शीतल पी सिंह-
हमारे मीडिया का गठन किस तरह एकरंगा और हास्यास्पद है कि इससे सिर्फ़ वितृष्णा ही पैदा हो सकती है। इसकी सूचनाओं और विश्लेषण पर देश की बहुसंख्यक आबादी को कैसे भरोसा हो सकता है?
बिहार में 2022 में हुए जाति आधारित सर्वेक्षण के अनुसार वहाँ की आबादी में ब्राह्मण समुदाय की हिस्सेदारी 3.66% है।
अब बिहार के चुनावों पर एक राष्ट्रीय टीवी चैनल के एक कार्यक्रम में कथित पत्रकारों/ विश्लेषकों का जातिगत वर्गीकरण देखिये। पैनल गढ़ते समय इनका मूल निवास तक ध्यान में नहीं रक्खा गया। इनमें से लगभग सभी ज़्यादातर बार उन क्षेत्रों में फील्ड रिपोर्टिंग करने या किसी तरह के सामाजिक अध्ययन के लिये गये हुए भी नहीं होते!
तिस पर तुर्रा यह है कि दुनिया की संस्थाएं इनकी विश्वसनीयता की रैंकिंग करते समय भेदभाव करती हैं!
संलग्न चित्र में दिख रहा है कि कुल पांच लोगों के पैनल में चार ब्राह्मण (2 उत्तर प्रदेश के +1राजस्थान +1कोंकणी) और एक भूमिहार के द्वारा बिहार के 87% (SC,ST,OBC, राजपूत ,मुस्लिम) वोटरों के मूड को विश्लेषित किया गया।

भारतीय मीडिया में हमेशा Upper Castes के लोगों का वर्चस्व रहा है. यह कोई नई बात नहीं. बीते डेढ दशक में दो ‘बदलाव’ जरूर दिख रहे हैं:
1: पहले के मैनेजरों संपादकों-पत्रकारों में कुछेक जेनुइन उदार और समझदार भी होते थे पर आज जो मीडिया (मालिक-प्रबंधक-संपादक-एंकर आदि) को कंट्रोल कर रहे हैं, वे वंचितों-पिछड़ों के प्रति अपेक्षाकृत ज्यादा अनुदार और आक्रामक हैं. क्योंकि पहले के मुकाबले आज वंचित समाज और पिछड़े वर्गों में पढ़ाई-लिखाई और प्रोफेशनल योग्यता हासिल करने वालों की संख्या बहुत बढ़ गयी है. उच्चवर्णीय पृष्ठभूमि के लोगों के बड़े हिस्से में इसे लेकर एक तरह का अनावश्यक असुरक्षा-बोध और ईर्ष्या-भाव पैदा हुआ है..
2: मेनस्ट्रीम मीडिया में जगह नहीं मिलने से क्षुब्ध
दलित-आदिवासी-पिछड़े और बैकवर्ड माइनाॅरिटी समुदाय के युवा-पत्रकारों के एक उल्लेखनीय हिस्से ने इधर इंटरनेट-आधारित संवाद और प्रसारण मंचों के जरिये स्वतंत्र पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कामयाबी हासिल की है. बड़े पूंजीवादी देशों से आई तकनीक और प्रौद्योगिकी ने भारत के सबाल्टर्न समूह के शिक्षित युवाओं को भारतीय मीडिया के वर्णवादी-सामंती ढांचे के समानांतर एक वैकल्पिक संरचना खड़ा करने का रास्ता दिया है. हालांकि सोशल मीडिया या वेबसाइट-यूट्यूब की पत्रकारिता (कुछ अपवादों को छोड़कर) में प्रोफेशनलिज्म की अपेक्षाकृत बहुत कमी है. पर निश्चय ही इसने सबाल्टर्न युवाओं के लिए संभावनाओं के नये दायरे का द्वार खोला है.(टीवी चैनलों के ‘पैनल डिस्कशन’ के वर्णवादी स्वरूप और चरित्र पर लिखी वरिष्ठ पत्रकार Sheetal P Singh की ताजा पोस्ट से प्रेरित होकर लिखी टिप्पणी)
-उर्मिलेश



