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एनडीटीवी में असद किदवई मेरे सबसे करीबी थे- सलाहकार, दोस्त और हंसी का ठिकाना भी

संजय किशोर-

उम्र 3 जमा 55 की, दिल बचपन का — असदुर्रहमान किदवई भी हुए रिटायर। एनडीटीवी में वो मेरे सबसे क़रीबी लोगों में से थे — सलाहकार भी, दोस्त भी, और हँसी के ठिकाने भी।

जब मन उलझता था, दिमाग़ ठिठकता था या दिल भर आता था — मैं सीधा असद भाई के डेस्क तक चला जाता था। वहाँ हमेशा मिलता था एक PJ तैयार, एक मशविरा मुफ़्त, और एक मुस्कान, जो कहती थी — “चलो यार, हो जाएगा।”

करीब तीन दशकों बाद, एनडीटीवी न्यूज़रूम की लॉबी और दफ़्तर का गलियारा आज थोड़ा ख़ाली-सा लग रहा होगा।

असद जी को जानने वाला हर शख़्स उनकी एक ख़ासियत ज़रूर बताएगा — उनकी ख़ुशमिज़ाजी। वो ग़ज़ब के हँसमुख हैं, और उनके PJs (Poor Jokes!) की चर्चा न्यूज़रूम के गलियारों में बरसों तक होती रहेगी।

बात 1998 की है। देश का पहला निजी न्यूज़ चैनल, ज़ी न्यूज़, तब दक्षिणी दिल्ली के साउथ एक्स के एक छोटे-से मकान से संचालित होता था।

मेरी पहली नौकरी सरकारी थी — इनलैंड वॉटरवेज़ अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया में। वहीं से इस्तीफ़ा देकर भारतीय जनसंचार संस्थान पहुँचा, और फिर मीडिया में पहला क़दम रखा।

ज़ी न्यूज़ में पहले दिन न्यूज़रूम में मैंने बैठने की जगह पूछी, तो लोग हँस पड़े — सरकारी नौकरी की आदतें थीं, जहाँ हर कुर्सी तय होती है।

स्वर्गीय उमेश उपाध्याय, शैलेश, राकेश खार, आलोक वर्मा और किशोर मालवीय जैसे दिग्गज ज़ी न्यूज़ के स्तंभ थे। कुछ ही दिनों बाद न्यूज़रूम में हलचल थी — किसी शख़्स की विदाई पार्टी हो रही थी। पता चला कि वो एनडीटीवी जा रहे हैं।

नाम था — असदुर्रहमान किदवई।

पाँच साल बाद, उनके पीछे-पीछे जब मैं भी अपने सपनों की नौकरी करने दक्षिणी दिल्ली के अर्चना कॉम्प्लेक्स पहुँचा, तो असद साहब को क़रीब से जानने और समझने का मौक़ा मिला।

एनडीटीवी में वो पहले न्यूज़ में थे, फिर स्पोर्ट्स डेस्क में आए। उसके बाद कभी न्यूज़, कभी स्पोर्ट्स, कभी प्रॉपर्टी के प्रोग्राम्स, और साथ ही ‘गुस्ताख़ी माफ़’ और उसके अंग्रेज़ी वर्ज़न ‘Double Take’ के लिए स्क्रिप्ट लिखते रहे।

सरल, सीधे, मगर ज़बरदस्त विनोदबुद्धि के धनी असद की रचनात्मक चमक को असली मंच मिला एनडीटीवी की मशहूर स्कूफ सीरीज़ ‘गुस्ताख़ी माफ़’ में। ज़्यादातर स्क्रिप्ट्स असद की कलम और उनके खुराफ़ाती दिमाग़ की देन थीं।

एनडीटीवी ने नए प्रयोगों की जो परंपरा शुरू की, उसमें असद जैसे लोगों की अहम भूमिका रही।

यह वो दौर था जब कैमरे के पीछे की रचनात्मकता, कैमरे के आगे की चमक से कहीं ज़्यादा गहरी और ज़िंदा होती थी — और असद साहब उसका जीता-जागता सबूत थे। बाद में कई चैनलों ने ‘गुस्ताख़ी माफ़’ की नकल की, लेकिन असली और ओरिजिनल चीज़ की बात ही कुछ और होती है।

असद जी कई साल तक स्पोर्ट्स डेस्क से भी जुड़े रहे, एंकरिंग भी की, लेकिन उनका पहला प्यार हमेशा लेखन ही रहा।

हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू — तीनों पर समान पकड़ रखने वाले असद, बाराबंकी के बड़ागांव से नवाबी तहज़ीब लेकर आए थे। उस तहज़ीब की झलक उनके लहज़े, बातचीत और बर्ताव में हमेशा दिखती रही।

एक खूबसूरत दौर का पड़ाव आया है — लेकिन साथ ही ये तसल्ली भी है कि हम जैसे बहुतों को उनके साथ काम करने और उनसे सीखने का मौक़ा मिला। रिटायरमेंट मुबारक हो, असद जी।

आपकी कहानी अब भी अनगिनत स्क्रिप्ट्स में ज़िंदा है — और PJs की गूंज अब भी न्यूज़रूम की दीवारों से टकरा रही हैं। तस्वीर से अनुमान लगाया जा सकता है कि विदाई के दिन भी एक लतीफ़ा सुना ही गए।

मूल खबर…

एनडीटीवी से आज 27 साल बाद असद उर रहमान किदवई जी भी रिटायर हो गए!

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