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आज के अखबार  : दिल्ली में भाजपा की ‘प्रचंड जीत’ के बाद का प्रचार और चिन्तित करने वाली वास्तविकता

संजय कुमार सिंह

भाजपा को जीत मिली, विकसित राजधानी बनेगी दिल्ली उसमें बस कर्मचारी अभी भी निर्भया की तरह गुप्तांग में सरिया घुसेड़कर लोगों को मार रहे हैं। खबर 10 दिन बाद छपी है। यह विकास जरूर हुआ है। देखना है यमुना मैया की जय के बाद घटना नहीं घटती है या खबर नहीं छपती है।

संजय कुमार सिंह

दिल्ली विधानसभा में भाजपा की ‘प्रचंड जीत’ (नवोदय टाइम्स से उधार) के बाद पीएम मोदी के भाषण से निकले बंड़े संकेतों के आधार पर आशुतोष त्रिपाठी ने जो लिखा है वह, “यमुना मैया की होगी जय, विकसित राजधानी बनेगी साडी दिल्ली” शीर्षक से छपा है। एक उपशीर्षक है, केंद्र सरकार की निगरानी में विजन के साथ होगा दिल्ली का विकास। मुझे लगता है कि नरेन्द्र मोदी, संघ परिवार और भाजपा की जगह किसी और ने नोटबंदी की होती और उसका वही परिणाम होता जो हुआ तो न सिर्फ उस प्रधानमंत्री को बल्कि उसकी पार्टी और पूरे परिवार को वर्षों कोसा जाता। जैसे इमरजेंसी के लिए इंदिरा गांधी को कोसा जाता है। ध्यान रहे इमरजेंसी से समसया आम आदमी को नहीं, राजनीतिकों को थी जिन्हें बाद में पुरस्कृत किया गया। नोटबंदी तो मुद्दा ही नहीं है उसके पीड़ितों को कौन पूछेगा। देश की बहुमत आबादी की श्रद्धा और भक्ति का ही कारण है कि वह सब मुद्दा तो नहीं ही बना है, अभी भी इस सरकार से विजन और उम्मीद है।

वैसे तो यह सब मेरी चिन्ता का विषय नहीं है पर अखबार जिस ढंग से सरकार की सेवा और भक्ति में लगे हुए हैं उसमें इसे रेखांकित करना और यह बताना जरूरी है कि नवोदय टाइम्स जब साड्डी दिल्ली को लेकर पहले पन्ने पर ऐसे सपने बुन रहा है और दूसरी खबर में बताया है कि भाजपा विधायकों को पारदर्शिता की नसीहत दी गई है तो हिन्दुस्तान टाइम्स में एक फरवरी की खबर तीन कॉलम में छपी है, दिल्ली में 22 साल के युवक को बस में सरिये से पीटा गया, मौत। यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में दो कॉलम में है, खाना बिखर जाने से शहर के युवक को पीट कर मार डाला गया। खबर का जो हिस्सा पहले पन्ने पर है उसमें नहीं लिखा है कि खाना मांसाहारी था या शाकाहारी या क्या था। मृतक का नाम मनोज था। मारने वालों का नाम नहीं लिखा है। खबर में यह भी नहीं बताया गया है कि एक फरवरी की खबर आज क्यों छपी है या आज तक क्यों नहीं छपी थी।

आरोपी, बस कर्मचारियों की हिमाकत देखिये कि उसे उत्तर पश्चिम दिल्ली के बवाना फ्लाईओवर पर फेंक दिया गया। निर्भया का मामला भी बस में हुआ था और तब मचे हंगामे को याद कीजिये और नोट कीजिये कि घटनाएं तो अब भी वैसी ही घट रही हैं अंतर सिर्फ यह है कि मीडिया में हंगामा नहीं मचता या खबर दस दिन बाद छपती है। टेलीविजन वालों की बात ही अलग है। इस मामले की समानता निर्भया मामले से है और वह यह कि यहां भी पीड़ित के गुप्तांग में छड़ डाल दिया गया था। आज की इन दो खबरों से स्पष्ट है कि 26 साल बाद दिल्ली में भाजपा को कामयाबी मिलने के बाद प्रधानमंत्री अगर यमुना मैया की जय कर रहे हैं, दिल्ली को विकसित राजधानी बनाने की बात कर रहे हैं तो कानून व्यवस्था की हालत क्या है। या अपराधी कितने मजबूत हैं। इतना ही नहीं, धार्मिक आस्था फैलाने की सरकारी कोशिशों का आलम यह है कि टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार एलजी ने अतिशी से कहा है, आपकी हार का कारण यमुना का अभिशाप है।

गंगा मां ने बुलाया है के बाद बनारस और गंगा की सफाई का जो हाल है उसमें महाकुम्भ भी चल रहा है और इसकी व्यवस्था का आलम यह है कि लोग वहीं मल-मूत्र त्यागने को मजबूर हैं। पर वहां कोई अभिशाप नहीं है। और बात इतनी ही नहीं है। बड़ी संख्या में देश भर के लोगों को आमंत्रित किया गया है और लोग पहुंच भी रहे हैं। सोशल मीडिया पर खबर है कि प्रयागराज पहुंचने वाली सभी सड़कें जाम हैं। इस तथ्य के बावजूद कि हादसा हो चुका है। आग लग चुकी है। और मरने वालों की सही संख्या तक नहीं बताई गई। घायलों-लापता लोगों की सूची सार्वजनिक नहीं है और अभी तक कंट्रोल रूम जैसा कुछ नहीं है। भले यह प्रचार किया गया कि मुख्यमंत्री के घर में कंट्रोल रूम है और वे देर रात तक स्वयं सब निगरानी कर रहे थे। सच्चाई यह है कि लोग मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए भटकते रहे।

ऐसे में  अब लोगों से अपील की जा रही है कि वे जहां हैं वहीं से लौट जायें क्योंकि आगे और जाम है। जो भी हो, इसकी सत्यता की पुष्टि मैं नहीं कर सकता क्योंकि मेरे अखबारों में किसी में पहले पन्ने पर ऐसी कोई खबर नहीं है। कुम्भ माफ कीजियेगा, महाकुम्भ में डुबकी लगाकर धन्य होने की आस्था का आलम यह है कि गर्भवती महिलायें भी पहुंच रही हैं और उन्हें वहां प्रसव भी हो (कराया जा) रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार महाकुम्भ स्थित तीर्थयात्रियों के अस्पताल में अभी तक 11 बच्चों का जन्म हो चुका है। मुझे लगता है कि सरकार (या मीडिया) को इन बच्चों पर जीवन भर नजर रखना चाहिये और प्रमुख घटनाओं की रिपोर्ट व अध्ययन से यह समझने, जानने और बताने का प्रयास किया जाना चाहिये कि जहां, जब स्नान करने भर से पाप धुल जाते हैं वहां उन्हीं दिनों पैदा होने वाले कैसे महात्मा होंगे। उनकी मां और परिवार को तो निश्चित रूप से ऐसे महात्माओं को जन्म देने के लिए पूजा जाने चाहिये। जहां तक भाजपा के नेताओं और उनकी कार्यशैली की बात है आज दि एशियन एज में भास्कर हरि शर्मा की बाईलाइन वाली एक खबर है। दिल्ली के भाजपा प्रमुख वीरेन्द्र सचदेव के हवाले से छपी इस खबर के मुताबिक दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के तहत रिश्वत के मामलों की जांच के लिए भाजपा एसआईटी बनायेगी। दिल्ली चुनाव नतीजों के बाद जब पार्टी के मुख्यमंत्री तय करना है तब प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की यह एक्सक्लूसिव बाईलाइन वाली खबर सिंगल कॉलम में छपी है। आप जानते हैं कि पिछले 10 साल में तमाम दलों के कई नेता भाजपा में शामिल हुए हैं। इनमें कइयों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले थे जो खत्म हो गये, वापस ले लिये गये या ठंडे बस्ते में डाल दिये गये हैं।

भाजपा और संघ परिवार की सरकार ने न सिर्फ भाजपा के नेताओं को भ्रष्टाचार के मामलों में राहत दी है बल्कि तमाम उदाहरणों और आरोपों से स्पष्ट है कि कई आरोपियों को डरा-धमका कर भाजपा में शामिल कराया गया है और उसके बाद उनके मामले भुला दिये गये। लेकिन दिल्ली और आम आदमी पार्टी के मामले में भाजपा अध्यक्ष कह रहे हैं और दि एशियन एज ने पहले पन्ने पर छापा है कि भाजपा में भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस है। सेबी प्रमुख पर आरोपों और उनके बचाव के बावजूद भाजपा के लोग ही ऐसे दावे कर सकते हैं। मेरा मानना है कि नेता दावे करें पर उनके ऐसे दावों को महत्व क्यों देना? खासकर तब जब अदाणी के खिलाफ आवाज उठाने वालों को भिन्न मामलों में परेशान किया गया फिर भी वे चुनाव जीतकर आ गये। और कार्रवाई न अदाणी के खिलाफ हुई (विदेश के कई नये मामलों के बाद भी) और ना उन्हें संरक्षण दे रही सेबी प्रमुख के खिलाफ जबकि हिन्डनबर्ग ने उनपर ठोस आरोप लगाये और वह साबित भी हो गया। आम आदमी पार्टी के निर्वाचित नेताओं को उनका भ्रष्टाचार साबित हुए बगैर जेल में रखा जा चुका है और अब एसआईटी बनाने की बयानबाजी को भी प्रमुखता दी जा रही है। शायद इसलिए कि इससे अरविन्द केजरीवाल की छवि खराब हुई है और उनके वोट कम हो गये हैं। हिन्दू की खबर के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार ने कहा है कि मुख्यमंत्री लाडकी बहिन योजना की अयोग्य महिलाओं से पैसे वापस नहीं लिये जायेंगे।

पीटीआई की खबर के अनुसार, महाराष्ट्र में जून 2024 में महायुति सरकार ने माझी लाडकी बहिण योजना (लाडली बहन योजना) की शुरूआत की थी। ये योजना महायुति गठबंधन की अप्रत्याशित जीत की एक बड़ी वजह भी बनी। हालांकि दिसंबर 2024 में इस योजना के लाभार्थियों की संख्या में कमी दर्ज की गई है। एक महिला और बाल विकास अधिकारी ने बताया है कि इस योजना के लाभार्थियों की संख्या दिसंबर 2024 में 2.46 करोड़ से घटकर पिछले महीने 2.41 करोड़ हो गई है, क्योंकि कई कारणों से पांच लाख महिलाएं अयोग्य पाई गईं। इन महिलाओं के खाते में 450 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए। हालांकि सरकार ये रकम वापस लेने की मंशा नहीं रखती है। साफ तौर पर यह भ्रष्टाचार का मामला लगता है। इसमें अपात्रों को पैसे दिये गये हैं और यह वोट के लिये तो हो ही सकता है संभव है किसी अधिकारी ने रिश्वत लेकर अपात्रों को भी पात्र बना दिया हो। जो भी हो, चूक तो है ही, सरकारी राजस्व का नुकसान भी पर सरकार पैसे वापस लेने की मंशा नहीं रखती है और इसके लिए किसी को सजा देने की योजना भी नहीं है और दिल्ली में प्रदश भाजपा अध्यक्ष दावा कर रहे हैं कि भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस है। पैसे देकर वोट लेना वैसे ही भ्रष्टाचार है लेकिन दिल्ली में प्रवेश वर्मा की ओर से और मुंबई में भी पैसे बांटने की शिकायतें हैं। उनपर क्या कार्रवाई हुई कोई नहीं जानता। इंदिरा गांधी के खिलाफ आरोप इससे कमजोर और कम स्पष्ट थे। फिर भी उन्हें सजा हो गई थी और इमरजेंसी लगाने को गलत करार दिया गया पर अभी की हालत अखबारों में खबरें छप भी नहीं रही है। ढूंढ़नी पड़ती है।

यही नहीं, एक खबर के अनुसार, महाराष्ट्र अगर अपात्रों को दिये गये पैसे वापस लेने की मंशा नहीं रखता है (दूसरे दल वाले ऐसे पैसे दें या देने का वादा करें तो प्रधानमंत्री उसे रेवड़ी कहते हैं) तो खबर यह होनी थी कि अपात्रों को कैसे और क्यों पैसे दिये गये। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। डबल इंजन वाले एक अन्य राज्य में ऐसा पहले भी हो चुका है। हालांकि तब पैसे वापस ले लिये गये थे। पर वह सब तो छोड़िये सरकार ऐसे व्यवहार कर रही है जैसे पैसे मुख्यमंत्री या पार्टी कोष के हों। और उदारता दिखाते हुए अपात्रों को छोड़ देंगे। यह स्थिति तब है जब एक इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, महाराष्ट्र में सरकार की कमजोर वित्तीय स्थिति का खुलासा हो चुका है और उसके पास लोकलुभावन योजना के लिये पैसे नहीं हैं और इसमें देरी हो चुकी है। इन और ऐसी खबरों के बीच आज इंडियन एक्सप्रेस में दिल्ली विधानसभा चुनाव पर लोकनीतिसीएसडीएस का सर्वेक्षण छपा है। इसमें केजरीवाल की हार के कारण बताये गये हैं : मतदाता की नाराजगी के पीछे प्रदूषण और पीने के पानी की कमी है। खबर में बताया गया है कि आधे से ज्यादा मतदाताओं ने चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही अपना मन बना लिया था। दूसरी ओर, भाजपा ने ऊंची जाति और ओबीसी वालों का मजबूत गठजोड़ बनाया था। इसमें केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की हार के तीन कारण बताये गये हैं।

पहला, केजरीवाल ने 2020 में यह वादा किया था कि वे यमुना को साफ करेंगे अन्यथा अगली बार वोटर उन्हें खारिज कर सकते हैं। दूसरा कारण यह बताया गया है कि आप और उसके नेताओं की साख बेहद खराब हो गई थी। और इसका पता इस बात से चलता है कि पार्टी के प्रमुख नेता अपने चुनाव क्षेत्रों में हार गये। तीसरा कारण यह बताया गया है कि आप ने जो सामाजिक गठजोड़ बनाया था उसे भाजपा के बनाये सामाजिक गठजोड़ से भारी धक्का लगा। आप की हार के लिए बताये गये इन कारणों के बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है पर सच यह भी है कि यह सब कैसे हुआ, भाजपा ने इसके लिए क्या किया वह सब इस खबर में नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि मतदाता सूची में छेड़छाड़ से नतीजे भले नहीं बदले हों (हालांकि, आंकड़े अलग गवाही दे रहे हैं) यह अपने आप में बेहद अनैतिक है और उससे भी गंभीर है, चुनाव आयोग की शर्मनाक चुप्पी या जवाब में कही जाने वाली घटिया शायरी। जो भी हो, आप क्यों हारी यह सबको पता है, हर कोई बता रहा है, भाजपा ने जीतने के लिए क्या सब किया वह मुद्दा नहीं है। आम आदमी पार्टी की हार का सीधा सा कारण एंटी इनकमबेंसी हो सकता है और भाजपा के जीतने का कारण यह है कि कांग्रेस मजबूत नहीं है और इसमें कोई शक नहीं है कि यह भाजपा के दुष्प्रचार के कारण भी है। पर प्रचारकों के लिए यह मुद्दा ही नहीं है।

पत्रकारिता और प्रचार के इस घालमेल में आज कई अखबारों में मणिपुर के मुख्यमत्री के इस्तीफे की खबर लीड है। टेलीग्राफ ने अपने शीर्षक में कहा है कि, जलते मणिपुर में 648 दिनों की कठोर हठधर्मिता के बाद आखिरकार बीरेन ने इस्तीफा दिया (या लिया गया)इंडियन एक्सप्रेस ने अपने उपशीर्षक में बताया है कि अब इस्तीफा क्यों लिया गया है। इसके अनुसार, पार्टी के अंदर असंतोष, विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव, सुप्रीम कोर्ट में जांच की अपील और रेटिंग में कमी आदि कारण हैं। इसलिए दिल्ली में अमित शाह और जेपी नड्डा से मिलने के बाद एन बिरेन सिंह ने इस्तीफा दिया है। आमतौर पर अखबारों में शीर्षक इस्तीफे की खबर ही है। दि एशियन एज के शीर्षक में जरूर विधायकों की बगावत की धमकी का जिक्र है। 31 नक्सलियों के मारे जाने की खबर भी रूटीन खबर की तरह छपी है टेलीग्राफ का शीर्षक और इसकी खबर से पता चलता है कि ये हत्याएं (मुठभेड़) बागियों के अभेद्य समझे जाने वाले गढ़ में हुई है और इसे अभी तक का सबसे सफल माओवादी विरोध कहा जा सकता है। इसमें दो जवान भी शहीद हुए हैं और जिस ढंग से नक्सलियों की हत्या हो रही है उसपर किसी को कोई चिन्ता नहीं है।

दूसरी ओर, सरकार की इस आजादी, सख्ती और पहले ही ऐसी कई कामयाबियों के बावजूद गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि नक्सल वाद खत्म करने में अभी एक साल से ज्यादा लगेंगे और यह 31 मार्च 2026 तक हो पायेगा (नवोदय टाइम्स)। मुझे याद आता है कि पाकिस्तान के ‘सभी’ (300 से ज्यादा) आतंकवादी मार देने की घोषणा और कश्मीर में आतंकवाद खत्म कर दिये जाने के चुनावी वायदों के बावजूद कश्मीर में वारदातें होती रही हैं। जहां तक नक्सलियों का सवाल है, इस साल 81 मारे जा चुके हैं और पिछले साल 219 मारे गये थे। इतनी मौतों के बाद भी अभी नक्सलवाद खत्म होने में एक साल से ज्यादा लगना स्वीकार किया जा रहा है जबकि इतनी मौतों के बाद किसी अच्छे भले गांव से जीवन खत्म हो सकता था। भारत सरकार को ऐसे लोगों की जान लेने का अधिकार कब कैसे मिल गया – यह भी चिन्ता का विषय है लेकिन चर्चा इसी पर होगी कि केजरीवाल कैसे बर्बाद हो गये और अब उनमें कुछ नहीं बचा है।   

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