
संजय कुमार सिंह
हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर का शीर्षक है, इंडिया ग्लोबल ब्राइट स्पॉट : फाइनेशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट। इस शीर्षक का सही हिन्दी अनुवाद चाहे जो हो पहली नजर में पढ़कर लगता है कि वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार भारत वैश्विक स्तर पर कोई चमकीली जगह है। असल में खराब आर्थिक स्थिति के कारण वैश्विक स्तर पर सबकी नजर भारत पर हो तब भी यही लिखा जायेगा और कह सकते हैं कि शीर्षक भ्रामक है। नकारात्मक खबर का सकारात्मक शीर्षक तो है ही। गूगल करने पर यह शीर्षक गई जगह मिला और इसे मुश्किल वैश्विक स्थिति में उज्ज्वल कहा गया है। द टेलीग्राफ में बिजनेस पेज पर इसका शीर्षक है, आरबीआई ने वित्तीय व्यवस्था के प्रति जोखिम को रेखांकित किया। इसलिए, स्थिरता रिपोर्ट शीर्षक को छोड़ भी दें तो खबर का मशीनी अनुवाद इस प्रकार है, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2025 की दूसरी छमाही में माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र में फंसी परिसंपत्तियों का अनुपात बढ़ा है। कर्ज के भुगतान में 31 से 180 दिन की देरी वाली (डीपीडी) दबावग्रस्त संपत्तियां मार्च 2025 में बढ़कर 6.2 प्रतिशत हो गई हैं, जो सितंबर 2024 में 4.3 प्रतिशत थीं। बैंकिंग सेक्टर के माइक्रोफाइनैंस पोर्टफोलियो पर दबाव बढ़ा है और 31 से 180 डीपीडी 4.7 प्रतिशत से बढ़कर 6.5 प्रतिशत हो गई है। माइक्रोफाइनैंस सेक्टर दबाव में है। इस सेक्टर को मिलने वाला ऋण 2024-25 में 13.9 प्रतिशत घटा है। पूरी खबर पढ़ लें तो आर्थिक स्थिति का अंदाजा लग जायेगा। इस खबर के साथ एक और शीर्षक है, जीएसटी आठ साल का हुआ, प्रमुख आर्थिक सुधार साबित हुआ। टेलीग्राफ में एसटी पांच साल में दूना होने की खबर भी है लेकिन छोटी सी क्योंकि सबको पता है कि यह सरकारी लूट है और इसी के कारण महंगाई बढ़ी है।
हाल में मैंने लिखा था कि तमाम संस्थाओं को और इनमें सरकारी संस्थाएं शामिल हैं, 2018-19 का करोड़ों रुपया बकाया होने का नोटिस दिया गया जिसे कोर्ट और दूसरे सक्षम प्राधिकारों ने खारिज कर दिया है। इसके बावजूद निजी क्षेत्र की ऐसी कंपनियों को नोटिस दिया जा रहा है जो आम तौर पर कर चोरी नहीं करते रहे हैं और साफ काम करने के लिए जाने जाते हैं। बाद में मामले खारिज हो जायें तब भी टाटा स्टील जैसी कंपनी को इनपुट टैक्स क्रेडिट का अनियमित लाभ लेने पर 1007 करोड़ रुपये की मांग का नोटिस मिला है। जीएसटी में इनपुट क्रेडिट का लाभ लेने का प्रावधान है, सरकार ही देती है और उसी का विभाग गलत लाभ लेने का आरोप लगाता है, वर्षों बाद। अगर सही होता तो खारिज नहीं किया जाता और इतने साल बाद सही भी हो तो उससे शेयर बाजार में नुकसान हो जाता है और मुकदमा लड़ना सही फैसला हासिल करना भारी मुश्किल है। अधिकारियों जजों के लिए भी मुसीबत है कि सरकार के खिलाफ फैसला दें तो लगेगा कि निजी कंपनी के प्रभाव में लिया गया और कंपनी को पुराने मामले को गलत साबित करने के लिये अतिरिक्त संसाधन लगाने होंगे जिसका नुकसान काम पर पड़ेगा। यह सब लाल फीताशाही की स्थिति है, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के साथ चल रहा है और मीडिया सच बताने की बजाय हमेशा से गड़बड़ जीएसटी की तारीफ कर रहा है। राजनीतिक मामलों के बाद आर्थिक मामलों में ऐसी पत्रकारिता चिन्ता का कारण होना चाहिये।
द टेलीग्राफ ने आज न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस की एक विस्तृत खबर छापी है जो बताती है कि कर्नाटक के बेंगलुरु ग्रामीण जिले में आईफोन की फैक्ट्री लगने के बाद क्या सब हुआ है। अखबार ने लिखा है डोनाल्ड ट्रम्प चाहते हैं कि ऐप्पल ऐसा ही अमेरिका में करे और जो हो रहा है वह आकर्षक तो है ही, यह भी लगता है संभवतः ऐसा नहीं होगा और क्यों। इस समय इसमें 8,000 लोग काम कर रहे हैं और जल्दी ही यह संख्या 40,000 होगी। ट्रम्प ने ऐप्पल से जो कहा वह भारत में भी खूब छपा है और सबको पता है। फिर भी भारत में किसी मीडिया संस्थान ने ऐसी खबर नहीं की जैसी न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस ने की है और जिसे टेलीग्राफ ने आज प्रमुखता से छापा है। ऐप्पल पर ट्रम्प के दबाव और पूर्व में भारत सरकार के दबाव के चलते ऐप्पल अपना इरादा न बदले यह किसी भी देशभक्त की चिन्ता होनी चाहिये और संबंधित खबर देना किसी भी मीडिया संस्थान का काम है। ऐसी खबर करना न तो मुश्किल है न जोखिम भरा फिर भी आम तौर पर तमाम मीडिया संस्थान नहीं करते हैं। दूसरी और, इंडियन एक्सप्रेस में आज डिजिटल लूट की उसकी कल की खबर की दूसरी किस्त है। इसमें बताया गया है और यही शीर्षक है कि ऐसी ही एक लूट का 3.72 करोड़ रुपया एक ऐसे खाते में गया जिसका शुरुआती बैलेंस बमुश्किल 500 रुपये था। एक ही दिन में इसमें से 3.33 करोड़ रुपये निकल भी गये। ऐसे किसी खाते में इतनी बड़ी रकम जाना और फिर निकल जाना – निश्चत रूप से असामान्य है और इसपर ध्यान दिया जाना चाहिये था पर अखबार ने शीर्षक में ही यह भी लिखा है कि किसी ने ध्यान नहीं दिया। खबर के मुताबिक पूर्वी दिल्ली के पते वाली यह इकाई छह राज्यों में जांच के केंद्र में है और यह सब तब जब बैंक दावा करते हैं कि वे प्रक्रिया का पालन करते हैं। केवाईसी नियमों की आड़ में ग्राहकों को इतना परेशान करते हैं कि डिजिटल ठग ग्राहकों को सफलता पूर्व ठग लेते हैं। दूसरी ओर, जनता लुट रही है, सामान्य सतर्कता भी नहीं बरती जा रही है। अपराधियों को पकड़कर इस तरह की लूट और ठगी को रोकना तो बड़ी बात है।
इसके बावजूद मीडिया न सिर्फ सरकार का साथ दे रहा है, उसकी प्राथमिकताओं पर उंगली नहीं उठा रहा है बल्कि सरकार जिसे परेशान करती है उसका भी साथ नहीं देता है या उसके मामलों का भी खुलासा नहीं करता है। कल मैंने यहां लिखा था कि सरकार ने अपनी एजेंसियों को अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को भ्रष्ट साबित करने में नहीं लगाया होता और एक पार्टी के रूप में वाशिंग मशीन की तरह काम नहीं कर रही होती तो एजंसियां जनहित के ये काम कर पातीं। इसमें यह भी दिलचस्प है कि पहले कई मामले छोटे और स्थानीय अखबारों में छपते थे और फिर उनके हवाले से बड़े अखबारों में छप जाते थे। बड़े अखबार अपनी जरूरत के अनुसार जांच करते या नहीं करते थे। 2014 के बाद छोटे अखबारों और उनके संपादकों को इतना परेशान किया गया है कि अब वे सरकार विरोधी खुलासे नहीं के बराबर कर रहे हैं या कर पा रहे हैं। वैसे भी ऐसे खुलासों के लिए संसाधनों की जरूरत होती है और छोटे मीडिया संस्थान इसके बिना काम करते हैं। इसलिए अब कई मामलों की पोल नहीं खुलती है। दूसरी ओर, सरकारी एजंसियों की योग्यता, निष्पक्षता और प्राथमिकता हमेशा से संदिग्ध रही है और उसमें भी कोई सुधार नहीं हुआ है। इसी का नतीजा है कि अपराधी बेलगाम हो गये हैं और गोरक्षा के नाम पर हत्या हो या आपराधिक गतिविधियों में रोकथाम का मामला – वे अफसरों को भी पीटने से नहीं चूकते। कितने ही मामले हैं और ज्यादातर डबल इंजन वाले राज्यों के। इनमें एक मामला उड़ीशा की राजधानी भुवनेश्वर का है जो कल से सोशल मीडिया पर छाया हुआ है लेकिन अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। पश्चिम बंगाल की कोई वारदात हो तो पहले पन्ने पर ही रहती है। इस बार सामूहिक बलात्कार के मामले में तो टीएमसी का नेता ही आरोपी है इसलिये खबर पहले दिन से पहले पन्ने पर है। हालांकि, इसके साथ टीएमसी नेताओं का सिरफुटव्वल भी है जो भाजपा में इन दिनों नहीं के बराबर हो रहा है।
वाशिंग मशीन पार्टी की प्रमुख सहयोगी और देश की शीर्षस्थ जांच एजेंसी से संबंधित एक खबर आज हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। इसके अनुसार, जेएनयू के छात्र नजीब के लापता होने के नौ साल बाद कोर्ट ने उसे नजीब की तलाश बंद करने की इजाजत दे दी है। दूसरे शब्दों में सीबीआई ने नजीब को तलाशने के मामले में हार मान ली है। यह वही सीबीआई है जो बंगाल के हर मामले की जांच करती है और डॉक्टर की हत्या के बहुत स्पष्ट और लगभग हल हो चुके मामले की जांच सीबीआई से कराई गई पर उसे कलकत्ता पुलिस की जांच से अलग कुछ नया नहीं मिला। दूसरी ओर, ऐसी गैरजरूरी या कम जरूरी जांच में फंसी सीबीआई जरूरी मामलों की जांच नहीं कर पा रही है और इसमें बैंक घोटाले तथा डिजिटल ठगी शामिल है। नरेन्द्र मोदी सरकार की कार्यशैली से यह साबित हो चुका है कि सरकार जो चाहे करती है और जिस लाभ या मकसद की अपेक्षा करती है उसके प्रति आश्वस्त रहती है और कई बार धोखा खाने या चूक जाने के बावजूद रणनीति नहीं बदल रही है और सरकार की ट्रोल सेना जरूरत के अनुसार रंग बदले तो बदले, मीडिया भी बदल लेता है और इसमें टेलीविजन मीडिया ज्यादा बेशर्म या उदार है। नोटबंदी से लेकर ऑपरेशन सिन्दूर और पाकिस्तान से युद्ध तक के मामले में यह सब होता रहा है और मीडिया सरकार की पोलखोल न भी करे तो जो खबरें हैं, सार्वजनिक हैं, सोशल मीडिया पर हैं उन्हें भी नहीं छापता। दूसरी ओर ‘मन की बात’ का प्रचार नहीं छोड़ता है।
आज भी ज्यादतर अखबारों की लीड प्रचार ही है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, एक अंतरिम व्यापार सौदा करने के लिए भारतीय वार्ताकारों ने अमेरिका में रहने की अवधि बढ़ाई। ट्रम्प के जवाबी टैरिफ पर 90 दिन के विराम की मियाद 9 जुलाई को खत्म हो रही है। इस दिशा में हमारे चौकीदार की सरकार ने क्या किया और क्या नहीं कर पाई या कैसी कोशिशें चल रहा हैं – यह सब खबर है। लेकिन मिले तब ना? और खबर का हाल ये है कि प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने वाले के नेतृत्व में चल रही लोकप्रिय सरकार आरटीआई के जवाबों से बचने का रास्ता ढूंढ़ रहे हैं। मनमानी ऐसी कि महाराष्ट्र में लाखों वोटर बढ़ गये, बिहार में कम करने की तैयारी। ज्यादातर अखबारों के लिए अभी यह मुद्दा नहीं है और चुनाव आयोग ने जो कहा है उसका मतलब यही है कि कुछ खास नहीं करेगा। फिर इतना प्रचार किसलिये और चुनाव आयोग ने वह सब किसके लिए कहा जो उसका काम ही नहीं है। जो भी हो, आज देशबन्घु की लीड का शीर्षक है, पांच करोड़ मतदाताओं को नहीं देना होगा दस्तावेज। मैं पहले बता चुका हूं कि जो दस्तावेज मांगे जा रहे हैं वो बिहार में बहुतों के पास नहीं होंगे, बहुतों के बने ही नहीं हैं और जिनके हैं उनसे मांगने की जरूरत नहीं है। अभी तक इनके बिना लोग मतदाता सूची में शामिल किये जाते रहे हैं तो इस बार क्यों नहीं। इसमें यह भी दिलचस्प है कि अमर उजाला की एक खबर के अनुसार, वाराणसी नगर निगम के वार्ड नंबर-51 भेलूपुर के कश्मीरीगंज मोहल्ले की मतदाता सूची में क्रमांक संख्या 234 से 284 तक के मतदाताओं के पिता का नाम राम कमल दास और मकान नंबर बी-24/19 दर्ज था। इसे लेकर हो-हल्ला हुआ तो स्थानीय लोगों ने बताया कि राम कमल दास वेदांती महाराज खोजवां स्थित राम मंदिर में गुरु दीक्षा देते हैं। मौजूदा समय में वह अमेरिका में हैं। राम कमल दास वेदांती महाराज के प्रतिनिधि के अनुसार, मतदाता सूची में जो भी नाम हैं, वह वेदांती महाराज के शिष्यों के हैं। मठ के ब्रह्मचारी शिष्य अपने गुरु को पिता मानते हैं और वही लिखते भी हैं। लेकिन, यह मतदाता सूची ढाई दशक से ज्यादा पुरानी है और उसे अपडेट नहीं किया गया है। इसी वजह से वह नाम आज भी (खबर लिखने तक) मतदाता सूची में जस के तस हैं।
जाहिर है, मतदाता सूची में नाम दर्ज करवाना कितना आसान रहा है। ठीक है कि यह नगर निगम चुनाव का था पर वहां भी ऐसा क्यों हो और यह तब की बात है जब आधार जैसा विश्वसनीय पहचान पत्र नहीं था। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने आधार को लगभग जरूरी बना दिया है लेकिन मतदान के लिए मतदाता सूची और मतदाता परिचय पत्र बन ही रहे हैं। एक देश एक चुनाव की संभावना तो टटोली जा रही है पर एक देश एक परिचय पत्र की चर्चा भी नहीं है। पहले यह सब मुश्किल था लेकिन अब एक आधार पर मतदाता परिचय पत्र से लेकर पैन नंबर और ड्राइविंग लाइसेंस सब का विवरण (या नंबर) लिखा जा सकता है। ऐसे में आधार पर पैन नंबर नहीं है मतलब संबंधित व्यक्ति का पैन नहीं है। इसी तरह मतदाता सूची का विवरण नहीं है मतलब वह मतदाता नहीं है और अगर ड्राइविंग लाइसेंस का विवरण है मतलब लाइसेंस है। अलग-अलग कार्य की जगह एक कार्ड होने के कई फायदे हैं, सरकारी खर्चा भी कम होगा और दोहराव या नियम नहीं मानने या कोई नया नियम लागू कर देने का भी मामला नहीं होगा। पर सच्चाई यही है कि अलग-अलग मतदाता सूची बनती रही है। गाजियाबाद नगर निगम के चुनाव 2022 में हुए थे और उसकी मतदाता सूची लोकसभा और विधानसभा चुनाव से अलग है और यह गाजियाबाद के 100 निकाय या वार्ड के लिए अलग-अलग आज भी इंटरनेट पर मौजूद है। संभव है, किन्हीं कारणों से ऐसा जरूरी हो पर मुद्दा तो यह है कि क्या हर चुनाव क्षेत्र के लिये मतदाता की परिभाषा अलग होगी? जाहिर है नहीं हो सकती है और यह उचित नहीं है कि घुसपैठिये निगम चुनाव में वोट दें और उन्हें लोकसभा या विधानसभा चुनाव में वोट नहीं देने दिया जाये और यह किसी पार्टी की जरूरत या इच्छा से हो।
बिहार में अभी अगर कुछ भी नया और अलग हो रहा है तो क्यों? लोकसभा चुनाव की मतदाता सूची को अद्यतन क्यों नहीं किया जा रहा है? घुसपैठियों और विदेशियों को निकालने का काम लोकसभा चुनाव के बाद किया जा सकता था या विधानसभा चुनाव के बाद भी किया जा सकता है। बिहार में अभी क्यों और महाराष्ट्र या हरियाणा में विधानसभा चुनाव से पहले क्यों नहीं। बाद के विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में ऐसा ही होगा इसकी भी कोई गारंटी सुनने में नहीं आई। हालांकि कल (30 जून को) देशबन्धु की एक खबर का शीर्षक था, “झूठी और नकली निकली मोदी की गारंटी : केजरीवाल”। यह आरोप आम आदमी पार्टी ने झुग्गियां तोड़ने के विरोध में प्रदर्शन के बाद लगाया है। भले ही यह आरोप नरेन्द्र मोदी या प्रधानमंत्री पर हो लेकिन चुनाव आयोग इनसे अलग भी तो नहीं दिखता है। कुल मिलाकर, लग रहा है कि बिहार की मतदाता सूची में इस बार फर्जी नाम नहीं होंगे (या कम होंगे) और सूची बनाने में थोड़ी सतर्कता बरती जायेगी। दि एशियन एज की खबर के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त ने भी यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि एक भी वोटर न छूटे। इसका मतलब यह भी है कि फालतू लोग मतदाता नहीं बनेंगे और इसी का प्रचार किया गया जिससे चुनाव आयोग को प्रचार मिला और महाराष्ट्र के मसले तथा राहुल गांधी की मांग से ध्यान हटा रहा। दूसरी ओर, सरकार और उसके समर्थक हर संभव मौके पर सरकार का प्रचार करने से नहीं चूकते। आज टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड वही है जो इंडियन एक्सप्रेस की है लेकिन दोनों के शीर्षक में स्पष्ट अंतर है। इंडियन एक्सप्रेस का मुख्य शीर्षक है, एक अंतरिम व्यापार सौदा करने के लिए भारतीय वार्ताकारों ने अमेरिका में रहने की अवधि बढ़ाई। इसके मुकाबले टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, डील के लिए अंतिम समय आठ दिन दूर है, अमेरिकी वार्ता अभी भी फंसी हुई है। हिन्दुस्तान टाइम्स और दि एशियन एज की लीड प्रधानमंत्री की पांच देशों की यात्रा है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने शीर्षक में ही बताया है कि प्रधानमंत्री के एजंडा में सुरक्षा और खनिज है ताकि यह छवि न बने कि वे घूमते रहते हैं। दि एशियन एज ने बताया है कि वे ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने जा रहे हैं। द टेलीग्राफ में कोलकाता के सामूहिक बलात्कार कांड से संबंधित खबर को लीड बनाया है जबकि द हिन्दू में हैदराबाद के पास तेलंगाना की एक फार्मा इकाई में विस्फोट और उसमें 17 लोगों की मौत की खबर है। हिन्दी अखबारों में अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, “भारत के साथ सीमा विवाद सुलझाने में वक्त लगेगा, परिसीमन पर चर्चा को तैयार :चीन”। ऐसे में रक्षा मंत्री राज नाथ सिंह हाल के अपने चीन दौरे के दौरान क्या बात करके आये होंगे और सीमा विवाद पर उन्होंने जो कहानियां बनवाई हैं वो अपनी जगह है। अमर उजाला की आज की खबर चीन सरकार के नियंत्रण वाले अखबार, ग्लोबल टाइम्स की खबर के हवाले से है और वहां यह खबर वहां के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के हवाले से है। मैं इस खबर की विश्वसनीयता या गंभीरता पर कुछ कहूं उससे बेहतर यह बताना होगा कि अमर उजाला ने इंडियन एक्सप्रेस की खबर की इतनी जगह दी होती या उसके हवाले से कुछ लिखा होता तो उसकी पठनीयता और गंभीरता इस खबर के मुकाबले कई गुणा होती। लेकिन यह संपादकीय विवेक और स्वतंत्रता का मामला है। नवोदय टाइम्स की आज की लीड, कश्मीर पर मुनीर ने उगला जहर है। इसके जरिये यह बताने या स्थापित करने की कोशिश हो रही लगती है कि मनीर और ट्रम्प हमारे मोदी जी को परेशान कर रहे हैं। मुझे लगता है कि ऐसा हो भी और इसका यकीन दिला दिया जाये तब भी पत्रकार या संपादक का काम यह बताना है कि हमारे प्रधानमंत्री कितने लाचार है। ट्रम्प के टैरिफ ही नहीं, युद्ध विराम से लेकर आज छपी टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस की खबरों के लिहाज से। दोनों अखबारों में यह लीड इसी कारण है। पर हिन्दी अखबारों में काम करने वाले लोगों की योग्यता और संख्या दोनों चुनौतियों से भरी है और शायद ही हिन्दी में कोई अखबार ऐसा हो जहां खबर करने वाला कोई ऋतु सरीन की बराबरी में रखा जा सके। अनुभव, उम्र, वेतन या संपर्क – किसी भी लिहाज से। इसीलिए डिजिटल घोटाले की उनकी खबर धूम मचा रही है। दूसरी ओर, प्रचारक जीएसटी की प्रशंसा के पुल बांध रहे हैं।


