देवरिया जेल में बंद पूर्व आईपीएस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता अमिताभ ठाकुर की तबीयत अचानक बिगड़ गई। मंगलवार देर रात उन्हें सीने में तेज दर्द की शिकायत हुई, जिसके बाद हार्ट अटैक की आशंका जताई गई। जेल प्रशासन ने स्थिति को गंभीर देखते हुए रात करीब 2 बजे उन्हें गोरखपुर मेडिकल कॉलेज रेफर किया, जहां उनका इलाज जारी है।
इस बीच अमिताभ ठाकुर की तबीयत बिगड़ने को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सोमवार को कोर्ट में पेशी के दौरान उनसे मिलने वालों के मुताबिक, अमिताभ ठाकुर ने खुद बताया था कि 19 दिसंबर 2025 को वाराणसी में पेशी के बाद उनके साथ कथित रूप से अमानवीय व्यवहार किया गया। उन्होंने आरोप लगाया था कि डीसीपी गौरव बंसवाल ने उन्हें जबरन गाड़ी में उठाकर इस तरह फेंका, “जैसे कचरे को कचरे के डिब्बे में फेंक दिया जाता है।”
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या उसी कथित शारीरिक दुर्व्यवहार और चोट का असर उनकी सेहत पर पड़ा है, जिसकी वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा? समर्थकों और परिजनों का कहना है कि अमिताभ ठाकुर पहले से किसी गंभीर हृदय रोग से पीड़ित नहीं थे, ऐसे में जेल में उनकी तबीयत अचानक बिगड़ना संदेह पैदा करता है।
मामले ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी हलचल मचा दी है। मानवाधिकार संगठनों और नागरिक समूहों ने इस घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि हिरासत में किसी भी व्यक्ति के साथ इस तरह का व्यवहार कानून और संविधान दोनों के खिलाफ है।
फिलहाल प्रशासन की ओर से आधिकारिक बयान का इंतजार है। लेकिन पूर्व आईपीएस अधिकारी की बिगड़ती सेहत और हिरासत में कथित बदसलूकी के आरोपों ने एक बार फिर पुलिसिया रवैये और जेलों में बंद कैदियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
देवरिया जिला कारागार में बंद पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर की मंगलवार देर रात अचानक तबीयत बिगड़ गई। उन्हें सीने में तेज दर्द और बेचैनी की शिकायत हुई, जिसके बाद जेल प्रशासन ने उन्हें तत्काल देवरिया मेडिकल कॉलेज पहुंचाया। प्राथमिक जांच के बाद डॉक्टरों ने उनकी गंभीर हालत को देखते हुए रात 2 बजे गोरखपुर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया। सूत्रों के अनुसार, गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में जांच के दौरान चिकित्सकों ने अमिताभ ठाकुर को हार्ट अटैक की आशंका जताई है। – राजेश साहू, पत्रकार
ऊधर, पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर की रिहाई के लिए देवरिया की जनता द्वारा किया गया पूजा पाठ का कार्यक्रम। लोगों का कहना है कि यहां जो शिव मंदिर का निर्माण हुआ था, उसमें अहम भूमिका अमिताभ ठाकुर जी की रही है.. जो अपने कार्यकाल में यहां पर एसपी रहे। उसी का परिणाम है जो यहां की जनता में उनकी लोकप्रियता दिखाई देती है। और यह पूजन पाठ का कार्यक्रम कराया गया।
विनय मौर्या-
व्हिसलब्लोअर पूर्व आईपीएस पर रार, क्या अमिताभ को मार ही डालोगे सरकार..!
साधु-संत कोई लिबास नहीं होता, वह एक विचारधारा होता है, जो भी व्यक्ति लोभ-मोह, राग-द्वेष से परे हो। जो गृहस्थ होकर सामान्य वेश में लोभ-मोह रागद्वेष से मुक्त संतुलित समान दृष्टि वाली विचारधारा पर कायम है, वही संत है। और जो इसे नहीं छोड़ पाया, वह महंत होकर भी संत होने पर संशय पैदा करता है।
बहरहाल बात बाबा की हो रही है, उस सियासी बाबा की, जिनके लिए मेरे हृदय में आज भी सम्मान है। मगर अपने सियासी राग-द्वेष के चलते उन्होंने सिर्फ मुझ जैसे निपट अज्ञानी ही नहीं, बल्कि कई बौद्धिक और विद्वतजनों के मन में भी यह गहरा संदेह पैदा कर दिया है कि बाबा ऐसा कैसे कर सकते हैं।
पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर को सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के मामले में साजिशन, हां कत्तई साजिशन, एक बेहद पुराने प्रकरण में जेल में ठूंस दिया गया है। उनके साथ सरकारी व्यवहार ऐसा है मानो वह कोई हार्डकोर अपराधी हों, जबकि कोई सामान्य व्यक्ति होता तो 1999 के उस मामले को अब तक न्यायालय भी खारिज कर जमानत दे चुका होता, आखिर इतने पुराने मामले में अचानक गिरफ्तारी और जेल, यह समझना किसी अदालत के लिए भी कठिन नहीं।
मगर जिसके खिलाफ सरकार खड़ी हो, उसे कौन बचा सकता है। खबरों के मुताबिक अमिताभ ठाकुर की तबियत खराब है, उन्हें हार्ट संबंधी दिक्कत है, मगर सरकार उन्हें सरकारी कालकोठरी से बाहर नहीं आने देना चाहती, क्योंकि वह व्हिसलब्लोअर हैं। वह बाहर आएंगे तो फिर सरकार को निशाना बनाएंगे, उसकी कमियां गिनाएंगे, लिहाजा अभी उनके हिस्से में प्रताड़ना ही लिखी है।
बाबाई सरकार अमिताभ ठाकुर को सलाखों के पीछे रखकर यह संदेश देना चाहती है कि देख लो, जो भी सरकार की कमियां गिनाएगा, उसका यही हश्र होगा। यकीनन अमिताभ ठाकुर सरकारी साजिश और तानाशाही के शिकार का एक जीवंत नमूना हैं। अब सोचिए, क्या एक बाबा को क्या ऐसी सोच रखना कदाचित उचित लगता है।
दूसरा मामला एक पुलिस इंस्पेक्टर का है, जिसने कभी थानेदारी के दौरान बाबा जी की किसी पैरवी को अनसुना कर अस्वीकार कर दिया था। आज एक दशक बीत जाने के बाद भी उसे प्राइम पोस्टिंग से वंचित रखा गया है। वह इंस्पेक्टर अगर जरा भी असावधान हुआ, तनिक भी लेकिन-किंतु-परंतु में कहीं नामित हो गया, तो उसकी बर्खास्तगी भी संभव हो सकती है। फिलहाल उस इंस्पेक्टर की हालत आंधी आए बैठ गंवाए जैसी है। गौरतलब है कि अमिताभ ठाकुर और वह इंस्पेक्टर दोनों ही भूमिहार हैं।
हाल के हालातों में बाबा ब्राह्मणों को भी नाराज करते आ रहे हैं। “ऊपर से केंद्रीय नेतृत्व के नंबर दो सरदार” बाबा को बेबस करने में कोई मौका नहीं छोड़ रहे।
उस नंबर दो सरदार ने ओबीसी लॉबी के विधायकों और मंत्रियों को अपने कोटे से अपने पाले में बैठा रखा है, जबकि किसी भी सरकार और दल के सियासी वजूद के लिए ओबीसी न सिर्फ जरूरत हैं बल्कि मजबूरी भी। और तो और, सियासी तौर पर बाबा को बर्बाद करने के लिए उनके आसपास घेरा बनाए बैठे ब्यूरोक्रेट्स भी हैं, जो गलत फीडबैक देकर उन्हें गड्ढे को झील और तलवार को कील दिखाते रहते हैं।
ऊपर से बाबा खुद को एक ही जाति में समेटकर अपने ऊपर ठप्पा भी लगवा रहे हैं। खैर, मैं अदना सा पत्रकार, अदनी सी बुद्धि लेकर क्या ही कहूं। बहरहाल बाबा जो कर रहे हैं, वह एक सियासी व्यक्ति के तौर पर देखा जाए तो तानाशाही है और एक संत के रूप में परखा जाए तो निस्संदेह संतत्व के विरुद्ध आचरण है। बाकी जो है सो हइये है।
बाबा निश्चित निष्कपट हैं,मगर निष्पक्षता कायम रखने में उतने ही निष्प्रभावी हैं।
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