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टीआरपी के लिए दूसरे के कपड़े फाड़ देने वाले टीवी संपादकों ने कल दिल्ली प्रोटेस्ट क्यों नहीं ताना?

नई दिल्ली। संसद मार्च के दौरान जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में पुलिस-प्रदर्शनकारियों की झड़प, बैरिकेडिंग, लाठीचार्ज और अफरातफरी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुईं। इसके साथ ही मुख्यधारा के टीवी चैनलों की कवरेज को लेकर भी बहस छिड़ गई है।

एक पूर्व टीवी पत्रकार ने सोशल मीडिया पर लिखा कि टीवी न्यूज़रूम की भाषा में इसे “विजुअल रिच” इवेंट कहा जाता है। उनका दावा है कि ऐसे घटनाक्रम सामान्यतः टीवी चैनलों के लिए टीआरपी का बड़ा मौका माने जाते हैं, जहां बड़ी संख्या में रिपोर्टर, कैमरे और ड्रोन तैनात किए जाते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी दृश्यात्मक घटनाओं के बावजूद अधिकांश टीवी चैनलों पर इसकी कवरेज अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई दी।

सोशल मीडिया पर कई यूजर्स भी यही सवाल उठा रहे हैं कि जिन घटनाओं में आमतौर पर घंटों लाइव कवरेज होती थी, उन्हें इस बार प्रमुखता क्यों नहीं मिली। इसी के साथ एक बार फिर भारतीय टीवी मीडिया की संपादकीय प्राथमिकताओं और उसकी स्वतंत्रता को लेकर बहस तेज हो गई है।


Portrait of a man with gray hair and glasses, wearing a black high-collar jacket, smiling in front of beige curtains.
शैलेंद्र झा वरिष्ठ पत्रकार

मैं टीवी में काम किया हुआ बंदा हूं। आज जंतर मंतर पर जो हो रहा था टीवी की ज़ुबान में उसे विजुअल रिच कहते हैं। ऐसे विजुअल्स की उम्मीद हो तो दस रिपोर्टर, बीस कैमरे, ड्रोन सब तन जाते हैं। संपादक का एक ही वर्ड होता है – तान दो।
तान दो मतलब टीआरपी की फुल गारंटी।
हमने वो दौर देखा है जब टीआरपी के लिए एक संपादक दूसरे के कपड़े फाड़ देता था।
ऐसे विजुअल रीच कंटेट को आपने किस चैनल पर आपने कितनी बार देखा?
आप कह रहे हैं गोदी मीडिया नहीं है?
-शैलेंद्र झा

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