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ईवीएम पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और प्रधानमंत्री को ‘करारा तमाचा’ की खुशी

आज टाइम्स ऑफ इंडिया में देखिये कांग्रेस के इस दावे के साथ कि, लड़ाई जारी है और जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अंतिम नहीं है तब भी प्रधानमंत्री से रहा नहीं गया। जब खबर की प्रस्तुति खुश करने वाली है तो प्रधानमंत्री की यह खुशी कितनी देर की है इसे समझिये क्योंकि असल में जीत तो जनता की ही हुई है और कोई तमाचा नहीं है। अगर करारा है, तो सरकार और चुनाव आयोग के लिए, गड़बड़ी कर जीतने वालों के लिए भी है लेकिन प्रधानमंत्री ने कह दिया और सबने लगभग समान भाव से छाप दिया।

 संजय कुमार सिंह

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संबंधित टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की खबर का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, “सुप्रीम कोर्ट ने बैलट पत्रों से चुनाव कराने की मांग को खारिज किया, कहा ईवीएम पर अविश्वास ‘अंधा’ है”। इस खबर का इंट्रो है, वीवीपैट स्लिप की 100% जांच से मना किया। टाइम्स ऑफ इंडिया अपनी लीड खबर के साथ संबंधित तथ्यों को एक बॉक्स में छापता है। आज भी ऐसे कई तथ्य हैं और इनका शीर्षक है, हारने वाले उम्मीवार ईवीएम की जांच कराने की मांग कर सकते हैं। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, विपक्ष के लिए जोरदार तमाचा:प्रधानमंत्री; वीवीपैट की लड़ाई जारी है: कांग्रेस”। मुझे लगता है कि आज ज्यादातर अखबारों का मुख्य शीर्षक वह नहीं बता रहा है जो असल में ‘खबर’ है। इसमें प्रधानमंत्री का यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला विपक्ष के लिए जोरदार तमाचा है गैर जरूरी और अनुचित दोनों है। गनीमत यह है कि इसके साथ कांग्रेस की बात भी आ गई है। नहीं होती तो कोई क्या कर लेता। कुल मिलाकर, मुझे लगता है कि आज के अखबारों ने या तो फैसले को ठीक से समझा नहीं है या किसी कारण से ठीक से समझाया नहीं है। जहां तक फैसले को समझने की बात है, संभव है कि प्रधानमंत्री ने भी उसे ठीक से नहीं समझा हो और तभी कहा है कि यह विपक्ष के लिए जोरदार तमाचा है। कांग्रेस का कहना है कि लड़ाई जारी है और जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अंतिम नहीं है। 

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आज इस फैसले और इससे संबंधित खबर की बात करते हुए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि कानून मेरा विषय नहीं है ना मैं कानून का जानकार हूं, ना उसमें मेरी दिलचस्पी है और ना मेरी टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर है। मेरी यह प्रतिक्रिया अखबारों में उसकी प्रस्तुति पर और खास अंशों के आधार पर प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर है। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट में कानूनी मुद्दा निपटाया गया है और प्रधानमंत्री के रूप में किसी का भी काम है कि वह न सिर्फ अभी के लिए बल्कि आगे के लिए भी निष्पक्ष, स्वतंत्र और स्पष्ट चुनाव की व्यवस्था करे। तकनीक का चुनाव या उसकी उपयुक्तता तय करना सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है। मैं पहले भी कह चुका हूं कि सरकार और संबंधित विभागों ने अपना काम ठीक से किया होता तो मामला सुप्रीम कोर्ट में जाता ही नहीं पर प्रधानमंत्री की टिप्पणी से लग रहा है कि वे इस मामले में खुद को एक पार्टी मान रहे हैं जबकि ऐसा है नहीं। जब तक वे पद पर हैं उनका काम देश के लिए एक अच्छी चुनाव प्रणाली की व्यवस्था करना है, मतदाताओं का भरोसा जीतना है। जो व्यवस्था चली आ रही है और जिसका विरोध उनकी पार्टी के लोग करते थे उसे अब सही या सर्वश्रेष्ठ साबित करना प्रधानमंत्री, प्रधानसेवक या प्रधान प्रचारक का काम नहीं है। मतदाताओं की शंका दूर करना भी उनकी और उनके बनाये चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है पर वे डर का ऐसा माहौल बना रहे हैं कोई शंका करने से ही डरे।

एक मतदाता के रूप में मुझे अभी भी ईवीएम पर भरोसा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी नहीं है और टाइम्स ऑफ इंडिया का सुप्रीम कोर्ट के हवाले से यह कहना भी सही नहीं लगता है कि उसपर अविश्वास ‘अंधा’ है। यहां अंधा को निराधार भी कह सकते हैं। उम्मीदवार की बात तो उम्मीदवार बतायेंगे जो विधान सभा चुनाव के बाद कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह बताते रहे हैं और चूंकि वह सब सुप्रीम कोर्ट में नहीं था इसलिए मेरा मामला भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संबंधित नहीं है। मैंने गाजियाबाद में कल ही वोट किया और जो पर्ची छपी वह ठीक थी। लेकिन बत्ती जलने पर ही दिखी और बत्ती तुरंत बुझ गई। शीशा भी रंगीन था। हाल में एक वीडियो में दिखाया गया था कि पर्ची कटकर गिरती नहीं है और वोट किसी को जाता है पर्ची कोई और दिखती है। मुझे भी कल पता नहीं चला कि पर्ची कट कर गिरी या नहीं। अगर नहीं गिरी तो जो वीडियो मैंने देखा है उसके अनुसार फिर किसी को दिखाई जा सकती है जबकि उसका वोट किसी और को जा रहा होगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह माना जा सकता है कि गड़बड़ी नहीं होती होगी पर इसका आश्वासन क्या है? शीशा पारदर्शी क्यों नहीं हो सकता है, बत्ती लगातार जली हुई क्यों नहीं हो सकती है और पर्ची कटकर गिर गई यह दिख क्यों नहीं सकता है या तबतक बत्ती नहीं जली रहने का क्या कारण हो सकता है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का कहना कि सभी पर्चियों को गिनना जरूरी नहीं है – किसी भी तरह संतोषजनक नहीं है।

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कारण और आधार मैं नहीं जानता पर फैसले से या जो व्यवस्था है उससे मैं संतुष्ट नहीं हूं। मेरा मानना है कि मुझे संतुष्ट करना सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है और यह काम सरकार को करना है। लेकिन सरकार के मुखिया जब कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुंह पर तमाचा है तो उन्हें बताना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले में कहा है कि हार वाला उम्मीदवार ईवीएम की जांच कराने की मांग कर सकता है। मुझे लगता है कि यह पर्याप्त आश्वासन है। गड़बड़ी करने वाले के लिए डर भी। और पकड़े जाने की पूरी संभावना तो बनती ही है। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वालों को यह उम्मीद तो नहीं ही होगी कि बीच चुनाव में कुछ बड़े बदलाव का आदेश आयेगा और हारने वाले (इंडियन एक्सप्रेस में दूसरे नंबर वाले लिखा है) सिंबल लोडिंग यूनिट्स की जांच की मांग कर सकते हैं और यह चुनाव के बाद सील करके रखा जायेगा। मतगणना के बाद 45 दिनों तक। कहने की जरूरत नहीं है कि पहले इसका अस्तित्व ही स्वीकार नहीं किया गया था अब इसे मतगणना के बाद 45 दिनों तक सुरक्षित, सील रखना है। मुझे लगता है कि यह पर्याप्त है और जो लोग कह रहे थे कि ईवीएम में कुछ गड़बड़ नहीं की जा सकती है उनेक लिये तमाचा है। नतीजों के बाद कुछ गड़बड़ मिल जाये तो सोने पर सुहागा। वैसे मिलेगा नहीं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में मामला होने का दबाव था। हालांकि मिल भी जाये तो देश में जो व्यवस्था है – कुछ कहा नहीं जा सकता है। संभव है, पता ही नहीं चले, खबर ही नहीं छपे और फिर किसी को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़े। जहां तक तकनीक के दुरुपयोग की बात है, कंप्यूटर में सबूत प्लांट करके गिरफ्तार करने और जेल में रखने का मामला है। पर सुनवाई ही नहीं हुई या हो गई हो तो पता नहीं चला जबकि मामला पर्याप्त गंभीर है और खबर छपती रहनी चाहिये। पर सत्ता की ताकत से कोई कितना लड़े खासकर तब जब अदालतें भी शक्तिशाली के साथ हों या दिखें।    

इस संबंध में आज ही टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर छपी एक और खबर पर आता हूं। शीर्षक है, (दिल्ली) हाईकोर्ट ने आम आदमी पार्टी की सरकार से कहा, आपने निजी हित को राष्ट्रीय हित से ऊपर रखा है। एमसीडी स्कूल के छात्रों को पुस्तकें नहीं मिलने पर नाराजगी जताई। अदालत ने टिप्पणी की है तो खबर है ही और दिल्ली हाईकोर्ट का मामला है तो दिल्ली के टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर होना भी कोई मुश्किल नहीं है। लेकिन इसके साथ की जो बातें हम जानते हैं उसके आधार पर कह सकते हैं कि आप की सरकार से अगर कोई शिकायत है तो वह इसलिए भी होगी कि उसके मंत्री, मुख्यमंत्री और कई लोग जेल में हैं। देश में किसी भी सरकार या पार्टी के इतने लोगों के जेल में होने का यह पहला मामला है और सरकारी स्कूलों में ढंग की पढ़ाई होने, किताबें मिलने के दुर्लभ मामले में तो है ही। जाहिर है कि जहां स्कूल ही नहीं हैं, पढ़ाई ही नहीं होती, किताबें नहीं मिलतीं वहां कोई चिन्ता नहीं है। जहां मिल रही थीं वहां व्यक्ति विशेष और पार्टी विशेष के कारण मिल रही थीं और अगर उसके लोग जेल में होंगे (निर्वाचित प्रतिनिधि होने का बावजूद) काम करने के लिए जमानत नहीं मिलेगी तो काम कैसे होगा? संभव है यह चिन्ता हाईकोर्ट की नहीं हो पर अखबार क्या बता रहे हैं। अखबार इस खबर के साथ यह भी बता सकता था कि कितने स्कूलों में कबसे किताबें नहीं मिलीं और वह मुद्दा ही नहीं है। या सब जगह मिल रही हों सिर्फ वहीं नहीं मिली जहां भारतीय जनता पार्टी की केंद्र की सरकार ने राज्य सरकार के मंत्रियों को जेल में रखा है। हाईकोर्ट का आदेश या टिप्पणी खबर के रूप में छाप देना सस्ता और आसान है। बगल में उत्तर प्रदेश या डबल इंजन वाले किसी भी राज्य के स्कूल का सच बताना मुश्किल है। इसलिए वह रह जाता है। नुकसान जनता का फायदा राजनीतिक दल और भाजपा का। 

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यह सब तब जब भाजपा के प्रधान प्रचारक नरेन्द्र मोदी ने दूसरे चरण के मतदान से पहले चुनावी सभाओं में हिन्दू-मुसलमान किया, लोगों ने इसका भारी विरोध किया पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और ऐन मतदान के दिन खबर छपी कि चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री के भाषण के लिए उनकी पार्टी के अध्यक्ष को नोटिस भेजा है और चूंकि शिकायत राहुल गांधी के खिलाफ भी थी इसलिए नोटिस कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को भी भेजा गया है। कल दिन भर मतदान हो गया। आज खबर है कि उत्तर प्रदेश में मतदान सबसे कम रहा और अटकलें जो हों, कारण समझना मुश्किल नहीं है। लोकतंत्र और मदर ऑफ डेमोक्रेसी में मतदान का महत्व अपनी जगह है। सरकार औऱ चुनाव आयोग ज्यादा मतदान कराने की कोशिश करते रहे हैं फिर भी ईवीएम पर अविश्वास (या अदालत में मुकदमा होने तक) या भिन्न कारणों से डबल इंजन वाले उत्तर प्रदेश में कल मतदान सबसे कम हुआ। सुप्रीम कोर्ट की अपनी सीमा है उसका फैसला कानूनी आधार पर होगा, जो मांग होगी उससे अलग नहीं हो सकता है आदि आदि। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सरकार जीत नहीं गई है। उसके समक्ष संतोषजनक व्यवस्था करने की मांग कायम है और इसके लिए जरूरी है कि वह इस संबंध में उठाये गये सभी सवालों के जवाब दे या विशेषज्ञों से दिलवाये। पर यह नहीं हो सकता है कि वह कोई सुनवाई नहीं करे। इसका सबसे बड़ा नुकसान वोटों का प्रतिशत कम होना है। लेकिन प्रधानमंत्री का बयान नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर है, दूसरा चरण बहुत अच्छा रहा : मोदी।

आज टाइम्स ऑफ इंडिया में चर्चा करने लायक तीसरी खबर का शीर्षक है, मनमोहन सिंह का वीडियो सामने आने के बाद मोदी ने तुष्टिकरण के आरोप को दोहराया। (ये सभी खबरें लगभग ऐसे ही शीर्षक से दूसरे अखबारों में भी है।) खबर के अनुसार इस वीडियो में मनमोहन सिंह अपने बयान पर खुद को कायम बताते हैं कि, अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों का देश के संसाधनों पर पहला दावा होना चाहिये। अखबार ने इस खबर में बताया है प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को दावा किया कि उनकी बात सही थी और कांग्रेस तथा उसके सहयोगियों के खिलाफ तुष्टिकरण का अपना आरोप तेज कर दिया। यह 2009 का वीडियो है और मनमोहन सिंह ने संभवतः 2006 में कहा था जिसके आधार पर प्रधानमंत्री न सिर्फ कांग्रेस पर तुष्टिकरण का आरोप लगा रहे हैं बल्कि हिन्दू मुसलमान भी कर रहे हैं और चुनाव आयोग से डर भी नहीं रहे हैं। डरें भी क्यों जब टाइम्स ऑफ इंडिया उनके सुर में सुर मिला रहा है। अखबार ने ही लिखा है, नेशनल डेवलपमेंट कौंसिल की बैठक में मनमोहन सिंह ने 2006 में कहा था, जिसकी पुष्टि 2009 के इस वीडियो में की गई है …. अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम अल्पसंख्यक, अगर वे गरीब हैं तो देश के आर्थिक संसाधनों पर उनका पहला दावा है ….। 

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इसके आधार पर राजस्थान के बांसवाड़ा में रविवार को प्रधानमंत्री ने कहा था,  अगर कांग्रेस की सरकार बनेगी तो हरेक की प्रॉपर्टी का सर्वे किया जाएगा। हमारी बहनों के पास सोना कितना है, इसकी जांच की जाएंगी। चांदी का हिसाब लगाया जाएगा। मेरी माताओं-बहनों की जिंदगी में सोना सिर्फ शो करने के लिए नहीं होता है। उसके स्वाभिमान से जुड़ा हुआ है। उसका मंगलसूत्र सोने की कीमत का मुद्दा नहीं है, उसके जीवन के सपनों से जुड़ा है, उसे छीनने की बात कर रहे हो अपने घोषणा-पत्र में। पहले जब उनकी सरकार थी, तब उन्होंने कहा था देश की संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। इसका मतलब ये संपत्ति इकट्‌ठी करके किसको बांटेंगे, जिनके ज्यादा बच्चे हैं, उनको बांटेंगे, घुसपैठियों को बांटेंगे। क्या आपकी मेहनत की कमाई का पैसा घुसपैठियों को दिया जाएगा। आपको मंजूर है ये। (भास्कर डॉट कॉम)

इंडियन एक्सप्रेस ने आज ईवीएम पर सुप्रीम कोर्ट की खबर को लीड बनाया है। साथ में एक्सप्रेस एसप्लेन्ड है। इसका शीर्षक है, वोटर के लिए कुछ नहीं बदला, दूसरे नंबर वालों को यह विकल्प मिला कि वे ईवीएम के चिप की जांच की मांग कर सकेंगे। ऊपर मैं लिख चुका हूं कि वोटर के लिए यह कैसे संतोषजनक है। फिर भी यह तथ्य आज ज्यादातर अखबारों के पहले पन्ने पर नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, सर्वोच्च अदालत ने ईवीएम, पेपर ट्रेल सिस्टम की पवित्रता की पुष्टि की। अखबार में एक उपशीर्षक है, छेड़छाड़ के दावों पर, इस आशंका कि किसी खास उम्मीदवार के समर्थन के लिए ईवीएम को मतों के बार-बार या गलत रिकार्डिंग के लिए छेड़ा जा सकता है, को खारिज किया जाना चाहिये। प्रधानमंत्री की खुशी यहां दूसरे शब्दों में है, प्रधानमंत्री ने इसमें समर्थन देखा। विपक्ष की योजना दबाव बनाये रखने की है।

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द हिन्दू में भी यह खबर लीड है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम का समर्थन किया, फिर से बैलट पेपर की संभावना से इनकार किया। उपशीर्षक है, अदालत ने कहा कि आंखमूंद कर अविश्वास करना मदद नहीं करेगा, वीवीपैट की पर्ची मतदाताओं को देने और 100% क्रॉस वेरीफिकेशन से इनकार किया; उसने सुझाया, हारने वाले प्रमुख उम्मीदवार खर्च देकर जांच के लिए कह सकते हैं। विपक्ष को तमाचा मोदी और वीवीपैट के लिए अभियान जारी रहेगा यहां सिंगल कॉलम में आमने-सामने हैं। द टेलीग्राफ में भी ईवीएम की खबर ही लीड है। फ्लैग शीर्षक है, बैलट पेपर और ज्यादा वीवीपैट (पर्ची) गिनने की मांग को ना। मुख्य शीर्षक है, ईवीएम को सर्वोच्च अदालत का वोट मिला। यहां इस फैसले को करारा तमाचा बताने वाला मोदी का बयान एक कॉलम में फोटो के साथ है। नवोदय टाइम्स और अमर उजाला में भी यह खबर लीड है और प्रमुखता से छपी है। भिन्न पहलुओं को भी महत्व मिला  है। और सब मिलाकर मामला यही है कि ना ईवीएम के मामले में जो हुआ वह खबर नहीं है। प्रधानमंत्री खुल कर हिन्दू मुसलमान कर रहे हैं फॉलो अप छापकर (टाइम्स ऑफ इंडिया) उसका समर्थन है या फिर भूलकर। अगला मतदान सात मई को है चुनाव आयोग के साथ सभी दलों के पास काफी समय है। देखना है ये दिन कैसे गुजरते हैं। 

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