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सुख-दुख

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल चीफ जस्टिस की अवमानना के केस में फँसते फँसते बचे!

दिलीप मंडल-

मेरे ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अवमानना का केस दर्ज करके के लिए भारत के अटॉर्नी जनरल से इजाज़त माँगी गई थी। अटॉर्नी जनरल ने कंटेप्ट की कार्रवाई शुरू करने से मना कर दिया है।

अटॉर्नी जनरल केंद्र सरकार के सबसे बड़े लॉ ऑफ़िसर होते हैं और कोर्ट में वे ही भारत सरकार होते हैं। लेकिन इस क्रम में अटॉर्नी जनरल ने मेरे बयान को “intemperate” यानी ज़रूरत से ज़्यादा तीखा बोला है।

मैं अपने वकीलों की राय ले रहा हूँ और मुमकिन है कि मैं अटॉर्नी जनरल के खिलाफ मानहानि का मुक़दमा करूँ।

मैंने अपने ट्वीट में लिखा था कि – ये तो चंद्रचूड़ से भी बढ़िया प्रवचन देता है। बात करवा लो इन निकम्मों से। इनकी अपनी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में 72 हज़ार से ज़्यादा केस पेंडिंग हैं। कई केस में तो पिटीशनर मर भी गए। यहाँ जज दो दो साल की डेट देते हैं। EWS में तो तीन साल में बेंच तक नहीं बनी।

मैं न्यायपालिका की इज़्ज़त करता हूँ।

पर जज चुनने का कोलिजियम जातिवादी है। ये रिश्तेदारों को जज बनाने की फ़ैक्ट्री है। जज निकम्मे और निठल्ले हैं। EWS के केस में 3 साल में यही तय नहीं हुआ कि कौन जज केस सुनेगा। न्यायपालिका आरक्षण विरोधी है। 72000 केस सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग हैं।

फिर भी मैं इज़्ज़त करता हूँ।

#casteist_collegium

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