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जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष पद से असग़र वजाहत का इस्तीफा

अजय तिवारी –

सोचता ही था कि अब फेसबुक पर ज़्यादा कुछ कहूँगा। लेकिन हमारे वरिष्ठ लेखक और प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी असग़र वजाहत ने यह सूचना देकर उद्विग्न कर दिया कि उन्होंने जनवादी लेखक संघ (जलेस) की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया है। वे जलेस के अध्यक्ष थे और 1982 में जलेस की स्थापना के समय से ही जो महत्वपूर्ण लेखक जुड़े थे, उनमें असग़र भी हैं।

असग़र भाई ने इस बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि अगर जलेस नेतृत्व पूछेगा तो स्वयं सार्वजनिक रूप में कारण बताएँगे। आधी अधूरी बात जाने से गलतफहमी होगी। लेकिन मुझे जहाँ तक मालूम है, जलेस नेतृत्व उनसे कुछ नहीं पूछेगा। मैं खुद जलेस का संस्थापक सदस्य हूँ। लेकिन अब अपने को जलेस में नहीं मानता।

जलेस के संविधान के अनुसार किसी सदस्य को न निकाला जा सकता है, न इस्तीफा दिया जा सकता है। अधिक से अधिक सदस्यता का नवीनीकरण न कराएँ तो जलेस से अलग हो सकते हैं। इसलिए असग़र से संवाद करने की कोशिश होगी, यह गलतफहमी है।

असग़र के अलावा जलेस के कुछ सदस्यों और कुछ नेताओं से बातचीत में जो तस्वीर निकली वह पीड़ादायक है। उस बातचीत को यहाँ लिखना मेरे लिए अनुचित है। लेकिन इतना कहना ज़रूरी है कि जलेस नेतृत्व के तौर तरीकों पर गौर करें तो साफ होगा कि वे कम्युनिस्ट पार्टी से भी ज़्यादा रेजीमेंटेशन से काम करते हैं। साररूप में कहें तो गाँधी और गोडसे को लेकर असग़र के जिस नाटक पर फ़िल्म बनी थी, वह केंद्र में है।

जलेस के उन नेताओं की, जिन्होंने न स्थापना में भूमिका अदा की है और न लेखकों को जलेस के साथ जोड़ने में कोई उल्लेखनीय काम किया है, उन्हें शिकायत है कि गाँधी पर असग़र का नाटक पार्टीलाइन के खिलाफ है! लेखक संघ की क्या पार्टीलाइन होती है, यह मुझे नहीं पता, जबकि लम्बे समय तक जलेस नेतृत्व में रहा हूँ। उसी प्रतिबद्धता के कारण अब तक वामपंथी पार्टियों और जलेस-प्रलेस मि हिमायत करता चल रहा हूँ। जब खुद जलेस के नेता चुप्पी साधे रहते हैं, तब भी अपने स्वभाव के चलते मैं मोर्चा लेता हूँ।

लेकिन असग़र वजाहत के इस्तीफे के बाद रही-सही अनुकूलता ख़त्म हो गयी। इन नेतृत्व के अहंकार में डूबे लोगों को याद दिलाने की ज़रूरत है कि 1945-46 के दौर में जब पार्टी ऑफिस मुंबई में था और अली सरदार जाफरी एवं रामविलास शर्मा के सम्पादन में ‘इंडियन लिटरेचर’ निकलता था, तब उसमें सरदार ने तेलुगू के महाकवि श्री श्री की कविता छापी। उसकी शिकायत हो गयी कि पार्टीलाइन के खिलाफ है।

सरदार से जवाब मांगा गया। रामविलास जी ने सलाह दी कि साफ़ कह देना कि श्री श्री बहुत बड़े जनकवि हैं, उनकी कविता छपने से पार्टी पेपर की प्रतिष्ठा बढ़ी है। कोई लेखक पार्टीलाइन पढ़कर कविता नहीं लिखता। अगर पार्टी के नेता समझ लें तो ठीक है, वरना इस्तीफा दे देना, माफ़ी मत माँगना।

अली सरदार जाफरी ने ऐसा ही किया।

असग़र के मामले में लगता है कि इतिहास ने अपने को दोहराया है। उपेक्षा सहने, लांछित होने और अलग-थलग किये जाने से अच्छा है कि इस्तीफा दे दिया जाता। असग़र का क़द वर्तमान जलेस के पद से बहुत बड़ा है। जो जलेस दूसरे वामपंथी लेखक संगठनों के साथ मिलकर एक बड़ा सम्मेलन करता है और उसका उद्घाटन कुलीनतावाद के पुरोधा से करवाता है, जहाँ वह पुरोधा प्रगतिशीलता पर अपनी आदत के अनुसार हमले करता है फिर भी उन नेताओं में से कोई कुछ नहीं बोलता जिन्होंने असग़र की बाहर करने में भूमिका निभाई है, उस जलेस के नेता किसी लेखक जा महत्व क्या समझेंगे और किसी लेखक का सम्मान क्या करेंगे?

दुःख की बात है कि जिस संगठन ने ऐतिहासिक उम्मीदें जगयीं और महत्वपूर्ण काम किये, वही आज आत्मविघटन का शिकार हो रहा है और इसका ज़िम्मेदार खुद उस संगठन का है।

अभी जलेस का मर्सिया नहीं गया जा रहा है और न उसका तर्पण किया जा रहा है हालाँकि उसका नेतृत्व भरसक इसी कोशिश में है।

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