
संजय कुमार सिंह
मेरे आठ अखबारों में आज अकेले अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, “तमिलनाडु के नेता कम से कम अपने हस्तक्षर तो तमिल भाषा में करें : मोदी”। कहने की जरूरत नहीं है कि यह दक्षिण के राज्यों पर हिन्दी थोपने की पुरानी कोशिशों के विरोध के संदर्भ में कहा गया है। अखबार ने इसे लिखा भी है, भाषा विवाद के बीच पीएम का सीएम स्टालिन पर तंज : कहा राज्य की द्रमुक सरकार मेडिकल की पढ़ाई तमिल में कराये। हिन्दी के मेरे दूसरे अखबार, नवोदय टाइम्स ने इसे सिंगल कॉलम में छापा है और इसके साथ दूसरी खबर में कहा है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री उस समारोह में अनुपस्थिति थे जिसमें प्रधानमंत्री ने यह बात कही। अखबार ने बताया है कि यह रामेश्वरम द्वीप को मुख्य भूमि से जोड़ने वाले पंबन समुद्री पुल के उद्घाटन का मौका था। खबरों के अनुसार प्रधानमंत्री ने नई ट्रेन सेवाओं को झंडी दिखाकर रवाना किया पुल के नीचे से पार होने वाले तटरक्षकों के एक जहाज को भी झंड़ी दिखाकर रवाना किया। आज उद्घाटन के मौके पर जो खबर होनी चाहिये वह पुल, उसका निर्माण, लागत, संबंधित इंजीनियरिंग, उपयोग और जरूरत आदि से संबंधित होती तो सूचनाप्रद होती। पर प्रधानमंत्री की घटिया राजनीति के कारण इस मौके पर मुख्यमंत्री ही अनुपस्थित रहे और प्रधानमंत्री ने तमिल में हस्ताक्षर करने और तमिल में मेडिकल की (पता नहीं इंजीनियरिंग भी या उसे छोड़कर) पढ़ाई कराने की बात करके अपनी घटिया राजनीति की। हालांकि प्रधानमंत्री ने जो कहा वह खबर तो है ही पर प्रधानमंत्री के कहने पर उसे जरूरत और चुनौती के रूप में पेश करने तथा यह बताकर पेश करने में फर्क है कि प्रधानमंत्री यहां भी अपनी राजनीति कर गये।
हिन्दी के अखबारों ने इसे प्रधानमंत्री की चुनौती के रूप में छापा है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, भाषा विवाद के बीच प्रधानमंत्री ने द्रमुक नेताओं से पूछा चिट्ठियों पर दस्तखत अंग्रेजी में क्यों? इस खबर का इंट्रो भी प्रधानमंत्री की शैली बताने वाला है, फंड्स आवंटन तीन गुना बढ़ गया है पर कुछ लोग आदतन रोते हैं। अखबार ने अपनी खबर में बताया है, अपर्याप्त केंद्रीय कोष के संबंध में द्रमुक नेतृत्व वाली राज्य सरकार के आरोपों का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि कुछ लोगों को अकारण शिकायत करने की आदत पड़ गई है जबकि मुझे लगता है कि अकारण शिकायत करने का काम प्रधानमंत्री कर रहे हैं और तमिलनाडु की शिकायत त्रिभाषा फार्मूला लागू करने की शर्त पर शिक्षा के लिए केंद्रीय धन रोकने से संबंधित है। 12 मार्च 2025 की एक खबर के अनुसार, “तमिलनाडु के एनईपी 2020 के प्रमुख पहलुओं, खासतौर से त्रि–भाषा फॉर्मूले को लागू करने से इनकार करने के कारण केंद्र ने राज्य को समग्र शिक्षा अभियान (एसएसए) के लिए दी जाने वाली केंद्रीय सहायता राशि की 573 करोड़ रुपये की पहली किस्त रोक दी है“। मुझे लगता है कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने जब प्रधानमंत्री के आरोप को जगह दी है तो तथ्य भी बताना चाहिये था हालांकि, यह माना जा सकता है कि पाठकों को तथ्य पता है और प्रधानमंत्री ने ऐसा कोई पहली बार नहीं किया है।
जहां तक तमिल में दस्तखत करने की बात है, प्रधानमंत्री गुजराती में क्यों नहीं करते? और दस्तखत किसी भाषा में, अपनी लिखावट में अपना नाम लिखना भर नहीं है। वह हमेशा एक जैसा रहता है और पत्र या दस्तावेज की भाषा के अनुसार बदलता नहीं है। इसलिए दस्तखत पर ऐसे सवाल उठाना प्रधानमंत्री के स्तर का मामला नहीं है। जहां तक हिन्दी या तमिल में मेडिकल पढ़ाने की बात है उसके फायदे कम हैं और अगर पुस्तकें संबंधित भाषा में न हों तो पढ़ाने का कोई मतलब नहीं है। वैसे भी, कुछ जरूरी और मानक पुस्तकों का अनुवाद हो भी जाये तो जरूरी नहीं है कि अनुवाद अच्छा और ग्राह्य होगा ही और हो भी जाये तो नई और ताजा सामग्री का अनुवाद कैसे होगा? कहा जा सकता है कि अब कंप्यूटर से अनुवाद हो जाता है तो जवाब यही है कि कंप्यूटर के अनुवाद से पढ़ने से बेहतर नहीं है कि बच्चों को अंग्रेजी सिखाई जाये और वे मूल अंग्रेजी से ही पढ़ें। मध्य प्रदेश में मेडिकल की किताब का हिन्दी अनुवाद होने की खबर आई थी और तब अनुवाद की भरपूर आलोचना हुई थी। यही नहीं अगर दक्षिण भारतीय राज्य मातृभाषा के अलावा अंग्रेजी पढ़ाना चाहते हैं और तीसरी भाषा की जरूरत नहीं समझते हैं या तीसरी भाषा हिन्दी को नहीं मानते हैं तो यह उनका मामला है प्रधानमंत्री को इसमें परेशान होने या अपनी सोच थोपने की कोई जरूरत नहीं है। अंग्रेजी नहीं पढ़ने और नहीं जानने की अपनी समस्याएं हैं और यह नहीं माना जा सकता है कि प्रधानमंत्री को यह सब बताने की जरूरत है। जाहिर है वे अपनी राजनीति कर रहे हैं और हिन्दी अखबारों को उनका समर्थन करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि हिन्दी अखबारों और उसके संपादकों-मालिकों को भी पता है (और होना ही चाहिये) कि अंग्रेजी नहीं जानने के क्या नुकसान हैं। अगर उन्हें देशभक्ति में हिन्दी जरूरी लगती है तो यह उन्हीं के लिए हो सकती है जिनकी मातृभाषा हिन्दी है। वसुधैव कुटुम्बकम की बात विश्व की भाषाएं जाने बगैर नहीं होंगी और अब यह मान लेना चाहिये कि विश्व की संपर्क भाषा अंग्रेजी ही है। सरकार, नरेन्द्र मोदी उनकी पार्टी और पूरा संघ परिवार जो चाहे और करे, हाल में यह खबर थी कि लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में नहीं विदेशी स्कूलों में पढ़ाना पसंद करते हैं और भारत में ऐसे स्कूलों की संख्या अच्छी खासी है। स्कूली शिक्षा भले मातृभाषा में हो या होती रहे देश हित में (जब देश में नौकरियां नहीं हैं) तो जरूरी है कि बच्चे विश्व की संपर्क भाषा भी जानें और जरूरत पड़ने पर अंग्रेजी बोलने वाले देशों में काम कर सकें। जिस देश में नौकरी नहीं मिलती, पेंशन नहीं मिलती, बुढ़ापे में इलाज की उचित व्यवस्था नहीं है वहां यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि बच्चे कमायें और इतना कमायें कि मां-बाप के बुढ़ापे का बंदोबस्त हो सके। सरकारी आयुष्मान योजना और रेल टिकट में छूट का हाल सबके सामने है।
मेरा मानना है कि हिन्दी अखबार अक्सर हिन्दू हो जाते हैं। राजनीति के लिए हो तो अलग मु्द्दा है पर अंग्रेजी में सवाल पूछा जाये तो वसुधैव कुटुम्बकम का सहारा लेना और अब हिन्दी या तमिल में मेडिकल पढ़ाने की जरूरत बताना बहुत ही हल्कापन है और प्रधानमंत्री से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती है। अगर वे ऐसे हैं और बहुमत को पसंद हैं देश और अगली पीढ़ी के हित में इसका समर्थन नहीं किया जा सकता है। फिर भी आज दैनिक जागरण ने अपने राष्ट्रीय संस्करण में, “तमिल में हस्ताक्षर नहीं करते तमिलनाडु के नेता : मोदी” को छह कॉलम में छापा है। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी अगर खुद गुजराती में दस्तखत कर रहे होते तो उनकी इस बात में दम था। अगर वे खुद गुजराती में दस्तखत नहीं करके हिन्दी में दस्तखत कर रहे हैं तो इसके जो कारण हैं वही तमिल में दस्तखत नहीं करके अंग्रेजी में करने के हो सकते हैं। इसलिए हिन्दी अखबारों के लिए मन की बात जैसा यह मुद्दा इतना बड़ा नहीं था कि छह कॉलम की लीड बनाई जाये। हिन्दुस्तान में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है नवभारत टाइम्स ने लीड के उप शीर्षक में इसका उल्लेख किया है लेकिन यह भाषा विवाद की चर्चा के साथ है और ‘तमिल में दस्तखत नहीं करते’ कहना हताशा भी जताता है। जिसे पता है कि वे खुद गुजराती में नहीं करते हैं उसके लिए यह व्यंग से ज्यादा नहीं है। देशबंधु के शीर्षक में तमिल दस्तखत और तमिल में मेडिकल पढ़ाई दोनों का जिक्र नहीं है। जनसत्ता की लीड का शीर्षक है, कुछ लोगों को बेवजह रोते रहने की आदत होती है। यह प्रधानमंत्री ने कहा है तो उनकी लाचारी है कि एक मुख्यमंत्री की शिकायत दूर नहीं कर पा रहे हैं खासकर उसका जो उनका समर्थक नहीं है। मुझे लगता है कि यह लीड के शीर्षक जैसी बात है और ‘हिन्दू’ हुए बिना प्रधानमंत्री का समर्थन भी हो तो खबर है। कहने की जरूरत नहीं है कि नरेन्द्र मोदी की 10 साल की राजनीति ने दूसरे सभी विरोधियों और विपक्षियों को कमजोर किया है और सबको तुच्छ बताने की उनकी आदत नई नहीं हैं। वे खुद कितने योग्य, ईमानदार और सही हैं, यह अब किसी से छिपा नहीं है। मेरे आठ अखबारों की लीड के शीर्षक आज इस प्रकार रहे
1. इंडियन एक्सप्रेस
भारत को पहला वर्टिकल लिफ्ट (ऊपर की ओर उठने वाला) समुद्री पुल मिला; मुख्यमंत्री स्टालिन कार्यक्रम से अलग रहे। (फ्लैग शीर्षक)। मुख्य शीर्षक है – प्रधानमंत्री ने पंबन पुल का उद्घाटन किया, तमिल की चर्चा के साथ राज्य सरकार पर तंज कसा।
2. हिन्दुस्तान टाइम्स
मोदी ने तमिलनाडु में संरचना बेहतरी की शुरुआत झंडी दिखाकर की, स्टालिन सरकार की आलोचना की। एक और खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने जोर दिया कि श्रीलंका की विकास परियोजनाएं भारत की प्राथमिकता है।
3. टाइम्स ऑफ इंडिया
उद्घाटन की खबर लीड नहीं है। उसकी चर्चा पहले हो चुकी है। लीड का शीर्षक है, इस बात की संभावना कम है कि सरकार चीन से निवेश की जांच आसान करेगी।
4. हिन्दुस्तान टाइम्स
“नया पंबन पुल इंजीनियरिंग का एक अजूबा : प्रधानमंत्री”।
मोदी ने पाल्क स्ट्रेट* पर 531 करोड़ रुपये की लागत से बने पहले वर्टिकल लिफ्ट ब्रिज का उद्घाटन किया और नई ट्रेन सेवा को झंडी दिखाकर रवाना किया, उन्होंने कहा कि इसका लाखों लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव होगा।
(*पाल्क जलडमरूमध्य भारत के तमिलनाडु राज्य और श्रीलंका के उत्तरी प्रांत के बीच स्थित एक जलसंधि है, जो बंगाल की खाड़ी को पाक खाड़ी और मन्नार की खाड़ी से जोड़ती है।)
5. दि एशियन एज
प्रधानमंत्री ने पहले वर्टिकल लिफ्ट सी ब्रिज का उद्घाटन किया, तमिलनाडु में 8300 करोड़ की परियोजनाएं। इसके साथ की एक खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने श्रीलंका में भारत की सहायता वाली दो रेल परियोजनाओं का उद्घाटन किया। इसके साथ उपशीर्षक और फोटो महाबोधि मंदिर में पूजा अर्चना की है। (बहुत सारे लोग सरकारी खर्च या दौरे पर मंदिर जाना, निजी लाभ के लिए पूजा करना अनैतिक मानते हैं)। मुख्य शीर्षक के साथ प्रधानमंत्री का यह दावा फ्लैग शीर्षक है कि भारत की अर्थव्यवस्था 10 साल में दूनी हो गई। मुझे याद है कि पहले (मेरे बचपन में) बैंकों में पांच साल में मूल धन दूना हो जाता था। अर्थ व्यवस्था कमजोर हुई तो यह अवधि बढ़ती गई और अब 10 साल हो गई है। नरेन्द्र मोदी ने जब पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की बात की थी तभी पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इसे बहुत अच्छी तरह समझाया था कि यह अपने आप होगा। कब होगा यह इसपर निर्भर करेगा का सकल घरेलू उत्पाद कितना रहता है। बाद में पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का मुद्दा भुला दिया गया पर पर दिल है कि मानता नहीं। बिना बात के भी श्रेय लेना चाहते हैं।
6. द टेलीग्राफ
यह खबर लीड नहीं है। वहां शिक्षकों की नियुक्ति रद्द किये जाने से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद की स्थितियों से संबंधित खबर लीड है। इसके अनुसार बर्खास्त शिक्षकों ने तय किया है कि वे दोबारा परीक्षा में नहीं बैठेंगे और इस मामले में गलती सरकार की है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कहा जायेगा कि उनकी सरकार को उन्हें बहाल करने का दूसरा तरीका अपनाना चाहिये। यहां पंबन पुल के उद्घाटन की खबर फोटो कैप्शन के रूप में विस्तार से दी गई है और प्रधानमंत्री के भाषण का जिक्र नहीं के बराबर है। पुल की खासियतें बताने वाली इस खबर का शीर्षक खुल जा सिम सिम की तर्ज पर “खुल जा सी-सी (समुद्र से समुद्र का दरवाजा): हिन्द महासागर में प्रवेश का नया रास्ता” है।
7. नवोदय टाइम्स
‘राम राज्य’ की सुशासन की प्रेरणा राष्ट्र निर्माण का बड़ा आधार: मोदी। यह राम और राम राज्य की राजनीति का भाग है और मुझे नहीं लगता है कि प्रधानमंत्री को ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रमों को सांप्रदायिक रंग देना चाहिये। लेकिन भाजपा और संघ के नजरिये से यह हिन्दुत्व की रक्षा है और अगर वे यही करना चाहते हैं तो उन्हें राजनीति (दरअसल सरकारी पद) छोड़कर हिन्दुत्व की सेवा की करनी चाहिये। पर यह सब गंभीर राजनीतिक मुद्दे हैं जिनकी चर्चा अब मीडिया नहीं करता। खास कर हिन्दी वाले जो मौके-बेमौके हिन्दू हो जाते हैं।
8.अमर उजाला
“तमिलनाडु के नेता कम से कम अपने हस्तक्षर तो तमिल भाषा में करें: मोदी”
अंग्रेजी अखबारों का आज का शीर्षक हिन्दी अखबारों की तुलना में गंभीर है और हिन्दुत्व की राजनीति से बचता लगता है। इससे पुल की खास बातें भी समझ में आ रही हैं और यह समझा जा सकता है कि कितने गंभीर मौके पर प्रधानमंत्री ने कितनी हल्की बात की है। हर मौके पर किसी मंदिर के चक्कर लगा लेना उनकी राजनीति का हिस्सा है। वे इसे निजी यात्रा कहकर खबर रुकवा सकते थे। पर आप जानते हैं कि जरूरत हुई तो वे मुख्य न्यायाधीश के घर भी पूजा करने पहुंच गये और उसका वीडियो खुद सार्वजनिक किया था। कुल मिलाकर ऐसे दौरे वे राजनीतिक लाभ के लिए करते हैं, अखबारों को यह पता है तो वे इसे प्रचार देने से रुक सकते थे पर…। कहने की जरूरत नहीं है कि पंबन पुल का उद्घाटन एक बड़ी खबर है और आज यह कई अखबारों में लीड है। यह देश का दुर्भाग्य है कि इसके उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री ने देश को भाषा के आधार पर बांटने की कोशिश की, विरोध कर रहे एक मुख्यमंत्री पर फूहड़ तंज कसा और उससे भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिन्दी अखबारों को यह बात समझ में नहीं आई या समझते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री के पक्ष को प्रचार दिया। संभव है, यह उनका हिन्दू होना और हिन्दुत्व का समर्थन हो।



