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अग्निवीर पर राहुल गांधी को गलत साबित करने की ‘मीडियावीर’ कोशिशें जानिये

संजय कुमार सिंह

‘मीडिया बुद्धि’ यह होती कि संबंधित अग्निवीर के परिवार से बात करके सच सार्वजनिक कर दिया जाता। लेकिन मीडिया आम तौर पर इस मामले में शांत है। सरकार ने जो कहा वह कल छप गया। फिर प्रधानमंत्री ने अपने आरोप अपने अंदाज में दोहरा दिये। अखबारों ने गलत नहीं कहा तो लोग सरकार को सही और राहुल को गलत मान लेंगे। लेकिन मीडिया क्या कर रहा है। जनसत्ता ने बताया है कि अग्नवीर को मुआवजा मिला है। टीवी9 की खबर है कि नहीं मिला है। ये खबरें उनके लिए हैं जो सच जानना चाहते हैं। सच सरकार के पक्ष में नहीं है तो ट्रोल शांत हैं और सरकार विरोधी अभी इस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं। मोदी जी के भाषण की प्रशंसा तो हो ही रही है।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के जवाब में प्रधानमंत्री ने कल जो कुछ कहा वह उनकी घटिया राजनीति के बेशर्म प्रदर्शन के अलावा कुछ और नहीं था। अमूमन मैं नरेन्द्र मोदी को नहीं सुनता, किसी रैली या सभा कक्ष में मौजूद रहकर तो नहीं ही सुना है, सीधा प्रसारण भी नहीं सुना था। क्लिप्स ही देखता रहा हूं। रिटायरमेंट की उम्र पार करने के बाद कल लगा कि कुछ समय यह जानने समझने में लगाया जा सकता है कि जनता ने तीसरी बार चुना है तो क्यों। भाषण सुनते हुए सोचा था कि भाषण का कायदे से विश्लेषण करूंगा पर हाथरस हादसे की खबर के बाद लगा कि उसकी पठनीयता खत्म हो गई। संयोग से कल मेरे पास अनुवाद का भी कुछ काम आ गया तो वह रह गया। मेरा मानना था कि हाथरस हादसे की खबर के बाद प्रधानमंत्री के भाषण की आलोचना अगर कुछ होती भी तो नहीं होगी। यहां यह गौरतलब है कि आलोचना करने वाले और राहुल गांधी की प्रशंसा करने वाले तो लिखना टाल देते हैं पर नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा करने वाले नहीं चूकते। हालांकि, वह अलग मुद्दा है।  

आज के अखबारों की खासियत यह है कि राहुल गांधी को भी पहले पन्ने पर जगह मिली है। और तो और अमर उजाला में भी भले सबसे नीचे लेकिन दो कॉलम में छह लाइनों की खबर, दो लाइन का शीर्षक और आधे कॉलम की तस्वीर छापने के बराबर जगह मिली है। अमर उजाला ने आज अपना पूरा पहला पन्ना हाथरस को समर्पित किया है। प्रधानमंत्री के भाषण समेत पहले पन्ने की खबरें दूसरे पहले पन्ने पर है। इनकी प्रस्तुति तो जो है, जैसी है, वह तो अपनी जगह है ही। इनमें यह खबर भी है कि राहुल गांधी ने अपने भाषण के विवादित अंश बहाल करने के लिए चिट्ठी लिखी है और कहा है कि पीएम मोदी की दुनिया में सच्चाई को मिटाया जा सकता है लेकिन हकीकत में सच्चाई को मिटाना संभव नहीं है। मुझे लगता है कि यह बड़ी बात है और रेखांकित करने लायक है। हालांकि नवोदय टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। यहां हाथरस कांड पर उनकी प्रतिक्रिया फोटो के साथ है। यह राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के शोक संदेश के बाद है।

हिन्दुस्तान टाइम्स में यह प्रधानमंत्री के भाषण के साथ दो कॉलम में है। शीर्षक है, भाषण के अंश हटाये जाने पर राहुल गांधी ने कहा : सच को हटाया नहीं जा सकता है। खबर में लोकसभा अध्यक्ष को लिखी उनकी चिट्ठी का जिक्र तो है ही संसद के बाहर भी उन्होंने प्रधानमंत्री पर निशाना साधा और कहा कि सच्चाई को हटाया नहीं जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि हिन्दुओं के मामले में राहुल गांधी ने जो कहा वह सभी हिन्दुओं के लिए नहीं था फिर भी प्रधानमंत्री और भाजपा व उनके सहयोगियो ने इसे मुद्दा बनाया और अखबारों ने बनाने दिया। वैसे ही जैसे चुनाव आयोग ने उन्हें कुछ भी बोलने दिया और उन्होंने पूरी मनमानी की। फिर भी लोगों को मनवाना चाहते हैं कि ईवीएम बिल्कुल ठीक है और चुनाव आयोग ने महान कार्य किया है। पर वह मुद्दा नहीं है

टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज हाथरस की खबर को पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड बनाया है। पहले पन्ने पर प्रधानमंत्री की खबर लीड है लेकिन इसकी सेकेंड लीड महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार, अदाणी रिपोर्ट में ‘धोखेबाजी’ पर सेबी ने हिन्डनबर्ग को नोटिस भेजा है”। इस खबर का इंट्रो फर्म यानी हिन्डनबर्ग का जवाब है। इसके अनुसार रेगुलेटर उनका बचाव कर रहा है जो फ्रॉड कर रहे हैं। खबर के अनुसार इस नोटिस पर 26 जून की तारीख पड़ी है। वैसे तो यह कई अखबारों में है लेकिन सबसे प्रमुखता से यहीं है। इसे कल जारी किया जाना और आज के अखबारों में  प्रमुखता से छपना भी हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग हो सकता है। इस खबर के साथ कोटक समूह का एक स्पष्टीकरण भी है और वह यह कि उसे पता नहीं था कि उसके एक निवेशक का संबंध हिन्डनबर्ग से है। जाहिर है, अदाणी मामले में हिन्डनवर्ग से तो जवाब मांगा ही जा रहा है, कोटक समूह को सफाई देनी पड़ रही है लेकिन अदाणी समूह से संबंधित सवालों के जवाब नहीं हैं।

मोदी सरकार ने देश की हजारों शेल कंपनियां बंद कराने का दावा किया पर अदाणी की कंपनी में 20,000 करोड़ का निवेश किसने किया यह पता नहीं चला और मुद्दा नहीं बना। संसद में सवाल पूछने वालों को परेशान किया गया। सेबी के जिस अधिकारी को सेठ जी के खिलाफ कार्रवाई करनी थी वे रिटायर होकर उनके संस्थान में नौकरी कर रहे थे और कहने की जरूरत नहीं है कि इसका मतलब होता है सरकारी नौकरी के समय काम नहीं करना और रिटायरमेंट के बाद बिना काम किसी और संस्था से वेतन या पेंशन लेना। यह पुरानी भ्रष्ट व्यवस्था है और मोदी सरकार में वाशिंग मशीन की तरह ही खुलकर दिख रही है। अदाणी मामले में सेबी की  कार्रवाई का क्या हुआ वह ना तो चर्चा में है ना कोई मुद्दा। जो भी हो, आज टाइम्स ऑफ इंडिया में भी राहुल गांधी की चिट्ठी की चर्चा है और यह लीड के नीचे दो कॉलम में है।

इंडियन एक्सप्रेस ने राहुल गांधी की खबर को और प्रमुखता से छापा है। असल में फ्लैग और मुख्य शीर्षक तो प्रधानमंत्री के भाषण का है लेकिन उपशीर्षक राहुल गांधी की खबर है और इंडियन एक्सप्रेस की खबर की शुरुआत राहुल गांधी के भाषण के हटाये गये अंशों की जानकारी से ही होती है। शीर्षक है, हिन्दुत्व, अग्निपथ, नीट से संबंधित अंश हटाये गये राहुल ने कहा सच्चाई बनी रहेगी। आप जानते हैं कि जो अंश हटाये गये हैं उनमें अग्निपथ योजना पर टिप्पणी भी है। कल (मंगलवार, 02 जलाई 2024) को अमर उजाला में खबर थी, अग्निपथ पर राजनाथ से तकरार – रक्षा मंत्री बोले सदन को गुमराह न करें। इसमें कहा गया था कि बलिदान होने पर जवान के परिवार को एक करोड़ देने का प्रावधान है। खबर के अनुसार राहुल गांधी ने कहा था कि (एक्सपंज हो गया है तो छपना नहीं चाहिये था और छपा था तो मैं चर्चा कर ही रहा हूं, डिजिटल जमाने में एंक्सपंज का मतलब राम जानें) अग्निवीरों से यूज एंड थ्रो वाले मजदूर जैसा बर्ताव होता है। शहादत के बाद उन्हें कुछ नहीं मिलता। जहां तक मुझे याद है राहुल गांधी ने एक खास अग्निवीर की बात की थी।     

‘मीडिया बुद्धि’ का सच

अगर इस मामले में तथ्य गलत थे तो बताना चाहिये था कि राहुल गांधी उस दिन की बात कर रहे हैं जब जवान शहीद हुआ था, उससे मिलने गये थे बाद में उसे नियमानुसार अमुक राशि दी गई। इसमें बीमा, बलिदान पर मिलने वाली राशि इतनी है कुल मिलाकर एक करोड़ रुपये दिये गये या दिये जाते इस मद में इतनी राशि कट गई या कम दी गई। अखबारों का भी काम था कि वास्तविक स्थिति बताते। अगर राहुल गांधी ने इरादतन गलत बयानी की हो तो वह और राजनाथ सिंह निराधार बचाव कर रहे हों तो वह भी। अभी की स्थिति में मैंने गूगल से जानने की कोशिश की ताकि कहीं कोई खबर छपी हो (जैसे पहले छपती थी) कि फलां शहीद अथवा अग्निवीर के परिवार को इतनी राशि दी गई। मुझे जो खबरें मिलीं उससे यही लगता है कि अग्निवीरों का बीमा होता है, मुआवजे की राशि 40 लाख के करीब है और इसका भुगतान सरकारी शैली में रफ्तार से किया जाता है और लोगों को भरोसा नहीं है कि मुआवजा मिलेगा या मिलता है। सरकार लोगों को यकीन दिलाने की बजाय अपनी साख बचाने और चुनाव जीतते रहने के प्रयास में है।  

लाइव हिन्दुस्तान की 23 जुलाई 2023 की एक खबर है, 2019 पुलवामा हमले में शहीद हुए 40 सीआरपीएफ जवानों में से प्रत्येक को 1.56 करोड़ से 2.94 करोड़ रुपये तक मुआवजा दिया गया है। गृह मंत्रालय की ओर से बुधवार को संसद में यह जानकारी दी गई। पार्लियामेंट में एक सवाल का जवाब देते हुए गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने इस बारे विस्तार से बताया। आप जानते हैं कि पुलवामा के शहीदों को भी मुआवजा नहीं मिलने की चर्चा थी और मुआवजा दिये जाने की पुष्टि आखिरकार संसद में हुई तो सवाल उठाने और संसद में चर्चा के कारण ही हुई। अग्निवीरों के मामले में अभी खबर नहीं है तो इसके दोनों मतलब हैं पर अखबारों ने अपना काम नहीं किया है। सरकार का जवाब संतोषजनक नहीं है लेकिन राहुल गांधी पर गलतबयानी का आरोप लगा दिया गया।

वैसे भी, अग्निवीर के मामले में आज तक की 16 घंटे पहले की खबर है, अगर ड्यूटी के दौरान किसी अग्निवीर की मृत्यु हो जाती है तो सरकार द्वारा परिवारजनों को मुआवजा भी दिया जाता है। आर्मी की वेबसाइट के अनुसार, (राहुल गांधी ने शहीद परिवार से मिलने के बाद उनके हवाले से कहा था) ऑन ड्यूटी मृत्यु होने पर शहीद हुए अग्निवीर के परिवार को 48 लाख रुपए का बीमा कवर, 44 लाख रुपए की अनुग्रह राशि, चार साल के कार्यकाल में बचे समय का पूर्ण वेतन और सेवा निधि दी जाती है। मुझे लगता है कि दी जाती होती तो खबर क्यों नहीं थी। अग्निवीर योजना की आलोचना तो शुरू से हो रही है। संभव है यह उसे गलत साबित करने के लिए हो। इस संबंध में जनसत्ता डॉट कॉम की एक खबर भी गौरतलब है जो न्यूजडेस्क की है। इस बारे में मैं कुछ नहीं कहूंगा, लोग जानते हैं। यह खबर 2 जुलाई 2024 की है और 1355 पर अपडेट की गई है।

इसके अनुसार, अगर ड्यूटी के दौरान किसी अग्निवीर की मृत्यु हो जाती है तो सरकार द्वारा परिवारजनों को मुआवजा भी दिया जाता है। यह भी रक्षा मंत्री को सही साबित करने के लिए किया गया हो सकता है। आर्मी की वेबसाइट के अनुसार, ऑन ड्यूटी मृत्यु होने पर शहीद हुए अग्निवीर के परिवार को 48 लाख रुपए का बीमा कवर, 44 लाख रुपए की अनुग्रह राशि, चार साल के कार्यकाल में बचे समय का पूर्ण वेतन और सेवा निधि दी जाती है। इसी में आगे लिखा है, अगर ड्यूटी के दौरान किसी अग्निवीर की मृत्यु हो जाती है तो सरकार द्वारा परिवारजनों को मुआवजा भी दिया जाता है। आर्मी की वेबसाइट के अनुसार, ऑन ड्यूटी मृत्यु होने पर शहीद हुए अग्निवीर के परिवार को 48 लाख रुपए का बीमा कवर, 44 लाख रुपए की अनुग्रह राशि, चार साल के कार्यकाल में बचे समय का पूर्ण वेतन और सेवा निधि दी जाती है। आपको जन धन खाते और बीमा का प्रचार याद होगा। सरकार और प्रचारकों को चाहिये कि उस बीमा राशि का विवरण भी सार्वजनिक करे।

जनसत्ता  खबर की एक लाइन है, शहीद हुए अग्निवीर अक्षय गवाटे के पिता ने कहा है कि उन्हें कुल 1 करोड़ 10 लाख का मुआवजा मिला है।  (इसमें पिता का नाम नहीं है) अगली ही लाइन में अग्निवीर का नाम बदल गया है, अग्निवीर गावते अक्षय लक्ष्मण के सियाचिन ग्लेशियर के चुनौतीपूर्ण इलाकों में ड्यूटी के दौरान मौत हो गई थी। महाराष्ट्र के रहने वाले लक्ष्मण पहले अग्निवीर हैं, जिन्होंने ऑपरेशन में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है। (यह न्यूज डेस्क आधारित डेस्क पत्रकारिता का भी नमूना हो सकता है) अंग्रेजी की खबर का कंप्यूटर अनुवाद हो यह भी संभव है। पर कोशिश राजनाथ सिंह का मदद करने की है, राहुल गांधी की नहीं। राजनाथ सिंह रक्षा मंत्री हैं, जो चाहें करें और बतायें। पर सच बतायें और उसी पर कायम रहें।

जहां तक मुझे याद है, राहुल गांधी ने पंजाबी अग्निवीर के पंजाबी परिवार का जिक्र किया थाटीवी9 हिन्दी डॉट कॉम की एक खबर के अनुसार, कोई भी वादा नहीं हुआ पूरा… राहुल के आरोपों के बीच शहीद अग्निवीर के परिवार ने किया खुलासा। यह 03 जुलाई 2024, 02:28 की खबर है। इसमें कहा गया है, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद में अग्निवीर योजना को लेकर कई सवाल उठाए। अपने भाषण के दौरान उन्होंने पंजाब के एक अग्निवीर की शहादत और उसके परिवार का जिक्र किया। इसके बाद बरनाला जिले के शहीद अग्निवीर का परिवार सामने आया है। शहीद अग्निवीर का परिवार सरकार से नाराज है। परिवार का कहना है कि अभी तक हमें कुछ भी नहीं दिया गया है। बरनाला के गांव मेहता का अग्निवीर सुखविंदर सिंह अप्रैल 2024 में ड्यूटी के दौरान जम्मू में शहीद हो गए थें। कहने की जरूरत नहीं है कि मुआवजा मिलता हो या नहीं, मिलेगा इसका यकीन नहीं है और मिलता है यह नियम नहीं है। अखबारों की ये कोशिशें सरकार के दबाव में हों या सेवा भावना से की गई हों  सामान्य नहीं हैं और मामला सामान्य होता तो पहले ही खबरें होती जैसी इमरजेंसी की हैं भले तब इंटरनेट, गूगल, कंप्यूटर कुछ नहीं था।

द हिन्दू में हाथरस की खबर तो लीड है लेकिन प्रधानमंत्री की खबर टॉप पर या लीड के बराबर में दो कॉलम में निपटा दी गई है। दोनों के नीचे तीन कॉलम में एक शीर्षक है, सासंद ने कहा, प्रधानमंत्री मणिपुर पर शांत हैं। कल प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान विपक्ष काफी समय तक मणिपुर कहता रहा लेकिन आज यह शीर्षक नहीं है। द हिन्दू में तीन कॉलम की इस खबर के साथ सिंगल कॉलम की एक खबर है, मेरा पूरा भाषण फिर से बहाल रें, राहुल ने ओम बिरला से कहा।

आज की खबरों में इंडियन एक्सप्रेस की खबर, मणिपुर के कांग्रेस सांसद ने सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाया और उन्हें जगाने की कोशिश की प्रमुख है। पश्चिम बंगाल में टीएमसी के एक नेता द्वारा एक प्रेमी युगल को पीटने का मामला खूब चर्चा में था। अगले ही दिन उसे गिरफ्तार कर लिया गया फिर भी राज्यपाल ने राज्य सरकार से सवाल पूछे और आज इंडियन एक्सप्रेस में आठ कॉलम का एंकर है, क्या आप योजना बनाकर प्रेम र सकते हैं, सार्वजनि तौर पर पीटी जाने वाली बंगल की महिला ने पीटा। कहने की जरूरत नहीं है कि मामला भाजपा नेताओं से संबंधित हो तो गायब हो जाता है। पश्चिम बंगाल का है और तृणमूल से संबंधित है तो गायब ही नहीं हो रहा है और छपने की बात करूं तो इतना महत्व राज्यपाल पर छेड़छाड़ के आरोप को नहीं मिला।

प्रधानमंत्री के भाषण की खबर का शीर्षक द टेलीग्राफ में जो है वह हिन्दी में कुछ इस प्रकार होता। चुप्पी बनाम समझदार – फ्लैग शीर्षक है । कहने की जरूरत नहीं है कि कल प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी का नाम लिये बगैर उन्हें बालक बुद्धि कहा था और यहां ‘समझदार’ प्रधानमंत्री के लिए है जो मणिपुर पर एक साल से ज्यादा समय से चुप है। चुनाव के समय मांस, मछली, मुसलमान, मंगल सूत्र आदि आदि कहने के बावजूद म से मणिपुर नहीं कहा। इसलिए कल संसद में उनके भाषण के दौरान लगातार मणिपुर का शोर होता रहा। मणिपुर खबर का शीर्षक है, मणिपुर पर मौन मोदी ने ‘पैरासाइट’ (कांग्रेस) पर ज्ञान दिया। कहने की जरूरत नहीं है कि मेरे सात अखबारों साथ कई अन्य में ऐसा शीर्षक नहीं है।

1. इंडियन एक्सप्रेस का मुख्य शीर्षक है, राहुल पर प्रधानमंत्री : बालक बुद्धि … हिन्दुत्व का अपमान करता है; विपक्ष के नेता की टिप्पणी हटाई गई।

2. टाइम्स ऑफ इंडिया – प्रधानमंत्री ने लोकसभा में पलटवार किया : कांग्रेस ‘परजीवी’ है, राहुल ‘बालक बुद्धि’।

3. हिन्दुस्तान टाइम्स – हार स्वीकार कीजिये, जनादेश को मत घुमाइये : विपक्ष से मोदी  

4. द हिन्दू – प्रधानमंत्री ने कहा जनादेश निरंतरता के लिये है, कांग्रेस सहयोगियो पर जीती है।   

5. द स्टेट्समैन – एनडीए को रिकार्ड तीसरी बार जनादेश मिला; कांग्रेस प्रगति को पटरी से नहीं उतार सकती है (छह कॉलम में)

6. द ट्रिब्यून –  मोदी ने राहुल पर बालक बुद्धि का आरोप लगाया, कांग्रेस को परजीवी कहा

7. दि एशियन एज – मोदी ने राहुल का मजाक उड़ाया, कहा कांग्रेस झूठ फैला रही है।

8. नवोदय टाइम्स – कांग्रेस ने ईवीएम, संविधान आरक्षण पर बोला झूठ : मोदी

9. अमर उजाला – हिन्दू समाज को सोचना होगा, यह अपमान संयोग है या प्रयोग  कांग्रेस आर्थिक अराजकता में झोंकने की रच रही साजिश। 

हिन्दू समाज की प्रधानमंत्री की चिन्ता इस तथ्य के बावजूद है कि आज ही सत्संग में भगदड़ मचने से 116 लोगों की मौत की खबर है। ऐसी मौतें न हों इसके लिए सरकार ने कुछ किया होता तो आज उसकी भी चर्चा होती और नहीं किया है तो उसकी भी चर्चा होनी चाहिये थी। पर सामान्य खबर के अलावा कुछ नहीं है। बसों में शव ले जाने का क्या मतलब? पर कई फोटो हैं। सवाल कहीं नहीं है। क्योंकि यह चिन्ता की बात ही नहीं है। कल इस घटना की खबर के बाद मुझे याद आया कि जमशेदपुर में हर साल संस्थापक दिवस मनाया जाता था खूब अच्छी आतिशबाजी होती थी। 1989 में 150 वीं जयंती के मौके पर आग लगने से 50 लोगों की मौत हो गई थी। मैं तब दिल्ली आ गया था पता नहीं आयोजन होता है कि नहीं लेकिन आतिशबाजी तो भी नहीं हुई और हादसा तो फिर नहीं ही हुआ। यही नहीं 2009 में मैं अपने स्कूल में पुराने छात्रों के एक आयोजन में गया था। पहला साल और पहला आयोजन था बहुत कम लोग थे पर सारी तैयारियों के बाद भी कार्यक्रम शुरू नहीं हो रहा था।

मैंने आयोजकों में से एक, जो मेरा सहपाठी था और उस समय टाटा की कंपनी में बड़ा अधिकारी, से मैंने देरी का कारण पूछा तो उसने बताया कि सुरक्षा संबंधी कुछ नियमों का पालन होना रह गया गया। बाद में एक दमकल और उसके साथ कुछ लोग आये। किसी हादसे की स्थिति में क्या करना है और क्या नहीं यह सब बताया गया और तब दमकल, एम्बुलेंस की उपस्थिति में कार्यक्रम शुरू हुआ। मुझे हवाई यात्रा  सुरक्षा नियमों के पालन और उसकी गंभीरता याद आई। क्या कल की घटना के बाद या पहले की घटनाओं से हमारी सरकारों ने कोई सीख ली है। मरने वाले ज्यादातर तो हिन्दू ही होते हैं। क्या इस बारे में सोचने की जरूरत नहीं है? पर बतायेगा कौन? इस उदाहरण के बाद अमेरिका के ट्विन टावर हादसे और उसके बाद बरती गई सावधानी को याद करने की जरूरत नहीं है पर मुझे याद है, तब जनसत्ता में छपी खबर का शीर्षक मैंने ही लगया था, लोग डरे हुए हैं कि बच्चे डर न जायें। कल सत्संग में गये लोग अब फिर जायेंगे? पता नहीं, सत्संग, बच्चे और डर की किसे चिन्ता है। सब हैं तो हिन्दू ही। समझना पूरे समाज को है अभी तो मीडिया ही नहीं समझ पाया है।

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