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सुख-दुख

हिंदी कविता में ठप्पावाद!

दिनेश चौधरी-

भाभी जी ने बताया कि कविवर जब से दिल्ली से लौटे हैं, अपने हाथ नहीं धो रहे हैं। मैंने कुछ सोचकर पूछा, “ठप्पा किस हाथ में लगवाया था?” जवाब मिला कि दायें हाथ में। “तब तो ठीक है”- मैंने कहा- “खाना तो छुरी-काँटे से भी खाया जा सकता है।”

कविवर बाहर आए। प्रफुल्लित और उत्साहित। हमेशा हाथ जोड़कर नमस्ते करते थे। आज एक हाथ से सैल्यूट जैसा किया। इस तरह किया कि ठप्पा दिख जाए। आशय स्पष्ट था कि वे ठप्पे पर गम्भीर विमर्श करना चाहते हैं औऱ ऐसा न होने पर वे पूरे मामले को अन्यथा ले सकते हैं। मैं इन हालात से बचता हूँ। नहीं चाहता कि मेरी किसी हरकत को कोई अन्यथा ले ले। अन्यथा वे बाद वे तरह-तरह से बदला लेते हैं।

मैंने कहा कि आपका ठप्पा तो बड़ा चमकदार है। ठप्पे के बारे में कुछ कहने के लिए मुझे कुछ और नहीं सूझा। कुछ और कहता भी तो क्या कहता? ठप्पे के चमकदार होने की बात पर उनका चेहरा चमक उठा। कहा, “हाँ, आयोजन वाले दिन में भी खूब चमक रहा था। अब कोई चार बीत गए हैं पर लग रहा है कि यह और चमकदार होता जा रहा है। इसकी चमक वैसी ही है, जैसे भक्तिकाल की कविताओं में हुआ करती थी।”

मैंने कहा, “हुआ करती थी का क्या मतलब है? भक्तिकाल तो अब भी चल रहा है। इतना है कि अब निर्गुण भक्ति के दिन चले गए। यह अंधेरे में तीर चलाने जैसा है। किसी की भक्ति की जाए और उसे पता ही न चले कि उसकी भक्ति की जा रही है तो क्या फायदा। सगुण भक्ति ही आज के समय में असली भक्ति है।”

वे खुश हो गए। कहा, “तुम मेरे सच्चे मित्र हो। मेरी भावनाओं को समझते हो। सगुण भक्ति तो मैं बहुत दिनों से कर रहा था पर शत्रु-कवि कविता के मर्म को नहीं पकड़ पा रहे थे। ईर्ष्यालु हैं। बहुत दिनों से मेरी टाँग खींचने में लगे हुए हैं। अब जब से ठप्पा लगवा कर लौटा हूँ, सब सालों के मुँह लटके हुए हैं।”

“जी बिल्कुल”-“मैंने कहा-“आपकी वह ठप्पे वाली तस्वीर सारी दुनिया में चल पड़ी है। जिन्हें ठप्पे नहीं लगे वे मारे ईर्ष्या के जलकर खाक हुए जा रहे हैं। कितने वर्षों की तप और साधना से यह हासिल होता है..।”

“वह तो है!”- उन्होंने कहा – “तप करते-करते हड्डियाँ गल जाती हैं। आखिर में जब रीढ़ की भी गल जाएँ तभी यह हुनर आता है। ठप्पेदार होना कोई आसान काम नहीं है..एक सज्जन आये थे। उन्हें झुकने को कहा तो उनके हाथ घुटनों तक ही पहुँच पाये। सात जन्म ले लें तो भी चरणों तक नहीं पहुँच सकेंगे। मुँह लटकाकर चले गए। जाते हुए अपनी सूनी हथेलियों को देख रहे थे..काश कि इसमें ठप्पा होता!”

“अपने यहाँ ठप्पों का बड़ा ऐतिहासिक महत्व भी रहा है”, मैंने कहा।

“जी हाँ”, -उन्होंने कहा, “सिकन्दर की सारी बदनामी इसी वजह से हुई। सारी दुनिया को जीतने की हसरत थी पर दुनिया से कूच किया तो उसके हाथ खाली थे, ठप्पा नहीं लगा था। हाथ में ठप्पा होता तो यह सनद मशहूर नहीं होती कि सिकन्दर खाली हाथ गया। अंग्रेजों के शासनकाल में जिन्होंने अपने माथे पर ठप्पे लगवाये, वही बड़े भू-स्वामी, जमींदार, राय-बहादुर वगैरह बने। ठप्पे लगवाने की परंपरा आजादी के बाद भी बनी रही। ठप्पे लगवाने वाले ही बड़े ओहदों तक पहुँच सके। अपने भैयाजी तो इस परंपरा में गजब के साधक हैं, उन्होंने अपने जिस्म के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग ठप्पे लगा रखे हैं। जब जैसी जरूरत पड़ती है, उसकी नुमाइश कर काम निकाल लेते हैं।”

“आगे आपकी योजना क्या है?” मैंने बातचीत को समेटने के अंदाज में प्रश्न किया।”

उन्होंने कहा कि “हिंदी कविता में ठप्पावाद पर एक शोध-प्रबंध रचने का इरादा है।” बगैर कहे नवोदित कवियों को यह सन्देश भी दिया कि “नयी प्रतिभाओं को ज्यादा से ज्यादा इस धारा में शामिल होना चाहिए।”

उन्होंने फिर से सैल्यूट जैसा किया और बाएँ हाथ से दाएँ हाथ को सावधानी से पकड़ कर अंदर चले गए।

मुझे लगा कि ज्यादा अच्छा होता कि वे गोदना गुदवा आते!

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