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सुख-दुख

“मरीज को कहीं और ले जाइए, पेपर बना देते हैं, ट्रामा सेंटर बीएचयू ले जाइए”

अजय राय-

गाजीपुर जनपद हॉस्पिटल मेडिकल कालेज खुल जाने से बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करा पायेगा, इसकी पोल खुल जाती है. सरकार का स्वास्थ्य सुविधा पर कितना ध्यान है इसकी पोल भी खुल जाती है.


रात के 12 बजे एक माथे पर चोट लगी बच्ची को जब हम जिला अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में लेकर पहुचे तो ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक ने कहा –


” अब इस समय हम सिटी स्कैन कहाँ से कराएंगे ? क्या पता इंटरनल ब्लीडिंग हो रही हो ?”


आयुष्मान-आयुष्मान जाप करने वाली सरकारी व्यस्वस्था से कौन पूछेगा कि इस समय सिटी स्कैन क्यों नही होगा. दो दर्जन से अधिक चिकित्सकों की फौज से सुसज्जित मेडिकल कालेज के चिकित्सकों को कौन बताएगा कि इंटरनल ब्लीडिंग हो रही है कि नहीं, यह उन्हें ही बताना है.


और उनकी भी क्या कहें, मेडिकल कालेज खुले शहर शहर और दिहाड़ी की मजदूरी पर एसोसिएट प्रोफेसर रखे गए. ओपीडी, इमरजेंसी सब उन चिकित्सकों के जिम्मे जिनकी सेवाशर्तें अग्निवीरों से भी खराब हैं. उन्हें साल साल भर के लिए काम पर रखा गया ताकि वह एमबीबीएस के स्टूडेंट्स को एनाटॉमी, फीजियोलॉजी … पढ़ाएं और जनपद की जनता के स्वास्थ्य की सुरक्षा करें. कौन पूछे ये सवाल और किससे ?


आधी रात बीत चली आधा दर्जन पेशेंट्स को रेफेर कर इमरजेंसी के स्टाफ ने अपना काम पूरा कर लिया जैसे.


अब उस बच्ची को लेकर बनारस जाना है, न एम्बुलेंस, न कोई मेडिकल एड .. क्या तमाशा है ? यह रोज रोज होता है.


किसी दिन वह सारी भीड़ जो जब-तब छठी मैया की पूजा करने गंगा की घाटों पर रेलम-पेल मचा देती है, वर्ल्ड कप देखने को सड़कों-गलियों को जाम कर देती है — अपनी मूल भूत आवश्यकताओं की अनदेखी के लिए अपना सिर क्यों नहीं पीट लेती जिसके लिए वह प्रशासन और सरकारें चुनती है.

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