विजय सिंह ठकुराय-
2018-19 की बात है। उस समय मैंने सार्वजनिक जीवन से संन्यास नहीं लिया था। सैकड़ों शैक्षिक संस्थाओं से टाई-अप हो रहे थे। किताबें जा रहीं थी। सेमिनार-वर्कशॉप होते थे। बहुत सी संस्थाएं इंडिविजुअल पेमेंट में नाटक करती थीं तो हमने सुविधा के लिए एक पब्लिकेशन हाउस जीएसटी में रजिस्टर करवा लिया। किताबों पर वैसे कोई टैक्स-वैक्स है नहीं, फिर भी हर महीने जीरो-बटा-निल की एक रिटर्न जीएसटी में दाखिल करने का प्रावधान होता था।
अब हम ठहरे टैक्सेशन के मामले में एकदम अनाड़ी। आज तक जो कंपनियां चलाई, उनकी सारी कागजी कार्यवाही हमारे पिताजी कर देते थे। हमने कभी रुचि ली ही नहीं, ऊपर से जीएसटी नया-नया आया था, तो उसके प्रावधानों की जानकारी वैसे ही कम थी। फिर लॉकडाउन आ गया। उस दौर में कुछ परेशानियों ने ऐसा घेरा कि पब्लिकेशन हाउस को साल भर के लिए भूल ही गया।
फिर एक दिन सोचा कि चलो, फिर से काम शुरू करें। अपने जीएसटी एडवोकेट के पास गए। उसने बताया कि आपने साल भर से ऊपर हो गया, निल वाली रिपोर्ट नहीं दाखिल करी। फाइन लगेगा। हमें लगा कि होगा दो-चार हजार का फाइन, भर देते हैं। पता चला कि जुर्माने की रकम तो 70 हजार क्रॉस कर गयी। मने हर रोज का एक निश्चित फाइन और उस पर हर महीने चक्रवृद्धि ब्याज। बहुत खूब…
हमने थोड़े-बहुत हाथ-पांव मारे कि कुछ सेटलमेंट हो जाये। सबने हाथ खड़े कर दिये। पता चला कि कुछ नहीं हो सकता और ये रकम दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती ही रहेगी। एक दिन नोटिस आ जायेगा। या तो रकम हमारे आधार लिंक्ड किसी अन्य खाते से काट ली जाएगी। खाते में रकम न हुई तो क्या मालूम जेल में पटक दिए जाते। अपने पिताजी को बताते तो 4-6 गाली वहां से भी खाने का डर था। तो मुर्दा कितना दिन घर में रखा जाता, एक न एक दिन तो गंगा में बहाना ही पड़ता। तो हम भी खीज कर 70 हजार का जुर्माना एकमुश्त भर आये।
देखा आपने? एक आइटम, जिसके बेचने का वैसे भी कोई टैक्स नहीं। बस रिपोर्ट सबमिट करने में लापरवाही का 70 हजार जुर्माना – जिसकी कोई सुनवाई नहीं। यह है भारत का गब्बर सिंह टैक्स सिस्टम, अर्थात – GST
आज एक खबर पढ़ी कि कर्नाटका में जीएसटी विभाग ने मंझले-छोटे 13000 दुकानदारों को नोटिस और कईयों को लाखों के डिमांड नोटिस चस्पा कर दिए हैं, यह बोलकर कि – तुम साल में 20 लाख से 40 लाख तक UPI से अमाउंट रिसीव कर रहे हो। जीएसटी में क्यों नहीं एनरोलमेंट किये? अब भुगतो।
ये 20-30 लाख साल का प्रॉफिट नहीं है। न जाने कितने मंझले-छोटे दुकानदार महीने में दो-तीन-चार लाख की खुदरा सेल करते हैं, जिसमें उनका प्रॉफिट 10-20 परसेंट से ज्यादा नहीं होता। अर्थात – कमाई के लिहाज से बड़े शहरों में 20-40-60 हजार रुपये की कमाई, जो कोई बहुत ज्यादा नहीं है। उस पर भी बहुत से वेंडर्स ऐसी चीजें बेच रहे हैं, जो जीएसटी के दायरे में आती ही नहीं। बस पेमेन्ट ऑनलाइन लेने के चक्कर में फंस गए। कभी सोचे ही नहीं होंगे कि ऐसा भी हो सकता है।
पर बात वही है कि पहले सबको देशहित में UPI का पाठ पढ़ाओ। फिर एक भ्रामक टैक्स सिस्टम लेकर आओ, जिसमें सुनवाई अपवाद है – जुर्माना नियम। आम जनता से गलती हुई तो उसे एक बार एजुकेट कर के माफ करने की बजाय कार्यवाही के नाम पर पीड़ित करो। आज यह कारनामा कर्नाटक में कांग्रेस ने किया है। इसी मॉडल को दूसरे राज्यों में भी दोहराये जाने की सुगबुगाहट चल रही है। क्या है कि 5 किलो अनाज बांटने और चुनावी रेवड़ियों के लिए धन भी जुटाना है। रिकॉर्ड जीएसटी कलेक्शन के आंकड़े दिखाने हैं। 5 ट्रिलियन इकॉनमी भी बनानी है।
चहुँमुखी विकास हो रहा है और विकास का पेट भरने के लिए तमाम योजनाएं बना कर किसी भी तरह आम आदमी की जेब काटने की होड़ मची है। लोअर मिडिल क्लास आदमी सुख-शांति से जिंदा रह पाए, इतने भर विकास में काम नहीं चल सकता क्या?





प्रविन
July 19, 2025 at 4:19 pm
कोई सुनवाई नहीं होगी अच्छा हुआ आपने फाइन भर दिया नहीं तो आप लंबें नपते ज्यादा तो नहीं लिख सकता लेकिन पब्लिक वेपारी उधोगपति भी कोई प्रतिक्रिया नहीं करते इसका नतीजा हैं हर ऐसोसिएशन वाले आगे आना चाहिए
Mahinder kumar
July 21, 2025 at 5:20 pm
Govt should deduct tax amount credited in beneficiary s/c
No need to file return and no need of Accountant Advocate CA