आनंद मिश्रा दैनिक जागरण, फरुर्खाबाद के ब्यूरो चीफ पद पर पदोन्नत किए गए

हरदोई दैनिक जागरण के सीनियर रिपोर्टर आनंद मिश्रा अब दैनिक जागरण फर्रुखाबाद के ब्यूरो चीफ के पद पर पदोन्नत हो गए हैं. दैनिक जागरण के पत्रकार पंकज मिश्रा ने भी इस बारे में कुछ लिखा है….

Pankaj Mishra : “हरदोई जागरण टीम” के अर्जुन मेरे छोटे भाई आनंद मिश्रा जी को संस्थान ने उनकी काबिलियत और लगन का इनाम देते हुए फर्रुखाबाद जागरण ब्यूरो चीफ की जिम्मेदारी सौंपी है। हरदोई में जागरण को निरंतर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाने में उनका अभूतपूर्व योगदान रहा। हमे और पूरी हरदोई जागरण टीम को उनकी कमी खलेगी लेकिन ख़ुशी इस बात की है कि वह पदोन्नति पर जा रहे हैं लेकिन दूर नहीं हम लोंगो के पास ही हैं। आनंद जी जैसी गंभीरता समझदारी और खबरों पर पकड़ कम ही लोगों में मिलती है। भगवान जी उन्हें सफलता के शिखर तक पहुंचाए। आनंद जी ने कभी छोटे भाई कभी अच्छे दोस्त तो कभी पद प्रदर्शक बनकर हर कदम हर मोड़ पर मेरा साथ दिया। मेरे पास उनकी प्रसंशा के लिए शब्द नहीं हैं। मुझे अपने भाई पर गर्व है। शनिवार को आनंद जी फर्रुखाबाद ब्यूरोचीफ की जिम्मेदारी संभालेंगे। एक बार फिर भाई को हजारों शुभकामनाएं और आशीर्वाद। भगवान जी की हमेशा कृपा बनी रहे।

खुद आनंद मिश्रा ने अपनी नई जिम्मेदारी के बारे में फेसबुक पर कुछ यूं लिखा है…

Anand Mishra : आप सबकी शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से आभार। इतना प्यार, आशीर्वाद और सहयोग मेरे आगे के सफ़र में मेरी ऊर्जा बनेगा। संस्थान ने नई जिम्मेदारी सौंपी है और संस्थान के शीर्ष अधिकारियों के आदेशों का पालन करते हुए अपना सर्वश्रेष्ठ देने की हर संभव कोशिश करूँगा। फर्रुखाबाद के सहयोगियों ने जो गर्मजोशी दिखाई, उसका भी मैं शुक्रगुजार हूँ। आदरणीय सत्यमोहन पांडेय जी ने पितृवत् स्नेह दिया तो तफहीम भाई ने भी बड़े भाई की तरह दुलार दिया। बृजेश जी, राजेश जी, आशू जी, सलीम भाई, पारस जी, आदर्श जी, उत्तम जी, अंशू जी और हां चंचल भाई ने भी हर संभव सहयोग के लिए आश्वस्त किया। फेसबुक से लेकर watsup तक पर हरदोई से जो शुभकामनाओं का दौर चला, उसका आभार जताने के लिए शब्द नहीं हैं। वैसे आभार जता कर प्यार कम भी नहीं करना चाहता। बाकी एक लाइन में- निकल पड़े हैं पांव हमारे, जाने कौन नगर ठहरेंगे।

आनंद के व्यक्तित्व के बारे में ‘आज’ अखबार में कार्यरत अभिनव ने फेसबुक पर एक संस्मरणात्मक और भावनात्मक प्रसंग लिख डाला है, जो इस प्रकार है…

Abhi Nov : ‘जाओ यार मौज करो’ ये लफ्ज़ कुछ अरसे पहले जब मेरे कानों में पड़े थे तब भी भावविभोर हो उठा था मैं और आज भी जब कानो में पड़ा कि ‘जा रहा हूँ यार’ तो भावों और अहसासों में भीग सा गया था मन…. नवंबर में मेरे घनिष्ठ सत्यम बाबू का बहुप्रतीक्षित विवाह था और डर था मुझे कि कहीं उसी तारीख को मेरी चुनाव में ड्यूटी न लग जाए. डर सही साबित हुआ और ऐसी ड्यूटी लगी कि पूरा कार्यक्रम ज़द में आ गया. मन उदास था. सारी तमन्नाएँ धूमिल हो उठीं थी.. ऐसे में एक शख्स ने उन धूमिल हो उठीं उम्मीदों और तमन्नाओं को फिर से धवल रंग में रंग दिया, मेरे मन को कुछ ऐसा पढ़ा उस शख्स ने कि सारी दुविधाएं पल भर में समाप्त हो गयीं. ड्यूटी से फारिग हो चुका था मैं. मैंने फोन किया उस शख्स को और कुछ कह भी न पाया था कि चहकती हुई आवाज़ आई ‘जाओ यार, जाओ मौज करो’.. मन को जो प्रफुल्लता मिली थी उस समय, बयाँ नहीं कर सकता… मन उसी पल समर्पित हो चुका था, उस शख्स के सम्मान में..

मैं जिस पेशे में हूँ पत्रकारिता वहाँ बहुत कम लोग होते हैं जो बिना अपने किसी हित के किसी की सहायता करते हों. हित जिसमें लाइमलाइट में आने की भी चाहत हो, शामिल है. उस शख्स ने किया ऐसा वो भी तब जब वो देश के सबसे बड़े अखबार का अर्जुन कहा जाता हो. जिसकी कलम की धार और तथ्यों को आंकने की समझ और पकड़ के सब मुरीद हों. जिसकी लिखी खबरें राजनैतिक और प्रशासनिक पटलों में हलचल मचा देतीं हों. सामाजिक मुद्दों को जो अंजाम तक पहुंचाने का माद्दा रखता हो. ऐसे शख्स में इतनी विनम्रता और सजगता, वो भी मुझ जैसे कनिष्ठ के प्रति….

दो दिन हुए हैं जब उनका सन्देश आया कि ‘जा रहा हूँ यार’ तो एक बारगी सन्न रहा गया… फिर जब पता चला कि तरक्की हुई है, क़ाबिलियत को एक सही पर आगाज़ी मुकाम मिला है, मन को कुछ बहला गया ये सब …

वो शख्स हैं आनंद मिश्रा. मेरे आनंद दादा. आनंद दादा अब तक फर्रुखाबाद में दैनिक जागरण के जिला संवाददाता (आम भाषा में ब्यूरो चीफ) के रूप में पद भार ग्रहण कर चुके होंगे. ये फर्रुखाबाद का सौभाग्य है कि उन्हें आंनद दादा जैसा कलमकार मिला है जिनकी कलम का लोहा बड़े बड़े धुरंधर मान चुके हैं… एक बात और लिखना चाहूँगा. मैंने अरसे पहले आनंद दादा से कहा था कि आप पर कुछ लिखूंगा एक दिन. जब ये पदोन्नति का समाचार मिला तो मेरे अंदर भी अपनी लिखने की इच्छा बलवती हो उठी और मैंने दादा से कहा कि क्या ज़ाहिर कर दूँ इसे? तो उन्होंने रोक दिया मुझे. कहा कि उनके वरिष्ठ का हक़ है इन पलों को सबसे पहले ज़ाहिर करने का इस जमाने के सामने, सो जब भी वो लिख दें, ज़ाहिर कर दें, उसके बाद ही लिखना और ज़िक्र करना तुम…. एक बार फिर मन सम्मान के भावों से विभोर हो उठा. समकक्ष हो जाने के बावजूद इतनी विनम्रता, इतनी भावुकता…..

मैंने अपनी लगभग हर उलझन, हर संवेदनशील लेख या खबर पर आपसे सलाह ली है और आपने भी पेशे से, संबंधों से परे जाकर मुझे राह दिखाई. दादा आगे भी, हमेशा ये राह दिखाते रहिएगा, आशीर्वाद बनाये रखियेगा, धूम मचाते रहियेगा…. कुछ ‘अपने’ ही कहेंगे इसे पढ़कर कि, ये गाथा उकेरी है मैंने निरे ‘तेल पानी’ के जज़्बातों से.. परवाह नहीं मुझे पर, मैं समझता हूँ ‘वो’ समझते हैं कि ये माला पिरोई है मैंने मेरे प्रेम और अहसासों के अनकहे अलफ़ाज़ों से…

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