भाषा के प्रति दूसरों को सचेत करनेवालों को स्वयं की त्रुटियों पर भी ध्यान देना चाहिए

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विकास मिश्रा जी ने हिंदी भाषा की वर्तनी संबन्धी त्रुटियाँ बताईं- ”पत्रकारिता में हिंदी का नरक युग” नामक लेख में। हिंदी भाषा की शुद्धता पर ध्यान देने के लिए निश्चत रूप से मिश्राजी धन्यवाद के पात्र हैं। मेरे विचार से हिंदी भाषा में की जाने वाली कुछ त्रुटियाँ ऐसी हैं, जो चलन में हैं और उनसे भाषा की बड़ी क्षति भी नहीं है। जिस तरह उन्होंने बताया कि नरक को नर्क लिखना। हाँ, कुछ त्रुटियाँ ऐसी की जाती हैं, जो वास्तव में भाषा समझने वाले पाठक को दु:खी करती हैं, असहनीय हैं और भाषा के विकास के लिए हानिप्रद हैं।

हिंदी भाषा पर सही में ध्यान देने की आवश्यकता है और मुझे उसके अस्तित्व पर ही संकट दिख रहा है। मेरा मत है कि किसी भी एक भाषा में दूसरी भाषा के शब्दों का आटे में नमक की तरह प्रयोग चल सकता है, लेकिन जिस तरह हिंदी में अंग्रेज़ी और उर्दू भाषाओं को भरने का चलन बढ़ रहा है, वह हिंदी के लिए चिंता का विषय है। इसी तरह उर्दू, अंग्रेज़ी या अन्य किसी भाषा को खिचड़ी बना देना उसी प्रकार चिंता की बात होगी।

बहरहाल, विकास जी द्वारा लिखे पत्र में भी भाषा और वर्तनी की त्रुटियाँ हैं। क्योंकि वे शब्द चलन में आ चुके हैं। शायद मिश्रा जी ने इस पर कभी ध्यान नहीं दिया होगा। अन्यथा न लें और सोचें कि यदि भाषा के प्रति दूसरों को सचेत करनेवाले स्वयं त्रुटियाँ करेंगे, तो मामला गड़बड़ रहेगा? यह सच है कि सर्वज्ञ कोई नहीं होता, किन्तु सहज त्रुटियों से तो बचना ही होगा। कृपया देखें-

* जब हम भाषा की शुद्धता की बात करते हैं, तो उर्दू भाषा के शब्दों को इस्तेमाल करते समय उनके नुक्तों पर भी ध्यान देना होगा।

-विकास जी के पत्र में उर्दू के कई शब्द प्रयोग किए गए हैं, लेकिन नुक्ते नहीं लगाए। कम-से-कम नकवी, रमज़ान और नमाज़ जैसे शब्दों में तो प्रयोग किया जाना ही चाहिए। उर्दू के कई शब्दों में नुक्ते लगाने या नहीं लगाने से अनर्थ हो जाता है, इस पर हिंदी भाषी ध्यान नहीं देते हैं। आमतौर पर लोग अंग्रेज़ी शब्दों में नुक्ते लगा देते हैं, उर्दू में नहीं, यह भाषानुगत ठीक बात नहीं।

* अशुद्धि, शुद्ध, सिद्धम्, विरुद्धम्

-इन शब्दों में द अक्षर आधा चाहिए, जब कि प्रयोग में ध को आधा किया जाता है, यह गलत है। यहाँ तकनीकी समस्या बताकर हम त्रुटि होने की बात से बच नहीं सकते हैं, त्रुटि को स्वीकारना होगा। इन्हें लिखना चाहिए- अशुद्धि, शुद्ध, सिद्धम़्, विरुद्धम्।

* एक वाक्य में लिखा है- जनरुचि को मनाकर…।

-यह विन्यास गलत है। आप जन को मना सकते हैं, जनरुचि को नहीं। उसे तो परिवर्तित  किया जाएगा।

* एक वाक्य में लिखा है- तब वो आजतक में नहीं थे।

-वो शब्द लोग बोलचाल में प्रयोग कर लेते हैं, लेकिन लिखने के लिए उचित नहीं। यहाँ सीधा समानसूचक वे शब्द आना चाहिए था।

* यह और ये का प्रयोग…

-पत्र में कहाँ यह शब्द प्रयोग होगा और कहाँ ये, इसका ध्यान नहीं दिया। जहाँ यह शब्द आना चाहिए था, वहाँ ये प्रयोग किया है। ऐसी गलती आप अंग्रेज़ी में नहीं कर सकते।

* एक वाक्य में लिखा है- भाषा ऐसी चीज़ है…।

-भाषा वस्तु नहीं है? उसे चीज़ कैसे लिख सकते हैं।

* दरअसल

-दरअसल गलत है, सही है दरअस्ल, लेकिन हिंदी लेखन में दरअसल ही चलन में हो गया है।

* ओपेन?

-क्षमा करें। जब भाषा की शुद्धता पर बात करनेवालों को तो छोटी-से-छोटी त्रुटियों पर ध्यान देना होगा, वरना हम दूसरों की त्रुटियों पर कैसे सवाल कर सकते हैं?

ऐसे में अपनी व्याकरण और विन्यास दोनों के प्रति बेहद सचेत रहना पड़ेगा। मैं भी पेशे से पत्रकार हूँ।

 

भूपेन्द्र शर्मा
9893634566
bhopendrak.sharma@gmail.com

मूल लेखः

पत्रकारिता में हिंदी का ‘नरक’ युग

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Comments on “भाषा के प्रति दूसरों को सचेत करनेवालों को स्वयं की त्रुटियों पर भी ध्यान देना चाहिए

  • ग्रेट भड़ास says:

    भूपेंद्र जी, आपसे भी सीखने को मिला और विकास मिश्रा जी से भी। यशवंत भाई को ऐसे ज्ञानवर्द्धक लेख छापने के लिए धन्यवाद।

    Reply

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