड बनाना चाहते थे मगर दुविधा यह थी कि पीटीआई इस बारे में मौन थी। सोनी जी मेरे इस तर्क से सहमत थे कि समाचार या समाचार एजेंसी की प्रामाणिकता तय करने वाले हम कौन होते हैं,खबर आई है तो मेरिट के आधार पर लीड बननी चाहिए। एक निर्णायक तत्व यह भी था कि नेपाली कांग्रेस भारत की मित्र है और जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर के कोइराला परिवार से निजी संबंध भी हैं। अगले दिन सिर्फ अखबार में वह लीड खबर थी। संपादक से लेकर नीचे तक हर स्तर पर अचर्चित रही। चर्चा तब हुई जब काठमांडों में ढाई-तीन हज़ार प्रसार वाले नभाटा पर रोक लगा दी गई। मैनेजमेंट की तरफ से शिकायत अज्ञेय जी के पास आई,जिसे उन्होंने सोनी जी से शेयर किया था। कुछ दिन बाद नभाटा की सप्लाई फिर शुरू हो गई।

अखबार अच्छा निकले या खराब,कोई भी खबर मिस हो जाए,संपादक और समाचार संपादक उस पर कभी बात नहीं करते थे। सहायक संपादकों का सुखद,सुविधाजनक टापू अलग था। संपादकीय पेज के अलावा उनकी निगाह और कहीं नहीं पड़ती थी। इसी अहंकार में एक सहायक संपादक अज्ञेय जी से बदतमीजी कर बैठे। अज्ञेय जी ने उनकी बर्खास्तगी की सिफ़ारिश ऊपर भेज दी। अगले दिन हड़ताल हो गई। खत्म हुई तो अज्ञेय जी जा चुके थे। इन स्थितियों ने घमंड में हमेशा चूर रहने वाले सहायक संपादक को सड़क पर आने से बचा लिया। समाचारों की प्लानिंग में समाचार ब्यूरो प्रमुख या मुख्य संवाददाता के साथ मीटिंग करते मैंने अज्ञेय जी को कभी नहीं देखा। नानाजी देशमुख के गोंडा प्रकल्प के उद्घाटन जैसे अवसरों को छोड़ वह समाचारों से दूर रहते थे। उनका सारा फोकस संपादकीय पेज पर रहता था। उनके पुराने मित्रों, जैनेंद्र कुमार, प्रफुल्ल चंद्र ओझा ‘ मुक्त’ और इसी तरह के लेखकों के स्तंभ अनिवार्यतः छपते थे। सहयोगियों के लिखने पर रोक नहीं थी। मैंने जब कभी लिखा,वह स्वीकार हुआ। एक बार मुझे शरारत सूझी। यूरो कम्यूनिज़्म पर यूरोपीय देशों में बहस चल रही थी। इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के विचारक सचिव पामीरो तोगलियाती की थीसिस के उल्लेख में मैंने जानबूझकर गलती कर दी। उन्होंने तुरंत बुलाकर उसे ठीक कराया था। पहली और आखिरी बार किसी संपादक के सामने मेरी हलक इस तरह सूखा कि कुछ शब्द मुश्किल से निकल पाए। काबिल और उत्साही सहयोगी इब्बार रब्बी संपादकीय पेज देखते थे।

लखनऊ में यशपाल के विप्लव कार्यालय को गिरा दिया गया था। रब्बी जी ने मुख्य लेख के नीचे की स्पेस के लिए मुझसे लिखने को कहा। मंजूरी के लिए उन्होंने वह लेख अज्ञेय जी की मेज पर रखवा दिया। थोड़ी देर बाद कार्यालय सहायक नत्थू सिंह ने एक स्लिप लाकर पकड़ाई,जिस पर लिखा था,’ लेखक कृपया बात कर लें।‘ मैं फौरन समझ गया कि यशपाल से जुड़े विषय पर लिखकर भूल की। करंट-सा लगा,क्योंकि मेरी प्रोबेशन अवधि चल रही थी। धड़कते दिल से उनके चैंबर में जाकर खड़ा हो गया। उन्होंने अदब से कहा, ‘ बैठिए।’ पूछा, ‘यह क्यों लिखा ?’ मैंने लड़खड़ाती जबान से कहा,’ विप्लव कार्यालय क्रांतिकारियों का अड्डा हुआ करता था…. उसके गिराए जाने से मैं दुखी हो गया।’ उनके ये शब्द मुझे अब भी याद हैं,’ किसी के व्यक्तिगत दुख से अखबार का क्या वास्ता? हो सकता है,आप यशपाल को मुझसे बड़ा लेखक मानते हों ।वह आप का निजी मत हो सकता है। मैं तो पूरे भारत में रहा हूं। क्या पूरे देश को म्यूज़ियम बना देना चाहिए?’ मैं मुंह लटकाए लेख लेकर बाहर आ गया। रब्बी जी इस घटना से खिन्न थे।

इंदिरा हटाओ के एकमात्र एजेंडे को लेकर सत्ता में आए, परस्पर विरोध और वैचारिक अंतर्विरोध से ग्रस्त नेताओं में जो सिर फुटौव्वल पहले दिन शुरू हुई थी,वह लगातार बढ़ती रही। 1977 के अंत तक स्पष्ट हो गया कि जनता पार्टी और मोरारजी देसाई की सरकार,दोनों का टूटना अवश्यंभावी है। 1978 के प्रारंभ में टाइम्स आफ इंडिया के संपादक गिरिलाल जैन का सहयोगी प्रकाशन ‘ इलस्ट्रेटेड वीकली आफ इंडिया’ में करीब तीन पेज का लेख छपा। लेख का सार था:’ अगर अभी चुनाव हो जाए तो इंदिरा गांधी की वापसी निश्चित है।’ शाह कमीशन के सामने पानी पी-पीकर इंदिरा गांधी को कोसने वालों के स्वर बदलने लगे। मीडिया में संतुलन नज़र आने लगा।इंदिरा जी और उनकी पार्टी के आक्रामक मुद्रा में आने के साथ ही आपस में लड़ रहे,जनता पार्टी के नेता लाचार साबित हो रहे थे। नवंबर 1978 में चिकमगलूर से इंदिरा जी की शानदार विजय जनता पार्टी के शिराजे के ताबूत में आखिरी कील थी। उसके बाद जनता पार्टी के कई नेता कांग्रेस से गुप्त संपर्क स्थापित करने लगे थे। ‘ संपूर्ण क्रांतिकारी ‘ बेनकाब हो चुके थे। बेनेट कोलमैन एंड कंपनी पर भी परिवर्तन का साया पड़ने लगा। अज्ञेय जी ने नभाटा में दो साल पूरे किए ही थे कि 72 दिन की हड़ताल हो गई। आफिस खुलने पर नभाटा,मुंबई में स्थानीय संपादक और पुराने स्टाफर आनंद जैन संपादक की कुर्सी पर विराजमान थे।एक दिन आनंद जैन की अनुपस्थिति में इला डालमिया अज्ञेय जी का सामान लेने आई थीं। चपरासी नत्थू सिंह एक बैग में सब रखकर इला जी को उनकी गाड़ी तक छोड़ आए थे। दमकते चेहरे वाले, प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी, देश-विदेश में सुविदित, कवि-लेखक-संपादक को स्टाफ या कंपनी की तरफ से विदाई पार्टी भी नसीब नहीं हुई।

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