हुजूर! उन बयालीस लोगों के कातिल कौन?

 

वर्ष 1987 में मेरठ दंगे के दौरान हुए बहुचर्चित हाशिमपुरा कांड में 42 लोगों की मौत पर दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने सबसे पुराने पेंडिंग केस में फैसला देकर सभी 16 आरोपियों को बरी कर दिया। 3 आरोपियों की मौत फैसले से पहले ही हो गई। फैसला हैरानी व नाखुशी दे रहा है।

 

अदालत के दहलीज के बाहर यह हैरानी जरूरी भी है क्योंकि मानवता को शर्मसार करने वाले कांड में 28 साल बाद आये फैसले में भी कोई दोषी नहीं मिला। सरकारी तंत्र ओर पैरवी के नकारेपन का इससे बड़ा सुबूत भला ओर क्या होगा। सवाल यह कि कत्ल हुए तो कातिल भी तो होंगे, लेकिन अदालती फैसले सुबूतों ओर गवाहों की रोशनी में आते हैं। कानून भावनाओं से नहीं चलता वरना मौत का मंजर देखने वाली आँखों में इंसाफ की तड़प जरूरी दिखती। मांओं ओर बेवाओं का दर्द भी दिखता। रोजी-रोटी का संकट, घर के चिरागों के बुझने से हुआ अंधेरा ओर दुआओं में सिर्फ इंसाफ मांगते बूढे माँ-बाप दिखते। हाँ राजनीति के बाजीगर ऐसे दर्द को वोटों के मुनाफे के लिए वक्त-वक्त पर जरूर समझते रहे। 

22 मई, 1987 को हुए नरसंहार पर मैंने भी कई बार कवरेज की। पीड़ित परिवारों के दर्द को शब्दों में तरासता रहा। इस केस की पैरवी करने वाले मौलाना यामीन जो हर मुलाकात में मुझे दस्तावेजी सुबूतों से रू-ब-रू कराते थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट व फोटोग्राफ तक वह समेटे थे। इंसाफ की आस लिए इस दुनिया से रूखसत हो गए। दर्द से रू-ब-रू हुए लोग मुझसे भी पूछते थे तो मैं उनकी उम्मीदों को चिराग को रोशन करता था। 1987 के दंगों की शुरूआत शब्बेरात पर अनार चलाने के विवाद को लेकर हुई। हिन्दू-मुस्लिम आमने-सामने आ गए और हाहाकार मच गया। मजबूरन शहर कफ्रर्यू के हवाले कर दिया गया। आरोपित है कि पीएसी के जवान ट्रक में भरकर युवाओं को ले गए ओर मुरादनगर नहर पर ले जाकर गोलियों से भून दिया।

उनकी लाशें नहर में फेंक दी गईं। उस्मान, जुल्फिकार समेत करीब दस लोग मुरादनगर से बचकर वापस भाग आये थे। उस्मान, जुल्फिकार व दो अन्य के पैरों में गोलियां लगी थीं। इस दंगे में जैनुद्दीन ने अपने दो जवान बेटों को खोया। दो बेटों की मौत का गम क्या होता है इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। जैनुद्दीन और उनकी पत्नी श्रीमती अमीना के चेहरों की खुशी हमेशा के लिये गुम हो चुकी है। ईद पर भले ही सारा जहां खुशियों में डूब जाये, लेकिन वह अपने दोनों बेटों को याद कर आंसू बहाते हैं। उनकी तरह अन्य का दर्द भी पत्थर को चीर देने वाला है। उन दिनों मेरठ के जिलाध्किारी राधेश्याम कौशिक व एसएसपी मैनेजर पाण्डेय थे जिन्हें बाद में हटा दिया गया था। केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी। देश की बागडोर दिवंगत राजीव गांधी के हाथों में थी।

सबसे बड़ा सवाल यह कि राज्य सरकारों ने क्या किया? सियासत करने वालों ने दंगा पीड़ितों के दर्द को खूब भुनाया। हाशिमपुरा व मलियाना कांड के बाद आजम खां, मुलायम सिंह यादव व शहाबुद्दीन जैसे ऐसे नेता रहे जो विपक्ष में रहकर गला फाड़कर चिल्लाते रहे और पीड़ितों को न्याय दिलाने के ताल ठोकते रहे परन्तु उनके दावे थोथे ही साबित हुए क्योंकि दावों के मुताबिक उन्होंने कुछ नहीं किया। स्थानीय नेता भी वक्ती तौर पर नब्ज छूते रहे ओर वोट पाते रहे। यह काम अब भी जारी रहेगा। सियासत शायद है ही ऐसी। पीड़ित परिवार कहते हैं- ‘नेताओं की स्थिति उन चील-कौओं की तरह है जो अपना शिकार देखकर ही मंडराते हैं और चतुराई से शिकार करके निकल जाते हैं।’ समाज के कथित ठेकेदार भी खामोश रह जाते हैं।

मेरठ दंगे की कवरेज करने वाले बीबीसी के पत्रकार कुर्बान अली आज भी खुलासा कर रहे हैं कि तब से लेकर अब तक राज्य सरकारों ने इसकी पैरवी नहीं की, नतीजन आरोपी बरी हो गए। गाजियाबाद के तत्कालीन एसएसपी विभूति नारायण राय ने दबावों के बावजूद मुकदमें लिखाये थे। कुर्बान अली यह भी आरोप लगाते हैं कि तल्कालीन गृह राज्यमंत्री ओर कांग्रेसी नेता पी0 चिदंबरम के इशारे पर भी यह हुआ। जो भी हो पीड़ित उस इंसाफ से महरूम हैं जो वह चाहते थे ओर बहस होती रहेंगी।

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