यही नहीं, बांग्लादेश में निष्पक्ष चुनाव भी जरूरी बताया है, तारिक रहमान की वापसी पर सतर्क है और आप जानते हैं कि शेख हसीना भारत में ही रह रही हैं। लाइव हिन्दुस्तान के अनुसार, कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा है, भारत ने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को वापस जाने के लिए मजबूर न करके सही मानवीय भावना दिखाई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वह भारत की लंबे समय से दोस्त रही हैं और जब तक कानूनी पहलुओं की सावधानी से जांच नहीं हो जाती, तब तक उन्हें सुरक्षा मिलनी चाहिए। ….प्रत्यर्पण से जुड़े मामलों में जटिल कानूनी प्रावधान, संधियां और अपवाद शामिल होते हैं। इन्हें बहुत कम लोग पूरी तरह समझते हैं। …. मैं यह फैसला सरकार पर छोड़ता हूं कि वह उचित विचार करे….।”
संजय कुमार सिंह
नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री रहते हुए पहली बार क्रिसमस पर चर्च गए थे और इस बार देश भर में क्रिसमस पर सबसे ज्यादा हुड़दंग हुआ। निश्चित रूप से यह ‘नामुमकिन मुमकिन है’ का सच होना था लेकिन इसकी खबरें कल पहले पन्ने पर नहीं छपी थीं। मैंने यहां लिखा भी था। यह भी लिखा था कि बांग्लादेश में हिन्दू युवक की हत्या को यहां के अखबारों में प्रमुखता मिली थी। आज मेरे सभी नौ अखबारों में कइयों की लीड और पहले पन्ने की प्रमुख खबरों में एक का शीर्षक है, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमले गंभीर, नजरअंदाज नहीं कर सकते। अमर उजाला की इस खबर का उपशीर्षक है, विदेश मंत्रालय की दो टूक…. हिन्सा की 2900 से ज्यादा घटनाएं, सियासी कहकर नहीं कर सकते खारिज। एक और उपशीर्षक है, भारत के खिलाफ की जा रही दुष्प्रचार की साजिश। इसके अलावा जो खबरें और छोटे शीर्षक हैं वे इस प्रकार हैं 1) निष्पक्ष चुनाव के लिए अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का भरोसा दिलाना जरूरी 2) हिन्सा की निष्पक्ष जांच हो, पीडि़तों को मिले न्याय। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत की स्थिति पर ऐसी खबर ढूंढ़नी पड़ती है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, दीपू चंद्र दास के हत्यारों को दंडित करे बांग्लादेश। उपशीर्षक है, अल्पसंख्यकों के खिलाफ जारी शत्रुतापूर्ण गतिविधियां चिन्ता का विषय : भारत”। देशबन्धु में इस खबर का शीर्षक है, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिन्सा चिन्ता का विषय : भारत। हालांकि एक और खबर का शीर्षक है, बांग्लादेश का सांप्रदायिक हिन्सा मानने से इनकार।
अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ और इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक कुछ अलग है। द टेलीग्राफ ने लिखा है, निष्पक्ष चुनाव बांग्लादेश के लिए महत्वपूर्ण : भारत। अखबार ने यह भी बताया है कि तारिक की वापसी को लेकर भारत सतर्क है। दि एशियन एज में यह खबर लीड नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर चार कॉलम में है। भारत ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले को रेखांकित किया। द हिन्दू में इसी शीर्षक से यह खबर लीड है। उपशीर्षक के अनुसार, भारत ने यह भी दोहराया है कि वह ‘समावेशी’ चुनाव चाहता है। यह दिलचस्प है कि भारत में एसआईआर को समावेशी नहीं माना गया है और यह आरोप लगता रहा है कि एसआईआर का मकसद समावेशी नहीं है और एसआईआर के ऐसे नियम हैं कि लोगों के नाम कटेंगे। कल जब देश के 12 राज्यों में एसआईआर की अंतिम तिथि थी तो आज खबर है कि कई राज्यों ने इसकी शिकायत की है। लाखों नाम कटने की खबरों के बीच एसआईआर में पारदर्शिता न होना और एक नाम दो जगह होना जांचने के लिए सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल नहीं किए जाने से कई नाम एक से ज्यादा बार हैं और एसआईआर पूरा होने को है जबकि बिहार में एसआईआर के बाद भी कई गलतियां रह गई हैं और उसपर चुनाव आयोग के जवाब या स्पष्टीकरण के बावजूद देश भर के कई राज्यों में एसआईआर हो गया। इसका मकसद भाजपा को फायदा पहुंचाना माना जा रहा है। भारत सरकार यहां के चुनावों के प्रति कम गंभीर लग रही है जबकि बांग्लादेश चुनाव पर उसकी चिन्ता आज सार्वजनिक है और भारतीय अखबारों में प्रमुखता से छपी है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह खबर लीड है और शीर्षक है, ‘नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता’: बांग्लादेश हमलों पर भारत। खबर इस प्रकार है, भारत ने शुक्रवार को बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ “लगातार गुस्सा” दिखाने पर गहरी चिंता जताई। हिंदू व्यक्ति दीपू चंद्र दास की लिंचिंग के लिए जिम्मेदार लोगों को न्याय के कटघरे में लाने की अपनी मांग दोहराई। यह पड़ोसी देश से भारत विरोधी बयानबाजी से पैदा हुए नए तनाव को दिखाता है। उल्लेखनीय है कि 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद दिल्ली के पास दादरी के बिसाडा में एक व्यक्ति के घर में घुसकर फ्रीज में रखे मांस की जांच की गई और भीड़ ने अखलाख की हत्या कर दी थी। आरोपी गिरफ्तार जरूर हुए लेकिन उन्हें बचाने, उनका सम्मान करने की कोशिशें चलती रहीं। सरकार की ओर से पीड़ित परिवार के प्रति सहानुभूति जताने की भी कोई खबर मुझे याद नहीं है। लेकिन हाल में खबर मिली कि सरकार कुछ आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेना चाहती है। हालांकि अदालत ने इससे मना कर दिया। अदालत की बात चली तो याद आया कि दिल्ली में प्रदूषण के चलते एक अदालत ने कहा है कि हवा साफ करने वाली मशीन (एयर प्यूरीफायर) पर जीएसटी कम किया जाए। सरकार की ओर से कहा गया है कि अदालत ने ऐसा करने के लिए कह दिया तो ढेरों समस्याएं खड़ी हो जाएंगी। आप जानते हैं कि सरकार ने तमाम उत्पादों पर भारी जीएसटी वसूली। राहुल गांधी ने गब्बर सिंह टैक्स कहना शुरू किया तो कई साल बाद दरें कम कर दी और उसका खूब प्रचार किया तथा करवाया। बचत उत्सव माने की अपील की और सरकारी राजस्व कम होने का राजनीतिक लाभ उठाया। अब प्रदूषण के कारण हवा साफ करने की मशीन खुद तो सस्ती नहीं ही की, अदालत के कहने पर भी तैयार नहीं है। दूसरी ओर चाहती है कि बांग्लादेश की अदालत भी सरकार की मांग या सलाह के अनुसार काम करे।
जहां तक बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ माहौल की बात है, बहुत संभावना है कि इसका कारण भारत में घुसपैठियों के खिलाफ चल रहे अभियान के कारण नाराजगी हो। वैसे भी, प्रधानमंत्री और भाजपा का आरोप बिना सिर-पैर का है और कितने घुसपैठिये मिले, यह नहीं बताया जा रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड का शीर्षक है, भारत ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नाराजगी की आलोचना की। इंट्रो है, हिन्दुओं की हत्या गंभीर चिन्ता का विषय। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक आम अखबारों से थोड़ा अलग है। अखबार ने कहा है कि भारत की यह प्रतिक्रिया बीएनपी नेता तारिक रहमान के ढाका पहुंचने के बाद पहली है और भारत ने कहा है, चुनाव समावेशी होने चाहिए। इंडियन एक्सप्रेस में आज बांग्लादेश में होने वाले चुनाव पर भारत की इस सलाह के साथ यहां हुए और चले एसआईआर की भी खबर है। इसके अनुसार, मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण के दौरान बिहार अगर प्लेबुक था तो बंगाल में लोगों को इससे अलग रखने की कवायद हुई। इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल को लिखे एक पत्र में, पश्चिम बंगाल सिविल सर्विस (एग्जीक्यूटिव) ऑफिसर्स एसोसिएशन ने बुधवार को “चल रही एसआईआर प्रक्रिया में ईआरओ की वैधानिक भूमिका को दरकिनार करते हुए पश्चिम बंगाल की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से मतदाताओं को सिस्टम द्वारा अपने आप हटाने का मुद्दा उठाया। इस पत्र की कॉपी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ऑफिस को भेजी गई है। रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950 के अनुसार, अगर ईआरओ को किसी वोटर की योग्यता, जिसमें नागरिकता भी शामिल है, पर शक होता है, तो नोटिस जारी करने का एकमात्र और सक्षम अधिकार उन्हीं के पास है। हालांकि, वोटर लिस्ट के चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन में, नोटिस जारी करने के लिए ईसीआई के सेंट्रलाइज्ड पोर्टल का इस्तेमाल किया गया है। इंडियन एक्सप्रेस ने 16 दिसंबर को रिपोर्ट किया था कि बिहार भर के ईआरओ ने ईसीआई के सेंट्रलाइज्ड पोर्टल पर अपने-अपने लॉग-इन पर “पहले से भरे हुए नोटिस” देखे थे।
जाहिर है, सरकार यानी प्रधानमंत्री भारत के मामले में तो ध्यान नहीं दे रहे हैं लेकिन बांग्लादेश की पूरी चिन्ता कर रहे हैं। बांग्लादेश की राजनीति में लंबे समय तक दो प्रमुख राजनीतिक परिवारों की वंशवादी भूमिका रही है। बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान की बेटी शेख हसीना 1981 से अवामी लीग की अध्यक्ष हैं और 1996 से 2001 तथा 2009 से 2024 तक सत्ता में रहीं। पूर्व राष्ट्रपति ज़ियाउर रहमान ने 1 सितंबर 1978 को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना की थी। यह बांग्लादेश की दो प्रमुख पार्टियों में से एक है। जियाउर रहमान की विधवा खालिदा ज़िया 1991 से 1996 तथा 2001 से 2006 तक दो बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं। इनके बड़े बेटे तारिक रहमान (60) बीएनपी के अंतरिम अध्यक्ष हैं। 5 अगस्त 2024 को व्यापक जन आंदोलन और हिंसा के बीच शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी और वे भारत चली आईं। इससे एक संवैधानिक संकट उत्पन्न हुआ क्योंकि बांग्लादेश का संविधान ऐसी स्थिति का स्पष्ट प्रावधान नहीं करता था। बाद में एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ, जिसका नेतृत्व नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस ने किया। अंतरिम सरकार ने देश में नये चुनाव का रोडमैप तैयार किया है। बांग्लादेश में आम चुनाव 12 फरवरी 2026 को निर्धारित किए गए हैं। भारत ने संकट के दौरान शांति की अपील की और कहा कि बांग्लादेशी लोकप्रिय हित सर्वोपरि हैं। वह सीधे हस्तक्षेप से बचने की बात करता रहा। लेकिन सीमा पार के मुद्दों, अल्पसंख्यकों पर हमलों और कुछ नागरिक मामलों को लेकर दोनों देशों के दूतावास अधिकारियों को तलब भी किया गया। बांग्लादेशी राजनीति में अंतरिम सरकार और बीएनपी नेतृत्व ने यह आरोप लगाया है कि भारत ने शेख हसीना को शरण देकर राजनीति में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई है। दक्षिण एशिया में स्थिरता के लिए भारत-बांग्लादेश संबंधों को महत्वपूर्ण माना जाता है। किसी भी अस्थिरता का पर्यावरणीय, आर्थिक और मानवाधिकार प्रभाव पड़ सकता है।

फोटो मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


