Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

अखबारों में सिर झुकाकर चुपचाप काम करने वाले पत्रकारों के लिए एक पते की बात!

श्री चंद्र-

अपने काम का ढोल तो बजाना ही चाहिए

अखबारों में काम करने वालों के सामने शुरू से ही पहचान का बड़ा संकट रहा है। यह संकट काम से जुड़ा हुआ है। अक्सर चुपचाप काम करने वालों को अपने हक का रिवार्ड नहीं मिलता और कइयों को बिना काम के ही मलाई मिलती रहती है। यानी यदि आप साइलेंट वर्कर हैं तो आपके लिए यह संकट और भी बड़ा है। आप काम में चुपचाप लगे रहेंगे और कभी अपने काम का श्रेय लेने का प्रयास नहीं करेंगे तो फिर आप अपने काम का वाजिब हक कैसे पाएंगे? यदि आपके साथ ऐसा हो रहा है तो हक पाने के लिए अपना ढोल बजाना पड़ेगा।

जब मैं नवभारत टाइम्स पटना में था तब हमारे एक संपादक का यह पसंदीदा वाक्य था। अक्सर वे इसे दोहराते रहते थे। हालांकि पूरे अखबार के संदर्भ में ऐसा कहते थे। उनके कहने का आशय यह था कि जब हमारे अखबार में कोई बड़ी और खोजी खबर छपती है तो हमें उसका श्रेय भी लेना चाहिए। हम सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता करते हैं तो समाज और जरूरी लोगों को हमेशा उसकी याद भी दिलाते रहना चाहिए।

जब कभी किसी आयोजन, सेमिनार, सामाजिक और राजनीतिक गैदरिंग में मौका मिले तो अपने अच्छे कामों को गिनाने से परहेज़ नहीं करना चाहिए। वह दौर पत्रकारिता में सच और तथ्यों के बोलबाला का था। एक-एक वाक्य तौलकर छापा जाता था। आज की तरह पत्रकारिता की तरह भेड़ चाल तब नहीं थी और न ही भेड़िया धसान की स्थिति। उस समय न फेसबुक था और न व्हाट्सएप। इसलिए अपना ढोल खुद बजाना पड़ेगा। ऐसा हमारे संपादक का कहना था।

इस वाक्य का असली अर्थ समझाया हमारे एक सीनियर साथी ने। वे समाचार संपादक थे और उन्होंने एक दिन हम सबको कहा, बच्चों (उस समय सीनियर हमें बच्चा ही समझते थे और हम भी बच्चे बने रहते थे) संपादक जी के वाक्य को तुम अखबार के अंदर भी लागू कर सकते हो।

हमने पूछा, कैसे। फिर उन्होंने जो बताया, वह जीवन भर की सीख बन गई। उन्होंने कहा कि अखबार के अंदर भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जो पूरी इमानदारी, मेहनत और लगन से अपना काम करते रहते हैं और फिर अपने काम को भूल जाते हैं। ऐसे लोग अपने काम का श्रेय लेने में संकोच करते हैं। लेकिन अखबार के दफ्तर में कुछ चालाक और चालू साथी भी होते हैं। वे साथियों के अच्छे कामों का श्रेय खुद ले सकते हैं। कुछ मामलों में देखा गया है कि लेते भी हैं। इसलिए सिर झुकाकर चुपचाप काम करते नहीं रहना चाहिए। कभी-कभी विनम्रतापूर्वक अपने काम का श्रेय भी लेना चाहिए। यानी अपने काम का ढोल खुद बजाना चाहिए। संपादक के संज्ञान में चीजों को लाना चाहिए। वरना आप काम में तल्लीन रहोगे और फल कोई और खा लेगा।

पुराने समय में यह संकट कम था क्योंकि उस समय संपादक अपने हर साथी का नाम और काम दोनों जानते थे। यह भी जानते थे कि किस व्यक्ति की क्या क्षमता है और क्या कमजोरी है। इस हिसाब से वे खुद हर व्यक्ति का आकलन करते थे और उसी हिसाब से रिवार्ड भी देते थे। लेकिन आज के समय में यह संकट बहुत बड़ा है। आज अखबारों में उस तरह से आकलन कम ही होता है जैसे पहले होता था। आज के समय में कौन व्यक्ति क्या करता है, यह तो संपादकों को पता होता है लेकिन कैसा करता है, कितना करता है, इसकी जानकारी उन्हें अपने ‘आदमियों’ के माध्यम से मिलती है।

अब उनके आदमी आपके बारे में क्या फीडबैक दे रहे हैं, यह आपको पता नहीं चल सकता है। इधर आप सिर झुकाकर चुपचाप काम करते रहते हैं और उधर कोई दूसरा आपकी छवि का निर्माण कर रहा होता है। हो सकता है आपके काम के दम पर अखबार की बढ़िया छवि बन रही हो और इस अच्छे काम को लेकर कोई दूसरा अपनी छवि बना रहा हो। इसलिए आज अपना ढोल बजाना एक जरूरी क्रिया है।

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन