
नितिन ठाकुर-
मैंने बलूच नेताओं के साथ दो पॉडकास्ट किए थे। ऑन एयर वो जो बोले सो बोले लेकिन उनमें से एक ने ऑफ एयर बहुत कुछ बताया। मैं ये जानकर हैरान था कि उन्हें पाकिस्तानी सेना का रत्ती भर डर नहीं रह गया है। उन्होंने पाकिस्तानी इस्टैब्लिशमेंट के खिलाफ दशकों जो सहा उनका डर निकल गया। वो खुलकर सेना को गाली देते हैं। सेना पर हो रही हिंसा का समर्थन करते हैं।
शांतिपूर्ण आंदोलन करते कई बलोच बीएलए का हिस्सा हो गए हैं। वो बस मात खाते हैं तादाद में। कुल पाकिस्तानी जनसंख्या का वो चार फीसद से भी कम हैं, यानि करीब अस्सी लाख। ईरान-अफ़ग़ानिस्तान को जोड़ लें तो बलोच दो फीसद बैठते हैं। इनमें ज़्यादातर हिंदी उर्दू बोलते हैं।
ओमान में देखें तो यहां बलोच ताकतवर पदों पर मिलेंगे। फिर भी इनकी तादाद बहुत ज़्यादा नहीं बनती। इसके बावजूद बलोचों ने पाकिस्तानी आर्मी को पानी पिला रखा है और अभी जब सेना का फोकस पूर्वी सीमा पर है तो बीएलए फिर सक्रिय हो गया है।
बलूचिस्तान वही इलाका है जहां चीन का सबसे ज़्यादा इन्वेस्टमेंट है। ये मसला भारत टाइप नहीं कि मतभेद चाहे जितने हों मगर पहले पाकिस्तान से निपटते हैं फिर मिल बैठकर सुलझाएंगे। ये एकदम अलग है। वो पाकिस्तान से अलग होने को तैयार बैठे हैं। उनकी बातचीत डूरंड लाइन मिटा देने को तैयार तालिबान से है, अलग पख्तूनिस्तान चाहने वाले पठानों से भी है।
हां, पिछले काफी वक्त से ये एक संयुक्त मोर्चा तैयार करने में जुटे थे, कौन जाने कि उसमें किस लेवल तक क्लैरिटी आ चुकी हो। बलूचों के साथ दोनों लंबी बातचीत में ऐसी कई बातें थीं जो उन्होंने संकेतों में कही। आज जब बीएलए जाफर एक्सप्रेस मसले के बाद फिर एक्टिव हुआ है तो याद आया।
ताज़ा जानकारी ये है कि तहरीके तालिबान पाकिस्तान और बीएलए ने 22 पाकिस्तानी सैनिकों की जान ले ली है। गैस पाइपलाइन उड़ा दी हैं। कुछ बलोच बुद्धिजीवी अचानक सक्रिय होकर आह्वान कर रहे हैं कि स्वतंत्र बलूच सरकार बनाई जाए।


