
पसंदीदा अधिकारियों को ईनाम और उनसे क्लीन चिट पाने-दिलाने का तरीका है यह। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज केएम खानविलकर यानी लोकपाल साब के फैसलों में पीएमएलए कानून भी है जिसका भरपूर दुरुपयोग और राजनीतिक इस्तेमाल खुलेआम हो रहा है।
संजय कुमार सिंह
आज द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, अपराध और सजा की कथा। इसमें एक कहानी भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण सिंह को अदालत से राहत मिलने की खबर है और दूसरी विद्वान व नागरिक अधिकारों के लिए अभियान चलाने वाले उमर खालिद का जेल में बने रहना है। आप जानते हैं कि कई अपराधों के आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई और यह भी कि उमर खालिद के खिलाफ यूएपीए का मामला है। कुल मिलाकर, ब्रज भूषण सिंह की खबर कल छपी थी और द टेलीग्राफ ने आज याद दिलाया है कि खिलाड़ी महिलाओं (बच्चियों कहना चाहिये) से यौन अपराध के आरोपी के खिलाफ इस व्यवस्था ने कुछ नहीं किया। दूसरी ओर, एक विद्वान, युवा व नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले को यूएपीए के तहत जेल में रखा गया है। दिलचस्प यह है कि आज हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर खबर है, माधवी पुरी बुच को क्लीन चिट। उसपर आने से पहले बता दूं कि ब्रजभूषण सिंह की वाशिंग मशीन की धुलाई पर जैसे आज द टेलीग्राफ ने खबर की है वैसी खबर दूसरे अखबार भी कर सकते थे। उनका काम है ऐसी खबरें बताना और ऐसे विरोधाभासों को रेखांकित करना। पर मेरे आठ अखबारों में किसी ने पहले पन्ने पर तो ऐसा नहीं ही किया है।
इस लिहाज से माधवी पुरी बुच की खबर के साथ भी अखबारों को बताना चाहिये था कि उन्हें क्लीन चिट मिलने से संबंधित तथ्य क्या हैं। खबरों के अनुसार, लोकपाल ने उनके खिलाफ तमाम शिकायतों को खारिज कर दिया है। सबको पता है कि माधवी पुरी बुच इस सरकार के खास लोगों में हैं और उन्हें सरकारी संरक्षण मिलता रहा है जिसे सबने देखा है। उनपर तमाम आरोपों में एक आरोप यह था कि उन्होंने अदाणी के मामले में कार्रवाई नहीं की क्योंकि वे अदाणी के लाभार्थियों में हैं। अदाणी का लाभार्थी होना – साबित करने की जरूरत हो सकती है लेकिन सेबी प्रमुख रहते हुए उन्होंने अदाणी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की यह तो साबित है। अगर माधवी पुरी बुच ने लाभार्थी हुए बिना अदाणी के खिलाफ जांच नहीं की तो उनका दोष कम नहीं हो जाता है। उनकी आय के मामले तो अपनी जगह हैं ही। कहा जा सकता है कि अदाणी की कोई गलती ही नहीं है तो सेबी प्रमुख के रूप में माधवी पुरी बुच क्या दोष निकालतीं? सबको पता है और मेरे पास भी कोई खास या अलग जानकारी नहीं है। लेकिन दुनिया जानती है कि अदाणी पर सवाल करने के लिए राहुल गांधी की संसद की सदस्यता चली गई थी और तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा को भी तरह-तरह से परेशान किया गया था। अगर यह मान भी लिया जाये कि अदाणी ने कुछ गलत नहीं किया है तो क्या सरकार और सरकारी एजेंसियों के लिए इन दोनों लोगों को संतुष्ट करना इतना मुश्किल था कि इनके खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी? यह भी सामान्य माना जा सकता था अगर गालीबाज सांसद के खिलाफ संसद में गालीबाजी के लिए कार्रवाई गई गई होती। पर जो हुआ उससे साफ है कि अदाणी पर सवाल उठाने वालों को परेशान किया गया। अदाणी के खिलाफ जांच नहीं हुई और अब जांच नहीं करने के आरोप को गलत बता दिया गया है। मोटे तौर पर मामला यह है कि अदाणी के यहां 20,000 करोड़ रुपये का निवेश है जो किसका है पता नहीं है।
जो नहीं जानते हैं उन्हें बता दूं कि 20,000 करोड़ रुपये के ब्याज भर से कितने ट्रोल काम पर लगाये जा सकते हैं। मोटा गणित है कि एक करोड़ रुपये का ब्याज सरकारी (और सबसे सुरक्षित) बैंक में बुरी से बुरी हालत में 50 हजार रुपये महीने से कम नहीं होगा। दिल्ली जैसे शहर में रहने के लिए भी इतना पैसा कम नहीं है। इस तरह एक करोड़ रुपये के इस ब्याज से एक ट्रोल या गालीबाज को वेतन दिया जाये तो अदाणी के इस पैसे से 20,000 ट्रोल रखे जा सकते हैं। और ये दो रुपये वाले ट्रोल के मुकाबले ज्यादा काम करेंगे पार्टी को अच्छा और समाज को बुरा नतीजा देंगे। लोकपाल जैसे अधिकारियों का काम ऐसे ही भ्रष्टाचार और भ्रष्ट व्यवस्था को देखना है पर वे खुद ईनाम के रूप में पद पायेंगे तो काम कैसे करेंगे। देश में इन दिनों यही हो रहा है। इसीलिए कांग्रेस को भ्रष्ट कहा तो गया, सजा किसी को नहीं हुई। दूसरी ओऱ ना खाउंगा ना खाने दूंगा के बावजूद पद नहीं छोड़ने की मजबूरी अब दुनिया जानती है। कायदे से अपने खिलाफ फ्रष्टाचार की जांच कराई जा सकती है और माधवी पुरी बुच के खिलाफ जांच और क्लिन चिट इस दिशा में पहला प्रयोग हो सकता है। मीडिया और समाज ने इसका ढंग से स्वागत किया तो संभव है भविष्य में प्रधानमंत्री की डिग्री भले न दिखे, क्लीन चिट जरूर आ जाये।
नरेन्द्र मोदी की सरकार ने काले धन का विदेशी रास्ते से भारतीय कंपनियों में निवेश किया जाना रोकने के लिए ना सिर्फ वायदे किये थे लाखों शेल कंपनियां बंद भी कराई हैं। विदेशी दान और चंदा लेना मुश्किल किया है और इन सबका देश की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है लेकिन अदाणी के 20,000 करोड़ का पता नहीं चला। संभव है यह मुश्किल हो लेकिन छोटी-मोटी राशि जब्त करके बाद में छोड़ने वाली सरकार और सरकारी एजेंसियों ने अदाणी की इस राशि को जब्त क्यों नहीं किया? कुल मिलाकर स्थिति यह है कि छोटी-मोटी राशि नहीं,कुल 20,000 करोड़ रुपये किसके हैं, कैसे हैं,संदिग्ध हैं। यह आतंकवाद को संरक्षण देने के लिए भी हो सकता है। स्पष्ट जवाब नहीं है और कोई कार्रवाई नहीं हुई है तथा इसके लिए जो जिम्मेदार है उसके खिलाफ गलत करने के सबूत नहीं हैं। मतलब यही हुआ कि मुद्दा, मुद्दा ही नहीं है। अदाणी के यहां लगे 20,000 करोड़ किसके हैं जानने की जरूरत सरकार को नहीं है और इसलिए जनता को इस बारे में बताया नहीं जायेगा। इसका दूसरा मतलब यह है कि माधवी पुरी बुच सरकार के लिए काम कर रही थीं और अब सरकार ने उन्हें बचा लिया है। माधवी पुरी बुच सरकारी संरक्षण पाने वाली कोई पहली हस्ती नहीं हैं। सरकार जिसे चाहती है उसे बचाती रही है और उसके संरक्षण व सुरक्षा कवच दोनों मिलता रहा है। अब ये सब बातें पुरानी हो चुकी हैं।
आइये, अब देखें माधवी पुरी बुच को कैसे बचाया गया। पहला तो संसदीय समिति के समक्ष उनका उपस्थित नहीं होना और तब उनका बचाव है। अब जिन लोकपाल ने उन्हें क्लीन चिट दिया है वो हैं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर। उनकी नियुक्ति 27 फरवरी 2024 को हुई थी। इससे पहले करीब दो साल यह पद खाली था। न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष 27 मई 2022 को रिटायर हुए थे तबसे लोकपाल कार्यलय अपने नियमित प्रमुख के बिना काम कर रहा था। द वायर की खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में सेवानिवृत्त होने के लगभग 19 महीने बाद जस्टिस एएम खानविलकर को भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यानी पद खाली रहा और उम्मीदवार भी – असल में यह दिखावा है और रिटायरमेंट के तुरंत बाद नियुक्ति हो तो सरकारी ईनाम कहने से कितने लोगों को रोका जा सकेगा। कांग्रेस के जमाने में यह अवधि बहुत ज्यादा होती थी तो भी भाजपा को एतराज होता था अब भाजपा अलग चाल चरित्र और चेहरा दिखाते हुए इस अवधि को कम करती जा रही है। पर वह अलग मुद्दा है। माधवी पुरी बुच के मामले में लोकपाल का फैसला सरकारी फैसला लगता है और और लोकपाल की नियुक्ति सरकारी तो है ही, ईनाम भी हो तो सरकारी इच्छा से अलग कैसे होगी। पंच परमेश्वर के देश में इसकी मांग नहीं होनी थी, इसका पालन होना था। पर स्कूलों के सिलेबस से कहानियां हटाई और बदली गई हैं। यह भी अलग मुद्दा है।

जस्टिस खानविलकर का सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश के रूप में छह साल का कार्यकाल था। अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में उन्होंने कई महत्वपूर्ण फैसले लिखे, जिन्होंने विशेष कानूनों में नागरिकों के खिलाफ राज्य की व्यापक शक्तियों को मान्य किया – मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम, गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम और विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन अधिनियम। वे जुलाई 2022 में सेवानिवृत्त हुए। लोकपाल के रूप में जस्टिस खानविलकर की नियुक्ति सेवानिवृत्ति के बाद देश की सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीशों के पास जाने वाले शीर्ष पदों की विवादास्पद परंपरा को जारी रखती है। सीजेआई पद से सेवानिवृत्त होने के बमुश्किल चार महीने बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया था। जुलाई 2021 में सेवानिवृत्त हुए जस्टिस अशोक भूषण को उस वर्ष के अंत में राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण का प्रमुख बनाया गया था – उन्होंने इस वर्ष की शुरुआत में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भाग लिया था। साल 2021 में मोदी सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के रूप में सुप्रीम कोर्ट के विवादास्पद पूर्व न्यायाधीश अरुण कुमार मिश्रा का नाम प्रस्तावित किया। 2023 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सेवानिवृत्त होने के चार महीने बाद सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया था। जस्टिस खानविलकर ने नरेंद्र मोदी सरकार के फैसलों पर व्यापक प्रभाव डालने वाले प्रमुख फैसले लिखे हैं।
दि वायर हिन्दी डॉट कॉम के सौजन्य से आज हम उन फैसलों को भी याद कर लें। अगर आप पूरी रिपोर्ट पढ़ना चाहते हैं तो शीर्षक, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एएम खानविलकर को लोकपाल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया गूगल करके पूरा पढ़ लें। यह खबर तब भी अखबारों में छपनी चाहये थी। आज भी छपनी चाहिये थी। छपती होती तो देश की कहानी कुछ और होती सभी संवैधानिक संस्थाओं पर सरकार के कब्जे की बात नहीं होती। हालांकि, यह सब भी अलग मुद्दा है। पीएमएलए कानून सरकार को न्यायमूर्ति खानविलकर की देने है। भिन्न कारणों से और असल में सरकार की व्यवस्था से पीएमएल कानून की समीक्षा अभी तक नहीं हो पाई है। हाल की एक एक खबर के अनुसार पीएमएलए के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (7 मई, 2025) को लगभग तीन साल पुराने शीर्ष अदालत के एक फैसले की समीक्षा की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं को यह आजादी दी है वे इस मामले में विरोध करने वाले केंद्र सरकार के शिखर के अधिवक्ताओं की सलाह से मुद्दे प्रस्तावित करें। इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 (पीएमएलए) में संशोधन की पुष्टि की थी, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को गिरफ्तारी, समन और छापेमारी की व्यापक शक्तियां दी हैं। जिनका भरपूर दुरुपयोग हो रहा है और राजनीतिक इस्तेमाल में तो कोई शंका ही नहीं है। खानविलकर और उनकी पीठ के प्रमुख फैसले इस प्रकार हैं।
1. समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया
2. आधार अधिनियम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा
3. केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति
4. सांसद एहसान जाफरी की पत्नी की याचिका खारिज कर दी थी
5. तीस्ता सीतलवाड और आरबी श्रीकुमार को गिरफ्तार कर लिया था
6. विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम, 2020 को बरकरार रखा
7. गिरफ्तारी की शक्ति से संबंधित धारा 19 ‘मनमानेपन’ से ग्रस्त नहीं है
कानूनी जानकार गौतम भाटिया के मुताबिक, जस्टिस खानविलकर की विरासत की कोई भी चर्चा राष्ट्रीय जांच एजेंसी बनाम जहूर अहमद शाह वटाली केस में 2019 के फैसले के बिना नहीं हो सकती है। वटाली मामले में जस्टिस खानविलकर ने सभी अदालतों को सबूतों की ‘जांच’ करने से रोक दिया, जिससे उन्होंने प्रभावी रूप से यूएपीए मामलों में जमानत (उमर खालिद यूएपीए में जेल में हैं) असंभव बना दिया। इस खबर में सरकारी ईनाम पाने वाले और भी जजों के फैसले का उल्लेख है। सरकार ने न्यायमूर्ति खानविलकर के साथ लोकपाल में तीन न्यायिक सदस्यों सहित छह सदस्यों की भी नियुक्ति की थी। इस खबर में इन लोगों के काम का भी विवरण है।
वाशिंग मशीन और क्लीन चिट के इस जमाने में आज की खबरें पर्याप्त दिलचस्प हैं। नवोदय टाइम्स ने बताया है कि कर्नल सोफिया पर टिप्पणी करने वाले मध्य प्रदेश के भाजपाई मंत्री विजय शाह की गिरफ्तारी पर रोक बढ़ा दी गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चल रही कार्यवाही बंद कर दी गई क्योंकि अब मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह दलील हाईकोर्ट में पेश की थी। कुल मिलाकर, सरकारी वेतन पाने वाले सॉलिसिटर जनरल गालीबाज मंत्री का बचाव कर रहे हैं। आरोप लगभग वैसा ही है जिसके लिए कन्हैया जेल हो आया, पुलिस सुरक्षा में जनता से पिट चुका और कई साल बाद भी जांच पूरी नहीं हुई है। इधर मंत्री की गिरफ्तारी पर रोक जारी है, जांच जाहिर है, नहीं हो पाई होगी। पर वह मुद्दा कहां है? अमर उजाला में विजय शाह की खबर सिंगल कॉलम में शीर्षक समेत 10 लाइनों में है। यह तो हुई मंत्री की आजादी और अदालती राहत की बात। अमर उजाला ने तीन कॉलम में अशोका विश्वविद्यालय की खबर छापी है। इसमें बताया गया है कि प्रोफेसर अपने खिलाफ एफआईआर पर टिप्पणी नहीं कर सकते हैं और यह भी कि बोलने के उनके अधिकार पर रोक नहीं है। परस्पर विरोधी स्थिति कैसे सही हो सकती है पर है और संभव है कानूनन इसकी गुंजाइश हो। पर यह खबर कैसे और क्यों है? अंग्रेजी की पोस्ट पर हिन्दी में एफआईआर हुई है, दुनिया भर में चर्चा हो चुकी है कि पोस्ट में जो नहीं कहा गया उसके लिए एफआईआर और गिरफ्तारी हुई है। इसपर जमानत मिलना सामान्य ही है पर रोक तो अजीब है ही। संभव है कानून के पालन के लिए जरूरी हो और मंत्री के मामले में माफी मांगने के बाद भी जांच की जरूरत हो पर यह सब खबर सरकार का प्रचार नहीं है?
एक (भूतपूर्व, भावी) संपादक और पत्रकार के रूप में ऐसी खबरों का मकसद व्यवस्था को ठीक दिखाना होता है। ठीक है कि खबर जैसे है वैसे ही दी जायेगी लेकिन कहां कितनी बड़ी होगी ये तो संपादक ही तय करेगा और हेडलाइन मैनेजमेंट का जितना दबाव हो आप उसमें शामिल और उसके भागीदार नहीं हैं तो ऐसी खबरों को अंदर रख सकते हैं। पर ऐसी खबरें प्रमुखता पा रही हैं जो प्रचार हैं, प्रमुखता देने लायक नहीं हैं। इसका कारण यही है कि मीडिया में बहुत पहले प्रचार जीवी भर्ती कर दिये गये थे। अब अगर अखबारों का तेवर इतना लिजलिजा है तो उसका कारण यही है। जनसत्ता में संपादक बदले सब कुछ बदल गया। एमजे अकबर के बाद टेलीग्राफ में कभी चर्चा नहीं हुई कि कौन संपादक और जो भी रहा टेलीग्राफ वैसा ही है। मैं स्थापना काल से पढ़ रहा हूं इसलिए कह सकता हूं। दूसरी ओर जनसत्ता अब मुफ्त में भी मिले (इंटरनेट पर मुफ्त में ही है) तो भी देखने का मन नहीं करता है। यह पत्रकारिता का विकास है। भक्तिकाल और अमृतकाल की पत्रकारिता है। इसकी खबर है, पीठ ने मामले की जांच के लिए गठित एसआईटी को अगली सुनवाई पर जांच रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है पर अगली सुनवाई कब है ये खबर में नहीं है। खबर है कि रोक जारी रहेगी, अंतरिम जमानत की शर्त में संशोधन से इनकार कर दिया आदि आदि। ऐसी स्थिति में आज के ज्यादातर अखबारों की लीड खरीफ की फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ना है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह खबर नहीं, सरकारी प्रचार है। आज खबर की बात करूं तो दि एशियन एज की एक खबर का शीर्षक है, “जम्मू और कश्मीर को राज्य का दर्ज बहाल करने पर केंद्र से वार्ता अभी भी जारी : उमर”। आप जानते हैं कि जम्मू और कश्मीर देश का अकेला ऐसा राज्य है जो दो हिस्सों में बांट कर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। ऐसा पहले बांटे गये किसी भी राज्य के साथ नहीं किया गया है और न नये बने झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्यों के साथ। फिर भी अनुच्छेद 370 हटाने के समय 5 अगस्त 2019 को ऐसा किया गया था और वहां के लोगों की मांग रही है कि उसे फिर से राज्य का दर्जा दिया जाये। केंद्र सरकार ने आश्वासन भी दिया है। वरना कह सकती थी कि नहीं ऐसा नहीं किया जायेगा और तब मांग का मतलब ही नहीं रहता। पर आश्वासन के बावजूद मांग पूरी नहीं की जा रही है और मांग हो रही है। वह भी तब जब राज्य आतंकवाद की समस्या से ग्रस्त है। केंद्र सरकार उससे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई कर रही है और उस कार्रवाई यानी ऑपरेशन सिन्दूर का प्रचार पूरे देश में कर रही है। इस लिहाज से न सिर्फ राज्य का दर्जा देने की मांग महत्वपूर्ण है यह मांग गुलमर्ग में हुई जहां उन्होंने प्रशासनिक सचिवों की बैठक की अध्यक्षता की। इससे पहले राज्य मंत्रिमंडल की बैठक पहलगाम में हो चुकी है और आतंकवाद से असली राजनीतिक लड़ाई यह है पर इसे वो प्रचार नहीं मिला जो ऑपरेशन सिन्दूर को दिया और लिया गया।


