उर्मिलेश-
भारतीय संविधान में आरक्षण जैसी सकारात्मक कारवाई (Affirmative Action) का आधार सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को बनाया गया था. पर 2019 के संसदीय चुनाव से ऐन पहले भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने सवर्णों का ‘संपूर्ण समर्थन’ हासिल करने के लिए एक ‘असंवैधानिक कदम’ उठाया. इसके लिए संविधान में संशोधन करके EWS नाम से सवर्णों के लिए अलग से 10 प्रतिशत आरक्षण का अनोखा प्रावधान जोड़ा गया.
सुप्रीम कोर्ट में EWS आरक्षण और उसे जायज ठहराने के लिए लाये 103वे संविधान संशोधन को ठोस दलीलों के साथ चुनौती दी गई. लेकिन जस्टिस चंद्रचूड की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले में दायर पुनरीक्षण याचिका को भी खारिज कर दिया और इस तरह EWS आरक्षण और 103 वें संविधान संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय से भी हरी झंडी मिल गयी.
ऊपर देखिये TOI की यह खास खबर कि EWS का क्या हाल है:
संजय कुमार सिंह-
यह है अमृतकाल जब नामुमकिन मुमकिन होने लगा है- यह खबर बताती है कि राजनीति ने देश का कितना नुकसान किया है या आप चाहें तो कहिए कि बेमतलब के कितने और कैसे काम किए हैं। आरक्षण देश-समाज की जरूरत है। गरीब-पिछड़ों की प्रगति के लिए जरूरी समझा गया है। आप इसके लाभार्थी हों या नहीं, आरक्षण से देश-समाज का भला होना तय है। समाज अच्छा होगा तो प्रत्यक्ष परोक्ष लाभ आपको भी मिलेगा। पर ऐसा होने नहीं दिया गया।
कारण बहुत साफ है जिसकी लाठी उसकी भैंस या स्वार्थ। राजनीति में ज्यादातर लोगों ने अपना स्वार्थ देखा और अपने लाभ की व्यवस्था की। उन्हें दूसरों की चिन्ता ही नहीं रही और रही होती तो दलित आरक्षण की जरूरत नहीं होती। सरकार राहुल गांधी से परेशान नहीं होती। लेकिन उसकी राजनीति 272 विशिष्ट लोगों वाली रही है। अब उनमें से कइयों के बारे में पता है और वह मुद्दा नहीं है। मुद्दा राजनीति को समझना है।
मामला विचारधारा का है और मोटी सी बात यह है कि भाजपा (या नरेन्द्र मोदी) अब जो कर रहे हैं या करना चाह रहे हैं वह कांग्रेस कई मौकों पर कर सकती थी। कर लिया होता तो भाजपा आज कहां होती कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। इसमें आरएसएस पर प्रतिबंध शामिल है। कांग्रेस चाहे जितनी बुरी हो उसने चुनाव आयोग को गुलाम नहीं बनाया। कानून का राज चलता रहा। इंदिरा गांधी को सजा हुई, लालू यादव को हुई और भी बहुत से लोग हैं।
2014 के बाद क्या हो रहा है? किसी भ्रष्टाचारी को सजा नहीं हुई (क्योंकि कोई था ही नहीं)। विदेश में रखा कितना कालाधन वापस आया कोई नहीं जानता। 15 लाख नहीं मिले रुपया कमजोर होता जा रहा है और जिसने जनहित के काम किए जेल रहा। उसकी सरकार बेईमानी से गिरा दी गई। जिसपर मुकदमा चला, जो जेल में रहा वह बरी हो गया, क्लिन चिट मिला। बाकी अदालत के फैसले राजनीति से प्रभावित होने का एक मामला तो यही लग रहा है।
इस खबर के अनुसार, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के 140 उम्मीदवारों ने निजी मेडिकल कॉलेजों के मैनेजमेंट और अनिवासी भारतीयों के कोटे की सीटें चुनी हैं। इनके लिए पढ़ाई की फीस हर साल 25 लाख से एक करोड़ रुपए से ज्यादा है और ईडब्ल्यूएस वर्ग का होने का मतलब है परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपए से कम। दूसरी ओर टाटा के कोटे से सरकारी मेडिकल कॉलेज में लालू यादव की बेटी के दाखिले के बाद टाटा ने वह कोटा छोड़ दिया था।
ओम शंकर-
EWS आरक्षण से MBBS की सीटें पाने वाले सवर्ण उम्मीदवार करोड़ों रुपए देकर PG में दाखिला ले रहे हैं। इससे बड़ी EWS आरक्षण की कलई खोलने वाली कड़वी सच्चाई भला और क्या हो सकती है?
EWS कोई कल्याणकारी कदम नहीं था—यह उस सुनियोजित राजनीतिक-वैचारिक योजना का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य आरक्षण की रीढ़ को तोड़कर उसे कमजोर करना था। यह सामाजिक न्याय का विस्तार नहीं, बल्कि शोषक वर्गों को संरक्षण और आर्थिक सुरक्षा देने की संवैधानिक वैधता पैदा करने का तरीका था।
सत्ता ने जाति-आधारित ऐतिहासिक असमानता को आर्थिक असमानता के बराबर साबित करने की कोशिश की, जबकि दोनों के स्रोत, दोनों का इतिहास और दोनों के प्रभाव बिल्कुल अलग हैं।
आरक्षण का मूल सिद्धांत साफ था: सदियों से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से वंचित समुदायों को सत्ता, संसाधनों और नीति निर्माण में प्रतिनिधित्व देना। पर EWS के जरिए ठीक उल्टा हुआ—सत्ता संरचना के शीर्ष पर पहले से मौजूद मुट्ठीभर प्रभावशाली जातियों की कमजोर होती पकड़ को मजबूत कर दिया गया।
आरक्षण आर्थिक गरीबी की भरपाई के लिए कभी बनाया ही नहीं गया था। यह व्यवस्था उन समुदायों के लिए थी जिनकी पिछड़ापन की वजह उनकी आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि उनका ऐतिहासिक सामाजिक उत्पीड़न, जातिगत भेदभाव और शैक्षणिक बहिष्कार था।
हर समाज में अमीर–गरीब होते हैं—यह सच है।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि:
- कौन-सा समुदाय जनसंख्या के अनुपात में कितना समृद्ध है?
- किसके पास संसाधन और सत्ता की ऐतिहासिक पहुँच रही है?
- कौन-सा समूह अपनी समृद्धि इसलिए खोया क्योंकि समाज ने उसे संरचनात्मक रूप से दबाया?
इन सवालों को समझे बिना आर्थिक कमजोरी को सामाजिक पिछड़ेपन के बराबर मानना, केवल एक राजनीतिक धूर्तता है।
EWS ने यही किया— वंचित समुदायों के हिस्से की न्यायिक गारंटी छीनकर, उसे उन्हीं जातियों को दे दिया जो सामाजिक-राजनीतिक सत्ता-संरचना के शीर्ष पर सदियों से मौजूद रही हैं।
यह आरक्षण का विस्तार नहीं था— यह आरक्षण को भीतर से खोखला करने की, सामाजिक न्याय को कमजोर करने की, और बहुसंख्यक वंचित आबादी के अधिकारों को पुनः सीमित करने की एक सुविचारित रणनीति थी।
सत्येंद्र पीएस-
आर्थिक आधार पर आरक्षण के साइड इफेक्ट्स. EWS कोटा में आवेदन किया. और जब सरकारी मेडिकल कॉलेज में अडमिशन नहीं मिला तो NRI कोटा में और प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में अडमिशन ले लिया, जहाँ सालाना फीस 25 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये है.
यह हर साल, हर परीक्षा में हो रहा है. शायद RSS और भाजपा के इसी आर्थिक आरक्षण के कारण समाज का एक तबका आर्थिक आरक्षण और भाजपा सरकार का अंध समर्थन करता है, जहाँ गरीबों के लिए निर्धारित गरीब कोटा में भी कोई जगह नहीं है. गरीब आदमी के लिए आरक्षित सीट सालाना एक करोड़ रुपये फीस देने की क्षमता वाले कब्जा कर लेते हैं.
इसमें कोई गुणवत्ता का सवाल भी नहीं उठाता कि एक करोड़ रुपये देकर डिग्री खरीदने वाले अनपढ़ और मूर्ख लोगों की वजह से स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता खराब होगी और ये लोग ओप्रेशन के दौरान मरीज के पेट में कैंची ही छोड़ देंगे!



