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इंडियन एक्सप्रेस में गूगल का ये विज्ञापन बता रहा है कि आने वाला समय ‘फूहड़ कामयाबी’ का है!

विनीत कुमार-

दि इंडियन एक्सप्रेस में गूगल के सुरक्षा कवच का यह विज्ञापन देखा तो ठहरकर, इत्मिनान से पढ़ने लग गया. पूरे पन्ने पर रोमन लिपि और हिंग्लिश में छपे इस विज्ञापन को पढ़ते हुए मुझे एकबारगी ऐसा लगा यह अंग्रेजी में लिखे किसी पाठ से गुज़रने से कहीं ज़्यादा मुश्किल काम है. संभवतः यही बात देश के लाखों ऐसे बच्चे जिनकी ‘अंग्रेजी, साइंस तो माशाअल्लाह है लेकिन हिन्दी थोड़ी वीक है’ पढ़ते हुए महसूस करें कि यह हिन्दी में लिखी किसी चीज़ से गुज़रने से कहीं ज़्यादा भारी काम है. ख़ैर,

मेरा शोध का काम टीवी, रेडियो के साथ-साथ हिंग्लिश पर भी थोड़ा-बहुत है. मैंने इस विषय पर भी कुछ आलेख और किताबों में अध्याय लिखे हैं तो जहां कहीं हिंग्लिश का प्रयोग होता है, मैं समय देकर उन्हें पढ़ता हूं और हिन्दी के बीच में अंग्रेजी प्रयोग के तर्क को समझने की कोशिश करता हूं. इस मामले में रीता कोठारी और रूपर्ट स्नेल द्वारा संपादित किताब” Chutnefying English: The Phenomenon of Hinglish” बेहद दिलचस्प और ज़रूरी किताब है. हिंग्लिश में कूट के घुलने (Code Mixing) और कूट के बदलने (Code Switching) के पीछे की पूरी रणनीति को समझने के लिए समय-समय पर “Hobson-Jobson: The Definitive Glossary of British India” पलटते रहना ज़रूरी होता है.

आप हिन्दी के बीच इस तरह से अंग्रेजी के शामिल किए जाने पर ग़ौर करना शुरु करेंगे तो आपके लिए भाषा की एक नयी दुनिया खुलेगी. आदत और सहजता के तर्क के बीच रेडियो मिर्ची सुननेवाले “always” ख़ुश क्यों, सदैव या हमेशा क्यों नहीं के सवाल का प्रसून जोशी और पीयूष पाण्डे के तर्क से सामना होगा तो अंदाज़ा होगा कि भाषा के उपर राजस्व उगाहने की कितनी बड़ी जिम्मेदारी है. वहीं हिन्दी-अंग्रेजी के कैसे बाज़ार-समाज और हमारे परिवेश ने विभाजित किया है. हिन्दी के बीच में अंग्रेजी शब्दों का चूरन डालने के पीछे कैसे वर्ग बदलने की कोशिशें काम करती है, एक नयी रणनीति से गुज़रना हो सकेगा.

यहाँ यह विज्ञापन पढ़ते हुए एक-दो शब्द पर अटक गया. दूसरी बार पढ़ने के बाद समझ आ गया. आप पढ़ते हुए जैसे ही आख़िर की पंक्ति तक आएंगे, आपके मुँह से सहज भाव से शब्द निकलेगा-बकवास, एकदम बकवास.

मैंने ऐसा कहते हुए ख़ुद को रोक लिया. दिए गए क्यू आर कोड को स्कैन किया और यूट्यूब पर जाकर पूरा सुना. सुनते हुए एक बार ढिंचिक पूजा और उनका “सैल्फी मैंने ले ली आज, सैल्फी मैंने ले ली आज” और फिर चाहत फ़तेह अली ख़ान का “ ओए होय,ओए होय, बदो-बदी…बदो बदी. का एकदम से ध्यान हो आया. आप इन दोनों को लेकर इंटरनेट पर खोजना शुरु करेंगे तो उपहास उड़ाने के अंदाज़ में काफी कुछ लिखा गया है लेकिन जब लोकप्रियता के सिरे से देखेंगे तो किसी भी संगीत में दक्ष गायक से कम हिट्स नहीं है. इस बात का एक मतलब स्पष्ट है कि जिसे आप और हम बकवास मानते हैं क्योंकि हम उसे भाषा, व्याकरण, अन्तर्वस्तु, संगीत के औज़ार और स्तर से देखने-समझने की कोशिश कर रहे होते हैं, उसका भी एक बाज़ार है और कई बार यह बाज़ार इतना आक्रामक है कि यह सब सीखने-बरतनेवाले हताश हो जाएं.

आपको क्या लगता है, गूगल जिसका दुनिया के बाज़ार पर अजेय कब्ज़ा है, उसके पास ढंग की कॉपी लिखने वाले लोग नहीं होंगे? मुँहमांगी क़ीमत देने की क्षमता नहीं है? सब है लेकिन चौतरफा हर चीज़ का शोर इतना अधिक है कि ढंग की चीज़ें जैसे एकदम से ग़ुम हो जा रही हों और जिन्हें आप बकवास मानते हों, वो एकदम से ध्यान खींच लेती हो. ये कुछ-कुछ ऐसा ही है कि भीड़-भाड़ में कोई अपनी लिखी कविता सुनाकर किसी को प्रभावित करने में नाकाम हो जाता हो और कोई बिना हेलमेट के, बाइक लहराते हुए जोर से चिल्लाकर- आज तो आपकी छुट्टी होगी, ध्यान खींच ले जाता हो. अब पीछे से जिसे हाऊ चीप, डिस्गस्टिंग, सो फनी कहना हो, कहता रहे. गूगल ने इतने मंहगे विज्ञापन बकवास शैली में छपवाकर इस बात पर एक तरह से मुहर लगा दी है कि बाज़ार किसका है और हम अपनी बादशाहत कैसे बनाए रख सकते हैं!

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