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कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की निन्दा की, आपने खबर पढ़ी? बंगाल में ये चल क्या रहा है?

संजय कुमार सिंह

कलकत्ता हाईकोर्ट ने तो कमाल कर दिया है। एक जज साब 37 साल बाद आरएसएस में वापस जायेंगे, एक भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में एक जज साहब ने 23 हजार से ज्यादा शिक्षकों की नियुक्ति रद्द कर दी थी और वेतन वापस करने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उसे स्टे किया है और यह सब चुनाव के साथ चल रहा है। प्रधानमंत्री टीएमसी पर आरोप लगा रहे हैं सो अलग। ‘एक देश की एक पुलिस बिना अनुमति मुख्यमंत्री से मिलने पहुंची उनकी पार्टी के सांसद से कथित मारपीट में खरोंच आने पर मुख्यमंत्री के सहायक को गिरफ्तार कर लेती है और राज्यपाल पर राजभवन में कार्य करने वाली महिला के यौन शोषण के आरोप पर कार्रवाई नहीं कर पाती है क्योंकि उन्हें संवैधानिक सुरक्षा है। प्रधानमंत्री राज्यपाल पर नहीं बोलते हैं। संदेशखाली पर बोलते हैं लेकिन स्टिंग वीडियो कुछ और कहता है तो चुप्पी साध लेते हैं। मुख्यमंत्रियों को काम नहीं करने देते, सरकार गिराते रहे हैं सो अलग। अखबार कुछ बताते हैं, ज्यादा छिपाते हैं।

आज के अखबारों में कल पांचवें चरण का मतदान हुआ के अलावा दो और बड़ी खबरें हैं। इनमें एक आम आदमी पार्टी पर विदेशी चंदे का ‘नया’ मामला और कलकता हाईकोर्ट में चुनाव आयोग की रगड़ाई। इनमें आम आदमी पार्टी की खबर तो छपी है, चुनाव आयोग की रगड़ाई का मामला जितना गंभीर और बड़ा है वैसे उसकी खबर नहीं छपी है। मेरे सात अखबारों में सबसे विस्तार में यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। यहां यह खबर कलकत्ता हाईकोर्ट के एक जज से संबंधित विस्फोटक खबर के साथ छपी है और शायद इसलिए ज्यादा पढ़ी जाये। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स में यह अधपन्ने के नीचे पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है। चार लाइन का शीर्षक और लगभग इतनी ही बड़ी खबर 12 लाइनों में है। पेश है टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का गूगल अनुवाद (संपादित)। 

कलकत्ता हाईकोर्ट ने भाजपा के अपमानजनकविज्ञापनों पर कार्रवाई नहीं करने के लिए चुनाव आयोग की आलोचना की शीर्षक खबर पर सुब्रत चट्टोराज की बाईलाइन है। खबर इस प्रकार है, भाजपा के कथित आक्रामक चुनावी विज्ञापनों के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस की याचिका पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि चुनाव आयोग आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों को संबोधित करने में “पूरी तरह विफल” रहा है। भाजपा को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाली सामग्री प्रकाशित करने से रोकते हुए न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य ने भाजपा द्वारा 4, 5, 10 और 12 मई को मीडिया जारी किए गए विज्ञापनों को “अपमानजनक” और “निंदनीय” कहा।

न्यायाधीश ने कहा कि स्वतंत्र, निष्पक्ष और बेदाग चुनाव के हित में ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगायी जानी चाहिए। टीएमसी ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग उसकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। इसके जवाब में हाईकोर्ट ने कहा है, 4 जून के बाद चुनाव आयोग के किसी प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं है। पार्टी ने बांग्ला के कुछ विज्ञापनों के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया, जो चौथे चरण के मतदान से एक दिन पहले 12 मई सहित खास दिनों में प्रकाशित किए गए थे। भाजपा के विज्ञापनों पर हाईकोर्ट के फैसले पर चुनाव आयोग ने हाईकोर्ट से एक दिन इंतजार करने के लिए कहा है

टीएमसी के वकील, जिष्णु साहा ने तर्क दिया कि अगर कोई प्रचार की अवधि खत्म होने के बाद की “शांत अवधि” में विज्ञापन जारी करना चाहता है तो उसे चुनाव आयोग से “पूर्व-प्रमाणन” लेने की आवश्यकता होती है। यह वह समय है जो मतदान से एक दिन पहले या मतदान के दिन होता है। इस लिये इसका मकसद समझना मुश्किल नहीं है। टीएमसी 4 मई से भाजपा के कथित “भ्रामक” विज्ञापनों पर चुनाव आयोग का ध्यान आकर्षित करती रही है। इसके अलावा लेवल प्लेइंग फील्ड की भी मांग की गई है। साहा ने कहा, लेकिन चुनाव आयोग की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। पहली प्रतिक्रिया उस दिन आई जब हमने 18 मई को हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।”

चुनाव आयोग के वकील लक्ष्मी गुप्ता ने कहा कि चुनाव आयोग ने पहले ही भाजपा को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा था कि क्या उसने 12 मई का विज्ञापन जारी करने से पहले “पूर्व-प्रमाणन” प्राप्त किया था। गुप्ता ने अदालत से एक दिन और इंतजार करने का आग्रह करते हुए कहा, “भाजपा को जवाब देने के लिए 21 मई (मंगलवार) की तारीख तय की गई है।” गुप्ता ने कहा, “अदालत का कोई भी फैसला चुनाव आयोग के फैसले पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।” न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि चुनाव आयोग की “सलाह देने वाली” शक्तियां “भ्रमपूर्ण” थीं, उन्होंने कहा कि उसे निंदा के अलावा अपराधियों के खिलाफ कदम उठाने का अधिकार नहीं है।

हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर आज एक खबर है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झाड़ग्राम में एक सार्वजनिक रैली को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने राज्य में हर नौकरी के लिए एक “रेट कार्ड” रखा है और पूर्वी प्रान्त को पीछे की ओर धकेल रही है। हालांकि, टीएमसी ने मोदी पर पलटवार किया और उनके आरोपों को खारिज कर दिया। मामला यह है कि बंगाल सरकार के खिलाफ शिक्षक भर्ती में घोटाले का एक मामला चल रहा है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने 22 अप्रैल को 23,753 शिक्षकों की भर्ती रद्द कर दी थी। तब अखबारों ने लिखा था कि यह ममता सरकार को हाईकोर्ट से बड़ा झटका है। अदालत ने शिक्षकों को दिया गया वेतन लौटाने का भी आदेश दिया था।

सात मई को ममता सरकार को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली। शिक्षकों की भर्ती रद्द करने के कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी गई। हालांकि मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने भर्ती प्रक्रिया को सुनियोजित धोखाधड़ी करार दिया है और कहा कि 25,753 शिक्षकों तथा गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति से संबंधित डिजिटल रिकार्ड बनाये रखना अधिकारियों का काम है। जो भी हो, आप जानते हैं कि भाजपा जजों को ईनाम देती रही है। अभी हाईकोर्ट के एक जज भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं आज एक जज का कहा छपा है कि वे आरएसएस के सदस्य हैं और वापस आरएसएस में जाने के लिए तैयार हैं। ऐसे में अदालती फैसलों के आधार पर चुनाव के समय विज्ञापन के जरिये या रैलियों में आरोप लगाने का मतलब आप समझ सकते हैं। चुनाव आयोग और मीडिया का मामला आप जानते ही हैं। 2019 के चुनाव में पहली बार के मतदाताओं से पुलवामा के मद्देनजर राष्ट्रवाद के नाम पर वोट मांगा गया था। और यह इतना गलत है एक गोदी एंकर ने सीधे प्रसारण के दौरान कह दिया कि ऐसा कैसे हो सकता है और कांग्रेस के प्रवक्ता ने उसी समय फोन पर वीडियो चलाकर सुना दिया। 

ऐसे में भाजपा लाभ की स्थिति में थी और है तथा मीडिया का खुला समर्थन जबरदस्त रूप से मिल रहा है तभी चुनाव के समय इस तरह की कार्रवाई हो रही है और आरोप लगाये जा रहे हैं, विज्ञापन भी छपवाये जा रहे हैं। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर का शीर्षक है, नरेन्द्र मोदी ने कहा कि राहुल गांधी के पुराने वीडियो से यह साबित होता है कि कांग्रेस मुसलमानों के लिए आरक्षण का समर्थन करती है। कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस करती भी हो तो यह चुनाव के समय कहने वाली बात नहीं है। और कहना होगा तो ह खुद कहेगी और करेगी तो छिपा कर नहीं कर पायेगी। उसे करने के बाद फिर चुनाव लड़ना है जबकि नरेन्द्र मोदी इस बार के बाद शायद ही चुनाव लड़ें। 2029 में 79 साल के होंगे। दूसरी ओर, कांग्रेस पर ऐसा आरोप नहीं लगाकर भाजपा कांग्रेस पर अहसान नहीं करेगी, खुद पर लगने वाले आरोपों से बचेगी।

इसलिए ऐसा नियम है जिसे आदर्श आचार संहिता कहा जाता है और चुनाव आयोग को उसका पालन कराना होता है। मीडिया ऐसी खबरों की आलोचना करता रहा है (भले अब नहीं करता है)। अभी स्थिति यह है कि भाजपा हिन्दू मुसलमान कर रही है, आरोप लगा रही है, कांग्रेस को चुनाव आयोग ने रोक रखा है या वह मोदी जी की तरह नहीं है। हो जाये तो चुनाव हिन्दू मुसलमान हो जायेगा और फिर नतीजा सबको पता है या चुनाव का कोई मतलब नहीं रहेगा। यह सब देखना अखबारों के साथ चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट का काम है पर अकेले सुप्रीमकोर्ट ही काम करता नजर आ रहा है। आज हाई कोर्ट की खबर को वह प्रमुखता नहीं मिली जो मिलनी चाहिये थी।

आज की दूसरी बड़ी खबर आम आदमी पार्टी पर सात करोड़ रुपए के विदेशी चंदे में गड़बड़ी की ईडी की शिकायत है जो उसने गृहमंत्रालय यानी अमित शाह से की है। अखबारों में खबर के रूप में छपी यह सूचना आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के लिए है और तथ्य यह है कि आम आदमी पार्टी ने कहा है तथा वह भी छपा है कि यह पुराना मामला है और गृह मंत्रालय इस मामले में पार्टी को क्लीन चिट दे चुका है। द हिन्दू में यह खबर अंदर होने की सूचना पहले पन्ने पर है। इसका शीर्षक है, ईडी ने कहा, आप को मिले दान में अनियमितताएं। कहने की जरूरत नहीं है कि दान, दान है और घोषित है कि दान है तो उसमें  क्या नियमित और क्या अनियमित। अंग्रेजी में एक कहावत है, बेगर्स कान्ट बी चूजर्स। यानी भीख मांगने वाले यह तय नहीं कर सकते हैं कि वे किससे लेंगे औऱ किससे नहीं लेंगे।

फिर भी भारत सरकार के नियम हैं और यह गैर सरकारी संगठनों पर भी लागू है। इससे कितने लोगों का काम बंद हो गया है और जन सेवा के ढेरों कार्य नहीं हो रहे हैं। सरकार ने इससे संबंधित नियम इतने सख्त कर दिये हैं कि स्वतंत्र रूप से काम करना लगभग असंभव है। सरकार कहती है कि वह देसी मामले में विदेशी मदद नहीं चाहती है पर असल में नहीं चाहती है कि किसी विरोधी को इतने पैसे मिलें कि वह उसका विरोध कर सके। अगर यही सख्ती सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार पर लागू होती तो फिर भी इसे जायज माना जा सकता था लेकिन सरकार के लिए इलेक्टोरल बांड ही नहीं पीएम केयर्स भी है जो आरटीआई से मुक्त है।  पर अभी वह मुद्दा नहीं है।

मूल बात यह है कि पीएम केयर्स में अरबों रुपये लेकर रखने वाली पार्टी के शासन में विपक्षी दल के सात करोड़ रुपये पर एक सरकारी विभाग को एतराज है जिसने सैकड़ों करोड़ के कई घोटालों को सार्वजनिक रूप से ठंडे बस्ते में डाल रखा है। मीडिया, सरकार और चुनाव आयोग पर संतुलित कार्रवाई और लेवल प्लेइंग फील्ड के लिए दबाव डाल सकता है तो उसकी भूमिका आप देख ही रहे हैं। मैं भी रेखांकित करता रहता हूं। ऐसी स्थिति में आज के अखबारों की सबसे बड़ी खबर मतदान का प्रतिशत है तो लगता है कि यह हेडलाइन मैनेजमेंट का असर है। वरना पत्रकारिता का मतलब दो जोड़ दो चार बताना नहीं है। भले यह नहीं बताये कि टूएबी एक्सट्रा नहीं होता है।

आज द टेलीग्राफ को छोड़कर मेरे सभी अखबारों में मतदान के प्रतिशत को बड़ी खबर बनाया गया है। सबमें यह पहले पन्ने पर है। खास बात यह है कि चुनाव आयोग और चुनाव लड़ने वाले दलों के प्रयास के बावजूद मतदान का प्रतिशत नहीं बढ़ रहा है और चुनाव आयोग ने शहरी उदासीनता छोड़कर मतदान में भाग लेने की अपील की थी पर मतदान प्रतिशत नहीं बढ़ा, पिछली बार के मुकाबले कम ही हुआ है तो जाहिर है लोगों ने शहरी उदासीनता नहीं छोड़ी है। आइये देखें अखबारों ने कैसे प्रस्तुत किया है। इसके साथ यह समझने की कोशिश करें कि इसके क्या मायने और कारण हो सकते हैं तथा यह भी कि मतदान के प्रतिशत को लेकर दावें हैं तो क्या और उसके क्या मतलब हो सकते हैं। उल्लेखनीय है कि 428 क्षेत्रों में मतदान हो चुका है। सिर्फ 115 सीटों पर बाकी है। दिल्ली की सातों सीटों पर 25 को मतदान है और कश्मीर की पांच सीटों पर पांच चरणों में मतदान निर्धारित किया गया था।

पांचवें चरण का मतदान कल हुआ आज के अखबारों की सबसे बड़ी खबर यही है। इस समझने के लिए सबसे पहले तो मैं आज के सभी शीर्षक पेश कर रहा हूं। इससे खास बातें भी सामने आ जायेंगी और फिर बात करने में सहूलियत होगी। जहां तक मतदान में लोगों की दिलचस्पी का सवाल है इसका संबंध इसके लिए मिलने वाली छुट्टी से भी होता है। 45 दिन का चुनाव पर्व देश भर में 45 दिन के फुरसत और प्रचार का माहौल बनाता है। हर आदमी देखता है कि चुनाव की छुट्टी सोमवार या शुक्रवार को हो तो तीन दिन का सप्ताहांत हो जायेगा। एक-दो दिन छुट्टी लेकर या वैसे भी कहीं घूम आने के लिए पर्याप्त है। ऐसे में वोट कौन देगा और वो छुट्टी के दिन क्यों नहीं। जो भी हो इस बार सात में से दो मतदान शुक्रवार को, दो सोमवार को और दो शनिवार को थे। मेरे ख्याल से सातो इतवार या मंगलवार और मंगलवार में दिक्कत हो तो बुधवार, गुरुवार को होते तो सप्ताहांत लंबा नहीं होता।  

1. अमर उजाला

मुख्य शीर्षक है, कश्मीर के बारामुला में 40 साल का रिकार्ड टूटा, बंगाल में हिंसा के बीच 76.05 प्रतिशत मतदान। उपशीर्षक है, पांचवें चरण में कुल 60.48 फीसदी वोटिंग हुई। 

2. नवोदय टाइम्स

59.06 प्रतिशत लोगों ने डाले वोट। एक अलग खबर का शीर्षक है, बारामूला में रिकार्ड तोड़ 59 प्रतिशत मतदान।

3. हिन्दुस्तान टाइम्स

पांचवें चरण में मतदान बढ़ा। एक अलग खबर का शीर्षक है, बारामुला में चुनाव प्रक्रिया ने प्रभावशाली भागीदारी देखी।

4. इंडियन एक्सप्रेस

उपशीर्षक है, चुनाव आयोग के अनुसार कुल मतदान 60.09 प्रतिशत। शीर्षक है, पांचवां चरण मामूली कमी, बारामुला में 1984 के बाद सबसे ज्यादा मतदान रिकार्ड हआ। इसके साथ एक और खबर है जिसका शीर्षक है, बारामुला में 56.73 प्रतिशत प्रतिशत मतदान, मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा जम्मू और कश्मीर में शीग्र चुनाव कराने के संकेत।

5. द हिन्दू

‘शहरी उदासीनता’ ने मतदान के प्रतिशत को कम करके 60.4 प्रतिशत पर पहुंचा दिया। चुनाव आयोग ने मुंबई, ठाणे, नासिक, लखनऊ में कम मतदान को रेखांकित किया; पांचवें चरण में महाराष्ट्र में सबसे कम मतदान रिकार्ड हुआ। पश्चिम बंगाल में जहां कई जगह हिंसा हुई, 76.05 प्रतिशत मतदान हुआ। चुनाव आयोग ने अपील की थी और द हिन्दू ने छापा था कि लोग ‘शहरी उदासीनता’ छोड़कर मतदान करें।  

6. टाइम्स ऑफ इंडिया

चरणों में सबसे छोटे में, मतदान 60.3 प्रतिशत, 2019 में मतदान 62.5 प्रतिशत था। इंट्रो है, राय बरेली, अमेठी में पिछली बार के मुकाबले ज्यादा मतदान हुआ।  एक अलग खबर में बताया गया है कि मुंबई में भारी गर्मी के बावजूद 30 साल से ज्यादा समय में दूसरा सबसे ज्यादा मतदान हुआ।

मुझे लगता है कि चुनावों को लेकर लोगों की दिलचस्पी कम हुई है और मतदान वहीं ज्यादा है जहां लोग कुछ करना चाहते हैं या जहां लोगों को लगता है कि कुछ हो सकता है। इस लिहाज से अमेठी और राय बरेली में मतदान प्रतिशत बढ़ने का मतलब है कि लोग इस बार के उम्मीदवारों के जीतने या हारने में दिलचस्पी रखते हैं और इसलिए वोट देने निकले हैं। उदाहरण के लिए अगर लोग चाहतें होंगे कि स्मृति ईरानी बनी रहें तो वोट देने निकलेंगे। इसी तरह अगर कोई चाहेगा कि सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी रायबरेली से जीतें और आगे भी लड़ें तो वह वोट देगा। और मतदान में उसकी दिलचस्पी का कारण केंद्र या राज्य की सरकार नहीं भी हो तो वह अपने उम्मीदवार के लिए वोट डालेगा। ऐसा ही बंगाल में और मुंबई के मतदाताओं के साथ लग रहा है। हालांकि असली परिणाम तो चार जून को ही सामने आयेगा।

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