डॉक्टर पथिक-
हिंदी साहित्य की गलियों में साहित्य चोरी के इल्जामात तो कई बार लगाए गए पर यह पहली बार है जब एक महिला साहित्यकार ने दूसरी महिला साहित्यकार पर घड़ी चोरी का इल्जाम लगाया है।
अणुशक्ति सिंह नामक कवियत्री का कहना है कि वह और पूनम अरोड़ा जी मित्र हुआ करती थी। किसी साहित्यिक यात्रा के दौरान अणुशक्ति जी पूनम जी के रूम में गई और असावधानी वश अपनी घड़ी उतारकर रख दी।
कुछ देर बाद अणुशक्ति जी को उस घड़ी की याद आई तो उन्होंने पूनम जी से उस घड़ी को खोजने का अनुरोध किया पर पूनम जी घड़ी खोजने में असहयोग किया।
दो साल बाद अणुशक्ति जी ने एक फेसबुक फोटो के आधार पर इल्जाम लगाया है कि पूनम जी द्वारा पहनी गई घड़ी की असली मालकिन अणुशक्ति जी हैं। अर्थात अणुशक्ति जी ने पूनम जी पर घड़ी चोरी का निकृष्ट इल्जाम लगाया है।
इस घटिया इल्जाम के सामने आने के बाद पूनम जी अपनी नर्व्स पर कंट्रोल नही रख पाई और भावुक होकर स्वयं की बेगुनाही के सबूत पेश किए तथा अणुशक्ति जी के चरित्र पर लांछन भी लगाया। पूनम जी ने अणुशक्ति जी को शराबी बताया और उनके कथित मित्र को शय्या सहभागी भी बताया।
इस प्रसंग के सामने आने के बाद हिंदी कवियत्री खेमा 3 भागों में बंट गया है।
रश्मि भारद्वाज नामक संघी विचारधारा की कवियत्री ने पूनम जी के समर्थन की घोषणा की है। कुछ संघी टाइप की नवोदित कवियत्रियाँ भी पूनम जी के खुले समर्थन में हैं। कुछ वामपंथी विचाराधारा की कवियात्रिओं ने अणुशक्ति जी का समर्थन करते हुए इस घटना को क्लिपटोमेनिया का उदाहरण बताया है।
अर्थात संघी धारा की कवियत्रियां पूनम जी का समर्थन कर रही हैं। वामपंथी धारा की कवियत्रियां अणुशक्ति जी के समर्थन में हैं। कुछ अपवाद भी हैं मसलन कालजई कविता “पदौड़ा पति” की लेखिका जोशना बनर्जी वामपंथी खेमे की हैं पर उन्होंने पूनम जी को समर्थन दिया है।
तीसरा खेमा बुजुर्ग टाइप की कवियत्रियों का है जो अणुशक्ति जी और पूनम जी को समझाते हुए भाषाई सुचिता का आह्वान कर रही हैं। व्यक्तिगत तौर पर मेरा समर्थन पूनम अरोड़ा जी के साथ है। मेरा मानना है कि बगैर पर्याप्त सबूत और गवाह के किसी भी गरिमा वान मनुष्य पर चोरी जैसे घटिया आरोप नही लगाना चाहिए।
मैं अणुशक्ति सिंह जी की कड़ी निन्दा करता हूं। घटिया भाषा प्रयोग करने तथा अणुशक्ति जी पर चारित्रिक लांछन लगाने के लिए पूनम अरोड़ा जी की भी कड़ी निंदा करता हूं। सच्चा साहित्यकार वही होता है जो घटिया आरोपों और प्रतिकूल परिस्थितियों के दौर में भी अविचलित खड़ा रहे।
पूनम अरोड़ा-

ये तीनों घड़ियां मेरी उद्यमी मां की दी हुई हैं। वो रियल एस्टेट बिज़नेस में थीं। ब्रेस्ट कैंसर से उनकी मौत हुए 3 साल हो गए। उससे भी एक साल पहले यह सुनहरी घड़ी और यह व्हाइट स्ट्रैप की घड़ी और छोटे डायल की घड़ी जोकि लुईस कार्डिन 18 कैरेट गोल्ड की है, भी मेरी मां ने मुझे दी थी। यह वाली लगभग 26 साल पुरानी है। यही छोटे डायल वाली गोल्ड प्लेटेड मैं अक्सर पहना करती थी। यह सुनहरी वाली जिसका विवाद हुआ, रखी रही मां की मौत के बाद से। वो चली गई, मेरा जीवन अलग तरह से चलने लगा फिर। कुछ नए संघर्ष जीवन में जुड़े और मैं निकल पड़ी अपने संघर्षों में पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ। ख़ैर।
लेकिन यह ‘घड़ी प्रकरण’ अब मैं समाप्त करती हूँ। बहुत से मित्र,शुभचिंतकों को मेरे भाषाई विचलन से कष्ट हुआ है परंतु आप लोग यह न भूलें कि एक सुगठित सुंदर भाषा में फिक्शन लिखा जाता है। अगर अचानक आप पर कोई चोरी का आरोप लगाता है तो पीड़ा और क्षोभ की भाषा गुस्से में ही निकलती है। बात इसके सही या गलत होने की नहीं है,ईमानदारी की है। पीड़ा में हम सब ऐसे ही बोलते हैं या फिर चुप्पी में जाकर अवसाद में घिर जाते हैं।
परन्तु फिर भी जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था। मैं अपनी तरफ से सब बातें क्लीयर कर चुकी हूँ। हो सकता है शायद सिर्फ़ सुनहरे रंग की वजह से गलतफहमी हुई होगी और उत्तेजना में चोरी का आरोप लगा दिया होगा,अब वे इसे स्वीकार कर आगे बढ़ती हैं या नहीं, यह उनका नैतिक निर्णय होगा। मैं अब आगे बढ़ती हूँ।
लेकिन सबसे दुखद यहां यह रहा कि हमारे विश्वासों को कई स्तरों पर बहुत बड़ा आघात पहुंचा है।
अणु शक्ति सिंह-
क़िस्सा ए गुम हुई चीज़। हुआ यूँ कि दिल्ली के किसी इलाक़े में हमारी दूर की दोस्त की चाची रहा करती थीं। उन्हें हम मुहब्बत से चची बुलाया करते। चची पूरे ख़ानदान के साथ अकेली रहतीं। वे अक्सर अपने ऊपर हुए ज़ुल्म की दास्तान से हमारी आँखों को तर किये रखतीं। उधर वे क़िस्सा सुनातीं, इधर हम दुःख में समंदर बहाते जाते।
चची से मुझे ख़ूब सहानुभूति होने लगी। वे भी मुझपर लाड़ जतातीं। अक्सर हम साथ आने-जाने लगे। साथ आना-जाना हुआ तो भरोसा भी बढ़ा।
एक दिन इसी भरोसे में मैंने अपनी एक चीज़ उनके सामने रखी, कहा आकर लेती हूँ। लौटकर गई लेने तो कहने लगीं, अरे तुम अपनी चीज़ यहाँ लाई ही नहीं थीं। मैं ख़ूब परेशान। कहाँ गया सामान। किधर गया। कोई कितना खोजे।
इस दरमियान चची मुझ पर गाहे-बगाहे बरसने लगीं। मेरे ख़िलाफ़ काले-पीले-नीले-सफ़ेद- जितने झूठे क़िस्से हो सकते थे उन्होंने बुन लिए थे। मुझे चची समझ नहीं आ रही थीं। एक-बारगी मुझे लगा कहीं भूत-वूत का चक्कर तो नहीं। फिर दिल को समझा लिया। मान लिया कि न चची, न ही उनकी मुहब्बत, न ही मेरी वह चीज़, कुछ भी क़िस्मत में नहीं थी। अब जो चीज़ गुम गई सो गई। यह सोचकर मैंने मन को मना ही लिया था कि चची लकदक मेरी चीज़ में इतराती नज़र आईं।
मैंने देखा। चची के बारे में दोस्त से दरयाफ़्त की। पता चला चची हाथ की पुरानी जादूगर हैं और अक्सर अपनी सहानुभूति की ज़मीन मज़बूत करने को नक़ली क़िस्से सुनाती रहती हैं। यानी कि आँसू के झीने पर्दे में गहरे काम किया करती हैं। आज जाने क्यों चची बेहिसाब याद आ रही हैं और मैं उन्हें सोच-सोच कर हँसे जा रही हूँ। आपका पाला कभी ऐसी किसी चची से पड़ा है क्या?
त्रिलोक नाथ पांडेय-
यह घड़ी का मामला क्या है? बहुत खोजबीन पर मुझे दो महिलाओं के बीच के कुछ मामले की भनक मिली, लेकिन मामला का पता न चला। इन दोनों महिलाओं से मिलने का मुझे कभी सौभाग्य मिल चुका है, लेकिन अपने पेज पर इनके फेसबुक फ्रेंड के रूप में प्रकट होने पर मैंने रोक लगा रखी है। इसलिए मामला मुझे नहीं मालूम है।
इस बीच, मेरे घर में भी घड़ी का एक मामला है। बच्चों ने एक स्मार्ट वाच मेरे फोन से संयोजित करके मेरी अनिच्छुकता के बावजूद मेरे हाथ में पहना दिया। वह घड़ी कितना सोया, कितना चला, कितना बीपी, कितना दिल धडका इत्यादि की खबरें फोन पर उपलब्ध कराती रहती थी, लेकिन ये सब मुझे भारी झंझट लगता था। इस बीच, दर्जा पाँच का विद्यार्थी होने के नाते स्कूल वालों ने प्रतोष को घड़ी पहन कर स्कूल आने की अनुमति दे दी।
फिर तो, पंडित जी तरह-तरह की घड़ियाँ जुटाने लगे और नई-नई घड़ी पहन कर स्कूल जाते हैं। इसी सिलसिले में उनकी नजर मेरी घड़ी पर भी पड़ी और उसे हड़प लेने का वे दबाव बनाने लगे। निरंतर बढ़ते दबाव के कारण दो दिन के भीतर ही मैंने सरेन्डर कर दिया और उन्हें घड़ी सौंप कर अपनी जान छुड़ाया।
अब सुना फ़ेसबुक पर घड़ी का कोई मामला आ गया है। तफ़सील से बातें मालूम हो तो इस मनोरंजनखोजी मन को थोड़ा मजा आए।
सईद मोहम्मद इरफान-
घड़ी पर चल रही चर्चा आशा है झोटा-झोटव्वल तक नहीं पहुंचेगी और हिंदी का रचनारत समय अपनी लोकतांत्रिक प्रगति पर आश्वस्त बना रहेगा।
इस संबंध में मुझे धुर दक्षिणपंथी और नफरती टिप्पणीकारों को फ्रंटफुट पर आकर खेलते देखना यह मानने का साहस देता है कि नई हिंदी की जमीन पर अभी ऐसा बहुत कुछ देखने को मिलेगा जिसके लिए ऋषिवर ने कह रखा है “आपने घबराना नहीं है।”



