रांची से प्रकाशित ‘खबर मंत्र’ अख़बार इसी महीने एक साल का हुआ है. जिलों में कार्यरत अधिकतर पत्रकारों को वेतन मिले भी साल गुजर गया. प्रबंधन वेतन तो दे नहीं रहा, ऊपर से अधिक से अधिक विज्ञापन लाने के लिए रोज-रोज का दबाव अलग से. बोकारो ब्यूरो से खबर है कि अखबार के साथ शुरुआत से बतौर ब्यूरो हेड जुड़े बसंत मधुकर ने भी खबर मंत्र को इस हफ्ते अलविदा कह दिया. वेतन नहीं मिलने से परेशान मनीषा, शैलेश, राजकुमार और रंजीत पहले ही बोकारो ब्यूरो छोड़ चुके हैं. महेंद्र आजकल के मेहमान हैं. जो अन्य बचे हैं उनकी अपनी अपनी मजबूरियां या स्वार्थ हैं.
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Kumar Rishabh
August 6, 2014 at 3:56 am
गीतेष्वर के गीत गाते नहीं थक रहे बसंत मधुकर
………………………………………………………………………………..
बोकारो हिन्दुस्तान को जरूरत के वक्त छोड़ कर खबर मंत्र ज्वाइन करने वाले पत्रकार बसंत मधुकर को इन दिनों काम की तलाष है। हमेषा से लाॅवी में काम करने और अपने जरूरत के अनुरूप वरिय अधिकारियों के बीच गहरी पैठ की दुहाई देने वाले मधुकर फिलहाल हिन्दुस्तान धनबाद संस्करण के स्थानीय संपादक को फेसबुक फ्रैरेंड बताते नहीं थकते और गीतेष्वर के गीत गाते नजर आ रहे हैं। हिन्दुस्तान छोड़ कर जाने के बाद खबर मंत्र के वरिय पदाधिकारियों के साथ अभद्र व्यवहार के कारण उनकी सेवा समाप्त कर दी गई है। सूत्रों के अनुसार बड़बोलापन के कारण हमेषा से चर्चा में रहने वाले बसंत गीतेष्वर और दिनेष को अपने घर की खेती बताते है और हिन्दुस्तान में वापसी की जुगत में रात दिन लगे हुए हैं।
काना फुसी…………….।
Siddarth Gautam
August 6, 2014 at 6:09 pm
[quote name=”Kumar Rishabh”]गीतेष्वर के गीत गाते नहीं थक रहे बसंत मधुकर
………………………………………………………………………………..
श्रीमान कुमार ऋषभ जी,
सबसे पहले तो आपके ज्ञान-चक्षु का धुंधलापन दूर करना चाहूंगा. कि, बसंत मधुकर किसी रेडियो प्रोग्राम में तो कभी गीतेश्वर के गीत गाये नहीं होंगे. और न ही आप की तरह बिना दीदा वाले व्यक्ति के आगे ही गिड़गिड़ाए होंगे. रही बात (आपको जिससे मिर्ची लगा सा प्रतीत होता है) उनके हिंदुस्तान की जरूरत के वक्त बोकारो ब्यूरो छोड़कर खबर मंत्र में जाने की, तो अपने करियर की बेहतरी के लिए हर कोई अपना भला-बुरा सोचता है. शायद आपकी तरह का कोई इम्मोशनल फूल ही ऐसा न करे! ज़ाहिर है, उन्होंने खबर मंत्र छोड़ दिया है तो उन्हें काम की तलाश होगी ही. इसमें आप नया क्या बता रहे हैं? अगर वे हिंदुस्तान में वापसी का प्रयास भी कर रहे होंगे, तो इसमें गलत या अस्वाभाविक क्या है? वैसे आपकी जानकारी का संवर्द्धन कर दूँ, हिंदुस्तान उन्होंने शौक से या किसी लालच में नहीं छोड़ा था. राम प्रवेश के बात-बात पर अड़ंगेबाजी करने की आदत से परेशान होकर मधुकर ने हिंदुस्तान छोड़ा था. लेकिन कहावत है ना- नेपाल जाओ, कपाल साथ जाता है! मधुकर के साथ भी वही हुआ. राम प्रवेश हिंदुस्तान से निकाल दिए गए और साल भर झक मारने के बाद हरि-पशुपति को तेल लगाकर खबर मंत्र से जुड़ गए. राम प्रवेश यहाँ भी अपनी आदत से बाज नहीं आये और चापलूसी-चुगलखोरी की अपनी नायाब काबिलियत से सबको सताने लगे. अगर सैलरी टाइम से मिल रही होती, तो कोई बर्दाश्त भी कर लेता. लेकिन यहाँ तो टका झां…. नहीं, कथा रात भर वाली कहानी है. कोई कब तक सहन कर पता? सो मधुकर ने खबर मंत्र को अलविदा कह दिया. मधुकर से पहले भी चार लोग बोकारो ब्यूरो छोड़कर जा चुके थे. उन चारों को आज तक उनकी बकाया सैलरी नहीं मिली है. रही बात हिंदुस्तान धनबाद के रेजिडेंट एडिटर या तथाकथित दिनेश के फेसबुक फ्रेंड होने की दुहाई देने की, तो पहली बात तो यही है कि उनके फेसबुक फ्रेंड्स लिस्ट में दोनों ही नहीं हैं. दूसरी बात, अगर उनके साथ मधुकर का कोई परिचय हो भी, तो इसमें आश्चर्यजनक या अस्वाभाविक बात क्या है? आपके चश्मे से अगर मधुकर को बड़बोला भी मान लें, तो बिना पूर्वाग्रह के आपको जलन क्यों हो रहा है? ना तो मुझे आपको सफाई देनी है और ना ही मैं बसंत मधुकर का वकील हूँ, लेकिन जिस प्रकार आपने उनपर खबर मंत्र के वरीय पदाधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार करने का आधारहीन आरोप लगाया है, उससे आपका पूर्वाग्रह और मानसिक दिवालियापन ही परिलक्षित होता है. किसी भी व्यक्ति पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से पहले अपने आरोपों पर ग़ौर करना तो बनता है…!
Kunal singh
August 6, 2014 at 6:37 pm
“झटका सिंह” टाइप पत्रकार ही रहेंगे खबर मंत्र में….!
खबर मंत्र में सिर्फ वैसे ही लोग बच गए हैं जो या तो पत्रकारिता के नाम पर नेतागिरी, नेताओं की चमचागिरी, थानों की दलाली, ठेका-दलाली, ट्रांसफर-पोस्टिंग दलाली, अवैध वसूली तथा एलआईसी पालिसी आदि बेचने का काम करते हैं या फिर अपने-अपने शहरों में बहिस्कृत पत्रकारों की श्रेणी में शामिल हैं. कहीं-कहीं अपवाद के रूप में एकाध अच्छे लोग निजी मजबूरी के चलते जरूर अभी तक जुड़े हुए हैं, लेकिन ये जुड़ाव नाम मात्र का है. किसी भी वक्त ये लोग खबर मंत्र के पिछवाड़े लात जमा सकते हैं. प्रबंधन भी इस बात को समझ रहा है, इसीलिए अख़बार के कार्यालय खोलने-बंद करने के लिए “पत्रकार” कहलाने के इच्छुक फ्रेशर लड़कों को अवैतनिक कॉन्ट्रैक्ट पर रखा जा रहा है. वो फोटोग्राफी भी सीख रहे हैं. मुख्यालय में भी ट्रेनिंग के नाम पर फ्रेशर्स से फ्री में डेस्क का काम कराये जाने की सूचना है.
बोकारो की पत्रकारिता में “झटका सिंह” के नाम से कुख्यात राम प्रवेश के खबर मंत्र से जुड़ने के बाद से ही दीपक ने कार्यालय आना छोड़ा हुआ है. राम प्रवेश का मुख्य पेशा अपनी पत्नी के नाम पर एलआईसी पालिसी बेचना है, जिसे पत्रकारिता में रह कर वे बेहतर ढंग से करते हैं. जिसने पालिसी दे दी उसकी पॉजिटिव ख़बर, यानी आगामी विधान सभा में टिकट/जीत पक्की, वरना संशय व्यक्त करने का विशेषाधिकार तो उनके पास है ही!
दरअसल, खबर मंत्र को ऐसे ही पत्रकार चाहिए जो वेतन न मांगें, दलाली करके ही अपना काम चला लें. यही कारण है कि अच्छे लोग एक-एक कर खबर मंत्र छोड़कर जाते रहे. आज स्थिति ये है कि यदि विश्वजीत झा अपना भला-बुरा सोचने में समर्थ हो जाएं, तो बोकारो ब्यूरो में ताला लग जायेगा. खबर मंत्र के स्टेट विज्ञापन प्रमुख पशुपति सिंह के खास सिपहसालार होने का मुगालता पाले रखने वाले बोकारो ब्यूरो के विज्ञापन प्रतिनिधि सुनील कुमार पांडे का भी मोहभंग हुआ है. सुनील अपनी बेटी के एडमिशन के लिए अपनी बकाया सैलरी में से ही बीस हज़ार रुपयों के लिए रिरिया रहे थे, लेकिन उन्हें भी टका सा जवाब मिल गया. अगर उनमें थोड़ा सा भी स्वाभिमान बचा होगा, तो बाहर का ही रास्ता देखेंगे. हाँ, बोकारो के सर्कुलेशन प्रतिनिधि रोशन जमील के दुसरे अख़बार में नौकरी मिलने तक खबर मंत्र से जुड़े रहने की सम्भावना है, लेकिन वे भी दिलो-जान से छुटकारा पाने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं.
खबर मंत्र के आकाओं ने शुरू से ही ख़बरों पर विज्ञापन को तरजीह दी. उन्होंने कभी ये समझने की कोशिश नहीं की, कि अच्छे अख़बार का मतलब तथ्यपरक अच्छी ख़बरों वाला अख़बार होता है. अख़बार अच्छा होने तथा सर्कुलेशन भी ठीक-ठाक होने पर ही विज्ञापन की निरंतरता बनी रहती है. लेकिन लोगों ने ब्यूरो प्रमुखों या संवाददाताओं से ख़बरों पर कभी कोई बात नहीं की. अभी भी नहीं करते. बस सुबह-सुबह एक-एक स्टाफ को सीधे संपादक का फ़ोन– आज कितना भेज रहे हो? गोया पत्रकार से नहीं, वसूली एजेंट से बतिया रहे हों! अख़बार कायदे का हो तो विज्ञापन सहूलियत से मिल जाता है. लेकिन, भले ही इसके संपादक/मालिक-मुख्त्यार खबर मंत्र को झारखण्ड का जनसत्ता और हिंदुस्तान दोनों ही समझ रहे हों, हक़ीक़त में सौ-डेढ़ सौ सर्कुलेशन वाले कचरा अख़बार को रोज-रोज विज्ञापन कौन दे और क्यों दे? अब पत्रकारों ने शुरू-शुरू में तो अपने निजी संबंधों के आधार पर खूब विज्ञापन उठाये भी, लेकिन काठ की हांडी आखिर कब तक चढ़े? उस पर भी, पत्रकार भूखे-पेट कब तक खबर मंत्र नाम का जाप करते? नतीजतन राज्य के सभी जिलों के ब्यूरो एक-एक करके पत्रकारों के छोड़ कर जाने से लगभग खाली हो गए हैं. हालत ये है कि खबर मंत्र के साथ अब कोई भी पत्रकार जुड़ना नहीं चाह रहा.
निचोड़ ये है कि खबर मंत्र ने बहुतों की लुटिया डुबोई है, अब लुटिया डूबने की खुद खबर मंत्र की बारी है.
shahwaz ansari
September 3, 2014 at 11:49 am
वीणा के झंकार से डोल रहा है खबरमंत्र, बिल्डर का ता -ता -थैया
रांची के एक मीडिया हाउस से जो खबर आ रही है , वह हैरान करनेवाली है। सूचना है कि अख़बार खबरमंत्र इनदिनों वीणा के झंकार पर डोल रहा है। सूचना है कि अख़बार खबरमंत्र इनदिनों वीणा के झंकार पर डोल रहा है।आज खबर मन्त्र के सीनियर संपादक से लेकर पत्रकार तक वीणा सिंह के तानाशाही और उदंड व्यवहार से आहात महसूस कर रहे है जहा उनके आत्म-सम्मान और वौद्धिकता के वीणा सिंह अपनी जूती की नोक से तार -तार कर दिया है.मार्केटिंग हेड और सर्कुलेशन हेड को तो चपरासी की तरह ट्रीट करती है. अख़बार के प्रिंटर-पब्लिशर ही जब ता -ता -थैया करने लगे तो बेचारे संपादक, उपसम्पादक और अन्य की मजबूरी समझी जा सकती है।
लेकिन ऐसी परिस्थिति भी आयेगी यह किसी ने सोचा था। यह अख़बार शुरू होने के बाद से ही झटके पर झटके इसे मिल रहें हैं। खबरमंत्र के मालिक बिल्डर डॉ अभय सिंह ने बोकारो की बीना सिंह को फिलहाल इस अख़बार का एक तरह से मालकिन बना दिया है। उस बीणा सिंह को , जो बोकारो में सुर -संगम इवेंट चलाया करती थी। दूर -दूर तक न पत्रकारिता का अनुभव और ना समाचार की परख पर बिल्डर ने कहने के लिये तो उन्हें डायरेक्टर बनाया है पर रूतबा उससे ऊपर का दे रखा है।
वें समाचार और विज्ञापन के साथ -साथ कंपनी का हित भी देखेंगी। इसी में अख़बार से अखिलेश सिंह को बाहर का रास्ता दिखाकर उनके दफ़्तर में मैडमजी को शिफ्ट कर दिया गया। यहीं तक बात रुकती तो ठीक थी पर नहीं पुराने सैंट्रो के बदले नया स्विफ्ट डिजायर भी उन्हें दे दिया गया है । अब रहने का भी प्रबंध मैनेजमेंट कर रहा है। ऐसी किस्मत पत्रकारों की कहां। जिंदगी भर कलम घिसते रहेंगें , पर कलम की पूछ नहीं होगी। आज खबर मन्त्र बीच मझदार में हिचकोले खा रही है क्या मैनेजमेंट ने अभी तक इस की कोई दिशा और दशा तय नहीं कर पाया है.इसी बीच इस की बागडोर एक नौसिखए और अनुभवहीन,आयोग्य और कुंठित महिला वीणा सिंह के हाथ में दे दिया गया है जैसे की बन्दर के हाथ में उस्तुरा.विश्वस्त सूत्रों से पता चला है की जब यह वीणा सिंह बोकारो स्टील सिटी में थी तो वहा से भी इस ने दसो लाख रूपया कई लोगो का लेकर चम्पत हो गयी.इस की संगीत विशारद की डिग्री भी फ़र्ज़ी है.एक कहावत है की “दिल लगी दिवार से तो पारी क्या चीज़ है “.ऐसे दो बच्चो की आम्मा वीणा सिंह अपने मोह जल में डॉ. अभय सिंह मालिक को इस प्रकार फंसा रखा है की डॉ.अभय सिंह का दिमाग काम करना बंद करदिया है.आज वीणा सिंह के उदंड और रूखे व्यवहार से खबर मन्त्र के सभी स्टाफ नाखुश और उदासीन है और अब उन्हों ने भी “लगी से घोड़े को घास खिला रहे है “.क्या बात है की आज वीणा सिंह को डॉ अभय सिंह ने अपना एक फ्लैट दे दिया है और उस के साजो -सजावट पर लाखो रुपये खर्च हो रहे है और इधर पत्रकारों और स्टाफ को दो महीना से वेतन नहीं मिला है ?इतिहास गवाह है की सूरा और सुंदरी के चक्कर में बड़े -बड़े सल्तनत और राजा डूब गए डॉ.अभय सिंह किस खेत की मूली है?
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😆 😡 😳
shahwaz ansari
September 3, 2014 at 11:50 am
वीणा के झंकार से डोल रहा है खबरमंत्र, बिल्डर का ता -ता -थैया
रांची के एक मीडिया हाउस से जो खबर आ रही है , वह हैरान करनेवाली है। सूचना है कि अख़बार खबरमंत्र इनदिनों वीणा के झंकार पर डोल रहा है। सूचना है कि अख़बार खबरमंत्र इनदिनों वीणा के झंकार पर डोल रहा है।आज खबर मन्त्र के सीनियर संपादक से लेकर पत्रकार तक वीणा सिंह के तानाशाही और उदंड व्यवहार से आहात महसूस कर रहे है जहा उनके आत्म-सम्मान और वौद्धिकता के वीणा सिंह अपनी जूती की नोक से तार -तार कर दिया है.मार्केटिंग हेड और सर्कुलेशन हेड को तो चपरासी की तरह ट्रीट करती है. अख़बार के प्रिंटर-पब्लिशर ही जब ता -ता -थैया करने लगे तो बेचारे संपादक, उपसम्पादक और अन्य की मजबूरी समझी जा सकती है।
लेकिन ऐसी परिस्थिति भी आयेगी यह किसी ने सोचा था। यह अख़बार शुरू होने के बाद से ही झटके पर झटके इसे मिल रहें हैं। खबरमंत्र के मालिक बिल्डर डॉ अभय सिंह ने बोकारो की बीना सिंह को फिलहाल इस अख़बार का एक तरह से मालकिन बना दिया है। उस बीणा सिंह को , जो बोकारो में सुर -संगम इवेंट चलाया करती थी। दूर -दूर तक न पत्रकारिता का अनुभव और ना समाचार की परख पर बिल्डर ने कहने के लिये तो उन्हें डायरेक्टर बनाया है पर रूतबा उससे ऊपर का दे रखा है।
वें समाचार और विज्ञापन के साथ -साथ कंपनी का हित भी देखेंगी। इसी में अख़बार से अखिलेश सिंह को बाहर का रास्ता दिखाकर उनके दफ़्तर में मैडमजी को शिफ्ट कर दिया गया। यहीं तक बात रुकती तो ठीक थी पर नहीं पुराने सैंट्रो के बदले नया स्विफ्ट डिजायर भी उन्हें दे दिया गया है । अब रहने का भी प्रबंध मैनेजमेंट कर रहा है। ऐसी किस्मत पत्रकारों की कहां। जिंदगी भर कलम घिसते रहेंगें , पर कलम की पूछ नहीं होगी। आज खबर मन्त्र बीच मझदार में हिचकोले खा रही है क्या मैनेजमेंट ने अभी तक इस की कोई दिशा और दशा तय नहीं कर पाया है.इसी बीच इस की बागडोर एक नौसिखए और अनुभवहीन,आयोग्य और कुंठित महिला वीणा सिंह के हाथ में दे दिया गया है जैसे की बन्दर के हाथ में उस्तुरा.विश्वस्त सूत्रों से पता चला है की जब यह वीणा सिंह बोकारो स्टील सिटी में थी तो वहा से भी इस ने दसो लाख रूपया कई लोगो का लेकर चम्पत हो गयी.इस की संगीत विशारद की डिग्री भी फ़र्ज़ी है.एक कहावत है की “दिल लगी दिवार से तो पारी क्या चीज़ है “.ऐसे दो बच्चो की आम्मा वीणा सिंह अपने मोह जल में डॉ. अभय सिंह मालिक को इस प्रकार फंसा रखा है की डॉ.अभय सिंह का दिमाग काम करना बंद करदिया है.आज वीणा सिंह के उदंड और रूखे व्यवहार से खबर मन्त्र के सभी स्टाफ नाखुश और उदासीन है और अब उन्हों ने भी “लगी से घोड़े को घास खिला रहे है “.क्या बात है की आज वीणा सिंह को डॉ अभय सिंह ने अपना एक फ्लैट दे दिया है और उस के साजो -सजावट पर लाखो रुपये खर्च हो रहे है और इधर पत्रकारों और स्टाफ को दो महीना से वेतन नहीं मिला है ?इतिहास गवाह है की सूरा और सुंदरी के चक्कर में बड़े -बड़े सल्तनत और राजा डूब गए डॉ.अभय सिंह किस खेत की मूली है?
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