
संजय कुमार सिंह
मुझे लगता है कि अखबारों को अपनी भूमिका और उसके नुकसान का अहसास हो रहा है। कल मैंने अपना यह कॉलम नहीं लिखा क्योंकि कल के अखबारों में मुझे ना तो भाजपा सरकार का अंध समर्थन मिला और ना ही आम आदमी पार्टी या कांग्रेस अथवा राहुल गांधी का गैर जरूरी विरोध या उपेक्षा जैसा कुछ नजर आया। इसलिए मैंने कल लिखा ही नहीं। दरअसल कल कुछ खास खबर थी ही नहीं थी। वैसी खबरें तो आज भी नहीं है लेकिन हेडलाइन मैनेजमेंट दिखता है। कल वो भी नहीं दिखा। आज भी नहीं दिखा और मैं कई घंटे से अखबार पलट रहा हूं और अभी अचानक दि एशियन एज में उपरोक्त शीर्षक चमका। इसके साथ उपशीर्षक दो बुलेट प्वाइंट हैं और संभव है यह भाजपा की राजनीति में मोदी की मजबूरी हो पर अखबार यही तो करते रहे हैं। आज खास बात यह है कि बाकी अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर इतनी प्रमुखता से नहीं दिखी। इस खबर या शीर्षक के ऊपर एक फोटो है जिसका शीर्षक अखबार ने, “महाकुम्भ के बाद : प्रयागराज की सफाई लगाया है।” पीटीआई की इस फोटो का कैप्शन है, प्रयागराज में संगम पर महाकुंभ के समापन के एक दिन बाद गुरुवार को पूजा सामग्री और अन्य कचरा एकत्र किया जा रहा है।
कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसी फोटो कुम्भ के दौरान छपती तो मुख्यमंत्री की हाल की घोषणा के अनुसार फोटोग्राफर (और संभवतः छापने वाले भी) गंदगी देखने और उसकी खपत करने वाले सूअर करार दिये जाते पर अब इसे सामान्य माना जा सकता है। मेरे हिसाब से दिल्ली के अंग्रेजी अखबार के लिए यह पहले पन्ने की खबर नहीं है पर संपादकों को न सिर्फ जगह भरना होता है, संतुलित भी दिखना होता है। जो भी हो, गौरतलब है कि यह फोटो और प्रधानमंत्री की प्रशंसा आज मेरे किसी और अखबार में पहले पन्ने पर इतनी प्रमुखता से नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह टॉप पर सिंगल कॉलम है। यहां इसे एकता का महाकुम्भ बताया गया है। द टेलीग्राफ में भी यह खबर पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है। बताया गया है कि खबर का विस्तार अंदर राष्ट्रीय खबरों के पन्ने पर है। द टेलीग्राफ की लीड कोलकाता की स्थानीय खबर है जो एक परिवार की सामूहिक आत्महत्या की कोशिशों और उसके बाद की घटनाओं से संबंधित है। प्रधानमंत्री ने कुम्भ की तारीफ की शीर्षक से पहले पन्ने पर छपी खबर के विस्तार का फ्लैग शीर्षक अंदर के पन्ने पर इस प्रकार है, मोदी ने मणिपुर के लिए नहीं, कुंभ में हुई चूक के लिए माफ़ी मांगी, अगर कोई हो। इस खबर का मुख्य शीर्षक है, प्रधानमंत्री की प्रशंसा भगदड़ पर चुप है। इससे आप खबरों की प्रस्तुत और संपादन का खेल समझ सकते हैं।
मेरे आठ अखबारों ने कल और आज ‘राजा का बाजा’ नहीं बजाया इसका मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिये कि उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का अहसास हो गया है या वे विज्ञापनों के दबाव अथवा लालच से मुक्त हो गये हैं। आज ज्यादातर अखबारों में दिल्ली विधानसभा की खबर लीड है। यह आम आदमी पार्टी की हार को जायज बताने या उसे बदनाम करने की भाजपाई कोशिशों का समर्थन और उसका प्रचार है। उदाहरण के लिए, नवोदय टाइम्स की आज की लीड का शीर्षक है, आज निकलेगा मोहल्ला क्लिनिक का जिन्न!। यह खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है और टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। यहां इसका शीर्षक है, “मोहल्ला क्लिनिक में चर्चा (डॉक्टर और मरीज के बीच) बमुश्किल एक मिनट चली : सीएजी”। खबर के अनुसार सीएजी की रिपोर्ट में बताया गया है कि मोहल्ला क्लनिक में स्टाफ और उपकरणों की कमी भी थी। इस शीर्षक से यह मेरे किसी और अखबार में लीड नहीं है। दि एशियन एज में लीड का शीर्षक है, आप विधायकों को विधानसभा से प्रतिबंधित किया गया, धरना दिया। यहां इसके साथ एक और खबर है, “शीश महल की जांच करेंगे : प्रवेश”। इससे आप समझ सकते हैं कि दिल्ली जीतने के बाद भाजपा क्या कर रही है और संभव है यह संपादकों को पसंद हो इसलिए आज दूसरे अखबारों में यह सब लीड या पहले पन्ने पर नहीं है। अफसोस, यह सब सीएजी की रिपोर्ट की आड़ में हो रहा है जो केंद्र सरकार के मामले में आई ही नहीं और जब आई थी तो सीएजी की रिपोर्ट और उसके पुराने दुरुपयोग पर मैं पहले यहां लिख चुका हूं।
वैसे भी, मोहल्ला क्लिनिक की अवधारणा बेहद अभिनव और इसके मूल में जनहित या जनसेवा है। इसका मकसद लाभ कमाना होना ही नहीं चाहिये और कम उपकरणों से अगर काम चल रहा है, जनता को लाभ है तो जैसा भी था, बुरा नहीं था। वास्तव में था कि नहीं इसका फैसला अभी तक चुनावों में होता था पर भाजपा ने मतदाता सूची में छेड़छाड़, हिन्दू मुसलमान, झूठे आरोप और ईवीएम पर शंका जारी रखकर जो व्यवस्था बनाई है उसमें काम करने या जनसेवा से वोट नहीं मिलता और नकद बांटने के उदाहरण हैं। दूसरी ओर, उसे रेवड़ी कहने का भी। ऐसे में मोहल्ला क्लिनिक को बदनाम करने का मकसद यह है कि डबल इंजन वाले राज्यों में इसकी मांग या जरूरत नहीं हो। दूसरी ओर सरकार को जांच और कार्रवाई ही करनी है तो उनकी करे जो हजारों की फीस लेकर भी जो इलाज करते हैं उससे लाभ नहीं होता है। सामान्य सर्दी खांसी के लिए मुझे डॉक्टर को दिखाने, जांच दवा आदि में पांच हजार रुपये लग गये और बहुत फायदा भी नहीं हुआ। मोहल्ला क्लिनिक में डॉक्टर की फीस तो नहीं ही लगती जो मुझे दो बार में 1400 रुपये देने पड़े। मैं जानता हूं कि बीमारी शुरू में ही पकड़ी जाये तो ठीक हो जाती है। पैसे कम लगते हैं और तकलीफ भी कम होती है। इसलिए मैंने समय रहते डॉक्टर को दिखाया लेकिन जो खर्च हुआ उस कारण सबके लिए संभव नहीं है और जब बीमारी बढ़ेगी तो मरीज को और मुश्किल होगी। केंद्र सरकार के पास उसके लिए आयुष्मान योजना है जिसका लाभ मुझे तो छोड़िये बहुतों को नहीं मिलेगा। ऐसे में मोहल्ला क्लिनिक की उपयोगित छोड़कर उसकी खामियां ढूंढ़ना भाजपा की भ्रष्ट राजनीति का भाग है और आम जन के हिस में नहीं है। फिर भी उसी को प्रचारित किया जा रहा है।
जहां तक सीएजी की रिपोर्ट की बात है, 2023 में केंद्र सरकार की योजनाओं में अनियमितताओं का पता लगाने वाले तीन ऑडिटर्स का तबादला कर दिया गया था। इस रिपोर्ट की चर्चा नहीं के बराबर हुई थी और बाद में सीएजी ने कहा था कि उनके तबादले से संबंधित मीडिया रिपोर्ट आधारहीन है। उसके बाद फिर केंद्र सरकार की किसी योजना पर सीएजी की रिपोर्ट का पता नहीं चला। हो सकता है तबादले की खबर आधारहीन ही हो पर मुद्दा यह है कि उस रिपोर्ट की चर्चा क्यों नहीं हुई और अब आप के खिलाफ क्यों हो रही है। तबादला हमेशा नियमानुसार ही होता है और इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने वाले सीबीआई अधिकारी का भी हुआ था। उन्हें तो गिरफ्तार करने की भी कोशिश हुई थी। सीबीआई से बाहर कर दिया गया था और फिर सीबीआई में लाया गया। उन्हें परेशान किया गया और यह सब उनकी किताब, खरा सत्य अंग्रेजी में द प्लेन ट्रुथ में है। 2014 के बाद भारत चाहे जितना बेहतर हुआ हो, केंद्र सरकार के खिलाफ काम करने वालों का तबादला हो ही रहा है। अनुकूल अफसरों को ईनाम देना बढ़ गया है और एक मामले में तो एक वरिष्ठ पत्रकार ने लोकसभा चुनाव हार चुके रिटायर आईएएस अधिकारी को राज्य सभा में भेजने की सलाह भी दी थी। लोकसभा का चुनाव एनके सिंह भी हार गये थे पर तब उन्हें किसी ने राज्यसभा में भेजने की सलाह दी हो या नहीं, भेजा नहीं गया था।

आज के इन अखबारों में जब राजनीति लीड है तब इंडियन एक्सप्रेस ने मणिपुर की खबर को लीड बनाया है। इसके अनुसार, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के दो हफ्ते बाद मणिपुर के जातीय उग्रवादियों ने लूटे हुए हथियारों का बड़ा जखीरा वापस किया। राज्यपाल की डेडलाइन खत्म होने तक अरामबाई तेंगगोल ने 246 हथियार लौटाये। वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने लिखा है, सुरक्षा बलों से लूटे हुये 246 हथियार सरेंडर करने वाला संगठन कौन है, इसे जानना जरूरी है। फेसबुक पोस्ट के अनुसार, 1. अरामबाई तेंगगोल मणिपुर में एक मैतेई हथियारबंद और अतिवादी संगठन है 2. इसके संस्थापक अध्यक्ष लीशेम्बा सनाजाओबा हैं 3. लीशेम्बा सनाजाओबा को बीजेपी ने राज्यसभा सांसद बनाया है। 4. लीशेम्बा सनाजाओबा के पूर्व मुख्यमंत्री बीरेन सिंह से गहरे संबंध रहे हैं। मणिपुर की हिंसा कौन करा था और क्यों थम नहीं पा रही थी इसका जवाब बहुत मुश्किल नहीं है। रिपोर्ट हैं कि सरेंडर हथियार लूटे हुये का कोई 6000 हथियारों का 5% भी नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि आज की लीड क्या होनी चाहिये थी। जो है आप देख रहे हैं। कुछेक की चर्चा कर चुका। कुल मिलाकर मामला यह है कि अखबार न सिर्फ सरकार का प्रचार करते हैं बल्कि खबरें छिपाते भी हैं और यह रेत में शुतुर्मुर्ग के सिर छिपाने की तरह है।
कहने की जरूरत नहीं है कि आज की प्रमुख खबरों में केंद्र या भाजपा सरकार की प्रशंसा या आम आदमी पार्टी की आलोचना भले नहीं थी। मणिपुर के मामले के साथ दक्षिण भारत में हिन्दी और लोकसभा क्षेत्रों के परिसीमन का मुद्दा तो है ही। आजतक डॉट इन की एक खबर के अनुसार, ‘परिसीमन के नाम पर भारत के दक्षिणी राज्यों पर एक तलवार लटक रही है। हमारी लोकसभा सीटों में कटौती होने जा रही है और तमिलनाडु की 8 लोकसभा सीटें कम हो जाएंगी।’ तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और केंद्र की एनडीए सरकार के धुर राजनीतिक विरोधी एमके स्टालिन ने 25 फरवरी को ये बयान देकर भारत में उत्तर बनाम दक्षिण की नई बहस छेड़ दी थी लेकिन यह मुद्दा अभी भी खबरों में वैसे नहीं है जैसे होना चाहिये। मुझे लगता है कि इसका कारण इसमें केंद्र की भाजपा सरकार का फंसा होना है। दक्षिण के राज्यों को डर है कि उनकी सीटें कम होंगी। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इस बारे में आश्वासन भी दिया है लेकिन आज तक की यह रिपोर्ट कहती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परिसीमन का आधार क्या होगा। अगर सिर्फ जनसंख्या को आधार बनाया गया तो निश्चित रूप से उनकी सीटें घटेंगी। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु की आबादी करीब 7.6 करोड़ है और वहां 39 लोकसभा सीटें हैं, जबकि उत्तर प्रदेश की आबादी 22 करोड़ से ज्यादा है और वहां 80 सीटें हैं। नए परिसीमन में उत्तर प्रदेश की सीटें बढ़ सकती हैं, लेकिन तमिलनाडु की बढ़ने की गुंजाइश कम है।
इंडियन एक्सप्रेस के एक अध्ययन के अनुसार 2025 तक यूपी-उत्तराखंड की आबादी 25 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, अगर 20 लाख की आबादी पर एक लोकसभा सीट को आधार बनाया गया तो यूपी-उत्तराखंड के हिस्से में 126 लोकसभा सीटें आएंगी, बिहार-झारखंड के हिस्से में 85 सीटें आएंगी, जबकि तमिलनाडु की सीटें 39 ही रहेंगी और केरल की सीटें 20 से घटकर 18 हो जाएंगी। गौरतलब है कि ये निजी आकलन है। अगर 1976 की तरह 10 या 11 लाख की आबादी पर एक सांसद का प्रतिनिधित्व स्वीकार किया गया गया तो यूपी-उत्तराखंड, बिहार-झारखंड की लोकसभा सीटों में बंपर इजाफा होगा। ऐसी स्थिति में यूपी-उत्तराखंड की लोकसभा सीटें 250, बिहार-झारखंड की 169, राजस्थान की 82, तमिलनाडु की 76 और केरल की 36 सीटें हो जाएगी। अगर क्षेत्रफल या अन्य मापदंडों को भी शामिल किया गया, तो दक्षिणी राज्यों नुकसान कम हो सकता है। लेकिन जैसा कि गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार को स्पष्ट कहा है कि किसी भी राज्य की एक भी सीट नहीं घटेगी तो इसका मतलब है कि केंद्र अलग पॉलिसी पर काम कर रही है। दरअसल अभी परिसीमन का फॉर्मूला भी स्पष्ट नहीं है। इसलिए परेशानी वाजिब है लेकिन खबरें? आज पहले पन्ने की खबर है, वक्फ संशोधन विधेयक को 14 बदलावों के साथ कैबिनेट की मंजूरी, डब्ल्यूटीसी बिल्डर और भूटानी समूह के ठिकानों पर ईड के छापे और जीएसटी के मामलों में एफआईआर न हो तो भी मांगी जा सकती है अग्रिम जमानत (लीड)। ये सब आज अमर उजाला की खबरें हैं। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने परिसीमन पर (अमित) शाह की टिप्पणी की आलोचना की। इंटरनेट पर हिन्दुस्तान की खबर का शीर्षक है, झूठ फैला रहे अमित शाह; परिसीमन को लेकर गृहमंत्री के आश्वासन पर सिद्धारमैया का तंज। इस खबर के अनुसार मुख्यमंत्री ने कहा कि हो सकता है गृहमंत्री के पास सटीक जानकारी की कमी हो, लेकिन अगर हमारे गृहमंत्री के पास ही सटीक जानकारी का अभाव है तो यह चिंता की बात है। हिन्दुस्तान के प्रिंट एडिशन में पहले पन्ने पर चार कॉलम की खबर का शीर्षक है, हिन्दी भाषा पर केंद्र और तमिलनाडु की तकरार बढ़ी। मुझे लगता है कि केंद्र की भाजपा सरकार का समर्थन कर रहे अखबारों ने अभी तक मोदी सरकार का समर्थन देकर उनका भला किया है भले देश का जो हुआ उसके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जाये। पर अब जो हो रहा है उसे नहीं बता कर या उसकी प्राथमिकता बिगाड़कर संपादक प्रचारक सरकार को भले बचा लें देश का जो हो रहा है उसे नहीं संभाल पायेंगे। मणिपुर उदाहरण है।


