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उत्तर प्रदेश

अमिताभ ठाकुर प्रकरण : साल 1999 के केस को अब धो-पोंछ कर निकालने का प्रयोजन क्या है?

अभिषेक उपाध्याय-

पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर क्या अंडर सर्विलांस थे? उन्होंने तो पुलिस को नहीं बताया था कि मैं फलानी ट्रेन से दिल्ली के रास्ते में हूं। फिर पुलिस को किसने बताया?

पुलिस को गिरफ्तार करना था तो घर आ सकती थी। वे शुभम जायसवाल की तरह दुबई तो नहीं बैठे थे। न ही कुछ ‘विशेष’ बाहुबलियों की तरह दिखाई देते हुए भी अदृश्य थे।

आखिर रात के 2 बजे शाहजहांपुर में ट्रेन से उतारकर गिरफ्तारी का क्या प्रयोजन था…? जो व्यक्ति न वांछित है, न भगौड़ा।

जो सरकार के सेंटर में बैठकर सरकार की अनैतिकता को चुनौती दे रहा है, क्या उसकी लोकेशन ट्रैक की जा रही थी?

क्या जो भी योगी आदित्यनाथ के खिलाफ बोल रहा है, फिर वो चाहे उनके दौर के आकंठ भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहा हो, या फिर प्रचंड जातिवाद के खिलाफ, क्या वो भी अंडर सर्विलांस है?

ये जलते हुए सवाल हैं। आप चाहे एफआईआर का डर दिखाएं, गिरफ्तारी या फिर कुछ और, जो आपके बस में है, कर लें!!

इन सवालों को एक रोज़ आपके रास्ते की ऐसी दीवार बनना है, जिसके आगे राजनीति का रास्ता ही खत्म हो जाता है।!!


अमिताभ ठाकुर की गिरफ़्तारी के सिलसिले में लखनऊ पुलिस ने जो प्रेस नोट जारी किया है, वो खुद ही सवालों में है।

इस प्रेस नोट में ये तो बताया गया कि ये साल 1999 का है। मगर आश्चर्यजनक तौर पर इस बात का ज़िक्र नहीं किया गया कि इसकी शिकायत कब की गई?

पुलिस को इस प्रेस नोट में ये भी लिखना चाहिए कि साल 1999 के मामले की शिकायत सितंबर 2025 में जाकर की गई, और तत्काल एफआईआर दर्ज हो गई!

पुलिस को ये भी लिखना चाहिए कि शिकायत करने वाला व्यक्ति कौन है? उसका इस मामले से क्या ताल्लुक़ है?

पुलिस को ये भी लिखना चाहिए कि सिविल प्रकृति के इस मामले में इतनी गंभीर धाराएँ कैसे जोड़ दी गईं? पुलिस को ये भी लिखना चाहिए कि अमिताभ ठाकुर जाँच में सहयोग कैसे नहीं कर रहे थे?

IO ने उन्हें कब बुलाया और वे कब पेश नहीं हुए? इस प्रेस नोट की शिनाख्त सिर्फ़ इतनी है कि इसमें एक उँगली अमिताभ ठाकुर की ओर उठती है और शेष चार उंगलियां ख़ुद पुलिस की ओर!!

पुलिस का प्रेस नोट यहां पढ़ें…

पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर की गिरफ्तारी पर लखनऊ पुलिस का बयान पढ़ें!

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