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‘हंस’ का मंच, ओटीटी में गालियां- कहानी की मांग या मसाला?

शालिनी श्रीनेत-

‘हंस’ जैसे एक गरिमामयी मंच से बेटीC@द, #ट और ल$@ जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं होना चाहिए, ये मेरा मानना है। विषय था, ओटीटी में गालियां – कहानी की मांग या मसाला। इसका मॉडरेशन कर रहे थे इरफान जी। उन्होंने शुरुआत ही इसी बात से की कि दो लोग गहरे दोस्त थे उसमें से एक के बहुत प्रिय टीचर आये थे किसी कार्यक्रम में। दोस्त ख़ाना परोस रहा था और उनके टीचर की थाली में कुछ नहीं दिखा तो उन्होंने कहा, क्या बेटीC@द #ट परोस रहे हो, ल$@ भी नहीं है थाली में।

पूरी बातचीत तो नहीं लिखी जा सकती पर सार बता दे रही हूं।

तिग्मांशु धुलिया, वैभव सिंह, दिबांग और उदय प्रकाश जी थे पैनल में। तिग्मांशु जी ने शुरुआत की कि गाली देकर बात करने से दोस्ती गहरी होती है। बीच में एक बार बोले कि मैं इलाहाबाद का हूं। मुझे गालियों से कोई परहेज नहीं, गलियां अच्छी लगती हैं। उन्हें गाली देकर बातचीत करने में कोई बुराई नहीं दिखती। वैभव किसी सीरीज की चर्चा करते हुए कह रहे थे कि उसमें गालियां खराब नहीं लगतीं। कुछ डायलॉग गालियों के साथ ही दमदार लगते हैं।

दिबांग और उदय प्रकाश जी नहीं होते उस पैनल में तो देखने सुनने लायक नहीं था वो कार्यक्रम।

मैंने सवाल पूछा तिग्मांशू और वैभव से एक ही साथ। मैंने पूछा- धूलिया जी, आपने कहा इलाहाबाद से तो हैं गालियां खराब नहीं लगती और गालियों से दोस्तियां गहरी होती हैं। लड़कियां-महिलाएं गाली नहीं देतीं तो क्या उनकी दोस्तियां गहरी नहीं होतीं? और वैभव जी सिरीज में गालियां इस्तेमाल करते हुए ये दिमाग नहीं आता कि महिलाओं के अंगों पर होती हैं गालियां… ये नहीं लगता कि ये महिला विरोधी है?

कुछ सेकंड तक कोई नहीं बोला…

फिर मॉडरेटर ने ही जवाब दिया कि शादी-ब्याह में गीत गाये जाते हैं जिसमें गालियां होती हैं। इसके बाद धूलिया और वैभव भी कहने लगे महिलाएं खुद ही बहुत गंदी गालियां देती हैं एक दूसरे को। तब तक माइक मैं वापस दे चुकी थी और कार्यक्रम में विवाद करना ठीक नहीं होता, इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा, नहीं तो उनसे पूछती और बताती भी कि आपको किसने अधिकार दे दिया गाली देने का? और ब्याह-शादी में गाई जाने वाले गालियों वाले गीत के पीछे का कारण भी जानिए…

जिस समय गालियों वाले गीत होते थे वो समय कुछ और था। महिलाएं घर में बंद रहती थीं। शादी ब्याह में ही उनको महत्व और आजादी मिलती थी तो वो अपना भड़ास निकालती थीं। पर अब समय जब बदल रहा है महिलाएं अपने हक-अधिकार समझने लगी हैं और अपने शरीर को लेकर बेहद सचेत हैं। तो हेलो आप कौन हैं स्त्रियों के अंगों को लेकर गाली देने वाले? या सिरीज बनाने वाले?

ध्यान रहे आधी आबादी को गरियाते हो आप पुरुष… जिस दिन अपने पर आयेंगी तो आप सबका क्या होगा। आपकी बहन, भाभियां और मांयें खड़ी होगीं आपके सामने तनकर कि क्या बदतमीज़ी है? क्यों हम महिलाएं इतनी सुलभ और सस्ती दिखती हैं? मुंह तोड़ देंगी आगे से गाली देकर बात किए तो! ये जो गाली देकर बात करने दोस्ती गहरी होती है न तो अपने को दिलवाओ… हम औरतों के अंगों का नाम लेने से परहेज करो नही तो हम तुमसे परहेज कर लेंगे।

जब इतने पढ़े-लिखे लोग ऐसे तर्क देते हैं तो सोचिए जरा कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ लोग कितना कुतर्क करते होंगे?

आगे आने वाले इनके सीरियल जिसमें गालियां होंगी हम विरोध करेंगे। हे पुरुषों जो भी गाली-गलौज करना है आपस में पुरुषों के अंगों के नाम पर ही करो…

हमें बख़्शो !!

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