सत्येंद्र पीएस-
मैं धर्म और अध्यात्म को हमेशा से राजनीति, जॉब, पेट पालने से परे, ऊपर की चीज मानता रहा हूँ। बेसिकली कोई दरिद्र आदमी आध्यात्मिक और धार्मिक हो ही नहीं सकता।
जो भी व्यक्ति पेट के भूगोल में फंसा हुआ है, वह तो पेट भरने में ही अपना जीवन लगा देगा। उसकी हवस यह होगी कि हम कितना पैसा कमा लें, कितनी बड़ी पोस्ट पा लें, कितने बड़े नेता बन जाएं।
व्यक्ति जब इससे ऊपर उठता है तब वह सांसारिक दुखों के बारे में सोचता है कि हम क्यों दुःखी हैं? हम जीवन में तमाम लक्ष्य रखते हैं, उसे पा भी लेते हैं। उसके बावजूद दुःख नहीं जाता। किसी नई हवस, किसी नए हाय तौबा में फंस जाते हैं। ऐसा आदमी तो अगर भारत का प्रधानमंत्री हो जाए या देश का सबसे बड़ा उद्योगपति हो जाए तब भी वह भगवान/ईश्वर के पास गिड़गिड़ाते हुए यह मांगने जाएगा कि हे भोलेनाथ, हे राम, हे अवलोकितेश्वर हमको एक टर्म और दिला दो। हमारी अमेरिका और आस्ट्रेलिया में एक फैक्ट्री खोलवा दो।
यह अध्यात्म नहीं है। यह धर्म नहीं है। यह आपका भिखमंगापन है कि ईश्वर के सामने गिड़गिड़ाने जा रहे हैं कि हमारी हवस पूरी कर दे। जो गेरुआधारी धुक्कड़ टाइप लोग राजनीतिक नेताओं, अमीरों के चरणों में लोट रहे हैं वह धार्मिक नहीं, अतृप्त और भिखमंगे जैसे लोग होते हैं। यह दोनों साइड होते हैं। आप कल्पना करें कि कोई धार्मिक योगी है, मठाधीश है, उसे उत्तराधिकार में 1000 साल का अध्ययन, शोध मिला हुआ है, जिसे उसे आगे बढ़ाना है। वह वो काम न करके नेता बनने चल दिया। इसका मतलब यह हुआ कि वह हजारों साल की शिक्षा को नास कर रहा है। अपनी उस अतृप्त भिखारी इच्छा के लिए, जो वह नहीं पा सका और मठ पर बैठकर हासिल करना चाहता है। ऐसे लोगों के लिए ही कहा गया है कि मूड़ मुड़ाय भये सन्यासी।
अध्यात्म, धर्म, पराभौतिक चीजों को समझने और जानने की असल कोशिश तब होती है जब आप तृप्त हों कि आईएएस बनने से सुख नहीं मिला, सांसद बनने से सुख नहीं मिला, देश का बड़ा उद्योगपति बनने से सुख नहीं मिला, राजा बनने से सुख नहीं मिला। और आप उसके बाद रिसर्च पर निकल पड़े कि कैसे हम दुखों से मुक्त हो सकते हैं।

मैं अपने 2 मित्रों को लम्बे समय से हिंदुइज्म में देख रहा हूँ। एक हैं मध्य प्रदेश के इंदौर के पुरुषोत्तम कोरान्ने (पुरुषोत्तम आश्रम) और एक हैं उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के अखिलेश मणि (Akhilesh Shandilya) यह लोग मुझे विलक्षण लगते हैं। यह लोग धर्म पर काम करते हैं। कोई राजनीतिक या धन या कोई इस तरह की भौतिक महत्त्वाकांक्षा नहीं दिखती कि दंगा कराकर नफरत फैलाकर अपना कुनबा, अपना गिरोह बढ़ा लें। पुरुषोत्तम जी से डेढ़ दशक से जुड़ा हुआ हूँ। वह अपने कार्य में बेहद ईमानदार दिखते हैं। अखिलेश जी से तो मुलाकात भी है, उनका धर्म भी नफरत नहीं सिखाता।
नेपाल में महायोगी श्रीधर राणा रिनपोछे से मिला। राजपरिवार से हैं। यूरोप से मैनेजमेंट की पढ़ाई की। नेपाल टूरिज्म को ब्रांड बनाया। होटल मैनेजमेंट में टॉप पोस्ट पर रहे। अचानक सब कुछ छोड़कर बुद्धिज्म की प्रैक्टिस में लग गए। उनकी किसी टॉप पोस्ट पर पहुँचने की अभिलाषा नहीं है, कोई हवस बची ही नहीं। इसलिए जो काम कर रहे हैं, पूरे मनोयोग से कर रहे हैं।
पराभौतिक चीजों पर काम करना बहुत बड़ी चीज है।


