आगरा में ‘अर्श’ हास्पिटल में बंधक बनाए गए गरीब मरीज को हिंदुस्तान अखबार के पत्रकारों ने मुक्त कराया

Vinod Bhardwaj : नाम डाक्टर का , पर काम शैतान का! कल ही मेरे संज्ञान में ‘अर्श’ नामक हॉस्पिटल के संचालक का ऐसा विकृत चेहरा सामने आया है , जिसने डॉक्टरी पेशे के बारे में मेरी राय और अनुभव को ‘फर्श ‘ पर ला पटका है । मैं घटनाक्रम बताता हूँ , कृपया आप सब अपनी राय भी बताएं। चार दिन पूर्व इमिलिया गांव में एक निहायत गरीब विवाहिता आग से जल गई। उसका अनपढ़ पति उसे इलाज के लिए टूंडला लाया। वहां उसे आगरा एसएन इमरजेंसी ले जाने को कहा गया। किसी ने एक एम्बुलेंस बुलाकर उन्हें आगरा के लिए बैठा दिया।

आगरा के डग्गेमार, लुटेरे कटाई केंद्रों का असली खेल इस एम्बुलेंस में बैठते ही शुरू हो गया। उस एम्बुलेंस के ड्राइवर ने उसे सीधा ‘अर्श’ हॉस्पिटल के अंदर ले जाकर भर्ती करा दिया। उसका अनपढ़ भोंदू पति उसी को इमरजेंसी (एसएन) समझ रहा था। उसकी आंखें तब खुलीं , जब हर कदम पर उससे नोटों की मांग शुरू हुई।

अब अनपढ़ पति ने घबराकर गांव में फोन कर अपनी कटाई की कहानी बताकर ग्रामीणों को रुपयों का इंतजाम कर आने की गुहार की तो अगले दिन ग्रामीणों ने आकर डाक्टर अग्रवाल से बात की। उन्होंने 80 हजार जमा कराने को कहा तो ग्रामीणों के पैरों तले से जमीन खिसकी। वे रोते-गाते मंत्री कठेरिया जी के यहां दौड़े। उनके किसी स्टाफ ने सीएमओ को फोन खटकाकर उन्हें वापस भेज दिया। अब तो डॉक्टर साहब ने ग्रामीणों को ही हड़का लिया और कहा कि जाओ चाहे जिससे शिकायत कर लो।

अब ग्रामीण अपने क्षेत्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल के यहां रोने पहुंचे। वहां मंत्री जी नहीं थे, पर उनकी मैडम मधु बघेल ने उनकी बात सुनी। ‘अर्श’ के डॉक्टर से भी बात की। सीएमओ को भी कहा। अब तो ‘अर्श’ के डॉक्टर का पारा और हाई! एलान कर दिया कि बिना पैसे इलाज भी नहीं करूंगा और न डिस्चार्ज!

अगले दिन फिर ग्रामीण मधु बघेल के पास रोने पहुंचे। उन्होंने मंत्री जी को फोन किया पर बात नहीं हो पाई। उन्होंने फिर ‘अर्श’ के डॉक्टर को फोन किया तो डॉक्टर ने उन्हें अपनी पट्टी पढाई और कहा कि डिस्चार्ज किया तो निकलते ही मरीज मर जाएगी। अब ग्रामीण रोये कि हम गरीबों पर इतना पैसा कहां! अब डाक्टर 1.65 लाख का बिल बता रहा है। हम 65000 हजार दे चुके हैं। मधु जी ने अपने पास से 10000 रुपये देकर उन्हें ‘अर्श’ वापस भेज दिया।

‘अर्श’ के डॉक्टर का एलान है कि चाहे जहां जाओ, मेरा कुछ नहीं हो सकता। पीड़ित रात को मेरे पास आये तो मैंने वरिष्ठ पत्रकार साथियों को फोन कर उसकी मदद के लिए कहा। उन लोगों ने डिप्टी डायरेक्टर हेल्थ को बताया। उन्होंने सीएमओ को कहा। पर कल से ही मुख्यमंत्री आगरा में हैं। सब अधिकारी वहां चाकरी में जमे हैं। पीड़ित अभी भी खून के आंसू रोते हुए किसी खुदाई मदद की आस लगाते अपने भाग्य पर रो रहे हैं। अब आप सब ही बताइए कि डॉक्टर और अस्पताल अगर ऐसे होते हैं तो किसी कसाई और कट्टी घर से उनकी तुलना करना सही है या गलत!

इसी शहर के लगभग सभी नामी डाक्टरों को मैं ससम्मान जानता हूँ। उनकी उदारता का भी कायल हूँ, पर ऐसे डाक्टर से राम बचाये. जिस लुटेरे हॉस्पिटल की बात मैं कर रहा, वह आगरा में बाईपास पर सुल्तानगंज पुलिया और भगवान टाकीज चौराहे के बीच सर्विस रोड पर है। ईश्वर का आशीर्वाद और सब का स्नेह भरा सहयोग रहा कि  हिंदुस्तान अखबार के साथी पत्रकारों की मदद से बंधक मरीज शाम को मुक्त हो गया। साथी पत्रकार दीक्षांत तिवारी ने मुझे फोन पर बताया है कि हिंदुस्तान के साथी पत्रकारों ने अर्श में बंधक पड़े मरीज को मुक्त करा दिया है। किसी ने सच ही कहा कि ये चिकित्सक नहीं, मानववधशालाओं के सचालंक है। ये डॉक्टर नहीं, कसाई हैं, और हॉस्पिटल नहीं, कसाई खाना है।

आगरा के वरिष्ठ पत्रकार विनोद भारद्वाज की एफबी वॉल से.

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