
पर जो मंदिर, धर्म और भगवान की बात करते हैं वो भगवान से डरते क्यों नहीं हैं?
संजय कुमार सिंह
आम चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद आज का अखबार जैसा होना चाहिये था वैसा लगा नहीं या कह सकते हैं कि वैसा ही है जैसा होना चाहिये था। असल में मैं कुछ अलग या नया कुछ अनूठा ढूंढ़ रहा था। पहले द टेलीग्राफ अक्सर नया होता था। अब निराश करता है लेकिन आज फिर पहले जैसा तो नहीं है, सबसे अलग है। फोल्ड से ऊपर की दोनों खबरें इस ढंग से प्रस्तुत की गई हैं कि आप जरूर पढ़ेंगे। आम तौर पर अखबारों ने बताया है कि मतदान कितना प्रतिशत हुआ लेकिन द टेलीग्राफ में फोल्ड के ऊपर दोनों खबरें खास हैं। मतदान कम हुआ यह भी है।

आज की कुछ खास खबरें
- सुप्रीम कोर्ट ने रामदेव के खिलाफ मामलों की स्थिति जाननी चाही
- सीएए नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर जवाब मांगा
- अघोषित इमरजेंसी में दूरदर्शन का लोगो घोषित तौर पर भगवा हुआ
- मणिपुर और पश्चिम बंगाल में झड़प, छत्तीसगढ़ में जवान मारा गया
- इकबाल अंसारी तो राम मंदिर आये, कांग्रेस नेता नहीं : मोदी
देश में चुनाव जब दो महीने चलेंगे तो अखबारों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वे सरकारी प्रचार की खबरें नहीं दें। चुनाव की तारीखें भी इस हिसाब से तय की गई हैं कि गाजियाबाद-नोएडा में मतदान के एक महीने बाद दिल्ली में मतदान है। आप कह सकते हैं कि सबके लिये समान स्थितियां हैं पर इसका फायदा कौन उठा रहा है यह देखने वाली बात है। पर जिसे देखना है वह नहीं देख रहा है तो जनता का काम है कि वह धर्म के नशे से बाहर निकले। देखे-सोचे और समझे कि वाकई धर्म रोजगार व्यवसाय से ज्यादा जरूरी है या धर्म के नाम पर कोई स्वार्थ साध रहा है। ठीक है कि इसके लिए शिक्षा जरूरी है और जो अशिक्षित रह गये हैं वो नहीं समझ रहे हैं लेकिन मीडिया और मीडिया के लोग क्यों नहीं समझ रहे हैं। यही नहीं, वे कैसे उम्मीद कर रहे हैं कि जनता जब समझेगी तो उन्हें माफ कर देगी या इस उम्मीद में हैं कि कभी समझेगी ही नहीं। यह भी संभव है कि पर जो मंदिर, धर्म और भगवान की बात करते हैं वो भगवान से नहीं डरते हों। पर यह सब मुद्दा नहीं है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि अरविन्द केजरीवाल को फंसाया गया है। आम आदमी पार्टी को बदनाम करने की साजिश चल रही है। जरूरी नहीं है कि आप यह समझें और मान लें। यह भी जरूरी नहीं है कि आप केजरीवाल या उनकी पार्टी के प्रशंसक या समर्थक हों पर किसी को जेल में दवा नहीं देने का समर्थन कैसे किया जा सकता है या इसका विरोध क्यों नहीं किया जाना चाहिये। ठीक है कि हम आम आदमी विरोध में क्या करे लेकिन अखबार? वो खबर तो छाप सकते हैं और छाप रहे हैं तो प्रमुखता तो ठीक से तय कर सकते हैं। कल मैंने लिखा था कि जेल में केजरीवाल के खाने को लेकर ईडी के आरोप सरकारी बेशर्मी (नालायकी भी कह सकते हैं) से कम कुछ नहीं है। तथ्य यह है कि केजरीवाल को घर का खाना खाने की अनुमति है और ईडी का आरोप इसीलिए था। खबर लिखने वालों ने यह नहीं बताकर खबर को रहस्यमयी बताने की कोशिश की या पहली नजर में खबर समझ में ही नहीं आया। इसपर मैं कल लिख चुका हूं।
स्टेन स्वामी के मामले में यह सार्वजनिक हो चुका है कि सिपर जैसी जरूरी चीज जेल में बिना मांगे नहीं मिलती है। गिरफ्तारी से पहले कैदी या अभियुक्त जो लेकर जाता है वह गायब हो जाता है या उसे दिया नहीं जाता है और अभियुक्त को सिपर मिलने में महीनों लगते हैं। किसी को निरपराध जेल में रखा जा सकता है और कोई मुआवजा नहीं है ना इसके लिए जिम्मेदार को सजा देने का प्रावधान है। सरकार को या व्यवस्था को अपने आप यह सुनिश्चित करना चाहिये था कि कैदियों को बुनियादी जरूरत की चीजें मिले। पर इसकी कोई व्यवस्था नहीं की गई। केजरीवाल पर ईडी के आरोप से जब यह मामला दोबारा सामने आया तो भी अखबारों ने इस मुद्दे पर चिन्ता नहीं की। उल्टे ईडी के आरोप को चटखारे लेकर प्रचारित किया जबकि ईडी से पूछा जाना चाहिये था कि डायबिटीज के मरीज को जेल में इस समय आम कैसे मिल रहा है। कैदी के पास आम का विकल्प क्या है और नहीं है तो कैदी कैसे दोषी है। और ऐसे में इंसुलिन नहीं देना किसी की हत्या की कोशिश नहीं तो और क्या है?
आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड इस मामले में केजरीवाल का पक्ष है। मेरे हिसाब से कल जो चटखारे ले रहे थे उन्हें आज इस खबर को उसी प्रमुखता से छापना चाहिये था पर ऐसा है नहीं। दीपांकर मालवीय की इस खबर के अनुसार, (अनुवाद मेरा) अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की एक अदालत का दरवाजा खटखटाया और अनुरोध किया कि जेल अधिकारियों को उन्हें इंसुलिन देने का आदेश दिया जाए। तिहाड़ जेल और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारियों पर उन्होने खुद को (जरूरी) दवा से वंचित करने और अदालत से झूठ बोलने का आरोप लगाया है। आप जानते हैं कि अधिकारियों ने उल्टे उनपर यह आरोप मढ़ दिया है (और मीडिया ने प्रचारित किया है) कि मधुमेह की अपनी बीमारी को बढ़ाने के लिए वे जानबूझकर मीठी चीजें खा रहे हैं।
केजरीवाल की कानूनी टीम ने इन आरोपों पर पलटवार किया है (जो आज उतनी प्रमुखता से नहीं छपा है), “48 भोजन में से, उन्हें केवल तीन बार आम दिए गए …. सरकार का काम पंक्चर बनाने वालों को कसना नहीं है। किसी को कसना नहीं है। फिर भी सरकार समर्थक ऐसा चाहते हैं तो उन्हें सोचना चाहिये कि एक मुख्यमंत्री उनका पंक्चर बनाने वाला नहीं है। अगर मुख्यमंत्री के साथ ऐसा किया जा सकता है तो आम आदमी या पंक्चर बनाने वालों का क्या हाल होगा। फिर भी नहीं समझ में आ रहा है तो आंख मूंद कर रोजगार, व्यवसाय, महंगाई सब भूलकर अत्याचारियों का समर्थन नहीं किया जाना चाहिये। अरविन्द केजरीवाल ने यह भी कहा है, चीनी के उपयोग का आरोप पूरी तरह से गलत है, मैं अपनी चाय में शुगर-फ्री का उपयोग करता हूं… ईडी कितना तुच्छ हो सकता है? उनके बयान पूरी तरह से झूठे हैं,” दिल्ली के सीएम की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा।
अपने प्रस्तुतीकरण में, सीएम के वकीलों ने भोजन पर दावों का खंडन किया और तर्क दिया कि “यह आरोप चौंकाने वाला है कि कोई व्यक्ति चिकित्सा जमानत पाने के लिए जानबूझकर शर्करा के स्तर में खतरनाक वृद्धि होने देकर अपने जीवन को खुद जोखिम में डाल देगा”। मैंने कल लिखा था कि कैदी आत्महत्या नहीं कर ले इसे देखना भी जेल अधिकारियों की जिम्मेदार है। आम लोगों के ऐसे अधिकारों की रक्षा के लिए मानवाधिकार आयोग है। आपको याद होगा कि कांग्रेस के शासन में पाकिस्तानी कैदी कसाब को बिरयानी खिलाने का आरोप लगाकर लोगों का दिमाग खराब किया गया है और अब एक मुख्यमंत्री को दवा नहीं दी जा रही है। बिरयानी खिलाने के लिए कांग्रेस की सरकार खराब हो सकती है तो दवा नहीं देने वाली सरकार (या व्यवस्था) उससे बेहतर कैसे है? रही बात पंक्चर बनाने वालों की, तो कोई भी सरकार उन्हें अरब सागर में डाल नहीं सकती है। इसके लिए इलेक्टोरल बांड से अरबों वसूल सकती है। दिल्ली में भव्य ऑफिस और गेस्ट हाउस बना सकती है। पर वह मेरी चिन्ता नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने कहा है कि सलाह मश्विरे के बाद इलेक्टोरल बांड फिर आयेगा।
खबर के अनुसार, विशेष न्यायाधीश कावेरी बावेजा की राउज एवेन्यू अदालत ने याचिका पर आदेश सुरक्षित रख लिया, लेकिन कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि केजरीवाल ने डॉक्टरों द्वारा निर्धारित आहार से परहेज किया है। स्थिति यह है कि मारपीट करने वाला उपराज्यपाल है, आतंकवाद की आरोपी सांसद हैं, हजारों करोड़ के लेनदेन से गांजे की खेती की योजना बनाने का आरोपी पूर्व केंद्रीय मंत्री विधायक हो गया है, सैकड़ों करोड़ की वसूली के मामले की जांच की जरूरत नहीं है, प्रधानमंत्री उस योजना को खारिज किये जाने के कारण लोगों को पछताना पड़ेगा कहने की हिमाकत कर रहे हैं और एक सरकार ने नीति बदलकर 100 करोड़ रुपये कमा लिये, उसे चुनाव में खर्च कर दिया तो उसके कई लोग जेल में हैं और हजारों करोड़ की वसूली के मामले में कार्रवाई और जांच की भी मांग नहीं है।
जेल में मुख्यमंत्री को उपलब्ध ‘सुविधा’ के बारे में ज्यादा जानना चाहें तो टाइपटू मधुमेह के रोगी केजरीवाल ने पहली बार 16 अप्रैल को अपने डॉक्टरों से परामर्श करने की अनुमति देने के लिए एक याचिका दायर की थी, जिस पर 18 अप्रैल को ईडी की प्रतिक्रिया आई थी। अगले दिन सीएम के वकीलों ने ईडी की दलीलों की तुलना उनके बिगड़ते रक्त शर्करा के स्तर के लिए उनके आहार को जिम्मेदार ठहराते हुए “मीडिया ट्रायल करने” के प्रयास के रूप में की। और कहा, “यह आवेदक द्वारा जीवन रक्षक दवा: इंसुलिन से वंचित करने में जेल अधिकारियों की गंभीर चूक और चिकित्सा लापरवाही का खुलासा करने से पहले मीडिया में खबर बनाने के लिए किया गया है। इससे आवेदक से घर के बने भोजन की सुविधा भी वापस ले ली जाएगी,” वकीलों ने दलील दी।
ईडी की ओर से पेश विशेष लोक अभियोजक (एसपीपी) जोहेब हुसैन ने आवेदन का विरोध किया और कहा कि उन्होंने गुरुवार को जो कुछ भी प्रस्तुत करने का प्रयास किया वह यह था कि केजरीवाल को दिया गया आहार डॉक्टर द्वारा निर्धारित विनियमित आहार से मेल नहीं खाता। केजरीवाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश गुप्ता ने भी हस्तक्षेप करते हुए कहा, “ईडी को क्यों सुना जाना चाहिए? यह जेल अधिकारियों का मामला है क्योंकि व्यक्ति न्यायिक हिरासत में है और जेल अधिकारियों के वकील यहां हैं।” खबर के अनुसार अदालत 22 अप्रैल को अपना आदेश सुना सकती है। खबर में आगे कहा गया है, अदालत में ताजा दलीलों में, केजरीवाल का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने जांच एजेंसी की विशिष्ट दलीलों का खंडन किया। उदाहरण के लिए, ईडी के यह कहने पर कि 55 वर्षीय आम और मिठाइयाँ खा रहे थे, बचाव पक्ष ने कहा कि केजरीवाल ने जेल में खाए गए 48 भोजन में से केवल तीन बार फल खाया और आखिरी बार उन्होंने ऐसा 8 अप्रैल को किया था। उनके पास जो मिठाइयाँ थीं, वे शुगर-फ्री थीं और छह भोजन के साथ भेजी जाती थीं।
सीएम के वकील ने यह भी कहा कि केजरीवाल ने केवल एक बार आलू-पूरी खाया था, लेकिन ईडी ने इसे उस भोजन का उदाहरण बताया जिससे उनकी मधुमेह की स्थिति खराब हो गई। मुझे लगता है कि यह ईडी का काम नहीं है और जमानत के विरोध के लिए अपनाया गया यह तरीका पेशेवर नहीं है। जो भी हो, यह भी व्यवस्था का भाग है और पहले ऐसा नहीं सुना गया है। फिर भी आपको भाजपा पसंद है तो हुआ करे। आवेदन में कहा गया है कि वास्तविक कारण यह है कि 21 मार्च 2024 को उनकी गिरफ्तारी के बाद से, बार-बार अनुरोध करने के बावजूद उन्हें इंसुलिन नहीं दिया गया है। इस कारण उनका शुगर लेवल बढ़ गया है। आवेदन में नहीं कहा गया है लेकिन मैं जानता हूं कि शुगर लेवल ज्यादा रहने से मरीज के हृदय, आंख या गुर्दे पर असर हो सकता है और जल्दी खराब हो जाता है। उससे जो नुकसान होना है वह हो चुका होगा। और यह एक निर्वाचित नेता के साथ किया जा रहा है जिसपर कोई दूसरा आपराधिक मामला नहीं है। इसकी तुलना यौनशोषण के उन आरोपियों से कीजिये जो गिरफ्तार ही नहीं हुए।
हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की खबर में लिखा है, अदालत ने उन्हें डॉक्टरों द्वारा निर्धारित आहार के अनुसार घर का बना खाना खाने की अनुमति दी। मुझे लगता है कि इसके बाद खाने पर टिप्पणी उसका मीडिया में छपना मीडिया ट्रायल के अलावा कुछ नहीं है और आज के समय में भाजपा के किसी नेता के लिए यह संभव नहीं है। इसपर भी रोक लगनी चाहिये और यह भी पुराना मामला है जिसपर 10 साल में कोई कार्रवाई नहीं हुई। कार्रवाई तो भ्रष्टाचार रोकने या 2014 से पहले के भ्रष्टारियों के खिलाफ भी नहीं हुई। पर समर्थकों को क्या क्या याद दिलाया जाये। अरविन्द केजरीवाल के मामले में तिहाड़ के वकील ने अदालत को जो सूचना दी वह भी महत्वपूर्ण है। जब केजरीवाल को जेल लाया गया, तो उन्होंने कहा कि वह पहले इंसुलिन ले रहे थे लेकिन कुछ महीने पहले बंद कर दिया था, “रक्त शर्करा का स्तर बनाए रखा गया है। घर से भेजे जा रहे खाने में वह निर्धारित डाइट का पालन नहीं कर रहे हैं। उन्हें डाइट चार्ट का पालन करना चाहिए। अगर अभी इंसुलिन लें तो शुगर कम हो जाएगी, शुगर लेवल में बढ़ोतरी की कुछ घटनाएं हुई हैं, अन्यथा इसे बनाए रखा जा रहा है, ”तिहाड़ के वकील योगिंदर हांडू ने शुक्रवार को कहा।
आप जानते हैं कि यह खबर आम चुनाव के पहले चरण के मतदान के दिन छपी थी। इसलिये यह हेडलाइन मैनेजमेंट भी हो सकता है। भारत जैसे देश में जहां सत्तारूढ़ पार्टी इलेक्टोरल बांड से (या पीएम केयर्स या दूसरे तरीकों से) अरबों रूपये कमा सकती है वहां सत्ता में रहने के लिए क्या-क्या कर सकती है इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। ऐसे में कुछ हजार रुपये के लिए दीन ईमान बेचने वाले लोग कब किसके लिए बैटिंग करने लगे इसे समझना और मुश्किल है। सोचना वोटर को ही है। मीडिया के एक बड़े वर्ग ने बता दिया है।


