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सुख-दुख

जेन-ज़ी के पास वैसा कोई ‘फिल्टर’ नहीं है, जैसा हम मिलेनियल्स के पास होता था!

Man with curly hair and glasses in a blazer signs a notebook while holding two books at a busy indoor event.

सुशोभित-

जेन-ज़ी के हावभाव, बोलचाल, नज़रिये, फ़लस्फ़े से मेरा थोड़ा-बहुत परिचय रहा है। इनमें से कुछ के मैं सम्पर्क में हूँ और कुछ जेन-ज़ी इंफ़्लुएंसर्स को यूट्यूब पर फ़ॉलो करता हूँ। वो कैसे बोलते हैं और जो बोलते हैं, उसके पीछे क्या सोचते हैं, वो कैसे जीते हैं या जीना चाहता हैं, इसे ऑब्ज़र्व करता रहा हूँ। मैंने पाया है कि इस पीढ़ी के पास वैसा कोई ‘फिल्टर’ नहीं है, जैसा हम मिलेनियल्स के पास होता था। ‘नाइन्टीज़-जनरेशन’ होने के कारण हम मिलेनियल्स में एक किस्म की रूमानियत, नॉस्टेल्जिया, संकोच और एक पराजय-बोध भी है, जिससे हमारी यह अगली पीढ़ी मुक्त है। हम जो बामुश्किल सोच ही पाते थे, उसे ये बेधड़क कह देते हैं और उससे वो ‘एम्बैरेस्ड’ नहीं होते। उनके मुँह से एक हकबकाया हुआ ‘पार्डन-मी’ रह-रहकर नहीं फूटता। उनकी यह बेलौस और बेतक़ल्लुफ़ अभिव्यक्ति अचम्भे में डालती है। वैसा शायद इसलिए है कि वो इतिहास-वंचित हैं। इतिहास हमें बूढ़ा बना देता है!

Person wearing a dark cap, black mask, and backpack holds up a cardboard sign that reads 'U Fucked with the wrong generation'.

जेन-ज़ी की विश्व-दृष्टि मीम्ज़ से नि​र्मित होती है, इसलिए उनमें एक तरह का अठखेलीपन है। वो एक ‘कॉमिकल-​यूनिवर्स’ में जीते मालूम होते हैं, जिसमें लगभग कुछ भी उपास्य या पवित्र (‘सैक्रोसैंक्ट’) नहीं है। यह उन्हें स्वाभावत: ही प्रतिमाभंजक बनाता है। हमारे माँ-पिता ने हमारे भीतर जिस सामाजिक-शिष्टाचार को बड़े परिश्रम से रोपा था, उससे वो मुक्त हैं और भदेस के लोक में नि:संकोच आवागमन करते हैं। हम एक ऐसे संसार में पले-बढ़े थे, जब अभी सैटेलाइट-टीवी भी नहीं आई थी। बाद उसके, हमने इंटरनेट, मोबाइल, सोशल मी​डिया और एआई को भी आते हुए देखा। इन सबमें हम चाहे जितने पारंगत हो जाएँ, हमारी जड़ें उस पूर्व-भूमण्डलीकृत दुनिया में ही हैं, जो रेडियो, दूरदर्शन, टेलीफ़ोन, चिट्ठी और साइकिल का संसार था। हम कालान्तर में ‘डिटिजल-नेटिव’ बने, लेकिन ये पीढ़ी तो डिजिटल-दौर में ही जन्मी है। इंटरनेट इनके लिए छठी इंद्री की तरह सहज है!

सेक्शुअल-ओवरटोन्स इनकी अभिव्यक्ति का एक विशेष आयाम है। किसी यौन-संकेत, अपशब्द या स्लैंग के ​बिना ये देर तक अपनी बात कहने में लगभग असमर्थ हैं। माँ-पिता और परिवार के सामने भी अब इन्हें ‘एफ़’ वर्ड का उपयोग करने से संकोच नहीं। उनकी डेटिंग और रिलेशनशिप्स के ब्योरे अब परिवार से छुपे नहीं होते। पोर्नोग्राफ़ी तक सीधी-पहुँच ने उनकी कल्पनाशीलता को एक ​भिन्न तरीक़े से मथा है। एक स्वाभाविक किस्म की शर्म, लज्जा, संकोच जो मेरी पीढ़ी के युवाओं-किशोरों में थी, उससे वो मुक्त हैं। कभी-कभी लगता है कि हम मिलेनियल्स उन्हें कभी भी समझा नहीं पाएँगे ​कि हम जिस दुनिया में पले-बढ़े थे, वो आज से कितनी अलग थी। लगभग किसी पुरातात्विक-उत्खनन की तरह अगर वो उसे कभी लोकप्रिय-संस्कृति के माध्यम से खोजें तो खोजें।

जेन-ज़ी की वोकेबुलरी विशिष्ट है। वे ‘वाइबिंग’ और ‘ऑरा-फ़ा​र्मिंग’ में दिलचस्पी रखते हैं। आर्ट और लिट्रेचर को वो ‘कंज़्यूम’ करना पसंद करते हैं। ‘वॉट-द-फ़क’ उनकी ‘धत्तेरे-की’ है। किसी को छेड़ना उनके लिए ‘रेजबेटिंग’ है। ग़ुस्सा निकालने का उनका तरीक़ा रिडिक्यूलिंग है, वे आपका मीम बनाकर रख देंगे और उसे वाइडली-सर्कुलेट कर देंगे, इसलिए उनसे पंगा लेने से पहले सावधान। ​किसी को नज़रअंदाज़ करने को वे ‘घोस्टिंग’ कहते हैं। ​रिलेशनशिप में उन्होंने ‘सिचुएशनशिप’ का संशोधन कर ​दिया है। वे चीज़ों को ‘पीक’, ‘डब्ल्यू’, ‘एल’, ‘क्रिन्ज’ के चश्मे से देखते हैं। ‘डेलुलु इज़ सोलुलु’ उनका मूल-मंत्र है। इसका अर्थ होता है : ‘डेल्यूज़न इज़ सॉल्यूशन’। इन अर्थों में वे 1970 के दशक की हिप्पी और बीटनिक जनरेशन के जैसे हैं, जो यथार्थ का अतिक्रमण करके भ्रांतियों में ख़ुशी-ख़ुशी जीना चाहती थी।

इस पीढ़ी की मूल्य-प्रणाली क्या है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। आज से दस-पंद्रह साल बाद वो कैसे होंगे, और उम्र के तजुर्बे उन्हें किस साँचे में ढालेंगे, यह देखना अभी शेष है। भौतिक इच्छाओं के परे उनके स्वप्न क्या हैं, आदर्श क्या हैं, महत् प्रयोजन क्या हैं, इस सबका परीक्षण होना अभी शेष है। लेकिन उनकी जो ‘नॉन-कन्फ़र्मिस्ट’ एप्रोच है, वह उन्हें वर्तमान में भारत के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण बनाती है। सत्ता-तंत्र देश की संस्थाओं, धारणाओं, प्रचार-तंत्र और चुनाव-तंत्र पर कब्ज़ा करके सोच बैठा था कि उसकी जीत पूरी हो गई, लेकिन जेन-ज़ी उसके लिए ‘आउट-ऑफ़-सिलेबस’ है, जिसको हैंडल करने के तरीक़े उसको बिलकुल नहीं पता। वह उन्हें धर्म, जाति, राष्ट्रवाद की बक़वास से वैसे मैनिपुलेट नहीं कर सकता, जैसे उनसे पहले की पीढ़ियों को किया था, और यह पीढ़ी उसके ईश्वर-तुल्य मान लिए गए नेताओं का किसी भी तरह से लिहाज़ करेगी- इसके कोई चांस नहीं हैं। फिलहाल तो इस पीढ़ी ने वह किया है, जो यथास्थिति को हताश होकर स्वीकार कर चुके हम नहीं कर सकते थे। उन्होंने अपनी ‘पीक-रेजबेटिंग’ से मग़रूर सत्ताधीशों को जैसे तिलमिला दिया है, वो ‘एब्सोल्यूट-सिनेमा’ है। इसके लिए एक ‘ओये, शाब्बाश’ दिल से निकलता है। मेरी अगली पीढ़ी जेन-ज़ी के लिए ख़ूब सारा प्यार और दुआएँ!

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