
संजय कुमार सिंह
एक्जिट पॉल के नतीजों के बाद लगा कि यह भी एक तरह का हेडलाइन मैनेजमेंट हो सकता है। भाजपा बहुत अच्छी पार्टी है, अच्छा काम कर रही है और लगातार लोकप्रिय हो रही है – यह संदेश देने और लोगों को यकीन दिलाने का कच्चा माल तो आज दे ही दिया गया। इस चर्चा में गये बगैर की भाजपा की सीटें कैसे बढ़ रही हैं। क्या चुनाव, लड़ने और जीतने के तरीके पर चर्चा नहीं होनी चाहिये? भाजपा की किन उपलब्धियों से लोग खुश हैं और वोट दिये जा रहे हैं। अगर मामला हिन्दुत्व का ही हो तो मामला शंकराचार्यों से भी ऊपर का है? यह सब जानने और बताने की जरूरत नहीं है? आप जानते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने अपने काम नहीं गिनाये उस पर वोट नहीं मांगे। अनुच्छेद 370 हटा या पर चुनाव ही नहीं लड़ी। विधानसभा चुनाव पांच साल में नहीं हुए हैं। इस चुनाव में प्रधानमंत्री ने हिन्दू-मुसलमान तो किया ही, विपक्ष और कांग्रेस की निराधार, गलत आलोचना की। चुनाव आयोग ने इसपर कोई कार्रवाई लगभग नहीं की।
ऐसे में अगर भाजपा की सीटें 2014 के बाद 2019 में और फिर 2024 में लगातार बढ़ रही हैं तो उसका कारण होगा उसकी चर्चा और उल्लेख क्यों नहीं है? आपको बता दूं कि 2019 के चुनाव में 300 सीटों के अनुमान को भी गलत बताया गया था भले असल में उससे ज्यादा आया था। मान लिया गया कि वह पुलवामा, बालाकोट, घुसकर मारूंगा आदि का कमाल था। 2019 में भाजपा को 300 सीटें आने की भविष्यवाणी पर प्रेम शंकर झा ने द वायर में जो लिखा था उसका शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, “क्यों इस बार एक्जिट पॉल बुरी तरह गलत हो सकते हैं”। हालांकि, इसका कारण उन्होंने यह बताया था कि एक्जिट पॉल के नतीजे सही हों इसके लिए जरूरी है कि मतदाता अपनी प्राथमिकता के संबंध में किसी अजनबी को सच बताने के लिए तैयार हो। यह बहुत सारे कारणों के समूह पर निर्भर करता है।
सर्वेक्षण के तरीके, सैम्पल साइज आदि अपनी जगह हैं लेकिन अब यह सार्वजनिक है कि 2019 में पहली बार के मतदाताओं से पुलवामा के नाम पर वोट मांगे गये थे और इसका यकीन प्रचारक एंकर को भी नहीं था। इसलिए, मुद्दा चुनाव प्रचार और उसका प्रभाव भी है। 2019 में अगर वोट मिले तो उसका कारण बहुत कुछ हो सकता है। अगर वह चुनाव लड़ने जीतने का जायज तरीका है तो एंटायर पॉलिटिकल साइंस के पाठ्यक्रम में होना चाहिये। दूसरी ओर, हम अशोका यूनिवर्सिटी के रिसर्च के बारे में भी जानते हैं। पहले यूनिवर्सिटी ने उस रिसर्च से पल्ला झाड़ा बाद में रिसर्च करने वाले की नौकरी गई। रिसर्च का जो होना था वह नहीं हुआ, बाकी चाहे जो हुआ हो। इसलिए, इसबार कुछ भी सकता है। लेकिन इस बार पुलवामा नहीं है, नरेन्द्र मोदी 75 साल के होने वाले हैं। उसपर उनका अपना बनाया नियम है। उसपर शांति है (पार्टी में आंतरिक विरोध भी होगा नहीं है तो वह भी विचित्र है)। बीजेपी के कई बड़े नेताओं की पंख कतर दिये गये हैं, कहा जा चुका है कि पार्टी को आरएसएस की जरूरत नहीं रही।
इसके बावजूद सीट बढ़ रही है तो वह अनुसंधान और जांच का विषय है। मोदी जी के प्रधानमंत्री रहते निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती इसलिए उनका हारना जरूरी है ताकि इस और तमाम अन्य मामलों की जांच हो सके। इसमें यह जांच भी जरूरी है कि ‘अनुभवी चोर’ सिर्फ अरविन्द केजरीवाल हैं या वाशिंग मशीन पार्टी में शामिल हुआ कोई घोषित भ्रष्टाचारी भी है। हेडलाइन मैनेजमेंट में मीडिया के बड़े वर्ग ने न सिर्फ 10 साल तक सत्तारूढ़ पार्टी की सेवा की बल्कि उसे लोकप्रिय बनाने के लिए यह तो बताया जा रहा है कि सीटें बढ़ेंगी पर उसका कोई कारण नहीं है। ना नतीजे परोसने वाले बता रहे हैं ना कोई पूछने वाला है। धड़ा-धड़ फॉर्वार्ड हो रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि इसी मैनेजमेंट और फॉर्वार्ड के कारण बर्खा दत्त से लेकर कन्हैया कुमार को देशद्रोही और टुकड़े-टुड़े गैंग का सदस्य मान लिया गया है। बहुत सारे लोग इनके खिलाफ राय रखते हैं, चुनाव के दौरान कन्हैया कुमार पर हमला भी हुआ लेकिन अगर उन्होंने कुछ अपराध किया है तो सजा नहीं हुई है। सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की है। कन्हैया कुमार के बार-बार चुनौती देने के बावजूद। जाहिर है, व्हाट्सऐप्प फॉर्वार्ड का असर होता है पर सरकार और मीडिया इससे लापरवाह रहे हैं।
दूसरी ओर, बहुत सारे लोग अर्बन नक्सल घोषित हैं सेक्यूलर यानी धर्म निरपेक्ष होना अब गाली है। इस सर्वेक्षण का नतीजा यह होगा कि असली परिणाम यही आये तो लोग उसे मान लेंगे यह नहीं पूछा-बताया जायेगा कि सीटें बढ़ी कैसे? अगर चुनाव परिणाम गलत आये तो ईवीएम और चुनाव प्रक्रिया पर बट्टा लगेगा। नई सरकार हो तो उसके लिए एक काम होगा कि वह इस शंका का समाधान करे या मान लिया जायेगा कि वह भी ऐसे ही चुनाव जीतने में विश्वास करती है और प्रक्रिया को पारदर्शी तथा बेदाग बनाने में दिलचस्पी नहीं है। लेकिन अभी मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा यह है कि एक्जिट पोल में भाजपा जीत रही है तो कैसे? आप पूछ सकते हैं कि गलत एक्जिट पॉल क्यों दिखाया जायेगा और दूसरे कि दिक्कत क्या है? परिणाम तो वही माना जायेगा जो चार जून को घोषित होगा। पर मेरा सवाल है कि ऐसे गैर जिम्मेदार या इतने ज्यादा सर्वेक्षण की आवश्यकता क्यों है? अगर यह जरूरी है तो सब अलग करने की बजाय एक साथ करें, बड़ा सैम्पल होगा तो नतीजे सही होने की संभावना बेहतर रहेगी।
कुछ साल पहले तक मैं सभी सर्वेक्षणों का औसत निकाल लेता था और मुझे लगभग सही और विश्वसनीय नतीजे मिल जाते थे। इस बार ऐसा नहीं है। एक सर्वेक्षण सरकार समर्थकों का है और दूसरा विरोधियों का। ऐसे सर्वेक्षणों के नतीजों पर शक करने का एक और कारण यह है कि एक स्टिंग से यह उजागर हो चुका है कि नतीजे आदेश के अनुसार आ सकते हैं। बेशक, यह चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के लिए था और उसकी जरूरत जीत का माहौल बनाने के लिए होती है। एक्जिट पोल के परिणाम ईवीएम के नतीजों को सही साबित करने के लिये हो सकते हैं। हो सकता है आप इस तरह के सर्वेक्षण को मनोरंजन, टाइम पास या ऐसी ही कोई जरूरत और जायज मानते हों पर मीडिया अगर कोई खबर दे रहा है, अनुमान लगा रहा है तो उसका आधार होना चाहिये, उसकी विश्वसनीयता होनी चाहिये, उसमें गंभीरता तो होनी ही चाहिये।
मुझे भाजपा के तीन सौ पार करने के आंकड़े विश्वसनीय नहीं लग रहे हैं। मेरा मानना है कि 2014 में भाजपा को अगर 282 सीटें मिली थीं और इस समय भाजपा के पक्ष में उस समय के मुकाबले कोई कारण नहीं है और विपक्ष (यानी कांग्रेस गठबंधन) तब के मुकाबले बहुत मजबूत है और कम से कम मिल कर लड़ रहा है तो सीटें इससे कम होंगी। अगर कोई 280 सीटें आने का भी दावा करे तो बताये कि ऐसा कैसे होगा। मीनाक्षी लेखी हार जायेंगी और बांसुरी स्वराज जीत जायेंगी – यह बिना चुनाव समझा जा सकता है तो चुनाव पर करोड़ों फूंकने की क्या जरूरत है खासकर तब जब इस बार गर्मी के कारण अकेले उत्तर प्रदेश में 33 लोगों के मरने की खबर है। हिन्दुस्तान टाइम्स में आज छपी एक खबर के अनुसार एक दिन में गर्मी या लू लगने के कारण 58 लोगों की मौत हुई है। मरने वालों में बिहार, उड़ीशा और मध्य प्रदेश के चुनाव अधिकारी हैं। एक मतदाता की मौत की भी खबर है।
दूसरी ओर, चुनाव परिणाम से पहले एक्जिट पॉल के नतीजों पर ही प्रधानमंत्री ने भी जीत का दावा किया है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, पूर्व में एक्जिट पॉल के नतीजे अगर सही रहे हैं तो गलत भी रहे हैं। इस बार तो मतदान के सभी दौर खत्म होने से पहले यह सार्वजनिक था कि मीडिया से कहा गया है कि वह एक्जिट पॉल में 350 के आस-पास सीटें दिखाये। जो परिणाम दिखाया गया है वह ऐसा ही है पर मुद्दा यह है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार का समर्थन करता रहा है। ईवीएम पर शंका पहले से है, कई शिकायतों का जवाब नहीं है और यह पिछले विधानसभा चुनाव के समय देखा गया था कि चुनाव परिणाम अनअपेक्षित थे फिर भी कुछ लोगों ने वही दावा किया था जो परिणाम आया। इसलिए, परिणाम सही हो या गलत स्वीकार कर लिया गया क्योंकि कुछेक सर्वेक्षण के अनुसार परिणाम अपेक्षित था और इस कारण ईवीएम से संबंधित शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। उनके संतोषजनक जवाब नहीं मिले। इसलिए इस बार सरकार की योजना अगर 350 सीटों की व्यवस्था करने की हो तो यही प्रचारित किया जा रहा है और आम लोगों या विपक्ष के अनुमान से अलग नतीजा अलग आया तो ये सर्वेक्षण उसका साथ देंगे।
जरूरी नहीं है कि ऐसा हुआ ही हो, व्यवस्था या कोशिश तो हो ही सकती है। उसपर ध्यान नहीं दिया जाना और परिणाम का सही होना सब संभव है लेकिन इस सर्वेक्षण और अनअपेक्षित नतीजों का परिणाम यही हुआ है कि आज दूसरी खबरों को महत्व नहीं मिला है वरना एक दिन में लू से और वह भी चुनाव के कारण 58 लोगों की मौत बड़ी खबर है लेकिन एक्जिट पॉल के नतीजों के आधार पर तीसरी बार मोदी सरकार बन चुकी है तो परिणाम अलग होने पर क्या अटपटा नहीं लगेगा और नहीं भी लगे तो क्या आज 58 लोगों के मरने की खबर छोड़ना उस सरकार का बचाव नहीं है जिसके नेतृत्व में ये मौतें हुई है ? आज के इस सर्वेक्षण या एक्जिट पॉल के कारण विपक्ष के दावे दब गये हैं या मीडिया ने उन्हें कम महत्व दिया है। यही नहीं, इस एक्जिट पॉल के आधार पर प्रधानमंत्री ने दावा किया है और कई अखबारों ने प्रमुखता से छापा है, “प्रधानमंत्री ने विपक्ष की आलोचना की लोगों ने इंडिया ब्लॉक की प्रतिग्रामी राजनीति को खारिज कर दिया है”। (इंडियन एक्सप्रेस) भारत ने ‘जातिवादी, सांप्रदायिक और भ्रष्ट’ वंशवादी पार्टियों को खारिज कर दिया है : प्रधानमंत्री” (टाइम्स ऑफ इंडिया)। “मौका परस्त इंडी गठबंधन देश की जनता के साथ तालमेल बिठाने में हुआ विफल:मोदी”। उपशीर्षक है – कहा, मुट्ठी भर परिवारों की रक्षा करने के मकसद से बनाया गया गठबंधन। (अमर उजाला)
मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री ने कहा है तो यह खबर है और कहीं भी छप सकती है। लेकिन प्रधानमंत्री इस योग्य नहीं है कि दूसरे दलों को सर्टिफिकेट बांटें। उनका अपना रिकार्ड इतना बढ़िया नहीं है और मेरी जानकारी व समझ उनके इस आरोप को गलत मानती है। इसलिए मैं इसे पहले पन्ने की खबर नहीं मानता हूं। हालांकि, पहले पन्ने की खबरें महंगी होंती हैं और उसके लिए अखबारों को खर्च करना पड़ता है। कोई दूसरी हो ही नहीं तो संपादक क्या करेगा। उसे इसी को महत्व देना पड़ेगा। मैं नहीं जानता इस खबर को प्रमुखता देने वालों ने क्यों इसे इतना महत्व दिया है। वह भी तब जब उन्होंने कहा है और अमर उजाला ने उसे भी साथ ही छापा है कि, जनता ने देखा हमारा ट्रैक रिकार्ड। कहने की जरूरत नहीं है कि वे अपनी पीठ खुद थपथपा रहे हैं और अच्छे प्रधानमंत्री नहीं साबित हुए हैं। विपक्षी गठबंधन में न सिर्फ अच्छे लोग हैं बल्कि उनकी नीति भी आम जनता का हित साधने वाली है।
उदाहरण के लिए भारी महंगाई के बावजूद सरकार ने तमाम जरूरी और आम लोगों के काम की चीजों पर न सिर्फ जीएसटी लगाया है, ऐसी व्यवस्था भी की है कि ये उत्पाद आम आदमी को भी बगैर जीएसटी नहीं मिल रहे हैं और यह 28 प्रतिशत तक है भले आम आदमी के काम की चीजों पर न हो। ऐसे में जीएसटी और सरकार की नीति की आलोचना करने की बजाय सरकार बताती है और मीडिया प्रचारित करता है कि जीएसटी वसूली बढ़ी। अमीरों और व्यावसायियों के आयकर कम करके आम लोगों से जीएसटी वसूलना और हर महीने दावा करना कि वसूली बढ़ गई है दरअसल आम आदमी का खून पीना है लेकिन पेश ऐसे किया जाता है जैसे सरकार ने कमाई की हो। अपने करीबियों, मित्रों और पार्टी से वसूल कर सरकारी खाते में जमा किया हो। आज खबर है कि जीएसटी संग्रह 10 फीसदी बढ़कर 1.73 लाख करोड़ हो गया है। यह सरकार की उपलब्धि नहीं है, आम आदमी से वसूली गई राशि है। अखबारों के पास दूसरी अच्छी खबरें होती या एक्जिट पॉल में भाजपा की जीत को प्रचारित करने का काम नहीं होता तो आज अखबारो में बगैर टिप्पणी या कारण यह नहीं छपना चाहिये था कि, दिल्ली में भाजपा का शानदार प्रदर्शन जारी …. आप कांग्रेस की जोड़ी बेअसर। कोई ऐसा कैसे कह सकता है?
आइये दिल्ली की सातों सीटें देख लें
अंतिम नतीजा आये बिना ऐसा कहने का क्या मतलब है और अगर आ जाये तो कायदे से उसकी जांच होनी चाहिये लेकिन ऐसे विषय पर अनुसंधान करने वाले अशोका विश्वविद्यालय ही नहीं सरकार का विरोध करने वाले पुराने चुनाव आयुक्त का हश्र भी हम जानते हैं। दिल्ली की सातों सीटों पर अमर उजाला की खबर है, भाजपा का पिछली बार की ही तरह प्रदर्शन जारी रहेगा। पीमार्क एक्जिट पॉल में पार्टी को सभी सात सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। ऐसा क्यों होना चाहिये? हो जाये तो आश्चर्य जरूर होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि दिल्ली का मामला बाकी जगहों से अलग है। शिक्षा, आय और राजनीति – तीनों अलग है। दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का भाजपा का वादा और अब उसपर उसकी चुप्पी महत्वपूर्ण है। पिछली बार अगर सात की सात सीट मिली थी (और विधान सभा तथा नगर निगम में पूरी कोशिश करके भी भाजपा हार गई) तो संभव है पूर्ण राज्य का दर्जा दिये जाने की उम्मीद में सातों सांसद जीते हों। भाजपा ने उनमें से छह को इस बार टिकट नहीं दिया है। जिन्हें दिया है वो कोई बहुत जाने-माने और लोकप्रिय नहीं हैं। दूसरी ओर उनका मुकाबला कांग्रेस या आम आदमी पार्टी के जिन लोगों से वे मजबूत हैं और इस बार वोट कांग्रेस तथा आप में बंटने की संभावना नहीं है तो सात की सात सीट भाजपा को मिलने का दावा कैसे किया जा सकता है?
आइये सातों सीटों के उम्मीदवार देख लें। 1. चांदनी चौक – जेपी अग्रवाल कांग्रेस के मुकाबले प्रवीण खंडेलवाल। प्रवीण खंडेलवाल दिल्ली स्थित व्यवसायी हैं। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स नामक संगठन के संस्थापक और महासचिव हैं। लेकिन वे कांग्रेस के जेपी अग्रवाल से मजबूत हैं ऐसा शायद ही कोई कहे। पिछली बार डॉ. हर्षवर्धन यहां से जीते थे। 2. नई दिल्ली से सोमनाथ भारती (आप) के मुकाबले भाजपा की मीनाक्षी लेखी की जगह बांसुरी स्वराज उम्मीदवार हैं। सोमनाथ भारती तीन बार के विधायक हैं। चौथा चुनाव है। बांसुरी का संभवतः पहला। दोनों पेशे से अधिवक्ता है। बांसुरी ललित मोदी की अधिवक्ता रही हैं और पहले ईडी के लिए काम कर चुकी हैं। भारत के उच्चतम न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष एक भारतीय वकील है। 3.पूर्वी दिल्ली – कुलदीप कुमार, विधायक, कोंडली (आप) मुकाबले में हर्ष मल्होत्रा हैं जो दिल्ली भाजपा के महासचिव हैं। पूर्व दिल्ली के पूर्व मेयर हैं और दाधिची देहदान समिति के अध्यक्ष हैं। मेरा मानना है कि अगर इनकी उम्मीदवारी दमदार होती तो पिछली बार भी लड़ाया गया होता। यहां से गौतम गंभीर भाजपा के सांसद थे और इस बार उनने चुनाव लड़ने से खुद मना कर दिया था। 4. उत्तर पूर्व दिल्ली कन्हैया कुमार – कांग्रेस का मुकाबला भोजपुरी गायक अभिनेता मनोज तिवारी से है। मनोज तिवारी दिल्ली भाजपा के अकेले सासंद हैं जिन्हें फिर से लड़ाया जा रहा है। जब उम्मीदवार बनाया गया था तब कांग्रेस के उम्मीदवार का नाम तय नहीं था। बाद में न सिर्फ कन्हैया कुमार ने उन्हें कड़ी टक्कर दी है बल्कि भोजपुरी गायिका नेहा सिंह राठौड़ ने भी उनका पूरा प्रचार किया। मनोज तिवारी की पोल खोली। वैसे भी मनोज तिवारी के खिलाफ एंटी इनकमबेंसी होगी।
सबके बावजूद चुनाव कोई भी जीत या हार सकता हैं पर नतीजे से पहले कहने का क्या मतलब? 5. उत्तर पश्चिम दिल्ली में उदित राज (कांग्रेस) का मुकाबला योगेन्द्र चंदोलिया से है उन्हें हंस राज हंस (बीजेपी) की जगह उम्मीदवार बनाया गया है 6. पश्चिम दिल्ली में महाबल मिश्रा (आप) का मुकाबला कमलजीत सेहरावत से है। वे परवेश वर्मा की जगह उम्मीदार बनाया गये हैं। और 7. दक्षिण दिल्ली में सही राम पहलवान, विधायक (आप) का मुकाबला राम वीर सिंह विधूड़ी से है। इन्हें रमेश विधूड़ी की जगह उम्मीदवार बनाया गया है। भाजपा का कोई भी उम्मीदवार ऐसा नहीं है कि पहले वाले से किसी भी तरह से मजबूत कहा जा सके। और मजबूत हो तो सवाल है कि पिछली बार जिसे उम्मीदवार बनाया था उसे इस बार क्यों बदल दिया। सिर्फ एंटी इनकमबेंसी से बचने के लिए? स्पष्ट है कि सामने वाला उम्मीदवार कमजोर नहीं है। इसलिए बहुत कम संभावना है कि भाजपा सात की सात सीट जीत जायेगी और अगर जीत गई तो महत्वपूर्ण यह होगा कि कैसे जीत गई। यह नहीं कि अच्छी है या मजबूत है या चुनावी रणनीति बनाने वाले चाणक्य काबिल हैं। अगर ऐसा हो रहा है और पक्का है तो यह ईवीएम का कमाल हो सकता है। सरकार और मीडिया को ऐसा संदेश जाने की चिन्ता भी नहीं है और मेरे लिये यही चिन्ताजनक है। इसलिए मुझे लगता है कि नरेन्द्र मोदी क चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग करनी चाहिये थी। अभी तक की स्थितियों से लग रहा है कि येन-केन प्रकारेण सत्ता में बने रहने की उनकी कोशिशें और उन्हें मिलने वाला सहयोग जारी है।



