बीजेपी ने अरुण शौरी और जसवंत सिंह जैसे लोगों का इस्तेमाल अपनी अनपढ़ छवि को मिटाने के लिए किया और उसमें एक हद तक कामयाब भी रही…
राकेश कायस्थ-
अरुण शौरी शास्त्रीय दक्षिणपंथ के सबसे सम्मानित व्यक्तित्वों में एक हैं। राम-मंदिर आंदोलन के दौर में जब मेनस्ट्रीम, खासकर अंग्रेजी मीडिया बीजेपी को लगभग अछूत की तरह देखता था, आडवाणी-वाजपेयी के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में शौरी सामने आये थे।
इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रहे शौरी ने हिंदू दक्षिणपंथ के उभार को मुस्लिम सांप्रादायिकता की प्रतिक्रिया बताकर आडवाणी की रथयात्रा जैसे इवेंट को वैधता प्रदान की थी। बीजेपी ने अरुण शौरी और जसवंत सिंह जैसे लोगों का इस्तेमाल अपनी अनपढ़ छवि को मिटाने के लिए किया और उसमें एक हद तक कामयाब भी रही।
साढ़े तीन या चार दशक बाद अरुण शौरी सांप्रादायिक राजनीति के विष वृक्ष को बढ़ता देखकर इस कदर आतंकित हैं कि उन्हें लगता है कि सावरकर का हिंदुत्व उस हिंदू जीवन-दर्शन को निगल जाएगा जो भारत की आत्मा है।
मुझे लगता है कि सावरकर पर लिखी गई शोधपरक किताब अरुण शौरी के उस अतीत का प्रायाश्चित है, जिसकी मदद से भारत में इस जहरीली राजनीति ने अपनी जड़ें जमाईं। संदर्भों से भरी यह किताब सिल-सिलेवार तरीके से बताती है कि सावरकर किस कदर फर्जी और जहरीले व्यक्ति थे। संक्षेप में कुछ बातें जो इस किताब के माध्यम से शौरी बताते हैं—
- सावरकर विशुद्ध रूप से अंग्रेजों के मददगार थे। वे भारत में हिटलर जैसी फासिस्ट व्यवस्था के पैरोकार थे। उन्होंने हिटलर की प्रशंसा में कई लेख लिखे और मुंबई में रहने वाले एक जर्मन एजेंट के जरिये हिटलर तक यह बात पहुंचाने की कोशिश की ताकि कृपा प्राप्त हो सके।
- सावरकर ने गांधीजी के साथ दोस्ती और लंदन में साथ रहने की झूठी कहानियां गढ़ीं और प्रचारित करवाईं। सावरकर और गांधीजी कभी भी इंग्लैंड में एक साथ नहीं रहे। सावरकर ने भारत में रहते हुए हमेशा गांधीजी के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया।
- अपने साथियों की मदद से सावरकर ने इस बात का दुष्प्रचार भी करवाया कि उन्होंने गांधीजी के कहने पर अंग्रेजों से माफी मांगी थी जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था।
- खिड़की के समुद्र में छलांग लगाकर मीलों तैरने की जिस कहानी के ज़रिये सावरकर को आज़ादी के महानायक के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जाती है, वह भी अतिरंजना से भरी हुई है। जब सावरकर को एक मालवाहक जहाज में ब्रिटेन से भारत लाया जा रहा था, तब उन्होंने बाथरूम जाने के बहाने खिड़की से छलांग लगाकर भागने की कोशिश की थी, मगर जहाज रुका हुआ था और जमीन से उसकी दूरी महज आठ-दस फुट थी।
- आरएसएस यह अच्छी तरह जानता था कि एक व्यक्ति के तौर पर सावरकर विश्वसनीय नहीं है, इसलिए हमेशा उनसे दूरी बनाकर रखी। गुरु गोलवलकर ने सावरकर को कभी अपने करीब आने नहीं दिया।
- बीजेपी के पास नायक नहीं है, इसलिए वो कभी सुभाषचंद्र बोस को हड़पने की कोशिश करती है तो कभी सावरकर को बड़ा बनाना चाहती है। सावरकर को नये नायक के रूप में उभारने की कोशिश इसलिए की जा रही है ताकि गांधी की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके।
- सावरकर के हिंदुत्व का मूल आधार घृणा था। वो ये मानते थे कि बिना घृणा के एकता नहीं हो सकती है। सावरकर के हिंदुत्व और हिंदूवाद अथवा हिंदुइज्म में जमीन-आसमान का अंतर है। हिंदुत्व पूरी तरह विभाजनकारी और विनाशकारी है। यह भारत को भगवा अफगानिस्तान बना देगा।
किताब का लिंक और इसे लेकर दिया गया इंटरव्यू दोनों कमेंट बॉक्स में हैं। अरुण शौरी की यह किताब हर किसी को ज़रूर पढ़नी चाहिए। तथ्यों के चोट से तिलमिलाई बीजेपी अब इसे काउंटर करने के लिए दिहाड़ी पर खट रहे `स्वयंभू दलित चिंतकों’ को मैदान में उतारेगी और दावा किया जाएगा कि शौरी बुरे आदमी हैं और उन्होंने अंबेडकर पर भी एक आलोचनात्मक किताब लिखी थी।
अरुण शौरी की किताब और नीचे बीबीसी को दिया उनका इंटरव्यू देखें…



