हेडलाइन मैनेजमेंट और खबरों के इस खेल के बीच आज इंडियन एक्सप्रेस की लीड भी जीडीपी बढ़ने की खबर है। मेरे नौ अखबारों में अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, देश की आर्थिक रफ्तार ने चौंकाया। उपशीर्षक हैं – 1) आम आदमी ने जमकर किया खर्च 6.4 फीसदी से बढ़कर 7.9 फीसदी। आपको याद होगा – जीएसटी कम करने के बाद सरकार ने लोगों से बचत उत्सव मनाने की अपील की थी और कहा गया था कि वे खूब खरीदारी करें और जीएसटी कम होने का लाभ उठाएं। हो सकता है यह उसी कोशिश का असर हो। पर वह अलग मामला है। दूसरा उपशीर्षक है 2) विनिर्माण क्षेत्र में बढ़ोत्तरी 9.1 प्रतिशत रही, बैंकिंग व रीयल इस्टेट में भी उछाल। इसके साथ सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, पीएम मोदी उत्साहित बोले – जारी रहेंगे सुधार। हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड का शीर्षक है – भारत का जीडीपी छह तिमाही में सबसे ज्यादा, 8.23 प्रतिशत बढ़ा। इससे पहले मार्च 2024 में यह 8.35 था। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, दूसरी तिमाही में जीडीपी 8.2 प्रतिशत बढ़ा, छह तिमाहियों में सबसे तेज। द हिन्दू का शीर्षक है, भारत ने दूसरी तिमाही में 8.2 प्रतिशत जीडीपी विकास दर्ज किया, छह तिमाहियों में सबसे ज्यादा रहा। दि एशियन एज की लीड है, भारत में जीडीपी वृद्धि बढ़कर 8.2 प्रतिशत हुई मोदी ने और सुधार के कसम खाए। फ्लैग शीर्षक में तीन बुलेट प्वाइंट हैं 1) जीएसटी में कमी के बाद खपत बढ़ी, ग्रामीण खर्च (व्यय) में वृद्धि 2) सीईए ने कहा इस वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था चार ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी 3) प्रधानमंत्री ने कहा उत्साहवर्धक संकेत। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, विकास अनुमानों से आगे निकल गया। अकेले टेलीग्रााफ ने फ्लैग शीर्षक में इन आंकड़ों पर विपक्ष के सवालों का जिक्र किया है। नवोदय टाइम्स में यह खबर आज के आम शीर्षक के साथ तीन कॉलम में है और देशबन्धु में भी यह तीन कॉलम में है और फ्लैग शीर्षक है – केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने जारी किए आंकड़े। मुख्य शीर्षक है, दूसरी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत। इस शीर्षक से पता चलता है कि आंकड़े सरकारी हैं और अनिल मसीह माफ कीजिएगा विनोद राय जैसे किसी अधिकारी के हो सकते हैं।
आइए अब इस शीर्षक से संबंधित सवाल, आशंकाओं और आलोचनाओं को भी जान लें। अतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भारत के “नेशनल अकाउंट्स स्टैटिस्टिक्स” को “सी ग्रेड” यानी “काफी कमजोर” आंका है। इस ग्रेडिंग को देखते हुए कुछ आर्थिक विशेषज्ञ व विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाया है कि क्या 8.2% जैसी तेज़ जीडीपी वृद्धि वास्तव में स्थायी और भरोसेमंद है? जीडीपी डिफ्लेटर और मुद्रास्फीति की वास्तविकता अनुरूप नहीं लगते हैं। इनमें असंगति है। आलोचना है कि जीडीपी डिफ्लेटर (जिससे वास्तविक जीडीपी की गणना की जाती है) “बहुत कम” दिखाया गया है जबकि आम लोगों को महंगाई / कीमतों में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ रहा है। इस विसंगति ने यह सवाल खड़ा किया है कि “क्या ये आंकड़े वास्तविकता प्रतिबिंबित कर रहे हैं?”। विपक्ष के नेता जयराम रमेश ने कहा है कि “इतनी तेजी से जीडीपी बढ़ने” के साथ “प्राइवेट निवेश (ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेंशन)” में कोई उछाल नहीं दिख रहा जो स्थायी विकास के लिए ज़रूरी होता है। यह भी तथ्य है कि पहले के जीडीपी आँकड़ों में “भारी संशोधन” किया गया है। इसलिए डेटा की गुणवत्ता पर सवाल है। 2024–25 और उससे पहले की तिमाहियों में डीजीपी वृद्धि दर व जीवीए को बाद में अचानक काफी ऊपर या नीचे संशोधित किया गया। ये बड़े-स्तर के पुनर्मूल्यांकन आर्थिक विशेषज्ञों को “डेटा की विश्वसनीयता” पर संदेह जताने के लिए मजबूर करते हैं।
आंकड़ों में ऐसे संशोधन या उठापटक से नीति-निर्माण, निवेश, बजट अनुमान आदि में अस्थिरता आ सकती है। यदि आँकड़ों की गुणवत्ता संदिग्ध हो, तो आर्थिक नीतियाँ भी गलत दिशा में जा सकती हैं। कुछ विशेषज्ञ और आलोचक कह रहे हैं कि जीडीपी विकास से संबंधित शीर्षक या “हेडलाइन मैनेजमेंट” भले प्रभावशाली हो, अर्थव्यवस्था की “जमीनी हालत” जैसे आम लोगों की आय, रोज़गार, महंगाई, कृषि/गरीबी, असंगठित क्षेत्र आदि को नहीं दर्शाता है। कहने की जरूरत नहीं है कि मीडिया में आधार-भूत आंकड़ों का विश्लेषण अभी सीमित है। इसका मतलब यह है कि जीडीपी वृद्धि दर से यह तय नहीं कि समृद्धि सभी हिस्सों में आई है या सिर्फ़ कुछ सेक्टरों/हिस्सों में। इसका पता मुफ्त राशन पाने वालों की संख्या कम होने से भी चल सकता है और वोटर लिस्ट से लाखों नाम हटाए जाने के साथ-साथ आधार को भी सुधारने की खबरों के बाद यह संख्या कम हो जाए तो मानना पड़ेगा कि कुछ लोगों की स्थिति सुधरी और उन्हें मुफ्त राशन की जरूरत नहीं है या उनने लेना बंद कर दिया है। जाहिर है कि जीडीपी डेटा जितना भरोसेमंद होगा नीति-निर्माण, बजट, निवेश, समाज कल्याण आदि बेहतर होंगे। जब आँकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे, तो यह समझना ज़रूरी है कि “कितना विकास असली है, कितनी उपयुक्त।” पर जनगणना हो नहीं रही है, एसआईआर जबरन हो रहा है। आंकड़ों से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ी है लेकिन निवेश, रोजगार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, असंगठित क्षेत्र, मुद्रास्फीति आदि साथ-साथ नहीं सुधर रहे हैं तो वृद्धि सतत या निरंतर जारी रहने वाली नहीं मानी जा सकती है और बचत उत्सव का नतीजा हो सकती है।
स्थिति यह है कि 2021 में होने वाली जनगणना अभी तक नहीं हुई है। अगले साल शुरू होनी है। इस बीच जीडीपी में तेज वृद्धि हुई है और एसआईआर जबरदस्ती हो रहा है जबकि बिहार में कोई लाभ नहीं दिखा और अगर है तो वह सत्तारूढ़ भाजपा को है। जनगणना रुकी हुई है सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि जीडीपी में तेज़ वृद्धि हुई है। ऐसे में एसआईआर का आक्रामक क्रियान्वयन वह भी तब जब बिहार में इसका प्रभाव सीमित रहा। सारी स्थिति मिलकर डेटा-गवर्नेंस, नीति-निर्माण और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े बड़े प्रश्न उठाते हैं। स्पष्ट है कि डेटा आधारित शासन की नींव कमजोर है, डेटा आधारित राजनीति तेज़ है और डेटा आधारित अविश्वास बहुत बढ़ रहा है। कुल मिलाकर, जीडीपी हो, एसआईआर हो या जनगणना सभी मुद्दों में पारदर्शिता, स्वतंत्र जांच, और विश्वसनीय डेटा ही समाधान ला सकता है। (समाप्त)

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