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क्रिकेट में Hawk Eye System की नींव कैसे पड़ी?

विजय सिंह ठकुराय-

पिछली सदी में क्रिकेट के दौरान पगबाधा करार दिए जाने से आउट हो जाना एक बड़ी विवादास्पद बात होती थी। अंपायर का फैसला सर्वमान्य होता था और कई बार बल्लेबाज को अंपायर के फैसले से नाखुश होते हुए भी खेल भावना का सम्मान करने के लिए पैवेलियन वापस लौटना पड़ता था। अब अंपायर भी हैं तो इंसान ही तो गलती की गुंजाईश हमेशा बनी रहती थी।
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एक चलताऊ क्रिकेटर रह चुके और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में डिग्री धारी ब्रिटिश पॉल हाकिंस भी अक्सर अपने पसंदीदा खिलाडियों के आउट हो जाने से परेशान हो जाते थी, तभी उन्हें लगा कि वे तकनीक की सहायता से इस समस्या को हमेशा के लिए सुलझा सकते हैं। इस तरह में 1999 में पॉल के दिमाग ने Hawk Eye System की नींव रखी जिसने दुनिया भर के स्पोर्ट्स की तासीर हमेशा के लिए बदल दी।
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क्रिकेट स्टेडियम की रूफटॉक पर लगे 6 हाई एक्यूरेसी और हाई फ्रेम रेट के कैमरा की मदद से हॉक आई का AI गेंद के गेंदबाज के हाथ से छूटते ही अपना विश्लेषण शुरू कर देता है। गेंद की गति, एंगल, कहाँ टप्पा खाया, कितनी स्पिन/स्विंग हुई, उसके बाद मूवमेंट के प्रत्येक एंगल का विश्लेषण करते हुए यह सिस्टम सिर्फ 3-4 मिलीमीटर के अंतर से गेंद की संभावित दिशा और स्थिति बताने में सक्षम है।
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इस सिस्टम को सबसे पहले 2001 में लॉर्ड्स में हुए इंग्लैंड-पाकिस्तान के मैच के दौरान टेस्ट किया था। फिर 7 साल तक चर्चा/संशय/बहस के बाद इस सिस्टम को इंडिया-लंका के मैच के दौरान पूरी तरह लागू कर दिया गया और भारत के वीरेंदर सहवाग डीआरएस के तहत सबसे पहले आउट करार दिए गये। फिर 2011 में इसे 50 ओवर फ़ॉर्मेट और 2017 में 20-20 फ़ॉर्मेट में भी इसे लागू कर दिया गया।
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आज सॉकर, टेनिस, बेसबाल, बालीबाल, रेसिंग इत्यादि विश्व के सभी मेजर स्पोर्ट्स में इसी हॉक आई सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है जो मूल रूप से क्रिकेट के क्षेत्र में हुई खोज है। इस सिस्टम के कारण खेल पहले के मुकाबले ज्यादा रोमांचक, निष्पक्ष हैं और दर्शकों के लिए बेहतर कवरेज उपलब्ध कराता है।
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क्या ये सब आपको पहले पता था? मुझे हाल-फिलहाल में पता चला और इन दिनों क्रिकेट की चर्चाएँ जोर पर हैं तो सोचा आपको भी बता दूँ। आप चाहें तो बिना इजाजत लिए अपने मित्रों से यह जानकारी साझा कर सकते हैं।
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  • झकझकिया
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